Thursday, May 28, 2009

चाहती हूं जीना एक दिन

जिंदगी उतनी लंबी होती है, जितनी आदमी जी लेता है।

उतनी नहीं जितनी आदमी जिंदा रह लेता है।

कोई एक में कई जिंदगियां जी लेता है तो कोई एक दिन भी नहीं जी पाता।

मैं जीना चाहती हूं। एक दिन में कई दिन- चाहती हूं जीना ऐसा एक दिन।

एक शाम- जब मैं जा सकूं साथी के साथ

सान्ता मोनिका पर नए साल के स्वागत के लिए।

कोई दिन- बिना दर्द, जलन, तकलीफ के।

एक दिन- जब मेरे हाथ में हो दिलचस्प किताब,

पास बजता हो मीठा संगीत और साथ हो अच्छा खाना।

दो दिन- जब मैं नताशा के साथ फुर्सत से बैठकर गपशप कर सकूं

बैठे-बैठे उसकी बिटिया को अपनी गोद में सुला सकूं।

दस दिन- जब मैं किसी बच्चे के साथ

जा सकूं एक छोटी सी पहाड़ी पर पर्वतारोहण के लिए।

एक महीना- जब मुझे अस्पताल या पैथोलॉजी लैब का

एक भी चक्कर न लगाना पड़े।

एक मौसम- जिसके हर दिन मैं पकाऊं कुछ नया, पहनूं कुछ नया

जो बनाए मुझे सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा।

एक साल- जिसमें लगा सकूं हर पखवाड़े एक

कैंसर जांच और जागरूकता कैंप दिल्ली भर में

पांच साल- बिना कैंसर की पुनरावृत्ति के।

एक जीवन- जब मैं परिवार और झुरमुटों-झरनों-जुगनुओं के बीच

रहूं दूर पहाड़ी पर कहीं।

मैं ये सारे दिन एक बार जीना चाहती हूं।

इजाजत है?

(PS: रचना ने इस तरफ द्यान खींचा कि बिना संदर्भ के इस कविता कई पाठकों को ठीक से समझ में नहीं आएगी। और संदर्भ इसे ज्यादा प्रभावी बना देगा। अस्तु-

संदर्भ: पिछले ग्यारह साल से हर दिन मेरे लिए कुछ आशंकाएं लिए आता है। मई 1998 में पहली कार मुझे कैंसर होने का पता चला। पूरा इलाज कोई 11 महीने चला। इसके बाद लगातार फॉलो-अप, चेक-अप, ढेरों तरह की जांचें, तय समयों पर और कई बार बिना तय समयों पर भी, जब भी कैंसर के लौट आने की जरा भी आशंका हुई। उसके बाद सारे एहतियात के बाद भी मार्च 2005 में कैंसर का दोबारा उभरना। इन सबके बीच इन छोटी-छोटी मोहलतों की हसरत बनी हुई है, जिनमें से कुछेक पूरी हुईं भी, लेकिन उस इत्मीनान के साथ नहीं, जो मैं दिल से चाहती हूं। इसलिए जिंदगी से इजाजत मांगने का मन है कि क्या कभी हो पाएगा। और मुझे उम्मीद है कि होगा।)

54 comments:

सुप्रतिम बनर्जी said...

बहुत ख़ूब। बहुत अच्छी कविता। अक्स हक़ीक़त का।

Readers Cafe said...

Naiki aur pooch pooch...aamin

Tarun

अविनाश वाचस्पति said...

जीने की सबको इजाजत है
जीना सब चाहते हैं
पर इस जीने पर
चढ़ कम पाते हैं
मंजिल दिखलाई तो दती है
पर पाना मुश्किल होता है
ऐसा सपना है यह
हकीकत में बदलना चाहते हैं सब
सबके लिए, अपने लिए
और जो जी जाते हैं
वे ही सबको जीने के लि

सनातन जीने का संदेश
पहुंचाते हैं
पहुंचता है मन तक
मानस तक सबके
किस्‍से हैं ये अबके
रबके किस्‍से सबके।

Shefali Pande said...

