Wednesday, October 28, 2009

दस मिनट खर्च करके जान बचाएं

आज, बुधवार 28 अक्टबर, 2009 को दैनिक भास्कर के 'समय' पेज पर मेरा यह लेख छपा है। उसे नीचे दे रही हूं।

हमारे देश में एक लाख में से 30 से 33 महिलाओं को स्तन कैंसर हो रहा है और अनुमान है कि शहरों में हर 8-10 महिलाओं में से एक को और गांवों में हर 35-40 में एक को यानी औसतन हर 22 वीं महिला को अपने जीवनकाल में कभी न कभी स्तन कैंसर होने की संभावना होती है। इस समय स्तन कैंसर के कोई एक लाख नए मामले हर साल दर्ज हो रहे हैं और इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) का अंदाज़ा है कि सन 2015 तक यह आंकड़ा ढाई लाख का होगा। इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि गांवों में ऐसे कई मामले रिपोर्ट भी नहीं होते।

पहले स्तन कैंसर विकसित देशों की, खाते-पीते परिवारों की महिलाओं की बीमारी मानी जाती थी, लेकिन अब हर वर्ग की महिलाओं में देखी जा रही है। बदले समय में शहरी भारतीय महिलाओं में भी स्तन का कैंसर सबसे आम हो गया है।इन संख्याओँ के बीच सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा यह है कि स्तन कैंसर के 50 फीसदी मरीजों को इलाज करवाने का मौका ही नहीं मिल पाता।

आंकड़ों को जाने दें तो भी हमारे यहां स्तन कैंसर का परिदृष्य भयावह है। इसके बारे में जागरूकता की और इसके निदान और इलाज की सिरे से कमी के कारण ज्यादातर मामलों में एक तो मरीज इलाज के लिए सही समय पर सही जगह नहीं पहुंच पाता। दूसरे इसके महंगे और बड़े शहरों तक ही सीमित इलाज के साधनों तक पहुंचना भी हर मरीज के लिए संभव नहीं।

यानी ज्यादातर मरीजों के बारे में सच यह है कि न इलाज इन तक पहुंच पाता है, न ये इलाज तक पहुंच पाते हैं। और जब तक मरीज कैंसर का इलाज दे सकने वाले अस्पताल तक पहुंचने में कामयाब होता है, उसका कैंसर बेकाबू हो गया रहता है। और अगर नहीं, तो पैसे की कमी के कारण वह इलाज बीच में ही बंद कर देता है। कई बार तो समय पर सही अस्पताल पहुंच कर पूरा खर्च करने के बाद भी कैंसर ठीक नहीं हो पाता। कारण- हमारे देश में कैंसर क विशेषज्ञता और इलाज की सुविधाओँ की बेतरह कमी।

ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या करें कि हालात बेहतर हों। तो, हम समस्या की शुरुआत में ही बहुत कुछ कर सकते हैं। और यही सबसे जरूरी भी है कैंसर को काबू में करने के लिए। कैंसर के सफल इलाज का एकमात्र सूत्र है ।- जल्द पहचान। जितनी शुरुआती अवस्था में कैंसर की पहचान होगी, इलाज उतना ही सरल, सस्ता, छोटा और सफल होगा। इसकी पहचान के बारे में अगर व्यक्ति जागरूक हो, अपनी जांच नियमित समय पर खुद करे तो मशीनी जांचों से पहले ही उसे बीमारी के होने का अंदाजा हो सकता है।

कैंसर की खासियत है कि यह दबे पांव आता है, बिना आहट के, बिना बड़े लक्षणों के। फिर भी कुछ तो सामान्य लगने वाले बदलाव कैंसर के मरीज में होते हैं, जो कैंसर की ओर संकेत करते हैं और अगर वह मरीज सतर्क, जागरूक हो तो वहीं पर मर्ज को दबोच सकता है।

