Custom Search

Saturday, April 13, 2013

लोगों की जिंदगी अहम है या झूठमूठ का पेटेंट?

(साप्ताहिक समाचार पत्रिका 'शुक्रवार' के 16 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित) 

आप इसे पांच रुपए में क्यों नहीं बेचते, एक लाख बीस हज़ार रुपए तो बहुत ज्यादा हैं।- यह सवाल भारत की आम जनता की ओर से उच्चतम न्यायालय ने स्विटजरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस के ग्लीवैक नाम की दवा को भारत में दोबारा पेटेंट दिए जाने के दावे पर सुनवाई के दौरान किया था।

इस दो अप्रैल 2013 को इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने नोवार्टिस के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। नोवार्टिस का दावा था कि कैंसर के खिलाफ काम आने वाली उसकी नई दवा ग्लीवैक (इमैटिनिब मेसिलेट) को भारत में दोबारा पेटेंट मिलना चाहिए जबकि कंपनी के दावे को भारत का पेटेंट अपीली बोर्ड पहले ही खारिज कर चुका था। न्यायालय का कहना था कि यह पुरानी दवा का ही थोड़ा सुधरा हुआ रूप है, और इस आधार पर इसे नई दवा के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय का यह फैसला न सिर्फ अकल्पनीय रूप से महंगी विदेशी जीवनरक्षक दवाओं के भारतीय कंपनियों द्वारा सस्ते विकल्प यानी जेनेरिक दवाएं बनाने को बढ़ावा देने, बल्कि कैंसर एचआईवी/एड्स, हिपेटाइटिस-सी जैसी जानलेवा बीमारियों के इलाज तक गरीबों की पहुंच को बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगा। इस क्रम में अपनी विभिन्न दवाओं के भारत में पेटेंट के लिए लड़ रही अनेक विदेशी कंपनियों का उत्साह जरूर कम हुआ होगा।

ग्लीवैक का मामला-

स्विटजरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस ने 90 के दशक के अंत में इलाज के सहारे लंबे समय तक चलने वाले रक्त कैंसर क्रॉनिक मायसॉयड ल्यूकेमिया के इलाज के लिए ग्लीवैक (इमैटिनिब) दवा विकसित की। 2001 में इसे अमरीकी खाद्य और दवा कार्यालय से मंजूरी मिली और वहां का पेटेंट भी। इसी साल कंपनी ने भारत सहित कई अन्य देशों में भी इस दवा का पेटेंट और बेचने का अधिकार हासिल किया। इसे चमत्कारी कैंसर-रोधी दवा बताया गया जो मारक रक्त कैंसर को लंबे समय तक चलने वाले कैंसर में बदल सकती है। लगातार ली जाने वाली यह दवा कैंसर मरीजों की उम्र 3 से 10 साल तक बढ़ा सकती है। इसकी एक महीने की खुराक का खर्च एक लाख 20 हजार रुपए है, जो ज्यादातर भारतीयों की पहुंच के बाहर है। 

इस बीच सिपला और नैटको जैसी भारतीय कंपनियों ने इसी दवा के सस्ते भारतीय जेनेरिक संस्करण बनाए जिनके दाम ग्लीवैक के दसवें हिस्से से भी कम हैं। वीनेट नाम से इसी दवा की महीने की खुराक की कीमत 10 हज़ार रुपए है तो सिपला ने इसे आठ हज़ार रुपए में बाजार में उतारा। एक अन्य कंपनी इसे मात्र 5720 रुपए में बेचती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का बड़ा फायदा मरीजों के साथ-साथ भारतीय दवा निर्माता कंपनियों को भी हुआ है।

भारत में दवाओं पर अनुसंधान और विकास की स्थिति बेहद खराब है। बाहर की कंपनियां इस स्थिति का फायदा उठा कर अपनी दवाएं इस बड़े और विविधता भरे बाजार में लगातार उतारती रहती हैं। कोई दवा बनाने से लेकर उसे बाजार में उतारने के बीच अनुसंधान, विकास, परीक्षण, स्वीकृति जैसी अनेक प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है जिनमें काफी समय और बेहिसाब धन खर्च होता है। जबकि उन दवाओं को मिले पेटेंट की अवधि सीमित होती है। ऐसे में कंपनी पुराना सिक्का ही फिर-फिर चलाने की कोशिश करती है। हर बार कोई नई दवा विकसित करने के बजाए पेटेंट की हुई दवा में ही कुछ सुधार-संशोधन और उसके लिए नया पेटेंट पाने की कोशिश करती है ताकि बिना ज्यादा समय और धन खर्च किए उसका कारोबार चलता रहे, बढ़ता रहे। 

एवरग्रीनिंग की इस प्रक्रिया में कंपनियां दवा बाजार में अपनी विशिष्ट पेटेंट दवाओं का एकाधिकार बनाए रख कर खूब मुनाफा कमाती हैं। देखा गया है कि कंपनियां अपना पुराना पेटेंट खत्म होने के ठीक पहले नए पेटेंट के दावे दाखिल करने में सक्रिय हो जाती हैं। आंकड़े बताते हैं कि नई दवाओं के पेटेंट पाने वाले 12-13 फीसदी मामले महत्वपूर्ण खोजों के, 40 फीसदी से कम मामले सामान्य इलाज के और 50 फीसदी मामले पहले से उपलब्ध दवाओं के संशोधित संस्करण होते हैं।

ग्लीवैक के मामले में भी कंपनी ने अपनी दवा के पुराने संस्करण में कुछ सुधार किए और बताया कि यह मरीज के शरीर में 30 फीसदी ज्यादा जज़्ब होती है, इससे उसका असर बढ़ जाता है। इस लिहाज से दवा के संशोधित संस्करण को नया पेटेंट मिलना चाहिए। 2006 में दाखिल मामले को पेटेंट अपील बोर्ड ने 2009 में खारिज कर दिया। हालांकि फैसले के कुछ बिंदु कंपनी के हक में थे। इसी आत्मविश्वास पर कंपनी ने सीधे उच्चतम न्यायालय में मामला दाखिल कर दिया।

न्यायालय ने भारतीय पेटेंट संशोधन अधिनियम-2005 की धारा 3 (डी) का हवाला देते हुए दो मुद्दों पर कंपनी के खिलाफ फैसला दिया- (1) यह वास्तव में नई दवा नहीं है (2) पुरानी दवा में किया गया सुधार इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि दवा के असर में गुणात्मक सुधार हो। इस आधार पर यह दवा पेटेंट की हकदार नहीं है।

धारा 3 (डी) के मुताबिक उत्पाद पेटेंट के उपयुक्त नहीं है यदि-
किसी ज्ञात पदार्थ के नए रूप की खोज मात्र, जो उस पदार्थ की ज्ञात क्षमता में वृद्धि में परिणत नहीं होती या ज्ञात पदार्थ के किसी नए गुण या नए उपयोग या ज्ञात पदार्थ, प्रक्रिया, मशीन या उपकरण का मात्र उपयोग, जबकि यह ज्ञात प्रक्रिया नए उत्पाद में परिणत नहीं होती या उसमें कम से कम एक नया क्रियात्मक पदार्थ शामिल नहीं होता।

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने कानून की मूल भावना को कायम रखा और माना कि लोगों का जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार किसी पेटेंट के दावे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह देश में सस्ती दवाओं के हक में बड़ी जीत है। इस फैसले पर नोवार्टिस का कहना है कि देश में नए अनुसंधान-प्रयासों और नई दवाओं के विकास पर बुरा असर पड़ेगा क्योंकि बिक्री से हुए मुनाफे को कंपनी आगे के अनुसंधान कार्य पर खर्च करती है। सोच कर देखा जाए तो अगर यही नए अनुसंधान हैं जिसके लिए कंपनी फंड जुटाना चाहती है, तो क्या भारत जैसे गरीब देश में नई दवा के लिए यह कीमत उचित है? उल्टे, इस फैसले से, यह संभावना बनती है कि अब विदेशी कंपनियां पेटेंट के मामले में संभल कर चलें और वास्तविक अनुसंधान और नई दवाओं की खोज पर जोर दें।

भारत में पेटेंट व्यवस्था-

भारत 2005 से पहले दवाओं का पेटेंट नहीं करता था। 1970 में देश का पहला पेटेंट अधिनियम बना था। इसके तहत खाद्य पदार्थों और रसायनों का पेटेंट नहीं किया जाता था। सिर्फ उनके निर्माण की प्रक्रिया का पेटेंट (प्रोसेस पेटेंट) होता था। पेटेंट की अवधि 5 साल या आवेदन की अवधि से 7 साल- इनमें से जो भी कम हो, होती थी। इस कानून की सरलता का लाभ उठाकर कई दवा कंपनियों ने विदेशी दवाओं के जेनेरिक उत्पाद बनाने शुरू कर दिए। किसी दवा को बनाने की प्रक्रिया में मामूली सा बदलाव लाना आसान है, खास तौर पर जब पता हो कि लक्षित रसायन कौन-सा है। भारतीय दवा कंपनियों की तो चांदी हो गई। 