आपके बारे में बहुत पढ़ा है ...
आपके हौसलों को सलाम ....

श्यामल सुमन said...

कोई एक में कई जिंदगियां जी लेता है तो कोई एक दिन भी नहीं जी पाता।
वाह। सच्चाई से आँखें मिलाती हुई पंक्ति। कहते हैं-

कहने को तो साँसें चलतीं हैं और यात्रा- क्रम भी प्रतिपल बढ़ता जाता है।
पर मैंने तो देखा सौ सौ बर्षों में मुश्किल से कोई एक दिवस जी पाता है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Nirmla Kapila said...

बहुत ही मार्मिक रचना है दुआ है कि जो जीना चाहता है वो हजaार हजार साल जीये इतनी सुन्दर कवित के लिये धन्य्वद और बधाई

भूतनाथ said...

हमने भी कुच्छ कहना था....पर क्या कहें....कितना जिए....कितना मरें....क्या कहें....जिन्दगी संगदिल है या मस्ती-भरी...क्या कहें....कितनी कितनी जी...क्या कहें....हमने भी कुच्छ कहना था....पर क्या कहें....!!

M Verma said...

एक दिन में कई दिन- चाहती हूं जीना ऐसा एक दिन ----
बहुत खूब --- सुन्दर रचना

BAL SAJAG said...

बहुत ही सुन्दर और गहरी भावनाओं की अभिबय्क्ति है . .... उम्मीद एक जिन्दा शब्द है... जो हमें जीने का हौसला देती है... जब कभी हम पैथोलाजी में ऍफ़० एन० सी० और बायोप्सी रिपोर्टो के आने के इंतजार में तन्हा खुद से लड़कर कमजोर होते रहते है...तब उम्मीद ही हमें मज़बूत और खुशदिल बनाती है.... जीने की इजाजत मांगनी नहीं है.... लड़कर लेनी है .... और जीना है तब तक........ जब तक हम जीना चाहते है.....
ये कैचिया हमें क्या खाक रोकेंगी
हम परो से नहीं हौसलों से उड़ते है ..........

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

आप ये सारे पल अपनी ज़िन्दगी में हजारों-लाखों बार जियें. और जब कभी गम-तकलीफ आपको सताए और नाउम्मीदी घर कर जाए तो फैज़ का यह शेर ज़हन में लायें:

"दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है;
लम्बी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है"

http://hindizen.com

venus kesari said...

इजाजत है?
बस यही आ कर बात अटक जाती है
आप किस्से इजाज़त मांग रही हैं खुद से ,जिन्दगी से, या समाज से ?????

वीनस केसरी

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर भाव लिये है आप की कविता

विनोद कुमार पांडेय said...

जिंदगी संघर्ष का दूसरा रूप है,
कुछ जीतते है,कुछ हार मान लेते है,
कुछ जो अपने दिल मे ठान लेते है,
की जिंदगी को हसीन बनाना है,
वो गम के दिन भी हँस गुज़ार लेते है,
और आने वाला हर पल सँवार लेते है,
इस दर्द भरी दुनिया मे कमाल बन जाते है,
और आप जैसे एक मिशाल बन जाते है.

Udan Tashtari said...

जिंदगी उतनी लंबी होती है, जितनी आदमी जी लेता है।
उतनी नहीं जितनी आदमी जिंदा रह लेता है।

--इतना ही एक पूरी कविता है. संपूर्ण. बधाई इस बेहतरीन रचना के लिए.

आर. अनुराधा said...

मैं तो दंग हूं, इतनी प्रति क्रियाएं देखकर।
धन्यवाद आप सबका, हौसला-अफज़ाई के लिए।

आर. अनुराधा said...

venus kesari said...
इजाजत है?