संपन्न देशों में क्लीनिकल जांच, स्तन स्वयं परीक्षा के अलावा 40 साल में और फिर उसके बाद हर दूसरे साल और 50 की उम्र के बाद हर साल मेमोग्राफी यानी मशीन से स्तन की जांच की जाती है जिससे छोटी-सी गांठ या बदलाव भी पकड़ में आ सके। लेकिन भारत में बहुत ही कम लोग हैं जो नियमित रूप से इस खर्च को वहन कर सकते हैं, वह भी कैंसर की महज संभावना को जानने के लिए। ध्यान देने की बात यह है कि मेमोग्राफी स्तन कैंसर को रोकने का तरका नहीं है, न ही इसका इलाज है। यह सिर्फ कैंसर को जल्द पहचानने का मशीनी तरीका है, जो कभी गलत रिपोर्ट भी दे सकता है।

मेमोग्राफी मशीन की सेंसिटिविटी औसतन 80 फीसदी होती है। यानी मशीन सौ में से बीस मामलों में कैंसर को नहीं पकड़ पाती, फॉल्स नेगेटिव रिपोर्ट देती है। अमरीका में नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि मेमोग्राम हर पांच में से एक कैंसर के मामले को पकड़ने में नाकाम रहता है। डॉक्टरों का एक स्कूल यहां तक मानता है कि मेमोग्राफी का खास फायदा नहीं है, क्योंकि जितनी बड़ी गांठ को उस मशीन से देखा जा सकता है, उस स्टेज पर तो महिलाएं अपनी जांच करके भी गांठ और बदलाव आदि का पता लगा सकती हैं। इसके अलावा उस मशीन से जो रेडिएशन निकलता है वही कई बार कैंसर की शुरुआत का कारण बन सकता है।

इस लिहाज से हमारे देश में और भी जरूरी हो जाता है कि सभी महिलाएं अपने स्तन की स्वयं परीक्षा करना सीख लें और महीने में सिर्फ दस मिनट खर्च करके यह जांच करें। कम सुविधाओं के बीच अपनी सेहत का इस तरह ख्याल रख कर महिलाएं अपनी जिंदगी बचा सकती हैं। पुरुषों के लिए भी जरूरी है कि वे इस बीमारी के बारे में जानें ताकि समाज में फैले सैकड़ों भ्रम दूर हो सकें। लोग इसे दुर्भाग्य, अपशकुन, किन्हीं कुकर्मों का फल या मारक बीमारी न समझ कर किसी भी दूसरी बीमारी की तरह देखें और इसके इलाज के लिए प्रस्तुत हों।

अमरीका में 1993 से अक्टूबर को स्तन कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाना शुरू किया और बाकी दुनिया ने भी इसे अपना लिया। दुनिया में गुलाबी रिबन स्तन कैंसर जागरूकता का प्रतीक मान लिया है। इसे भले ही कोई दिखावा या विदेशी रस्म कहे, लेकिन यह मानना ही पड़ेगा कि हमारे देश में गुलाबी रिबन की जरूरत सभी को है।

Sunday, October 25, 2009

केरल के कुट्टनाड इलाके में कैंसर की पैदावार?

केरल से एक चौंकाने वाला आंकड़ा मिला है। यहां अलप्पुड़ा मेडीकल कॉलेज अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग में इस साल जनवरी से मई के बीच 499 मरीजों ने इलाज करवाया जिनमें से ज्यादातर कुट्टनाड इलाके के थे। इसके मुकाबले पिछले साल यहां 355 मरीज आए थे जबकि उससे पहले साल 300 मरीजों ने इलाज करवाया। यह संख्या सिर्फ उन मरीजों की है जो उस अस्पताल तक पहुंचे। कई और रहे होंगे जिन्होंने निजी अस्पतालों में इलाज करवाया, या फिर करवाया ही नहीं। कोई 21 लाख की आबादी वाले इलाके में कैंसर के मरीजों की संख्या इस रफ्तार से बढ़ना खतरे की घंटी है।

केरल के अलप्पुड़ा जिले के कुट्टनाड इलाके को धान का कटोरा भी कहा जाता है। यहां जमीन नीची है, जिससे जल-भराव के कारण चावल के अलावा कोई और खेती नहीं हो सकती। यहां के 90 फीसदी किसान ज्यादा उपज वाली फसल बोते हैं जिसके लिए ज्यादा रसायनों की जरूरत पड़ती है। उस पर पानी-भरा इलाका होने के कारण यहां भूरे टिड्डे और फफूंदी का प्रकोप रहता है, जिसे काबू करने के लिए कीटनाशक और फफूंदीनाशक जरूरी हो जाते हैं।