उन्हें उत्पाद पेटेंट के इस्तेमाल का शुल्क भी नहीं देना पड़ता था, जो कि काफी अधिक होता। दूसरा रास्ता यह था कि कंपनी थोड़ा इंतजार करे और पेटेंट की अवधि खत्म होते ही प्रक्रिया और उत्पाद दोनों का साधिकार उपयोग करे। इससे मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध हो गईं। इनकी कीमतें विदेशी मूल दवाओं से आधी से लेकर दसवें हिस्से तक कम थी।

विश्व व्यापार संगठन के दोहा चक्र में व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकार समझौते (ट्रिप्स) पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत के लिए जरूरी हो गया कि वह अपने दशकों पुराने पेटेंट कानून की धूल झाड़ कर उसे आधुनिक रूप दे। इसी से जन्म हुआ बौद्धिक संपदा अधिनियम-2005 का। इस कानून के तहत नए रसायनों के अलावा सम्मिश्रण दवाओं, दवाएं देने के तरीकों, दवा निर्माण प्रक्रिया आदि का भी पेटेंट किया जाने लगा। यह पेटेंट दवा के आने के 20 साल या उससे ज्यादा समय तक लागू होता है।

ट्रिप्स समझौते में विकासशील देशों के लिए अनिवार्य लाइसेंस का विशेष प्रावधान रखा गया है जिसके तहत जन-स्वास्थ्य की आपात स्थितियों में सरकारें राष्ट्र हित में और गैर-व्यावसायिक कारणों से पेटेंट-प्राप्त दवाओं के सस्ते स्वदेशी संस्करण बनाने की इजाजत दे सकती है। दिलचस्प बात यह है कि भारत से कहीं पहले अमरीका, कनाडा, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड जैसे देशों ने इस प्रावधान को आजमाया। जन-स्वास्थ्य संस्थानों, इस क्षेत्र में काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों और दवा उद्योग की मांगों के दबाव में सरकार ने लंबे इंतजार के बाद इस प्रावधान का उपयोग करना शुरू किया और कई मामलों में सक्रिय रूप से इस प्रावधान के पक्ष में विदेशी कंपनियों के बजाए देसी जेनेरिक दवा उत्पादन को प्राथमिकता देने की शुरुआत की। 

ऐसा पहला फैसला जर्मनी की दवा कंपनी बायर की जिगर गुर्दे और फेफड़ों के कैंसर की दवा नेक्सावार (रासायनिक नाम- सोराफेनिब) और उसकी भारतीय जेनेरिक नकल के मामले में दिया। अनिवार्य लाइसेंस के प्रावधान के तहत सरकार पेटेंट के 3 वर्ष बाद जन-हित में पेटेंट धारक की अनुमति के बिना भी किसी अन्य कंपनी को सस्ती जेनेरिक दवा के उत्पादन की मंजूरी दे सकती है। नेक्सावार की भारत में एक महीने की खुराक की गगनचुंबी कीमत 2 लाख 80 हजार रुपए के मुकाबले नैटको कंपनी ने इसे 8800 रुपए में बाजार में उतार दिया। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने पेटेंट दफ्तर के फैसले को कायम रखा कि नैटको जेनेरिक दवा के उत्पादन और विपणन अधिकार के बदले बायर को सात फीसदी की रॉयल्टी देगी।

इस फैसले के बाद कई विदेशी कंपनियों ने अपनी कई दवाओं के दाम खुद ही कम कर दिए। उधर नैटको के मुकाबले में कई भारतीय दवा कंपनियां आईं और प्रतियोगिता के माहौल में सोराफेनिब दवा की कीमत 6600 रुपए तक गिर गई। ऐसे कई मामले सरकार और न्यायालयों में लंबित हैं और उम्मीद है नोवार्टिस पर ताजा फैसले से इन मामलों को भी दिशा मिलेगी।

जीत जनता की या भारतीय दवा उद्योग की-

पेटेंट अधिकार के संरक्षण के मामले में भारत का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा। इस स्थिति का पूरा फायदा देसी दवा कंपनियों को मिला। लचीले पेटेंट कानूनों के कारण आजादी के बाद से ही कई दवा कंपनियां फलीं-फूलीं और दूसरे विकासशील देशों में भी भारतीय कंपनियों की जेनेरिक दवाएं पहुंचने लगीं। पिछले दशकों में जब अफ्रीका में एचआईवी/एड्स की दवाओं की बहुत कमी थी और ब्रांडेड दवाओं का खर्च उठाना उस गरीब देश के लाखों लोगों के बूते के बाहर था, तब भारत से इसकी जेनेरिक दवाएं निर्यात हुईं। कोई 10 हजार डॉलर सालाना की कीमत वाली मूल दवाओं के बदले भारतीय जेनेरिक विकल्प 150 डॉलर में मिल जाते थे। 

आज भारत का जेनेरिक दवा का कारोबार बहुत बड़ा है। आंकड़ों के अनुसार 80 फीसदी विकासशील विश्व में भारत में बनी जेनेरिक दवाएं पहुंच रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमरीका, अफ्रीका, जापान और योरोप तक भारतीय दवाओं का आयात कर रहे हैं। कैंसर, एचआईवी/एड्स, हेपेटाइटिस-सी, टीबी से लेकर, साधारण बीमारियों तक की सस्ती भारतीय दवाएं विश्व भर में मरीजों के काम आ रही हैं। यूनिसेफ भी विकासशील देशों में मुफ्त बांटने के लिए सबसे ज्यादा दवाएं भारत से ही मंगवाता है।

भारत हर साल 11 अरब डॉलर मूल्य की जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है। मात्रा के हिसाब से विश्व का तीसरा और मूल्य के हिसाब से 14वां सबसे बड़ा दवा उद्योग भारत का है जो जेनेरिक दवाओं के बल-बूते पर ही है। देश के भीतर भी बिकने वाली 90 फीसदी दवाएं जेनेरिक हैं। साफ है कि पेटेंट अधिकारों के प्रति स्वाभाविक अनदेखी ने भारत के जेनेरिक दवा कंपनियों को देश में ही नहीं, दुनिया भर में फैलने और उद्योगपतियों को अरबपति बनने में मदद की है। इस फैसले के बाद और पेटेंट संबंधी कई और मामलों में सरकार के रुख को देखते हुए उनकी आभा में निश्चित रूप से और चमक आएगी।

कैंसर के मामलों में चीन और अमरीका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। सालाना, दुनिया के कुल 7.5 फीसदी मामले भारत में रिपोर्ट किए जा रहे हैं। कोई 10 लाख नए मरीज हर साल जुड़ रहे हैं जिनकी मृत्यु दर सालाना आठ फीसदी है। कैंसर की दवाओं का बाजार दवा उद्योग का सबसे ज्यादा तेजी से उभरते क्षेत्रों में से है। मरीजों की बढ़ती संख्या, नई दवाएं और बेहतर इलाज के तरीके ये सभी इस क्षेत्र में तेज विकास की संभावना की ओर इशारा करते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष की 10 कैंसर-रोधी दवाओं का बाजार में हिस्सा 70 फीसदी तक है और 2009 में इस वर्ग की दवाओं की बिक्री 2,60,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की थी। अनुमान है कि साल 2013 के लिए यह आंकड़ा 3,90,000 करोड़ रुपए के करीब होगा। 
 
कैंसर का इलाज अक्सर लंबा चलता है। नई तकनीकों, दवाओं के कारण अब कैंसर के साथ लंबा जीवन जीने की संभावना बढ़ गई है। इसके मुकाबले आम जन से जुड़े कुछ तथ्यों पर अगर नजर डालें तो देश के 40 फीसदी लोगों की दैनिक आमदनी 60 रुपए से कम है। सेहत पर प्रति व्यक्ति सालाना खर्च 500 रुपए से कम है। इसके अलावा 60 फीसदी स्वास्थ्य-रक्षा का काम निजी सेक्टर के हाथ में है और 70 फीसदी लोग किसी सरकारी या निजी स्वास्थ्य योजना से बाहर हैं, यानि वे अपना मेडीकल का खर्च खुद ही वहन करते हैं। ऐसे में देश का आम आदमी कैंसर के इलाज पर कितना और कब तक खर्च कर पाएगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। कोई जीवन-रक्षा के लिए धन का इंतजाम कर पाता है तो उसमें जमा-पूंजी के अलावा चल-अचल संपत्ति, उधार, दान, रोजगार सभी कुछ शामिल हो जाता है। इसके सीधे असर की जद में पूरा परिवार आता है जो महंगी दवाओं के कुचक्र का शिकार होता है। मध्य वर्ग के लोगों को गरीबी रेखा ने नीचे धकेलने वाला यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है। 

