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Sunday, April 24, 2011

बेहतर सेहत कैंसर से लड़ने की ज्यादा ताकत देती है

सेहत पहले से ही अच्छी हो तो कैंसर से होने वाली 65 फीसदी मौतों को रोका जा सकता है


स्तन कैंसर का इलाज कराने वाली महिलाओं के लिए उनकी कैंसर होने के पहले की सेहत भी बहुत मायने रखती है। अमेरिका के After Breast Cancer Pooling Project में शामिल शुरुआती स्तन कैंसर की 9,400 महिलाओं पर कैसर का पता लगने के दिन से अगले सात साल तक लगातार नजर रखी गई। पाया गया कि इनमें से करीब आधी महिलाओं का बॉडी-मास इंडेक्स (बीएमआई) यानी लंबाई और वजन का अनुपात गड़बड़ था। सरल शब्दों में कहें तो वे मोटी थीं, उनका वजन लंबाई और उम्र के अनुपात में ज्यादा था। और इस वजह से उनकी कुल सेहत भी खराब थी। जिन महिलाओं की सेहत इलाज के शुरू में खराब आंकी गई उनमें से 27 फीसदी को दोबारा कैंसर हुआ- उसी जगह या फिर नई जगह पर नया कैंसर। जबकि आम तौर पर शुरुआती स्टेज का कैंसर ज्यादा खतरनाक नहीं माना जाता।
इन महिलाओं की सेहत के आंकड़ों का विश्लेषण करके यह भी पाया गया कि इन कम स्वस्थ महिलाओं की कैंसर या किसी और बीमारी से मरने की संभावना सामान्य वजन वाली महिलाओं की तुलना में 65 फीसदी ज्यादा रही। इनके बारे में पाया गया कि वे कम सक्रिय थीं, इन्हें नींद की समस्या रही, और उच्च रक्तचाप या डाइबिटीज होने की संभावना 50 फीसदी ज्यादा थी और आर्थराइटिस होने की संभावना भी दोगुनी रही। American Association for Cancer Research (AACR), के ओरलैंडो में हुए सम्मेलन में इस अध्ययन को प्रस्तुत किया गया। डॉक्टरों का कहना था कि सिर्फ कैंसर के इलाज के बजाए महिलाओं के कुल स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर उनके सामान्य स्वास्थ्य में पांच फीसदी का भी सुधार होता है तो उनके जीवन की गुणवत्ता और जीवित रहने के अवसरों में खासा सुधार होता है।

न सिर्फ कैंसर के मौके के लिए बल्कि हमेशा हम अपनी सेहत पर ध्यान देते रहें और खान-पान, कसरत आदि पर ध्यान देते रहें तो किसी भी बीमारी से बेहतर लड़ सकेंगे, बल्कि कई बीमारियों को आने के पहले ही जरूर रोक सकेंगे।

Sunday, May 31, 2009

इसके बावजूद तंबाकू का सेवन करने वाले, धूम्रपान करने वाले खोपड़ी से खाली हैं....

आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस है।






# “पता है, स्मोकिंग दरअसल आप नहीं करते। सिगरेट ही स्मोकिंग करती है। आप तो सिर्फ सिगरेट का छोड़ा हुआ धुंआ पीते हैं।“


# “अब यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि सिगरेट दुनिया में आंकड़ों के होने का एक प्रमुख कारण है।“











तंबाकू पर ज्यादा जानकारी के लिए 18 मई 2008 की पोस्ट देखें- कैंसर की दुनिया का आतंकवादी पत्ता: तंबाकू

Monday, April 20, 2009

कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-4)

खान-पान और कैंसर

अनुमान है कि विभिन्न कैंसरों से होने वाली 30 फीसदी मौतों को जीवन भर सेहतमंद खान-पान और सामान्य कसरत के जरिए रोका जा सकता है। लेकिन कैंसर हो जाने के बाद सिर्फ बोहतर खान-पान के जरिए इसे ठीक नहीं किया जा सकता। इंटरनैशनल यूनियन अगेन्स्ट कैंसर (यूआईसीसी) ने अध्ययनों में पाया कि एक ही जगह पर रहने वाले अलग खान-पान की आदतों वाले समुदायों में कैंसर होने की संभावनाएं अलग-अलग होती हैं। ज्यादा चर्बी खाने वाले समुदायों में स्तन, प्रोस्टेट, कोलोन और मलाशय (रेक्टम) के कैंसर ज्यादा होते हैं।