चावल की फसल में कीटनाशक रसायनों के इस्तेमाल पर एक अध्ययन एक एनजीओ ‘सैंडी’ ने प्रायोजित किया। केरल कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्र की डॉ. पी इंदिरा देवी के इस रिसर्च की रिपोर्ट साउथ एशियन नेटवर्क फॉर डेवलपमेंट एंड एनवायर्नमेंटल इकॉनॉमिक्स (SANDEE) की पत्रिका में मार्च 2007 में छपी थी।

इसमें कहा गया कि कुट्टनाट में चावल की फसलों को भूरे टिड्डे, चावल कीट और पत्तों पर लगने वाली बीमारी से बचाने के लिए रसायनों का जरूरत से कई गुना ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां कुल 19 तरह के रसायन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इस इलाके में हर साल 15 हजार टन रासायनिक उर्वरकों, 500 टन कीटनाशकों और 50 टन फफूंदनाशकों का इसेतेमाल किया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इन रसायनों का छिड़काव सुरक्षित मशीनों से नहीं किया जाता। छिड़काव करने वाले अपने को रसायन से बचाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा कोई कपड़ा नाक-मुंह पर बाध लेते हैं या अपने शर्ट की आस्तीन से ही काम चलाते हैं। जबकि ये रसायन बेहद खतरनाक और जानलेवा तक हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक केरल के कुट्टनाड इलाके में ओंठ, पेट, त्वचा और सिर के कैंसर, लिंफोमा, ल्यूकेमया और मायलोमा जैसे कैंसर के अनेक मामले सामने आए। एक अन्य सर्वेक्षण में पाया गया कि यहां मछलियों की संख्या में भी कमी आई है। स्थानीय मीडिया में खबरें भी आईं कि बड़ी संख्या में मछलियां अल्सर के कारण मर रही है। इन सभी घटनाओं को इस रिपोर्ट में रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से जोड़ा गया।

इससे पहले भी 1980 और 90 के दशकों में केरल का कासरगोड़ जिला काजू की फसल पर कीटनाशकों के बेहिसाब इस्तेमाल के लिए खूब चर्चा में रहा है। एंडोसल्फान नाम के इस कीटनाशक के असुरक्षित छिड़काव की वजह से यहां अनेक मौंतें हुईं।

हाल में मीडिया में आई इन खबरों के बाद कुट्टनाड विकासन समति ब्लॉक और ग्राम पंचायत के साथ मिलकर ने इस इलाके में घर-घर जाकर स्क्रीनिंग करके कैंसर के लक्षणों वाले लोगों को जांच केंद्रों में भेजने और उनका इलाज करवाने की मुहिम शुरू की है। इस कार्यक्रम के निदेशक का भी मानना है कि इलाके के पानी में रसायन लगातार जमा होते जा रहे हैं जिनका असर लोगों की सेहत पर दिख रहा है। इसे रोकने की जरूरत है।

चावल की फसल में जरूरत से ज्यादा रसायनों के इस्तेमाल और इससे कैंसर की घटनाएं बढ़ने के बारे में हाल ही में राज्य की विधानसभा में भी सवाल उठ चुका है। सरकार ने इस बारे में सभी उपाय करने का वादा भी किया। स्थानीय डॉक्टरों की भी मांग है कि इस मुद्दे की पूरी जांच की जाए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और रोकथाम के उपाय समय रहते किए जा सकें।

हालांकि किन्हीं रसायनों से कैंसर होने में 5-10 साल का समय लगता है लेकिन यह भी समझ में आ रहा है कि कैंसर होने की मौजूदा घटनाएं कुछेक साल पहले के रसायनों के असुरक्षित इस्तेमाल का नतीजा हैं और आगे की पीढ़ी को यह विकट स्थिति न देखनी पड़े इसके लिए जरूरी है कि अभी से सतर्क होकर ऐसे वैकल्पिक उपाय अपनाए जाएं जो हानिकारक न हों।