प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टर और निजी अस्पताल ही नहीं, सरकारी तंत्र में भी जेनेरिक की बजाए दवाओं के ब्रांड नाम लिखने का चलन है, जो सीधे-सीधे दवा कंपनियों को मुनाफा दिलाता है, जबकि गरीब मरीज चुनने का विकल्प होते हुए भी विकल्पहीन होता है। कैंसर के मरीज को दोहरी चोट लगती है जब उसे सस्ते विकल्प बताए बिना, उसकी आर्थिक स्थिति को देखे बिना डॉक्टर दवाएं लिख देते हैं। और अक्सर यह अनजाने में नहीं होता। डॉक्टर जानते-बूझते हुए किसी कंपनी या ब्रांड की दवाएं लिखते हैं जिसके बदले कई तरह के प्रलोभन और प्रोत्साहन पाते हैं। मेडिकल क्षेत्र में यह नैतिकता संबंधी सबसे बड़ी बहस और मेडिकल काउंसिल भी इस चलन को रोकने की कोशिश कर रहा है।

इसके तोड़ के रूप में केंद्र सरकार ने एक नीति बनाई है जिसके तहत सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए अनिवार्य होगा कि वे मरीजों के लिए जेनेरिक दवाएं ही लिखें। ऐसा न करने पर सज़ा का भी प्रावधान होगा। इसी योजना में ब्रांडेड दवाएं लिखने की भी सीमा निर्धारित की गई है। ज्यादातर मरीजों को जेनेरिक दवाएं मुफ्त दी जाएंगी। अगले कुछ वर्षों में देश की 50 फीसदी आबादी को इस स्वास्थ्य योजना में शामिल करने की परिकल्पना है।

जेनेरिक दवाओं और सरकारी योजनाओं के आने के बाद भी कैंसर, एड्स/एचआईवी, हिपेटाइटिस-सी जैसी कुछ समय पहले तक लाइलाज मानी जाने वाली लेकिन अब नई दवाओं में उम्मीदें देखने वाली बीमारियों का इलाज आम आदमी तक पहुंच पाएगा, इसकी बहुत उम्मीद नहीं दिखती। हालांकि जेनेरिक दवाएं विदेशी दवाओं के मुकाबले सस्ती हैं लेकिन यह भी आसमान से टपक कर खजूर पर अटकने जैसी स्थिति है क्योंकि इनका मकसद भी कंपनी का मुनाफा ही है। यानी इलाज उतना सस्ता नहीं होगा जितना कि हो सकता है या होना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय द्वारा नोवार्टिस से किया गया सवाल दरअसल चिकित्सा व्यवस्था के बड़े सवाल का एक हिस्सा भर है। घरेलू दवा निर्माता हो या विदेशी, जब तक इस सवाल का जवाब हां में नहीं मिलता, आम मरीज की जीत अधूरी है।
-आर. अनुराधा


Friday, October 5, 2012

ज़िंदगी के एहसास का मौक़ा

हिंदी की महत्वपूर्ण पाक्षिक पत्रिका द पब्लिक एजेंडा के ताजा अंक में मेरा संस्मरण कैंसर के बावजूद कुछ कर जाने वाले लोगों पर विशेष आयोजन के तहत प्रकाशित हुआ है। वही आलेख शब्दशः--

ज़िंदगी के एहसास का मौक़ा

इसे मैं मौका कहूंगी- जीने का, जिंदा होने के एहसास का तीसरा मौका। किसी कैंसर के मरीज को तीन मौके कम ही मिलते हैं- खास तौर पर उसे, जिसका ट्यूमर चौथे स्टेज का और बीमारी एडवांस करार दी गयी हो। डॉक्टर ने मुझे भाग्यशाली कहा, जब मैंने कैंसर के बाद पांच साल की खतरे की रेखा पार की थी। मगर सात साल होते-न-होते मैं फिर उसी जगह खड़ी थी, जहां कैंसर के रास्ते पर मेरी यात्रा शुरू हुई थी। 


इलाज के उन्हीं दुर्गम रास्तों से दोबारा गुजरने के सात साल बाद फिर तीसरी बार अब। सिर्फ जिंदा रहना भी अपने आप में एक नेमत है। वैसा सहज नहीं, जैसा हम आम तौर पर सोचते हैं। जीना तभी समझ में आता है जब जीवन पर खतरा महसूस होता है। जीने का एहसास होने पर इंसान तीन तरह से जीता है- बिसूरते हुए कि हाय, मुझे जिंदगी कितनी छोटी मिली, मेरे साथ अन्याय हुआ। जैसे कोई अपने घाव को लगातार खरोंचता रहे और दर्द से छटपटाता भी रहे। दूसरी स्थिति है कि वह सोचे, कम ही दिन रह गये हैं, चलो जल्दी-जल्दी जिया जाये, बहुत कुछ कर लिया जाये। और तीसरी स्थिति - जब वह बाकी बचे अनिश्चित समय को इत्मीनान से जीना चाहता हो, आने वाले समय का बिना खयाल किये। वह कई मामलों में तदर्थ हो जाता है कि बाद किसने देखा है, अभी समय बेहतर कटे, बस। मैं इस समय बाद वाली दोनों स्थितियों में एक साथ जी रही हूं।


हम अपने शरीर की बनावट-सजावट भले ही रोजाना करते हों, लेकिन हम इसकी जरूरतों और गड़बड़ियों का ध्यान कम ही रखते हैं। जब तक समय साथ देता है, हम कद्र नहीं करते। जब बिगड़ जाता है, तब फौरी राहत देकर छूटने की कोशिश में रहते हैं। अपने शरीर की साज-संभाल करने और जानकारी होने की जरूरत पहली बार महसूस हुई 14 साल पहले, जब स्तन कैंसर होने का पता चला। संतान जन्म के समय या ऐसी ही किसी जांच-मुलाकात में अगर किसी डॉक्टर ने कभी मुझे स्तन स्वयं-परीक्षा का मुफ्त, सरल-सा तरीका बता दिया होता तो स्थिति शायद खराब न होती। 


कैंसर इंसान को ढंग से जीना सिखा देता है। इसका इलाज बहुत जानकारी की मांग करता है, सहज ज्ञान और समझदारी के अलावा भी। इलाज लंबा, कई स्तरों पर होने वाला, जटिल और मारक होता है। इस दौरान मरीज बेहतर महसूस करने की बजाय इलाज के बुरे प्रभावों के कारण ज्यादा बीमार हो जाता है। कीमोथेरापी में इस्तेमाल होने वाली दवाएं मूलतः जहरीले रसायन हैं जो कभी हिटलर के नात्सी गैस-चेंबरों में यहूदियों को मारने के लिए इस्तेमाल किये जाते थे। इलाज में इनका मकसद बीमार, कमजोर कैंसर कोशिकाओं को मारना है, लेकिन इस दौरान ढेर सारी स्वस्थ कोशिकाएं भी मारी जाती हैं। रेडियोथेरेपी में रेडियो-सक्रिय किरणें स्वस्थ कोशिकाओं को भी उसी शिद्दत से जला डालती हैं। ऐसे समय में शरीर का स्वस्थ हिस्सा कमजोर न पड़ जाये, इस कोशिश में लगना पड़ता है। यह जिम्मेदारी मरीज की होती है। यह स्थिति सभी के लिए बराबर कठिन होती हो, ऐसा नहीं है, फिर भी शरीर के भीतर इलाज की चाल जानना लाजिमी होता है।