भोजन के खाद्य तत्वों के अलावा बाहरी तत्व, जैसे- प्रिजर्वेटिव और कीटनाशक रसायन, उसे पकाने का तरीका यानी जलाकर ((ग्रिल), तेज आंच पर देर तक पकाना आदि, और उसमें पैदा हुए फफूंद या जीवाणु यानी बासीपन आदि भी कैंसर को बढ़ावा देते हैं।

खाद्य सुरक्षा और खाने की सुरक्षा, दोनों का ही कैंसर की संभावना से गहरा संबंध है। विकसित देशों में अतिपोषण की समस्या है तो विकासशील देशों में कुपोषण की। जब जरूरी पोषक तत्वों की कमी से शरीर किसी बीमारी से लड़ने में पूरी तरह सक्षम नहीं होता तो शरीर कैंसर का आसान शिकार बन जाता है।

मांसाहार बनाम शाकाहार-

सेहतमंद खानपान की बात हो तो ये मुद्दा आना ही है कि मांसाहार बेहतर है कि शाकाहार। मेरा अपना विवेक शाकाहार के पक्ष में तर्क देता है। नीचे कुछ तथ्य हैं जो मैंने शाकाहार के समर्थन में ढूंढ निकाले हैं। मांसाहार के पक्ष में आपकी राय हो तो जरूर बताएं, चर्चा ज्यादा समृद्ध होगी।

*जर्मनी में 11 साल तक चले एक अध्ययन में पाया गया कि शाकाहारी भोजन खाने वाले 800 लोगों को आम लोगों के मुकाबले कैंसर कम हुआ। कैंसर होने की दर सबसे कम उन लोगों में थी जिन्होंने 20 साल से मांसाहार नहीं खाया था।

*ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैंसर में 2007 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 35 हजार महिलाओं पर अपने 7 साल लंबे अध्ययन में पाया गया कि जिन बूढ़ी महिलाओं ने औसतन 50 ग्राम मांस हर दिन खाया, उन्हें, मांस न खाने वालों के मुकाबले स्तन कैंसर का खतरा 56 फीसदी ज्यादा था।

* 34 हजार अमरीकियों पर हुए एक अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि मांसाहार छोड़ने वालों को प्रोस्टेट, अंडाषय और मलाशय (कोलोन) का कैंसर का खतरा नाटकीय ढ़ंग से कम हो गया।

* 2006 में हार्वर्ड के अध्ययन में शामिल 1,35,000 लोगों में से अक्सर ग्रिल्ड चिकन खाने वालों को मूत्राशय का कैंसर होने का खतरा 52 फीसदी तक बढ़ गया।

शाकाहार किस तरह कैंसर के लिए उपयुक्त स्थियों को दूर रखता है-

* मांस में सैचुरेटेड फैट अधिक होता है जो शरीर में कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है। (चर्बी निकाले हुए चिकेन से भी, मिलने वाली ऊर्जा की कम से कम आधी मात्रा चर्बी से ही आती है।) चिकेन और कोलेस्ट्रॉल शरीर में ईस्ट्रोजन हार्मोन को बढ़ाता है जो कि स्तन कैंसर से सीधा संबंधित है। जबकि शाकाहार में मौजूद रेशे शरीर में ईस्ट्रोजन के स्तर को नियंत्रित रखते हैं।

* मांस को हजम करने में ज्यादा एंजाइम और ज्यादा समय लगते हैं। ज्यादा देर तक अनपचा खाना पेट में अम्ल और दूसरे जहरीले रसायन बनाता है जिससे कैंसर को बढ़ावा मिलता है।

* मांस-मुर्गे का उत्पादन बढ़ाने के लिए आजकल हार्मोन, डायॉक्सिन, एंटीबायोटिक, कीटनाशकों, भारी धातुओं का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है जो कैंसर को बढ़ावा देते हैं। थोड़ी सी जगह में ढेरों मुर्गों को पालने से वे एक-दूसरे से कई तरह की बीमारियां लेते रहते हैं। ऐसे हालात में उन्हें जिलाए रखने के लिए खूब एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं जिनमें आर्सेनिक जैसी कैंसरकारी भारी धातुएं भी होती हैं।

* मांस-मुर्गे में मौजूद परजीवी और सूक्ष्म जीव कुछ तो पकाने पर मर जाते हैं और कुछ हमारे शरीर में बढ़ते हैं और कैंसर और दूसरी बीमारियां पैदा करते हैं, हमारी प्रतिरोधक क्षमता को थका देते हैं।