यहां बड़े पैमाने पर हो रही खेती के लिए जैविक खाद को बहुत व्यावहारिक नहीं बताया जा रहा है। लेकिन एक विकल्प है- एक फसल के बाद खेतों में एक मौसम मछलीपालन किया जाए जो घास-पात और खरपतवार को खाएंगी भी और साथ ही पानी में अपने मल के रूप में जैविक खाद भी उस जमीन में छोड़ेंगी। इससे जमीन फिर उपजाऊ हो जाएगी, खरपतवार खत्म होंगे और किसान को नुकसान भी नहीं उठाना पड़ेगा।

एक सरकारी सर्वेक्षण में देश के खाने की चीजों के 25 नमूनों में निर्धारित अधिकतम मात्रा की सीमा से अधिक खतरनाक रसायन पाए गए। शायद पूरे देश में खेती के लिए रसायनों की जगह वैकल्पक उपायों की जरूरत है ताकि भावी पीढ़ियों के लिए खान-पान और रोजगार के रूप में खेती सुरक्षित बनी रहे।

Sunday, September 13, 2009

'सेल फोन से ब्रेन ट्यूमर होता है?- गलत'

हम सभी को एक-न-एक बार वह फॉरवर्डेड मेल मिली होगी जिसमें कहा जाता है कि ज्यादा सेलफोन इस्तेमाल करने वालों को सिर का ट्यूमर होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए सेलफोन को सिर के पास न यानी कान पर रखें बल्कि ब्लू-टूथ उपकरणों का इस्तेमाल करें।

सेलफोन से ट्यूमर होने की बात सबसे पहले चर्चा में आई जब डेविड रेनार्ड ने 1993 में एक टीवी शो में अपनी पत्नी को ब्रेन ट्यूमर होने का कारण यह माना कि वह सिर से सेलफोन लगाकर काफी देर तक बातें करती थी। इसके समर्थन में कई न्यूरोसर्जन्स भी कह चुके हैं हालांकि वे भी इसका कोई पुख्ता कारण नहीं दे पाए कि यह कैसे होता है।

इसका जवाब मेडीकल साइंस के नहीं, भौतिकी के विशेषज्ञों से आया है। कोलैबोरेशन ऑफ इंटरनैशनल ईएमएफ एक्टिविस्ट्स नाम के इस ग्रुप ने सेलफोन से ब्रेन ट्यूमर होने की संभावना पर एक रपोर्ट जारी की है।

दरअसल कैंसर शरीर में होता है जब कोशिकीय डीएनए में गडबड़ होती है और उसमें म्यूटेशन आ जाता है, यानी उसकी संरचना में बदलाव आ जाता है। रसायनों, रेडएशन या वायरस से होने वाले ट्यूमर सभी में कोशिका में यह बदलाव आता है। सभी प्रकार के रेडएशन में फोटोन होते हैं और रेडिएशन की वेवलेंथ से उस फोटोन की ताकत तय होती है।

भौतिकशास्त्री एक आधारभूत तथ्य देते हैं कि साधारण बल्ब की रौशनी की फ्रीक्वेंसी 5x1014 हर्ट्ज़ होती है जिसमें हमारी कोशिका के डीएनए को तोड़ने या छेड़ने की ताकत नहीं होती, वरना आज हम सब या तो कैंसरों का पुलिंदा बने घूम रहे होते या अंधेरे में जी रहे होते।

इसके मुकाबले सेलफोन की फ्रीक्वेंसी 1 x 109 हर्ट्ज़ होती है और घरेलू इस्तेमाल के माइक्रोवेव ओवन की 2.45 x 1012 हर्ट्ज़। यानी बल्ब के मुकाबले माइक्रोवेव में ऊर्जा एक हजारवां और सेलफोन में दस लाखवां हिस्सा होती है। यानी सेलफोन की ऊर्जा से जीवित शरीर के भीतर किसी कोशिका के डीएनए को तोड़ना वैसा ही है जैसे कागज़ की कैंची से लोहे का तार काटना।

जर्नल ऑफ नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट ने 2001 के अंक में डेनमार्क के 5 लाख सेलफोन इस्तेमाल करने वालों के आंकड़ों का अध्ययन कर रिपोर्ट छापी है जिसमें उन्हें ब्रेन ट्यूमर होने के कोई लक्षण नहीं मिले।