कुल मिला कर युद्ध सी स्थिति होती है। स्तन कैंसर पर चौतरफा हमले में सर्जरी, कीमो, रेडिएशन के 8-10 महीने लंबे इलाज के बाद कैंसर को रोके रखने के लिए पांच साल तक हार्मोन का इलाज दिया जाता है ताकि ओवरी, पैंक्रियाज और शरीर में कहीं और बन रहे स्त्री हार्मोनों को दबा कर रखा जा सके। कई मामलों में यही हार्मोन कैंसर को उकसाते हैं। इलाज के इन हमलों में स्वस्थ कोशिकाएं बची रहें और फलती-फूलती रहें, इसके लिए जानकारी से ही रणनीति बनाने की शुरुआत होती है। तत्काल और विस्तृत जानकारी पाने के कई साधन मेरी पहुंच में रहे, यह महत्वपूर्ण था। चौदह साल पहले जब इंटरनेट महानगरों के समृद्ध संस्थानों तक ही था, पत्र सूचना कार्यालय के मुख्यालय में नियुक्ति होने के कारण मेरी उस तक पहुंच और उसे इस्तेमाल करने की दक्षता सहज ही थी। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाएं भी मिल जाती थीं जिनमें तब कैंसर के चिकित्सकीय और गैर-चिकित्सकीय पक्षों पर विमर्श छपता था। इन सबसे मेरी जानकारी लगातार बढ़ती गयी। इलाज सरकारी अस्पताल एम्स में हो रहा था, जहां देश भर के मरीज आते हैं। ऐसे में कैंसर, खास तौर पर महिलाओं से जुड़े स्तन कैंसर की विविध स्थितियों को सुनने-जानने का मौका मिला। उनके साथ मैं अपने अनुभवों, ज्ञान और बेहतर जीवन जीने के नुस्खे साझा करती थी।


वहां एक बड़ी बात मुझे समझ में आयी कि लोगों में कैंसर, उसके इलाज, साइड इफेक्ट्स की जानकारी बहुत कम है और थोड़ी-बहुत जानकारी भी उनके जीवन में अंतर लाने में सक्षम थी। यहीं से यह विचार आया कि स्तन कैंसर पर क्यों न जानकारीपरक एक पुस्तक लिखी जाये। इसके दो मकसद थे, एक मेहनत से इकट्ठा की गयी जानकारियां और दूसरी महिलाओं के अलग-अलग अनुभव लोगों को सहज ही, उनकी अपनी भाषा में मिल जायें। दूसरे, इस विषय पर बार-बार वही बातें कहने की बजाय उन्हें लिख कर ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाये। मैं डॉक्टर तो थी नहीं, लेकिन इस बारे में कुछ सघन निजी अनुभव थे, जो आम तौर पर मरीजों को ज्यादा प्रभावित करते हैं। 


कुल मिला कर पुस्तक लिखने का उद्देश्य इस कठिन दौर से गुजर रहे लोगों का जीवन आसान बनाने के अपने अनुभव बताना था। यह पुस्तक "इंद्रधनुष के पीछे-पीछेः एक कैंसर विजेता की डायरी' मार्च 2005 में छप कर आयी, जब मैं कैंसर से दूसरी लड़ाई की तैयारी कर रही थी। जाहिर है, इस स्थिति के बारे में पुस्तक छपने के पहले सोचा भी नहीं था! 


(लेखिका ने कैंसर से जूझने की कहानी पुस्तक "इंद्रधनुष के पीछे-पीछेः एक कैंसर विजेता की डायरी' में लिखी है। वे प्रकाशन विभाग में संपादक हैं।)


Saturday, March 3, 2012

कुछ दिनों से सोच में हूं

कुछ दिनों से सोच में हूं। एक नव-परिचिता, 'कैंसर-बड्डी' का कैंसर दोबारा उभर आया है। पहली बार उन्हें कैसर का पता लगा था पिछले साल लगभग इसी समय। उसके बाद उन्होंने जम कर इलाज करवाया और अक्तूबर में फारिग होकर फिर से काम-काज में मन लगाया। इसी बीमारी-इलाज के बीच उनकी बेटी की धूम-धाम से शादी भी हो गई। हालांकि इलाज सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली में कराया, जो कि केंद्रीय सरकार के बड़े अस्पतालों में गिना जाता है।

उनसे मुलाकात के ठीक पांचवें दिन उनका फोन आया कि कैंसर उनके शरीर के कई हिस्सों में फैल गया है- लिवर सहित। यह मुलाकात भी संयोग ही रही। मेरा एक आत्मकथात्मक आलेख नवभारत टाइम्स में छपा। वहां के नंबर पर फोन करके उन्होंने संबंधित विभाग में संबंधित व्यक्ति से बात की, जिन्होंने मुझसे पूछ कर मेरा फोन नंबर उन्हें दिया और इस तरह हमारी पहली बात-चीत फोन पर हुई।

उसके दो ही दिन बाद वे मेरे दफ्तर पर मिलने आईं। वैसे दफ्तर में समय कम ही मिलता है, फिर भी उस दिन करते-न-करते वो करीब 40 मिनट साथ रहीं। उनसे कई तरह की बातें हुईं। कैंसर की, कैंसर के साथ और उसके बाद जीवन की, खाने पीने, सोने जागने की। फिर विदा, संपर्क में रहने, फिर मिलने के वादे के साथ। और इस के पांच ही दिन बाद उन्होंने कैंसर के शरीर के कई अंगों में फैल जाने की खबर अचानक दी। यह उनके लिए भी सदमे की तरह था, क्योंकि उन्हें कोई दर्द या तकलीफ नहीं हो रही थी, महज रूटीन चेक-अप में ही की गई कुछेक जाचों से इसका पता चला।

एक समय मैं मानती थी कि कैंसर लौट आने का मतलब है- मौत के करीब खड़े हो जाना। पर अपनी जानकारी और दूसरों के अनुभवों से जाना कि यह हमेशा सही नहीं होता। मेरे साथ खुद यह हुआ था- कोई 7साल पहले। दोबारा, दूसरे स्तन में फिर से तीसरी स्टेज का कैंसर,जो बड़ी तेजी से फैला था, या ऐसा मुझे लगा था, क्योंकि अचानक ही उस बड़ी गांठ पर ध्यान गया था। लेकिन उस इलाज के बीच और बाद में कई महिलाओं से मुलाकातें हुईं जिन्होंने पिछले कई बरसों से कैंसर के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था, उनका इलाज लगातार जारी था- कभी यहां, तो कभी वहां।

लेकिन इस नव-परिचिता का कैंसर लिवर, पसलियों आदि पेट के कई महत्वपूर्ण अंगों तक फैल चुका है, जहां यह जानलेवा भी हो सकता है। इस स्थिति को वे अच्छी तरह समझती हैं। इनके साथ बातचीत में दो बातें मुझे असहज करती हैं- पहली कि उन्हें इस नए, प्राइवेट, विशेषज्ञता वाले अस्पताल के डॉक्टरों ने समझा दिया है इसलिए वे लगातार यह मानती हैं, कि पिछली बार सरकारी अस्पताल के इलाज में डॉक्टरों द्वारा भयानक लापरवाही और कोताही बरती गई, इसीलिए उनका कैंसर खत्म होने के बजाए फिर उभरा है। वे डॉक्टरों और सरकारी अस्पताल पर मामला ठोक देने की धमकी देते हुए बार-बार कहती हैं कि उनको जो कीमो दी गई उससे कैंसर खत्म नहीं हुआ बल्कि उसके ‘जर्म्स’ गांठ में से निकलकर पूरे शरीर में ‘भाग कर फैल गए और यहां-वहां छुप गए’। केस बिगाड़ दिया गया है। कोई एक टेस्ट जो एक बार नेगेटिव और फिर एक बार माइल्डली पॉजिटिव आया था, उसे ‘फिर’ नहीं कराया गया। इलाज खत्म होते ही सीटी स्कैन आदि नहीं करवाया गया। इत्यादि। ये सारी बातें उन्हें निजी अस्पताल के डॉक्टरों ने ऐसी अच्छी तरह समझा दी है कि वे दोबारा कभी इलाज के सरकारी तंत्र में जाना चाहेंगी ही नहीं, हालांकि वे खुद सरकारी नौकरी में हैं।

कितना आसान है किसी अनुभवी,पढ़े-लिखे मरीज तक को भी डराकर, प्यार से, अपने दिखावटी नरम व्यवहार से फुसला ले जाना कि वह इलाजके निजी तंत्र में ही उलझा रहे, सरकारी तंत्र के आजमाए हुए रूखे और मशीनी-से लगने वाले प्रोटोकॉल में विश्वास न करे। दर असल तथ्य यह है कि कैंसर के जर्म्स नहीं होते, यह शरीर के, कोशिकाओं के भीतर ही बनता है और इन कोशिकाओं की प्रवृत्ति छिटककर खून के साथ दूर जाकर नई बस्तियां बसाने की होती है। अगर किसी कीमो से एक जगह का ट्यूमर खत्म होता है तो वह खून के सहारे पूरे शरीर में हर कोने में जाकर उसकी हर बिखरी कोशिका को खत्म करने की प्रवृत्ति रखता है। यह नहीं होता कि कोशिकाएं एक जगह से भागकर कहीं और जाकर छिप जाती हैं। कीमोथेरेपी सिस्टमिक यानी पूरे शरीर में एक साथ, रक्त के बहाव के जरिए किया जाने वाला इलाज है।