* शाकाहार में मौजूद रेशे बैक्टीरिया से मिलकर ब्यूटिरेट जैसे रसायन बनाते हैं जो कैंसर कोशा को मरने के लिए प्रेरित करते हैं। दूसरे, रेशों में पानी सोख कर मल का वजन बढ़ाने की क्षमता होती है जिससे जल्दी-जल्दी शौच जाने की जरूरत पड़ती है और मल और उसके रसायन ज्यादा समय तक खाने की नली के संपर्क में नहीं रह पाते। खूब फल और सब्जियां खाने से मुंह, ईसोफेगस, पेट और फेफड़ों के कैंसर की संभावना आधी हो सकती है।

* फलों और सब्जियों में एंटी-ऑक्सीडेंट की प्रचुर मात्रा होते हैं जो शरीर में कैंसरकारी रसायनों को पकड़ कर उन्हें 'आत्महत्या' के लिए प्रेरित करते हैं।

* शाकाहार में मौजूद विविध विटामिन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और इस तरह कैंसर कोषाएं फल-फूल कर बीमारी नहीं पैदा कर पातीं। शाकाहार जरूरी लवणों का भी भंडार है।

Saturday, April 18, 2009

कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-3)

कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-2)

कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-1)


फ्री-रैडिकल्स और ऐंटी-ऑक्सीडेंट

ऑक्सीडेशन एक रासायनिक प्रक्रिया है जिससे लोहे में जंग लगती है और हमारे शरीर में भी। हमारे शरीर में मौजूद फ्री-रैडिकल्स ऐसे अणु हैं जिनमें एक इलेक्ट्रॉन कम होता है जिसकी पूर्ति के लिए वे दूसरे अणुओं की ओर जल्द आकर्षित होते हैं और उनके इलेक्ट्रॉन चुरा लेते हैं। अब जिस अणु का इलेक्ट्रॉन चोरी हुआ है वह किसी और का चुराने को उद्धत रहता है इस तरह यह चेन रिऐक्शन चलता रहता है जिससे कोशिका के भीतर कई तरह के अणु, यहां तक कि डीएनए भी प्रभावित होते है।

डीएनए का एक अणु भी अपनी जगह से हिला तो उसके जेनेटिक कोड में बदलाव आ जाता है और कोशिका का काम-काज प्रभावित होता है। तंबाकू, धुंए, रेडिएशन जैसी कई चीजों में फ्री-रैडिकल्स होते हैं जो कोशिका के जेनेटिक कोड में बदलाव लाकर कैंसर भी पैदा कर सकते हैं।

फ्री-रैडिकल्स के लिए इलेक्ट्रॉन देने में शरीर में मौजूद ऑक्सीजन अव्वल होती है। इसलिए फ्री-रैडिकल्स को इलेक्ट्रॉन की पूर्ति होना ऑक्सिडेशन कहलाता है। जो अणु फ्री-रैडिकल्स के ऑक्सिडेशन को रोकते हैं उन्हें ऐंटी-ऑक्सीडेंट कहा जाता है।

ऐंटी-ऑक्सीडेंट, जैसे विटामिन ई और सी, फ्री रैडिकल्स के साथ रिऐक्शन करके उन्हें काबू में रखते हैं और इस तरह ऑक्सीडेशन की चेन रिऐक्शन को, यानी कैंसर पैदा होने की स्थितियों को रोकते हैं। पेड़-पौधों में ऐंटी-ऑक्सीडेंट काफी होते हैं। ये हमारे शरीर में भी पैदा होते हैं लेकिन काफी कम मात्रा में।

फाइटोकेमिकल्स यानी पौधों से मिलने वाले रसायन जो कैंसर को रोकते हैं, उसकी ग्रोथ को रोकते हैं या उसे ठीक करने में मदद करते हैं। अब तक कोई ऐसा फाइटोकेमिकल नहीं खोजा जा सका है जिससे कैंसर का इलाज हो जाए। हालांकि कैंसर को रोकने में कई फाइटोकेमिकल्स कामयाब पाए गए है।

ऐंथोसायनिन ऐसे रसायन हैं जो सब्जियों, साइट्रस फलों, बेरीज़ आदि को लाल, नीला और जामुनी रंग देते हैं। इनसे बढ़ी उम्र से जुड़ी तकलीफें, दिल की बीमारियां, मोटापे और कैंसर रोकने में मदद करते हैं। ये ऐंटी-ऑक्सीडेंट का काम करके डीएनए को नुकसान से बचाते हैं।