मैरीलैंड विश्वविद्यालय के भौतिकशास्त्री रॉबर्ट एल पार्क का इसी पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन ऐसे किसी तथ्य की पुष्टि नहीं करता।

और जहां तक फॉर्वर्डेड मेल्स में यूटू्यूब की सेलफोन से मक्के का पॉपकॉर्न बनने जैसी फिल्मों का सवाल है, तो थोड़ी सी कंप्यूटर कारीगरी से सेलफोन के ऊपर रखे मक्के दानों को नीचे टेबल पर गिरते ही पॉपकॉर्न में बदल देना कोई बड़ी बात नहीं। और यह वीडियो दरअसल एक ब्लू टूथ बनाने वाली कंपन का विज्ञापन है। नीचे बटन पर क्लिक करके देखा जा सकता है।

Monday, August 17, 2009

‘ऊंची नाक’ के कारण कैंसर से ज्यादा मारे जाते हैं पुरुष?!

कुछ दिनों पहले खबर आई है कि पुरुषों को अपनी अकड़ की कीमत कैंसर से मौत के रुप में भी देनी पड़ रही है। इंग्लैंड में हाल ही में हुए एक अध्ययन के हैरान करने वाले नतीजे निकले हैं। पता लगा है कि स्त्री-पुरुष दोनों को होने वाले कैंसरों से मरने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं के मुकाबले 60 फीसदी ज्यादा होती है। और दिलचस्प बात ये है कि यह अवलोकन बिना किसी अपवाद के इस कैटेगरी के हर तरह के कैंसर पर लागू होता है।

वैज्ञानिकों को इसका कोई बायोलॉजिकल कारण नहीं समझ में आया है।

वैज्ञानकों ने पाया कि पुरुषों के कैंसर से मरने की संभावना महिलाओं से 40 फीसदी तक ज्यादा है। लीड्स मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालय की इस रपोर्ट के लेखकों में से एक प्रो. ऐलन व्हाइट का मानना है कि पुरुषों की जीवनचर्या यानी लाइफ स्टाइल (सिगरेट, मद्यपान, पान मसाला आदि) ही इसका कारण है।

डॉक्टरों का मानना है कि पुरुष जानते हुए भी इस बात को नजरअंदाज करते हैं कि उनके शरीर के बीच के भाग का मोटापा यानी तोंद मोटापे से जुड़े कैंसर और उससे मौत तक होने की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है। एक विचार यह भी है कि पुरुष डाक्टर के पास जाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि शायद इसीलिए समय पर निदान और इलाज न होना भी इसका एक कारण हो सकता है।

2006 और 2007 में कैंसर के मामलों और इसकी वजह से जान गंवा चुके लोगों के बारे में इकट्ठे किए गए आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों में किसी भी प्रकार का कैंसर होने की संभावना महिलाओं के मुकाबले 16 फीसदी ज्यादा है लेकिन उन्हें दोनों में होने वाले कैंसरों के होने की संभावना 60 फीसदी ज्यादा है।

और जैसा कि अक्सर होता है, इन नतीजों पर भी विवाद शुरू हो गया है। इंग्लैंड के जाने-माने कैंसर विशेषज्ञ कैरोल सिकोरा का मानना है कि पुरुषों में कैंसर से ज्यादा मौतों का कारण वहां की राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना (एन एच एस) का पुरुषों के खिलाफ भेद-भाव है। वे कहते हैं कि वहां एन एच एस बरसों से महिलाओं के हित में काम कर रही है जबकि पुरुषों की सेहत की लगातार अनदेखी होती रही है।

लब्बो-लुबाब ये कि इंग्लैंड में पढ़े-लिखे पुरुषों को भी कैंसर के बारे में पढ़ाने-सिखाने की जरूरत महसूस की जा रही है। महज लाइफस्टाइल में सुधार करके ही करीब 50 फीसदी कैंसरों का होना रोका जा सकता है। मगर चिंता की बात ये है कि इन सलाहों पर कोई कान नहीं दे रहा है।

सबक सीखना हो तो- कैंसर को छुपाना, उसके बारे में बात न करना शुतुरमुर्ग का रेत में चोंच छुपाना है। इससे सामने आया खतरा टल नहीं जाता। बल्कि ज्यादा आक्रामक, ताकतवर होकर हमला करता है। कैंसर पर अंग्रेजी में 30 करोड़ से ज्यादा वेबसाइट हैं। कोई यहां पहुंचे तो सही!

