Monday, November 2, 2009

दस साल में कितना कुछ बदल गया!

पहली बार मई 1998 में पता चला कि मुझे कैसर है। तब इलाज का वह 10 महीने लंबा समय खुद से परिचय कराते-कराते ही तेजी से उड़ गया। ये कठिन 10 महीने भी कितनी जल्दी बीत गए थे। उतने लंबे नहीं लगे। जैसे आइंस्टाइन का सापेक्षतावाद कहता है कि अगर किसी आदमी को सुंदर महिला के सामने बैठा दो तो उसे दो घंटे भी दो मिनट की तरह लगेंगे। और अगर उसे गर्म तवे पर बैठाया जाए तो उसके दो मिनट भी दो घंटे की तरह गुजरेंगे।

लेकिन उस गर्म तवे पर बैठ कर, गर्मी का एहसास करते हुए भी मुझे वह वक्त उतना लंबा नहीं लगता। कारण शायद यह रहा हो कि उस समय हर अगले पल के अनुभव से अनजान थी, नहीं जानती थी कि आगे क्या होने वाला है, क्या होगा, क्या अपेक्षा करूं। इसके साथ ही उत्सुकता, कि अब क्या होगा, कैसे होगा, क्या करूं कि मेरा हर वार एकदम सटीक बैठे क्योंकि पता नहीं, उस कैंसर रूपी दुश्मन पर दूसरा वार करने का मौका भी मिले कि नहीं।

साथ में यह भरोसा भी रहता था कि बस, यह एक पल कठिन है, गुजर जाए तो बस। फिर तो तकलीफ खत्म। और इसी उम्मीद और भरोसे के साथ वह पूरा समय कट गया क्योंकि नीचे गर्म तवा होने के बावजूद आस-पास फुलवारी थी, सुंदर लोग, तितलियां, भंवरे, फूल-पत्ते, सुगंध थे जो लगातार मन को लुभाते रहे, उस जलन-गर्मी के तकलीफदेह एहसास से दूर ले जाते रहे।

फिर दूसरी बार मार्च-अप्रैल 2005 में मुझे पता लगा कि मैं फिर से युद्ध के मैदान में हूं, उसी पुराने दुश्मन के साथ दो-दो हाथ करने के लिए। इस बार मैं जानकारी के हथियार से लैस थी। डॉक्टर ने भी चुटकी ली कि अब तो मैं ‘वैटरन’ हो गई हूं, डरने, चिंता करने की कोई बात नहीं है।

और यहीं सब मार खा गए।

इस बार जब मुझे पता था कि क्या-क्या बुरा हो सकता है, और उससे बचने के लिए मैं क्या-क्या कर सकती हूं और क्या-क्या मुझे करना पड़ेगा तो मुझे शुरुआत में ही लगा कि थक गई। उफ! फिर से वही मशक्कत लंबे समय तक करनी पड़ेगी! और इस बार हर कष्ट और उसको झेलने की संभावना का ख्याल तक मुझे कष्ट देने लगा, हर कष्ट मुझे ज्यादा कष्टकारी लगा। क्योंकि मैं जानती थी, इसलिए होने के पहले भी अपने दिल-दिमाग में अनुभव कर लेती थी, कि यह होना है। और इस बार क्योंकि कोई नयापन नहीं था, कोई उत्सुकता नहीं थी, इसलिए आठ महीने चला इलाज भी बहुत लंबा और उबाऊ लगा।

खैर, यह मेरा भावनात्मक अनुभव था। लेकिन अब के समय के ज्यादातर कैंसर मरीजों के लिए शारीरिक अनुभव निश्चय ही 10 साल पहले के अनुभव के मुकाबले ज्यादा सहनीय हो गए हैं। अब कैंसर का पता लगना मौत का फरमान नहीं लगता। अपने आस-पास कैंसर के मरीजों और इलाज करा रहे या करा चुके विजेताओं को देखते, उनसे चर्चा करते, समाज अब इस बीमारी के प्रति अपेक्षाकृत सहज है। इस जागरूकता के बाद अब लोग जल्दी डॉक्टर और इलाज तक पहुंचने लगे हैं।