दरअसल जिंदगी से इतनी मोहलत (जाहिर है, समय की नहीं) या कहें सामर्थ्य मांगी है। इसमें इजाजत मांगने के भाव से ज्यादा यह कहने की कोशिश है कि "क्या यह संभव हो पाएगा?"
और मैं उम्मीद करती हूं कि होगा।

Rachna Singh said...

anuradha
agar aap sandarbh bhi daeti to venus kaesri jaese paathako ko " jeenae ki izajat " kaa abhipray clear hota

bahut sae paathak shayad is blog kae sandarbh sae is kavita ko nahin jod paayae haen kyuki bloging mae nit nay paathalk aatey haen

mae to kahungi izaazat naa mango priya , jittey jao aur jeetey jao
lots of love
rachna

ravindra vyas said...

सचमुच, एक प्यारी और सच्ची कविता। हर तरह के बनाव-श्रंृगार से मुक्त।

आर. अनुराधा said...

रचना, धन्यवाद इस पहलू की तरफ इसारा करने के लिए। इस पोस्ट के अंत में संदर्भ जोड़ देती हूं।

Anonymous said...

जिन्दगी से इजाज़त ना तुम मांगो
क्युकी तुममे हैं शक्ति
जो हर धरा को बदल देगी
और अपनी तरफ मोड़ लेगी
और मांगना ही हैं तो जिन्दगी से
बस इतना मांगो की तुम्हरी
जिजीविषा बनी रहे

Rachna

Dipti said...

बेहद ख़ूबसूरत रचना है। अगर आप अनुमति दे तो क्या मैं इसे साभार अपने ब्लॉग पर लगा सकती हूँ

आर. अनुराधा said...

So nice of you Rachna!!:-)

आर. अनुराधा said...

@ दीप्ति,
इस ब्लॉग की सबी पोस्ट्स और सामग्री बहुजन-हिताय है। इसे इस्तेमान करें, बस, क्रेडिट देते चलें।

sushant jha said...

good poem..really good.

surekha said...

Ijaajat hai? this verse is not anu at all
This is just not the anu I know
Anu- my best friend and the bravest girl I will ever know is more likely to look straight into the eye of life and say
"do what u must, I will never give up the fight"
And in this staring match life is going to blink first.... not my anu.

Vaishnavi. C said...

A really great poem….
A heart touching one…
Hats off to your spirit….
As I say…if u cant hope you cant find what’s beyond your hopes..
And I know till your last breath you will continue to hope…

Himank said...

aap ke liye mere hriday main aadar aur samman har din badhta ji jaata hai. Aap ko toh pata hi hai ki meri maa is rog ke kaaran hi sansar ko alvida keh gayeen. Aap ki likhi panktiyon par kewal ek baat kehna chahoonga - is rog ki tees aur dard kewal wahi samajh sakta hai jisne iske dard ko bahut nazdeek se mehsoos kiya ho. Tab bhi aap ki samvednaayen aur aap ke dard ka ehsaas aap ke siva kisi aur ko ho hi nahin sakta. Aap toh sadaiv meri prerna srot rahin hain. Despite all that is and has been said, I cannot bear to see you anything - but strong. Call it my selfishness or my expectations from you. Remember - even God gives pain to HIS chosen few, those who can endure it - not to ordinary mortals.

आर. अनुराधा said...

@ surekha-
"Ijazat Hai" pe to hangama karte miayan ap logan!

On a serious note, that was just to give it poetic touch/ending, else, it was, to me, a prose typed to look like poetry.

Himank said...

I would just like to elaborate on the last line - that God gives pain to HIS chosen few.......What I mean to say is that God has to distribute pain and joy in equal measure. Not everyone can be happy. But if at all, at any point of time when one feels - WHY ME - one would do well to remember that if HE has given you pain, you are HIS chosen one, HE loves you the most.

sada said...

मैं ये सारे दिन एक बार जीना चाहती हूं, बहुत ही गहरे भाव, प्रबल इच्‍छाशक्ति हर तकलीफ हर मुश्किल में कुछ कर गुजरने का जज्‍बा . . . बहुत ही मार्मिक रचना ।

Himank said...

Aisa nakko bolne ka. Pehle toh aap-ich hangama karvateen phir aap-ich hi rokteen!!! Salllamma!!!!