Sunday, May 31, 2009

इसके बावजूद तंबाकू का सेवन करने वाले, धूम्रपान करने वाले खोपड़ी से खाली हैं....

आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस है।






# “पता है, स्मोकिंग दरअसल आप नहीं करते। सिगरेट ही स्मोकिंग करती है। आप तो सिर्फ सिगरेट का छोड़ा हुआ धुंआ पीते हैं।“


# “अब यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि सिगरेट दुनिया में आंकड़ों के होने का एक प्रमुख कारण है।“











तंबाकू पर ज्यादा जानकारी के लिए 18 मई 2008 की पोस्ट देखें- कैंसर की दुनिया का आतंकवादी पत्ता: तंबाकू

Thursday, May 28, 2009

चाहती हूं जीना एक दिन

जिंदगी उतनी लंबी होती है, जितनी आदमी जी लेता है।

उतनी नहीं जितनी आदमी जिंदा रह लेता है।

कोई एक में कई जिंदगियां जी लेता है तो कोई एक दिन भी नहीं जी पाता।

मैं जीना चाहती हूं। एक दिन में कई दिन- चाहती हूं जीना ऐसा एक दिन।

एक शाम- जब मैं जा सकूं साथी के साथ

सान्ता मोनिका पर नए साल के स्वागत के लिए।

कोई दिन- बिना दर्द, जलन, तकलीफ के।

एक दिन- जब मेरे हाथ में हो दिलचस्प किताब,

पास बजता हो मीठा संगीत और साथ हो अच्छा खाना।

दो दिन- जब मैं नताशा के साथ फुर्सत से बैठकर गपशप कर सकूं

बैठे-बैठे उसकी बिटिया को अपनी गोद में सुला सकूं।

दस दिन- जब मैं किसी बच्चे के साथ

जा सकूं एक छोटी सी पहाड़ी पर पर्वतारोहण के लिए।

एक महीना- जब मुझे अस्पताल या पैथोलॉजी लैब का

एक भी चक्कर न लगाना पड़े।

एक मौसम- जिसके हर दिन मैं पकाऊं कुछ नया, पहनूं कुछ नया

जो बनाए मुझे सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा।

एक साल- जिसमें लगा सकूं हर पखवाड़े एक

कैंसर जांच और जागरूकता कैंप दिल्ली भर में

पांच साल- बिना कैंसर की पुनरावृत्ति के।

एक जीवन- जब मैं परिवार और झुरमुटों-झरनों-जुगनुओं के बीच

रहूं दूर पहाड़ी पर कहीं।

मैं ये सारे दिन एक बार जीना चाहती हूं।

इजाजत है?

(PS: रचना ने इस तरफ द्यान खींचा कि बिना संदर्भ के इस कविता कई पाठकों को ठीक से समझ में नहीं आएगी। और संदर्भ इसे ज्यादा प्रभावी बना देगा। अस्तु-

संदर्भ: पिछले ग्यारह साल से हर दिन मेरे लिए कुछ आशंकाएं लिए आता है। मई 1998 में पहली कार मुझे कैंसर होने का पता चला। पूरा इलाज कोई 11 महीने चला। इसके बाद लगातार फॉलो-अप, चेक-अप, ढेरों तरह की जांचें, तय समयों पर और कई बार बिना तय समयों पर भी, जब भी कैंसर के लौट आने की जरा भी आशंका हुई। उसके बाद सारे एहतियात के बाद भी मार्च 2005 में कैंसर का दोबारा उभरना। इन सबके बीच इन छोटी-छोटी मोहलतों की हसरत बनी हुई है, जिनमें से कुछेक पूरी हुईं भी, लेकिन उस इत्मीनान के साथ नहीं, जो मैं दिल से चाहती हूं। इसलिए जिंदगी से इजाजत मांगने का मन है कि क्या कभी हो पाएगा। और मुझे उम्मीद है कि होगा।)
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