फिर उनका वह हॉर्मोन जांच का पॉजिटिव या नेगेटिव नतीजा इलाज की दिशा को कतई प्रभावित नहीं करता है, सिर्फ इलाज की सफलता का अंदाजा लगाने में मदद देता। हर स्तन कैंसर के मरीज को पांच साल तक खाने के लिए ईस्ट्रोजन हॉर्मोन-निरोधक गोलियां खाने को दी जाती हैं ताकि अगर उस कैंसर के होने में हॉर्मोन का जरा भी हाथ हो तो वह हॉर्मोन के असर को खत्म करके इसके दोबारा होने को रोक पाए। और यह साबित बात है कि वह हॉर्मोन जांच कई साधारण कारणों से गलत भी आती है, इसलिए इसे दो-तीन बार भी कराया जाता है। तो, इस अर्थ में उनका इलाज पूरा किया गया, पांच साल के लिए हॉर्मोन की गोली के प्रिस्क्रिप्शन सहित।

दूसरा मसला जो इनके दोबारा कैंसर होने और उसके फैलाव के बारे में जानने के बाद मेरे सामने आता है, कि मैं उनसे बातें करना चाहती हूं, उनकी व्यग्रता, उद्विग्नता, आशा-निराशा को साझा करना चाहती हूं ताकि उन्हें अच्छा लगे और मुझे भी उनके हालात को समझने का मौका मिले। हालांकि वे खुद बार-बार कहती हैंकि वे फाइटकरेंगी और इसमें जीतें या हारें, मन को नहीं हारने देंगी। लेकिन ठीक होने का उन्हें कतई भरोसा नहीं है, और अपने जल्द ही इस दुनिया से कूचकर जाने की भी पूरी-पूरी आशंका देख रही हैं। ऐसे कठिन समय में उनकी आशंका में आप यह दिलासा नहीं दे सकते कि चिंता न करें, जल्द ही ठीक हो जाएंगे। खास तौर पर ऐसे वक्त में, जब उन्हें भी पता है कि शायद यह बीमारी अब ठीक न होने की जद पर आ पहुंची है। सोच ही रही हूं।

Monday, February 20, 2012

जरा और हंगामे की जरूरत है- युवराज के बहाने कैंसर


(यह आलेख शुक्रवार पत्रिका के 17-23 फरवरी के अंक में छपा है।)

वैसे तो पिछले साल से ऐसी आशंकाओं का सिलसिला चल रहा था कि क्रिकेटर युवराज सिंह को फेफड़ों में ट्यूमर है। लेकिन जनवरी के आखिरी हफ्ते में पक्की खबर आई कि युवराज सिंह को जर्म सेल ट्यूमर ऑफ मीडियास्टिनम या मीडियास्टिनल सेमिनोमा नाम का फेफड़ों का कैंसर है। हर तरफ सनसनी फैल गई। युवराज सिंह की कीमोथेरेपी यानी दवाओं से इलाज शुरू होने की खबरों के बीच उसके ठीक होने की संभावनाओं, अटकलों, माता-पिता से बातचीत, दूसरे क्रिकेटरों, दुनिया भर की सेलिब्रिटीज़ की शुभकामनाओं की खबरों से भी पूरी दुनिया का मीडिया पट गया। युवराज मीडिया के लिए इस समय खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पिछले साल ही हमारी क्रिकेट टीम विश्वकप जीत लाई है, जिसमें युवराज मैन ऑफ द सीरीज रहे।

खबरों की कहानी के पहले इस कैंसर को समझ लें। मीडियास्टिनम मोटे तौर पर छाती के बीच की जगह है जहां दिल, इससे निलकने वाली खून की नलियां और संवेदी तंत्रिकाएं, श्वसन नलियां, खाने की नली का कुछ हिस्सा वगैरह होते हैं। इन नाजुक अंगों को सुरक्षित समेटे हुए इस हिस्से को घेरे एक झिल्ली होती है। युवराज का जर्म सेल ट्यूमर ऑफ मीडियास्टिनम दुर्लभ इसलिए है कि यह आम तौर पर जर्म सेल, यानी पुरुषों के शुक्राशय की कोशिकाओं में होता है। सेमीनोमा का मतलब ही है, शुक्राशय की सेमीनिफेरस नलिकाओं की सतह की कोशिकाओं का ट्यूमर। वैज्ञानिक समझ नहीं पाए हैं कि कैसे, पर कभी-कभार यह कैंसर शुक्राशय की बजाए छाती में या पेट की गुहा में बन जाता है। खास तौर पर पुरुषों में होने वाला यह कैंसर 20 से 35 की उम्र में सबसे ज्यादा होता है। और अच्छी बात यह है कि इसके लक्षण फौरन दिख जाते हैं और कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का इन पर अच्छा असर होता है इसलिए ठीक होने की संभावना काफी ज्यादा होती है।

हमारे देश में जहां कैंसर के 25 लाख से ज्यादा मरीज हैं, उनमें हर साल आठ लाख और जुड़ते हैं और साढ़े पांच लाख लोग मर जाते हैं, जहां 70 फीसदी लोगों का कैंसर इतनी विकसित अवस्था में होता है कि डॉक्टर भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाते, वहां स्वाभाविक है कि इस बीमारी का नाम ही दिल दहला देता है। जानकारी की कमी भ्रम और आशंकाओं को बढ़ावा देती है। ऐसे में अच्छा है कि युवराज के बहाने ही सही, इस विषय पर चर्चा ने जोर तो पकड़ा।

वह समय अभी बीता नहीं है जब कैंसर का मतलब मौत का वारंट होता था, लोग जीने की उम्मीद छोड़ देते थे। ईश्वर की तरह आयुर्वेद आदि पर विश्वास होने के नाते लोग वैद्यों, हकीमों, होमियोपेथिक डॉक्टरों, “कैंसर से एड्स तक” हर मर्ज का इलाज करने का दावा करने वाले नींम चिकित्सकों के पास पहले जाते थे क्योंकि उनका विश्वास होता था कि एलोपेथी में कोई कारगर इलाज हो ही नहीं सकता। अस्पताल जाना तभी होता था, जब तकलीफ असहनीय हो जाती थी। इसके अलावा कैंसर के लिए अच्छे अस्पतालों की बेतरह कमी, लंबा, खर्चीला, तकलीफदेह और अनिश्चित परिणाम वाला इलाज करवा पाना आम हिंदुस्तानी के लिए आसान नहीं।

लेकिन पिछले कुछ साल में मीडिया ने कई सेलीब्रिटीज़ के कैंसर पर विशेष रूप से चर्चाएं छेड़ी हैं। सिंगर काइली मिनोग से लेकर बिग बॉस की जेड गुडी, लीसा रे और पर्सनल कंप्यूटर क्रांति शुरू करने वाले स्टीव जोब्स तक ने कैंसर पर लोगों की जागरूकता, जानकारी बढ़ाने के लिए मीडिया को उकसाया। एक ऐसा शब्द जिससे कई भ्रम और वर्जनाएं जुड़ी थीं, लोग उच्चारने से डरते थे, अब लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा है। अखबार और न्यूज चैनल अपने हीरोज़ के साथ-साथ इस बीमारी के अलग-अलग पहलुओं को भी तरह-तरह से उभारते हैं। विशेषज्ञों का ज्ञान, कैंसर-साथियों के अनुभव लोगों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। इंटरनेट और, खासकर सोशल मीडिया का भी इसमें बड़ा योगदान है।

हमारे देश में भी कैंसर की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इसके बारे में जागरूकता, इसकी जल्द पहचान और पूरा इलाज जरूरी है। कई तरह के कैंसरों को खुद पहचानने; धूम्रपान, नशा न करने; नियमित, सक्रिय जीवनचर्या; नियंत्रित और संतुलित खान-पान जैसी आधारभूत जानकारियां देने और इलाज के लिए प्रेरित करने जैसे काम मीडिया के जरिए संपन्न हो रहे हैं। युवराज के बहाने हम कई हस्तियों के अनुभवों को जान पा रहे हैं जिन्होंने इस बीमारी के बाद भी बहुत उपलब्धियां पाईं, नए आसमान छुए और कैंसर पीड़ितों और समाज के लिए प्रेरणा बने।