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर लिखा .. भगवान के घर देर है .. अंधेर नहीं .. सब इच्‍छाएं पूरी होंगी।

अनिल कान्त : said...

आपकी कविता में मैं डूब गया
मैं आपके जज्बे को सलाम करता हूँ ....

Pooja Prasad said...

मैं ये सारे दिन एक बार जीना चाहती हूं।...आप ये सारे दिन कई बार जीएंगे। आपकी उम्मीद आपकी आस्था है जिसमें आपके ऐफर्ट्स भी मिले हुए हैं। कविता तो सच्ची और अच्छी है ही। कामना है आपकी मनोकामना जल्द पूरी हो। और तब सतत भी रहे।

स्वप्नदर्शी said...

Anuradha, ye nahi kahungee ki kavitaa achchee hai. Tum bahut achchee ho.

Tumhaaree ye himmat banee rahe aur iskaa vistaar bhee ho un tamaam logo tak jo apane-apane morcho par lage hai

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

बहुत सादी, सुंदर और दिल को छू जाने वाली रचना।

ALOK PURANIK said...

बिना रोये इस कविता को पढ़ नहीं पाया, सुबह सुबह आपने रुला दिया। इससे ज्यादा पवित्र आंसू मेरी आंखों से शायद पहले कभी नहीं बहे।
आपके हौसले को सलाम।

ALOK PURANIK said...

बिना रोये इस कविता को पढ़ नहीं पाया, सुबह सुबह आपने रुला दिया। इससे ज्यादा पवित्र आंसू मेरी आंखों से शायद पहले कभी नहीं बहे।
आपके हौसले को सलाम।

मीनाक्षी said...

'नारी' के माध्यम से इस पल ज़िन्दगी से जीने की इज़ाज़त माँगती ज़िन्दगी को देख लिया...एक और हैं जो माँ है नन्हे नन्हे दो बच्चों की...ज़ालिम कैंसर पर मुस्कुराती जी रही है..."माँ तुम चली गईं तो....." बच्चों के सवाल करने पर माँ बस मुस्कुरा देती है..उसकी मुस्कान बच्चों की ताकत बन जाती है...और पति सिसक उठते हैं....
आप को पढ़कर बस उस परिवार की याद आ गई.. कैंसर से जूझने वालो के लिए दुआएँ..

Mired Mirage said...

अनुराधा जी, आपकी सभी इच्छाएँ पूरी हों। आपकी तरह ही मेरी एक प्रिय सहेली भी दो बार कैंसर से जूझ चुकी है किन्तु उससे अधिक हँसने, खिलखिलाने वाली स्त्री मुझे आज तक कोई और नहीं मिली। शायद उसकी हँसी ही कैंसर को परास्त करती रही है। आपका लेखन और आपकी जिजीविषा भी आपको शक्ति देंगे और हम सबकी शुभकामनाएँ तो आपके साथ हैं ही।
घुघूती बासूती

pranava priyadarshee said...

anuradha
kavita mere mail pr aa gayee thee (jaise ki apki har post aa jaati hai). padh kr sahaj andaaj me pratikriya bhee mail se hee bhej dee. apke blog par der se aaya. pahle iska afsos tha, par ab mujhe lagta hai achchhaa huaa der se aaya.
in tamaa pratikriyaaon se guzarnaa ek alag anubhav rahaa. panktiyaan to shaandaar hain hee aapke bhaaavon kee gahraayee ne paathakon ke man me jaisee bhaavnaayen jagaayeen vah dekhanaa kavita padhne se kam sukhakar nahi hai.
haardik aabhaar kavita ke liye, itni pratikriyaayen jagaane ke liye aur in sabse badh kar aap jaisee hain vaisee hone ke liye

Mrs. Asha Joglekar said...

अनुराधा जी आपकी टिप्पणियाँ तो चोखेरबाली पर कई बार पढीं पर आपके ब्लॉग पर पहली बार आई हूँ ।
आपके भोगे हुए यथार्थ को पढ कर आँखें नम हो गईं। आप को हर उस ख्वाहिश पूरी करने की इजाज़त मिलेगी जो अधूरी है ।

HARI SHARMA said...