करक्यूमिन हल्दी को पीला रंग देने वाला रसायन है। यह ऐटी-ऑक्सीडेंट के साथ ही कीटीणु-नाशक, विष-नाशक भी है। यह स्वस्थ कोशाओं को छेड़े बिना ट्यूमर की बीमार कोशिकाओं के विकास को धीमा कर देता है।

ईजीसीजी या एपीगैलोकैचिन-3-गैलेट हरी चाय में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो त्वचा, कोलोन, स्तन, पेट, लिवर और पेफड़ों के कैंसर को रोकने में मदद करता है। पानी के बाद सबसे ज्यादा पिया जाने वाला पेय- चाय की पत्ती को जब फर्मेंट या प्रोसेस नहीं किया जाता तो उसके ज्यादातर गुण रह जाते हैं।

लाइकोपीन टमाटरों को लाल रंग देने वाला रसायन है। यह तरबूज़, अंगूर, अमरूद र पपीते में भी थोड़ी-बहुत मात्रा में मिलता है। इसका सेवन करने से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा कम हो जाता है। साबित हो चुका है कि ताजे टमाटरों से मिलने वाला लाइकोपीन ज्यादा असरदार होता है, बजाए लाइकोपीन की गोलियों के।

ईस्ट्रोजन हार्मोंन जो मानव शरीर में अपने आप बनता है। इसके समान हार्मोन पौधों में भी होता है- फाइटोईस्ट्रोजन। सोया उत्पादों में यह बड़ी मात्रा में होता है। ईस्ट्रोजन हार्मोंन स्तन, बच्चेदानी की झिल्ली और प्रोस्टेट कैंसर का कारण है। जबकि फाइटोईस्ट्रोजन की मौजूदगी ईस्ट्रोजन के बुरे प्रभाव को कम कर देती है।

पिक्नोजेलोन फ्रांस में पाए जाने वाले चीड़ के पेड़ की छाल से मिलने वाला रसायन है। यह अंगूर और कोकोआ में भी पाया जाता है। इसके ऐंटी-ऑक्सीडेंट प्रभाव की पड़ताल जारी है।

Friday, October 31, 2008

जो पहले ज़ख्म था, नासूर बन गया

इन पृष्ठों पर कैंसर के रिस्क फैक्टर्स यानी कैंसर की संभावना बढ़ाने वाले कारकों के बारे में चर्चा हुई है। लेकिन कैंसर का एक और रिस्क फैक्टर है जिसके बारे में हम लोकोक्तियों/कहावतों में तो कई बार कहते हैं लेकिन उसे भाषा की सुंदरता बढ़ाने वाले अलंकार से ज्यादा नहीं समझते। दिल के किसी पुरानी चोट/दर्द के ठीक होने की सूरत नहीं नज़र आती तो हम अक्सर कहते हैं कि जो पहले ज़ख्म था, अब नासूर बन गया है। नासूर यानी कैंसर। लंबे समय का दिल का जख्म या दुख जब ठीक नहीं होता तो सिर्फ दिल में नहीं शरीर में भी नासूर बना सकता है।

इज़राइल में रिसर्चरों की एक टीम ने 255 स्तन कैंसर की मरीज़ों और 367 स्वस्थ महिलाओं के जीवन में बीमारी शुरू होने के पहले खुशी, आशावादिता, तनाव, अवसाद जैसी स्थितियों के आंकड़े जुटाए। डाक्टरों ने पाया कि जिन महिलाओं के जीवन में एक या एक से ज्यादा बड़े दुख की घटनाएं हुईं उन्हें कैंसर की संभावना ज्यादा थी। जबकि आम तौर पर सामान्य, खुशमिजाज़, आशावादी रहने वाली महिलाओं को स्तन कैंसर कम हुआ।

उनका कहना है कि केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सेंट्रल नर्वस सिस्टम), हार्मोन और रोग प्रतिरक्षा तंत्र आपस में संबंधित हैं और व्यक्ति का व्यवहार और बाहरी कारक इनकी कार्यक्षमता पर असर डालते हैं।

तो, हम बाकी सकारात्मक कोशिशों के साथ साथ- खुश रहने और कैंसर दूर भगाने के इस मंत्र को भी याद रखें ।
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