शहरों में कम से कम इतना असर हुआ है कि लोग कैंसर होने की बातें छुपाते नहीं हैं। वे जान रहे हैं कि हर तरह के लोगों को कैंसर हो सकता है। जानकारी से बीमारी की घटनाएं तो कम नहीं होतीं, लेकिन वे इलाज करवा रहे हैं और कई ठीक होकर या कैंसर के साथ ही, लंबा और बेहतर जीवन बिता रहे हैं। लोगों के भ्रम और डर खत्म हो रहे हैं, कैंसर से अपरिचय और सदमे का भाव कम हो रहा है। दूसरी तरफ मीडिया कैंसर के इलाज की कमियों को सामने लाकर व्यवस्था में सुधार लाने के लिए दबाव बनाने का काम भी जाने-अनजाने कर रहा है। आंखें बंद करके डॉक्टर की अंगुली पकड़ चलते जाने वाले लोगों को विकल्पों की पगडंडियां भी ये चर्चाएं दिखा रही हैं, नई खोजों, इलाजों, उनकी खामियों को सबके सामने रख रही हैं।

हालांकि मीडिया अति भी करता है और बीसीसीआई को अपील करनी पड़ती है कि युवराज की निजता का सम्मान करें। कैंसर के बहाने उसके निजी जीवन के हर मिनट की खबर देना समाचार मीडिया का काम नहीं है।

तो, युवराज सिंह, तुम्हें धन्यवाद और शुभकामनाएं। अपना इलाज करवाकर जल्द लौटो और उन सबके लिए एक और मिसाल बनो जिनके जीवन में उम्मीद की कमी है।

---

Sunday, February 19, 2012

जिम्मेदार होना कैंसर के बारे में

राष्ट्रीय सहारा, हस्तक्षेप में 4 फरवरी 2012 को विश्व कैंसर दिवस पर मेरा यह आलेख छपा था। चित्र के नीचे पूरा लेख संलग्न है।



पीछे मुड़कर देखूं तो अपने ही जीवन की घटनाएं चलचित्र-सी, किसी और के साथ घटी लगती हैं। महज 30 की उम्र में स्तन कैंसर होने के बारे में कौन सोच पाता है? चौदह साल पहले जब मुझे पहली बार कैंसर होने का पता चला तब तक वह तीसरे स्टेज की विकसित अवस्था में पहुंच चुका था। अच्छी बात बस यह थी कि वह छिटक कर किसी दूसरे महत्वपूर्ण अंग तक नहीं पहुंच पाया था। इस बीमारी या इसके कारण, बचाव, निदान, इलाज के बारे में कुछ भी नहीं पता था। इसलिए जब इलाज शुरू हुआ तो मेरे लिए एक ही सूत्र वाक्य था- इसके बारे में जानो, जानो और ज्यादा जानो। और जानने की इस प्रक्रिया ने दिमाग और मन को लगातार व्यस्त और उलझाकर रखा। जानने की इस लगन ने ग्यारह महीने लंबे कठिन इलाज के बीच किसी वक्त उकता कर रुक जाने का ख्याल भी न आने दिया।

कैंसर के बारे में हर संभव स्रोत से खोज-खोज कर पढ़ने-जानने की उत्सुकता ने मुझे उन कठिन अपरिचित रास्तों के कई बड़े-छोटे रोड़ों से पहले ही परिचित करा दिया। जानकारी ने मुझे जीने का भरोसा दिया और और डॉक्टरों से अपने हित में बीमारी के बारे में, उसके इलाज और बुरे नतीजों के बारे में सवाल करने आत्मविश्वास भी। कई तरह की सुनी-सुनाई बातों की सच्चाई-झुठाई समझ में आने लगी। दवाओं के संभावित साइड इफेक्ट्स के लिए काफी हद तक तैयारी कर पाने और मानसिक रूप से तैयार रहने का मौका दिया। कम उम्र मेरा भरपूर साथ दे रही थी लेकिन इसे संतुलित करने के लिए नकारात्मक पक्ष भी मौजूद था- उस कड़े इलाज के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील और प्रतिक्रियावादी मेरा शरीर।

पूरी जिंदगी की साधः लड़ाई के दो मोर्चे

इलाज के दौरान बाल सारे झड़ गए, सर्जरी के बाद शरीर बेडौल हो गया। लेकिन ये छोटी बातें थीं और अस्थायी भी। ज्यादा जरूरी था- जीवन को बनाए रखना ताकि इन बाहरी कमियों के बाद भी जिंदगी के ज्यादा महत्वपूर्ण, दिलचस्प हिस्सों को बरकरार रख पाऊं। इन छोटे दिखावटी हिस्सों को खोकर अगर एक अधूरी जिंदगी को पूरी लंबाई तक ले जाने में मदद मिलती है तो उन्हें मैं सौ बार गंवाने को तैयार थी।

इलाज पूरा हुआ। उसके बाद पहले तीन महीने पर, फिर छह और फिर 12 महीने पर फॉलो-अप, डॉक्टरी और तरह-तरह की लैबोरेटरी में जांचों और स्कैन इत्यादि का सिलसिला। लेकिन बड़ी बात यह थी कि मैं जिंदा थी और जीना चाहती थी। इसके सामने बाकी सारी बातें नजरअंदाज करने लायक थीं। खुद अपने लिए नहीं बल्कि अपने लोगों के लिए जीना, जिनको मेरी परवाह थी। दरअसल कैंसर के खिलाफ लड़ाई कभी अकेले की नहीं होती। यह साझा लड़ाई होती है जिसमें डॉक्टर-नर्स, परिवार के लोग मित्र-शुभचिंतक सभी शामिल होते हैं। बीमार के शरीर को मैदान बनाकर लड़ी जा रही इस लड़ाई में कोई आयुध पहुंचाता है तो कोई रसद। कोई शुभकामनाएं देकर ही मनोबल बनाए रखता है। दुश्मन यानी इस बीमारी की कमजोरियों और ताकतों के बारे में जागरूकता लड़ाई में जीत की संभावना को बढ़ा देते हैं।

कैंसर होने का पता चलने के बाद पांच साल जी लेना किसी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। डॉक्टर आम तौर पर इसके बाद जीवन को सुरक्षित, कैंसर को ठीक हुआ मान लेते हैं। मेरे पांच साल पूरे होने पर डॉक्टरों की बधाई मिली। लगा मुक्ति मिली। एक आत्मकथात्मक किताब भी छप कर आ गई। मैंने सोचा, मेरे जीवन की एक कठिन कहानी खत्म हुई।

मगर नहीं। दो और साल बीते तो पता चला कि वह तो जीवन की एक लंबी किताब का सिर्फ एक अध्याय था। दूसरा अध्याय अभी बाकी था। यह एक और लड़ाई थी मेरी, कैंसर के खिलाफ जिसमें मैं फिर से अनचाहे ही धकेल दी गई थी। उसी अस्पताल में उन्हीं डॉक्टरों के पास मैं फिर पहुंच गई अपनी कहानी के इस नए अध्याय की भूमिका लेकर। डॉक्टरों ने मुझे ‘वेटरन’ करार दिया, इस बिनाह पर कि पिछले अनुभवों के बाद मेरे लिए कुछ भी नया नहीं होगा और आसानी से मैं इसके इलाज को दोबारा भी झेल पाऊंगी। लेकिन अनुभवी हो जाने भर से दर्द की अनुभूति कम तो नहीं हो जाती। इस बार भी वही इलाज- सर्जरी, 25 दिन रेडियोथेरेपी और छह साइकिल कीमोथेरेपी- बिना किसी छूट, कोताही या राहत के।

सीखने होंगे कुछ गुर बेहतर जिंदगी के

दूसरे अध्याय को भी कोई सात साल बीत चुके हैं। इन चौदह वर्षों में जीवन के उतार-चढ़ावों से गुजरकर मैंने जीने के कुछ गुर सीख लिए हैं। बेहतर जिंदगी पाने का पहला गुर है- अपने को जानना, अपने शरीर को पहचानना, समझना, कहीं पर आए बदलावों पर नजर रखना और अपनी जिम्मेदारी खुद लेना। बदलाव या बीमारी का पता लगते ही उसके इलाज का उपाय करना पहला महत्वपूर्ण कदम है। ठोस कैंसर की गांठों का पता आम तौर पर मरीज को ही सबसे पहले चलता है। डॉक्टर भले ही न पहचान पाए, लेकिन व्यक्ति अगर नियमित रूप से सही तरीके से अपने शरीर को जांचे तो उसमें आ रहे बदलावों को पहचान सकता है। कैंसर के मामले में जल्दी पहचान उसके सफल इलाज की कुंजी है। हमारे देश में कोई 70 फीसदी कैंसर के मामले जब तक सही अस्पताल तक पहुंचकर इलाज की स्थिति में आते हैं, ठीक होने की संभावना से काफी आगे निकल चुके होते हैं। देरी हो चुकी होती है और ट्यूमर फैल चुका होता है। इसलिए बीमारी का पता जितनी जल्दी लग जाए, इलाज उतना ही कामयाब और सरल होता है।