नई तकनीकों के कारण कैंसर की पहचान जल्द और आसान हो गई है। और बायोप्सी के बाद डॉक्टर बीमारी के प्रकार, आकार, फैलाव और ‘गुणों’ के बारे में ज्यादा जान पाते हैं जो निश्चित रूप से इलाज में मददगार साबित होते हैं। और जिन मरीजों के कैंसर की पहचान उतने ‘समय’ पर नहीं हो पाती, उनके लिए भी कई तकनीकें आ गईं हैं जो उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी, सहज और कम तकलीफदेह बना देती हैं।

....जारी, अगली पोस्ट में

8 comments:

IRFAN said...

Anuradhaji,
aapko roz yada-kada dekhta hoon,prernaa lene ke liye.sochta hoon is lady me itna sab saahas kaise aaya hoga,yah mamooli baat to nahin hai.10 sal ki baat ki,mujhe to woh aapke saath jaakar apna ITO ke Syndicate Bank me jaakar apna account khulwaane ka din yaad aa gaya.yaad phir taaza ho gayi.
aapko dhher saari shubhkaamnaaye.kabhi mere cartoons bhi dhekha kijiye...:-)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अनुराधा जी आप शीघ्र ठीक हों यही कामना है. आपका संबल यूं ही बना रहे..यह जीवट बहुत बड़ी बात है.

ambrish kumar said...

aap bahadur hai .

परमजीत बाली said...

आत्मविश्वास से बहुत कुछ संभव होता है...और वह आपमे बहुत है.........शुभकामनाएं।

विनीत कुमार said...

हमें हौसला मिलता है आफको लगातार पढ़ते हुए..

आर. अनुराधा said...

इरफान भाई! वाह, आपकी टिप्पणी, और वह भी सबसे पहले, देखकर दिल खुश हो गया। धन्यवाद।
आपका ब्लॉग तो उतनी शिद्दत से नहीं, लेकिन अखबारों में कार्टून नियमित रूप से देख रही हूं, और पूरा आनंद ले रही हूं। धन्यवाद. इस कठिन जीवन में हास्य और कठिन बात को सरलता से कहने को व्यंग्य की तेजी आपकी कलम में बरकरार रहे। आमीन!

@ काजल कुमार, शुभकामनाओं के लिए सभी को धन्यवाद और बदले में उससे भी ज्यादा शुभकामनाएं। लेकिन जानकारी के लिए- मैं बीमार नहीं हूं, थी कभी, पर अब नहीं। उस 8-10 माह लंबे इलाज के बाद से अब तक ठीक हूं, आप सबकी दुआएं मिलती रहती हैं। बदले में मैं चाहती हूं कि इस मारक 'समझी जाने वाली' बीमारी के बारे में लोगों को बताऊं, ताकि इसके इलाज की सफलता के एकमात्र मंत्र- "जागरूकता, सतर्कता, जल्द पहचान और पूरा इलाज" की जानकारी लोगों को हो सके और वे, खुद पर ऐसी किसी स्थिति में सही तरीके से सोच पाएं।

लाहुली said...

अनुराधा जी,
जब मै आप लोगों से पहली बार मिला था तो कभी मुझे नही लगा कि आप इस तरह कैंसर को झेल चुकी हैं। आपके जीवटता को मेरा सलाम। आज मुझे लग रहा है कि आप लोगों को बारालाचा दर्रा पार कर सरचू जैसे हाई अल्टीटूट तक पहुँच कर कितना सुखद लगा होगा..

nilesh mathur said...

इसी तरह लिखती रहें, लोगो को भी साहस मिलेगा, शुभकामना!

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