Thursday, May 22, 2008

कैंसर क्या है- एक अरब आवारा कोशिकाएं

कैंसर क्या नहीं है इस पर चर्चा होने के बाद जरूरी हो जाता है कि जाने, कैंसर क्या है। थोड़ी-बहुत पढ़ाई में मैंने जाना कि कैंसर दरअसल कुछ अधूरी कोशिकाओं का समूह है जो शरीर में कहीं भी बनकर बढ़ता है। इसकी शुरुआत एक कोशिका से होती है जो किन्हीं चयापचयिक (मेटाबॉलिक) कारणों से अचानक ही असंयमित व्यवहार करने लगती है। असामान्य तेजी से विभाजित होकर अपने जैसी बीमार कोशिकाओं का ढेर बना देने वाली इस कोशिका से ट्यूमर बनने में बरसों, कई बार तो दशकों लग जाते हैं। जब कम से कम एक अरब ऐसी कोशिकाएं इकट्ठा होती हैं तभी वह ट्यूमर पहचानने लायक आकार में आता है।


एक सामान्य कोशिका का कैंसरयुक्त कोशिका में बदलना
एक सामान्य सी लगने वाली कोशिका अपने विकास के किसी दौर में अचानक दिशाहीन क्यों हो जाती है, इस रहस्य को समझने में वैज्ञानिकों को बरसों लग गए। दरअसल हर कोशिका में निर्धारित संख्या में जीन होते हैं जो इसकी हर गतिविधि को निर्देशित करते हैं। इन्हीं में से कुछ जीन यह तय करते हैं कि कोशिका कब विभाजित हो और कब नहीं। इन्हें ऑन्कोजीन और ट्यूमर सप्रेसर जीन कहते हैं। जब इन जीनों की बनावट में कोई गड़बड़ी आती है तो इनसे कोशिका को उलटे-पुलटे निर्देश मिलने लगते हैं और उसी के अनुसार कोशिका में अनियमित और अनियंत्रित विभाजन शुरू हो जाता है।

वैज्ञानिकों ने बीसी-10 नाम का एक जीन खोजा है जो मूल रूप से एक पहरेदार का काम करता है और कोशिका के जरा बहकते ही उसे नष्ट कर देता है। लेकिन जब इसी जीन में गड़बड़ी आ जाती है तो वह कोशिका लक्ष्यहीन हो जाती है।
यह जानना दिलचस्प है कि हर कोशिका, चाहे वह कैंसर-युक्त हो या नहीं, अपने भीतर मृत्यु की कुंजी साथ लिए चलती है जिसे उत्तेजित किया जाए तो वह अपनी तरह की बाकी हमउम्र कोशिकाओं से जल्दी मर जाएगी। कोशिका में मौजूद आत्महत्या की इस मशीनरी को एपोप्टोसिस कहा जाता है।


एपोप्टोसिस यानी कोशिका करे आत्महत्या


एपोप्टोसिस कई आपस में संबंधित चरणों की एक श्रृंखला है। इसके शुरुआती बिंदु को छेड़ने भर की देर है और इसमें शामिल सभी प्रोटीन अपने आप क्रमश: सक्रिय हो जाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे एक-दूसरे पर टिके ताश के पत्तों में से किनारे वाले पत्ते को छूते ही बाकी सभी पत्ते एक-के-बाद-एक उस पर गिरते जाते हैं।

कोशिकाओं की इस प्रवृत्ति का इस्तेमाल कई मौकों पर होता है। जैसे, शुरुआती समय में भ्रूण की अंगुलियों के बीच घना जाल मौजूद होता है। बाद में इस जाल की कोशिकाओं में एपोप्टोसिस की प्रक्रिया शुरू होती है और ये जाल नष्ट हो जाता है। शुरुआती अवस्था में कैंसर के खिलाफ शरीर भी इसी हथियार का इस्तेमाल करता है। जैसे ही कोई कोशिका असामान्य व्यवहार करने लगती है, उसमें मौजूद प्रहरी जीन किसी अज्ञात प्रक्रिया से उसे भांप लेता है और सदा सजग रहने वाली एपोप्टोसिस को सक्रिय होने का इशारा कर देता है। यह कैंसर के खिलाफ शरीर का पहला और सबसे जबर्दस्त युद्ध है।

वास्तव में हर व्यक्ति के जीवन क्रम में साधारण कैंसर के लाखों बेहद छोटे-छोटे ट्यूमर बनते और एपोप्टोसिस के जरिए खत्म भी होते रहते हैं। लेकिन कभी-कभार एकाध रोगी कोशिका अपने में कुछ बदलाव लाकर आत्महत्या की इस प्रक्रिया से बच निकलने में कामयाब हो जाती है और अपने जैसी असामान्य कोशिकाएं बनाना शुरू कर देती है। ये ही आखिर कैंसर के रूप में हमारे सामने आती हैं। यानी इस मौके पर जिंदगी और मौत के तराजू में कैंसर कोशिका की जिंदगी का पलड़ा ज्यादा भारी होता है। कैंसर को कोशिका के भीतर मौजूद अणुओं के स्तर तक जानने के बाद भी कैंसर की घटना के कई पहलू वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली हैं।

नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल नर्से ने कोशिका के पूरे जीवन चक्र को चरणबद्ध किया है। इस जानकारी के बाद किन्हीं खास कोशिकाओं की वृद्धि को किसी खास चरण में रोकने की कोशिश की जा रही है। माना जा रहा है कि इस तरीके से कैंसर की रोगी कोशिकाओं को दवाओं के जरिए एक हद तक रोका जा सकेगा।

इस तरीके से कैंसर का पूरा इलाज भले ही अभी संभव न हो लेकिन मरीज की उम्र बढ़ाने का रास्ता जरूर दिखाई पड़ने लगा है। हालांकि हर प्रकार के कैंसर का पुख्ता इलाज ढ़ूढना वैज्ञानिकों के लिए अब भी एक कड़ी चुनौती है।

6 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप ने कैंसर उत्पत्ति की इस जानकारी को आम कर के बहुत बड़ा काम किया है। पता नहीं क्यों चिकित्सक इस तरह की जानकारी आम नहीं करते और न ही इन्हें विद्यार्थियों को स्कूलों में पढ़ाया जाता है। जब कि यह जानकारी तो माध्यमिक स्कूल में विज्ञान के पाठ्यक्रम का हिस्सा होनी चाहिए।
धन्यवाद।

सुजाता said...

बढिया जानकारी अनुराधा जी , हम अधिकांश भारतीय मेडिकली इल्लिटरेट होते हैं इसलिए बहुत सी समस्याओं को समझ नही पाते जबकि इस तरह की जानकारियाँ सामान्य रूप से हमे होनी चाहिये ।

अनुनाद सिंह said...

कैसर जैसे चिकिस्तकीय विषय पर हिन्दी में जानकारी देने का आपका प्रयास प्रशंशा का अधिकारी है।

ऐसे ही लिखती रहें ।

pranava priyadarshee said...

कैंसर जैसे जटिल विषय को इतनी आसान भाषा और सरल, सहज शैली मे समझाना तुम्हारे ही बूते की बात थी. महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए धन्यवाद

Neelima said...

अनुराधा जी बहुत सरल भाषा में आपने लिखा है और बहुत काम की जानकारी दी है ! धन्यवाद!

DR.ANURAG ARYA said...

सरल भाषा मे जानकारी दी है ,इसलिए अच्छा लगा....कुछ ऐसे लोगो के संस्मरण अगर दे जो कैंसर से लड़ाई के बाद जीवित रहे तो ओर अच्छा होगा ,आशा है आप विचार करेंगी....

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