हालांकि पिछले समय में कैंसर के नए-नए कम साइड इफेक्ट वाले इलाज खोजे गए हैं, जो पहले के इलाज से ज्यादा कारगर हैं। टार्गेटेड थेरेपी कैंसर के मरीज की जरूरत के अनुसार डिजाइनर दवाओं से इलाज की पद्यति है, जो स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान किए बिना सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को खत्म करती है, जबकि पारंपरिक इलाज में कैंसर के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाएं भी बुरी तरह प्रभावित होती हैं। कुछ प्रकार के कैंसरों में टार्गेटेड थेरेपी शुरुआती परीक्षणों के स्तर पर सफल साबित हो रही है।

उम्मीद की लौ में है जिंदगी

विकसित देशों में कैंसर के पुख्ता इलाज की खोज में लगातार अनुसंधान चल रहे हैं, हालांकि पिछले कुछ दशकों में जितना समय और धन इस पर खर्च किया गया है, उसके मुताबिक परिणाम नहीं मिल पाए हैं। विकसित अवस्था के ज्यादातर कैंसर अब भी ठीक नहीं हो पाते, फिर भी कैंसर के साथ जीवन अब पहले से कहीं ज्यादा लंबा और ज्यादा आसान हो गया है। वैसे भी कैंसर मूलतः शरीर के भीतर की रासायनिक संरचनाओं में गड़बड़ी के कारण होने वाली बीमारी है। ऐसे में सेहतमंद खान-पान, शारीरिक क्रियाशीलता, बेहतर जीवनचर्या सभी के लिए महत्वपूर्ण है, ताकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत हो कि कैंसर दूर रहे या कुछ ज्यादा समय तक शरीर इसके खिलाफ लड़ पाए।

अपने शरीर और मन की क्षमताओं की सीमाओं को टटोलना और बढ़ाते जाने की लगातार कोशिश करते रहना भी जीने की कला है जो कैंसर जैसी शरीर के भीतर पैदा होने वाली गड़बड़ियों पर लगाम रखती है। साथ ही जरूरी है- जीवन की उम्मीद बनाए रखना और इसे आगे बढ़ाना, उन सब तक, जिनके जीवन में बस इसी एक लौ की सख्त जरूरत है।
-आर अनुराधा

Saturday, January 7, 2012

हाल के समय में हुईं कैंसर के इलाज की कुछ महत्वपूर्ण खोजें

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी- त्वचा का कैंसर मेलानोमा तेजी से फैलता है और विकसित अवस्था में इसका इलाज मुश्किल होता है। इसीलिए इस अवस्था में मरीज के जीने की संभावना औसतन 8 से 18 माह ही होती है। अब तक इसका इलाज डाकार्बाज़ाइन नाम की कीमोथेरेपी दवा से ही किया जाता है। यह दवा सीधे ट्यूमर पर हमला करती है। क्योंकि कैंसर की रक्त के जरिए फैलने की प्रवृत्ति होती है इसलिए एक सीमा के बाद दवा असरकारक नहीं रहती। ऐसे में कैंसर विकसित होता रहता है और आखिर जानलेवा साबित होता है। लेकिन न्यू यॉर्क के स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ने विकसित मेलानोमा के मोनोक्लोनल एंटीबॉडी यानी शरीर में ही इस खास कैंसर से निकलने वाले सहयोगी प्रोटीन के खिलाफ बनाई गई एंटीबॉडी से इलाज के लिए डाकार्बाज़ाइन के साथ इपिलिमुमाब नाम के रसायन का इस्तेमाल किया। तुलना करके देखा गया कि जिन मरीजों को सिर्फ डाकार्बाज़ाइन दी गई उनके एक साल तक जीवित रहने की उनकी संभावना 36.3 फीसदी रही जबकि दोनों दवाएं पाने वालों के लिए यह प्रतिशत 50 रहा। इसे पिछले 30 साल में त्वचा के कैंसर की सबसे जबर्दस्त खोज कहा जा रहा है।

एक अन्य शोध में इसी संस्थान की एक और टीम ने डाकार्बाज़ाइन की तुलना में वेमुराफेनिब दवा का इस्तेमाल करके देखा कि यह बी-आरएएफ नामक जीन के कैंसरकारी म्यूटेशन के असर को रोकती है। यह म्यूटेशन त्वचा के कैंसर के करीब आधे ट्यूमरों में मौजूद पाया गया है। बी-आरएएफ जीन एक एंजाइम छोड़ता है, जो ज्यादा सक्रिय होने पर त्वचा की रंजक कोशिकाओं मेलानोसाइट्स के कैंसर की संभावना को बढ़ा देता है। वेमुराफेनिब एक एंजाइम है जो म्यूटेटेड बी-आरएएफ जीन की गतिविधियों पर रोक लगा कर कैंसर बनने को ही रोक देता है। इस इलाज से मरीजों का छह माह जीवित रहने की संभावना 84 फीसदी थी जबकि डाकार्बाज़ाइन लेने वाले समूह की 64 फीसदी। यह इलाज इतना प्रभावी रहा कि इस परीक्षण को बीच में ही रोक दिया गया ताकि सभी मरीजों को इसमें शामिल करके उन्हें भी इस टार्गेटेड इलाज का लाभ दिया जा सके।

एंटी एंजियोजेनिक थेरेपी- इस साल अप्रैल के पहले हफ्ते में खबर आई कि क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट, इंग्लैंड के फार्मेसी स्कूल और अल्माक डिस्कवरी लिमिटेड के वैज्ञानिकों ने ऐसा इलाज खोजा है जिसमें दवा ट्यूमर पर सीधे हमला करने की बजाए उसकी रक्त नलिकाओं की बढ़त को रोक देती है। इस तरह ट्यूमर कोशिकाओं को ऑक्सीजन और पोषण मिलना बंद हो जाता है और वे मर जाती हैं। वैसे तो 1985 से ही वैज्ञानिक जानते थे कि रक्त नलिकाएं ट्यूमर के लिए विशेष आपूर्ति हेतु विकसित हो जाती हैं। लेकिन उन्हें बढ़ने से रोका कैसे जाए, इस सवाल का जवाब उन्हें अब मिल गया है। उम्मीद है कि यह थेरेपी सभी तरह के ठोस ट्यूमरों के लिए असरदार रहेगी। अभी प्राकृतिक प्रोटीन और पेप्टाइड पर आधारित यह एंटी एंजियोजेनिक पद्यति प्रि-क्लीनिकल स्तर से गुजर रही है।

इसी तरह के एक और परीक्षण के बारे में ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के कैंसर थेरैप्यूटिक संस्थान की रिपोर्ट जर्नल कैंसर रिपोर्ट में प्रकाशित हुई है। इसके मुताबिक सूजन, जलन आदि के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑटम क्रोकस के फूल में पाया जाने वाला जहरीला रसायन कोल्चिसिन कैंसर के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि अपने आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपने लिए जगह बनाने के लिए सभी ट्यूमर कुछ एंजाइम पैदा करते हैं। संवर्धित कोल्चिसिन अणु में एर प्रोटीन होता है जिससे यह अक्रिय बना रहता है। लेकिन जब यह प्रोटीन इन एंजाइमों के संपर्क में आता है तो वह नष्ट हो जाता है और कोल्चिसिन सक्रिय हो जाता है। और तब वह ट्यूमर को पोषण देने वाली रक्त नलियों को नष्ट कर देता है और ट्यूमर खत्म हो जता है। इस तरह यह दवा सिर्फ ट्यूमर पर ही असर करती है, स्वस्थ कोशिका पर नहीं।

सीरियल किलर टी-सेल- इसी प्रक्रिया से जुड़ी एक खोज पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने विकसित अवस्था के ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर के इलाज के लिए टी-लिंफोसाइट को जेनेटिकली इंजीनियर किया है। इस प्रयोग में शामिल तीन में से दो मरीज एक साल से ज्यादा समय तक स्वस्थ रहे, उनमें कैंसर लौट कर नहीं आया। हार्वर्ड मेडीकल स्कूल ने कैंसर कोशिकाओं में एक खास रसायन की मौजूदगी को खोजा था, जिसे इस ताजा प्रयोग में निशाना बनाया गया है। कैंसर पर हमला करने वाली कोशिका बनाने के लिए एक वायरस के जीन में बदलाव किए गए ताकि वह ऐसा रसायन बनाए जो ल्यूकेमिया कोशिका से जुड़ जाए और वहां रक्त में मौजूद टी-लिंफोसाइट को उकसाए कि वह कैंसर कोशिकाओं को मार दे। फिर मरीज के शरीर से रक्त निकाल कर उसमें यह वायरस डाल दिया गया। जब संक्रमित खून वापस मरीज के शरीर में डाला गया तो हर इंजीनियर्ड टी-लिंफोसाइट हजार से ज्यादा बार बहुगुणित हुई और कई महीने जिंदा रह कर कैंसर को खत्म कर दिया। इनसे अक्रिय ‘यादगार’ टी-कोशिकाएं भी बनीं, जो कैंसर के दोबारा पनपने पर उसे पहचान कर अपने आप ही उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू देंगी।