अद्भुत, उर्जावान, प्रेरक और जीवंत.
अनुराधा तुझे सलाम.

रंगनाथ सिंह said...

aap ke sahasik jivantata se atyadhik prabhavit huwa. jo chij filmo dekhi thi wo pahli bar samne dikhi h

aap ke liye shubhkamnavo sahit

Anonymous said...

इतनी सुन्दर कवित के लिये बधाई

devendra mishra said...

इतनी सुन्दर कवित के लिये बधाई

रज़िया "राज़" said...

ज़िंदगी जीने का मतलब तब सही होता है जब आदमी दुसरों के लिये जीता है। आप की जिंदगी भी कंइ मायनों में सही है।आप को भगवान लंबी उम्र नसीब करेगा यही दुआ करते है। और दुआ करते हैं
कि....आप को मिले "एक जीवन- जब मैं परिवार और झुरमुटों-झरनों-जुगनुओं के बीच""

geetashree said...

http:hamaranukkad.blogspot.com
हाय अनुराधा, समय मिले तो इस नुक्कड़ से गुजरना कभी। तुम्हे अपनी सी आवाज सुनाई देगी। अपना ईमेल देना. पहली बार देखा ब्लाग..तुमसे जीने का हौसला किसे नहीं मिलेगा...सब कुछ हारने के बाद भी, कोई तुम्हे पढ ले तो जी उठे।
गीता

sangeeta said...

hi Anuradha..
this is my first visit to your wonderful blog and i am happy that i came here.
jeena aur zinda rehne ka fark wohi jaan sakta hai jise zindagi ne aisi mushkil dikhai ho....i know how you feel about the small joys of life which are denied..........i have seen it ...have been through it in a different way.

if you write that ye blog un sabke liye hai jinhe cancer ne chhua hai.....do you mean that??
any kind of debilitating condition can cripple a beautiful life n leave you frustrated.....but i believe that in such times you always discover your hidden strengths ...meet my daughter Mithi at my blog Homealone..http://sangeeta-homealone.blogspot.com/

will come back to read more here...keep up the good work.

राकेश कौशिक said...

बहुत देर से पढ़ सका -
"मैं ये सारे दिन एक बार जीना चाहती हूं।
इजाजत है?"
जी जियें और ख़ुशी से जियें - मैं कौन होता हूँ ये कहने वाला लेकिन दुआ तो कर सकता हूँ - भावप्रद रचना के लिए बधाई.

आर. अनुराधा said...

राकेश कौशिक, संगीता, गीताश्री...
आप सबके कमेंट तक बहुत देर में पहुंच पाई। पर हौसला तो उतना ही बढ़ा, जितना ताजा टिप्पणी पढ़ने में बढ़ता। मेरी हौसला-अफज़ाई के लिए फिर से शुक्रिया।

शेफाली पाण्डे said...

aapke blog ko aaj dhyaan se padh rahee thee....meree 3 mahine kee bitiya hai....badeee bitiya ke 8 saal baad huee hai...37 saal kee ho gaee hun ...left breast me bagal ke paas dard sa hai..thodee see swelling bhi hai....dar gaee hu...aaj hee docter ko dikhane jaaungee....aapse bhi raay letee rahungee...

vishnu pratap singh said...

अनुराधा जी
आपकी भावनाओं को सच्चे अर्थों में वही समझ सकता है जिसको कभी इस तरह कि पीड़ा हुई हो | कोई जरूरी नहीं कि इसके लिए कैंसर होना चाहिए | आपके जज्बे ने मुझमें एक नईऊर्जा का sanchar कर दिया और पीड़ा भी दी कि अच्छे लोगों के साथ क्यों ऐसा होता है | मेरी दादी भी................

Er. Shilpa Mehta said...

anuradha ji - i salute you, and i salute your spirit.

thanks for being an inspiration to fight, to live, and to show others HOW life should be lived.

cheers

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