आई-बेट 151- इंग्लैंड में ग्लैक्सो स्मिथ क्लीन व कैंसर रिसर्च यूके (क्रुक) ने खोजा कि 2 साल से छोटे बच्चों में एक्यूट ल्यूकेमिया के 80 फीसदी मामलों और वयस्कों में 1-10 फीसदी मामलों में मिक्स्ड लीनिएज ल्यूकेमिया या एमएलएल होता है। एमएलएल जीन एक अन्य जीन के साथ मिल कर फ्यूजन प्रोटीन बनाता है जो कि ल्यूकेमिया बनाने वाले जीन को काम शुरू करने को उकसा देता है। लैब में चूहों की और मानव कोशिकाओं में आई-बेट 151 प्रोटीन से यह प्रक्रिया रोकी जा सकी है। यह थेरेपी अभी परीक्षण के शुरुआती चरण में है।

रेनियम-186 और लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी- क्वींस यूनिवर्सिटी, बेलफास्ट में एडवांस प्रोस्टेट कैंसर के फेस-1 ट्रायल में मरीजों को कीमोथेरेपी के साथ रेडियोएक्टिव रेनियम-186 (Rhenium) दी गई। दूसरा फेज़ 6 माह में शुरू होगा, जिसके नतीजे दो साल में आएंगे। यूसी सांता बारबरा में प्रोस्टेट कैंसर का एक और इलाज खोजा गया। लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक कैंसर कोशिका और स्वस्थ कोशिका में अंतर करती है। इस गुण की जानकारी से स्वस्थ कोशिकाओं को बचाते हुए केवल बीमार कोशिकओँ को नष्ट करने के लिए रेडियोथेरेपी का उपयोग किया गया है।

इन पद्यतियों को बाजार तक आने में अभी बरसों लगेंगे।

कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 2

कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1

कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।
-आर. अनुराधा


किसी कोशिका के भीतर जेनेटिक रसायनों यानी जीनों में अचानक बदलाव आने के कारण उसके अनियंत्रित हो जाने और अपनी तरह की बीमार, अधूरी कोशिकाओं की संख्या बढ़ाते जाने का नाम ही कैंसर है। यह अचानक बदलाव म्यूटेशन कहलाता है। जीनोम की जानकारी के बाद अब वैज्ञानिक ट्यूमर के बजाए उसके बनने की प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, ताकि ट्यूमर की जड़ को ही खत्म किया जा सके। इसी के साथ-साथ काम करती है शरीर में फैल चुकी कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए टार्गेटेड कीमोथेरेपी। इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर वैज्ञानिक हर म्यूटेशन और उसके रासायनिक वातावरण को समझ कर उसी के अनुरूप दवाएं खोजने में जुटे हैं। इस तरह पर्सनलाइज्ड और टार्गेटेड इलाज से एकदम सटीक इलाज तय किया जा सकता है, बिना स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए। इस तरह का इलाज छोटा और सस्ता होगा, मरीज को इलाज की तकलीफ भी नहीं झेलनी होगी। इसलिए सिर्फ ट्यूमर पर फोकस करने की बजाए अब वैज्ञानिक मरीज की रासायनिक बनावट को भी जांच के दायरे में ला रहे हैं।

दूसरी तरफ हमारे बाहरी रासायनिक वातावरण का गहरा असर शरीर के रासायनिक संतुलन पर पड़ता है। रसायनों का यह हमला हमारे जीवन पर बढ़ता जा रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय आयुधों के लिए या लोगों के सामूहिक संहार के लिए बने ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे रसायनों को उद्योगों ने हमारे रोज के इस्तेमाल की चीजों में तब्दील कर दिया। धुलाई, सफाई और सौंदर्यवर्धन से लेकर कीटाणु-जीवाणु, मच्छर-मक्खी और फसलों की खरपतवार के नाश तक के लिए बने उत्पादों में ये जहरीले रसायन भरपूर हैं, जिन्हें हम बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं। इनका इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही कैंसर होने की संभावना भी बढ़ती है। इसी के साथ हमारी जीवनशैली की कमियां भी नत्थी हैं, जो कैंसर को बढ़ावा देती हैं। इस अर्थ में कैंसर कोई ऐसी बीमारी नहीं जो कीटाणुओं से होती है, बल्कि कई कारकों का दुष्परिणाम है जो शरीर के मेटाबॉलिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं और यह बिगड़ाव कैंसर के रूप में सामने आता है। यह दरअसल कैंसर की रोकथाम का एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

इन बाहरी और भीतरी हमलों के खिलाफ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र लगातार काम करता रहता है। जीवन भर हर एक के शरीर में लगातार ‘कैंसर’ कोशिकाएं बनती रहती हैं और उन्हें शरीर नष्ट भी करता रहता है। लेकिन एक सीमा के बाद जब उन्हें रोक पाना प्रतिरक्षा तंत्र के बस में नहीं होता, तब कैंसर बीमारी के रूप में फैलने लगता है, जिसे रोकने के लिए इलाज की जरूरत होती है।

इलाज की इन तकनीकों ने कई तरह के कैंसरों में मरीजों का जीवन बचाया है, या पहले से आसान बनाया है। अमरीका में 1990 से 2007 के बीच कैंसर से मृत्यु दर में पुरुषों में 22 और महिलाओं में 14 फीसदी की कमी आई है। 1975 में आधी संख्या में ही मरीज 5 साल तक जी पाते थे, अब करीब 70 फीसदी मरीजों का जीवन पांच साल तक खिंच जाता है। यह प्रगति महत्वपूर्ण है, पर काफी नहीं। इतना आगे बढ़ पाने के बाद भी हम अभी कैंसर से मुक्ति के उपाय के आस-पास भी नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर साल सवा करोड़ नए कैंसर मरीजों की पहचान होती है और इस साल 75 लाख लोग इस बीमारी से मर जाएंगे। 20 साल में कैंसर से मरने वालों की संख्या सालाना लगभग दोगुनी- 1.2 करोड़ तक हो जाएगी। कैंसर दरअसल बड़ी उम्र की बीमारी है। पुराने होते शरीर की कोशिकाएं भी करोड़ों बार के विभाजन के बाद स्वाभाविक ही, थक जाती हैं, असामान्य होने लगती हैं उनमें बदलाव, म्यूटेशन आने लगते हैं। इसलिए लोगों की उम्र लंबी होने के और बड़ी उम्र के लोगों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

भारत में 25 लाख कैंसर के मरीज हैं और हर साल 8 लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज होते हैं और साढ़े पांच लाख मर भी जाते हैं। इनके अलावा हज़ारों हैं जो कैंसर अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। हमारे यहां 70 फीसदी मामलों में एडवांस स्टेज में ही मरीज इलाज के लिए पहुंच पाता है। तब तक बीमारी काबू के बाहर हो जाती है। आर्थिक स्थिति भी कई बार पूरे इलाज से मरीज को वंचित रखती है और इस तरह बहुमूल्य मानव संसाधन का नुकसान होता है। जो आर्थिक क्षमता रखता है, वह मौजूदा महंगे, लंबे इलाज से बंधा रहता है। इलाज कितना कारगर होगा, वह बच पाएगा या नहीं इसी अनिश्चितता में लगातार भावनात्मक ऊहा-पोह की स्थिति में रहता है। कैंसर व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के लिए भी आर्थिक और भावनात्मक सदमे का कारण है।

अगर पहली या दूसरी अवस्था में ही कैंसर को पहचान कर पूरा इलाज करवाया जाए तो 80 फीसदी तक मरीजों का जीवन बच सकता है जबकि स्टेज तीन या चार के मरीजों के बचने की संभावना 20 फीसदी तक ही होती है।

जो इलाज की तकनीकें और दवाएं मरीज को उपलब्ध हैं, वे भी फिलहाल कैंसर से मुक्ति का तरीका नहीं हैं। कैंसर से मुक्ति का रास्ता लंबा है और इसका भविष्य इन्हीं मौजूदा आजमाइशों की सफलता पर निर्भर करेगा।