This blog is of all those whose lives or hearts have been touched by cancer. यह ब्लॉग उन सबका है जिनकी ज़िंदगियों या दिलों के किसी न किसी कोने को कैंसर ने छुआ है।
Monday, February 20, 2012
जरा और हंगामे की जरूरत है- युवराज के बहाने कैंसर
(यह आलेख शुक्रवार पत्रिका के 17-23 फरवरी के अंक में छपा है।)
वैसे तो पिछले साल से ऐसी आशंकाओं का सिलसिला चल रहा था कि क्रिकेटर युवराज सिंह को फेफड़ों में ट्यूमर है। लेकिन जनवरी के आखिरी हफ्ते में पक्की खबर आई कि युवराज सिंह को जर्म सेल ट्यूमर ऑफ मीडियास्टिनम या मीडियास्टिनल सेमिनोमा नाम का फेफड़ों का कैंसर है। हर तरफ सनसनी फैल गई। युवराज सिंह की कीमोथेरेपी यानी दवाओं से इलाज शुरू होने की खबरों के बीच उसके ठीक होने की संभावनाओं, अटकलों, माता-पिता से बातचीत, दूसरे क्रिकेटरों, दुनिया भर की सेलिब्रिटीज़ की शुभकामनाओं की खबरों से भी पूरी दुनिया का मीडिया पट गया। युवराज मीडिया के लिए इस समय खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पिछले साल ही हमारी क्रिकेट टीम विश्वकप जीत लाई है, जिसमें युवराज मैन ऑफ द सीरीज रहे।
खबरों की कहानी के पहले इस कैंसर को समझ लें। मीडियास्टिनम मोटे तौर पर छाती के बीच की जगह है जहां दिल, इससे निलकने वाली खून की नलियां और संवेदी तंत्रिकाएं, श्वसन नलियां, खाने की नली का कुछ हिस्सा वगैरह होते हैं। इन नाजुक अंगों को सुरक्षित समेटे हुए इस हिस्से को घेरे एक झिल्ली होती है। युवराज का जर्म सेल ट्यूमर ऑफ मीडियास्टिनम दुर्लभ इसलिए है कि यह आम तौर पर जर्म सेल, यानी पुरुषों के शुक्राशय की कोशिकाओं में होता है। सेमीनोमा का मतलब ही है, शुक्राशय की सेमीनिफेरस नलिकाओं की सतह की कोशिकाओं का ट्यूमर। वैज्ञानिक समझ नहीं पाए हैं कि कैसे, पर कभी-कभार यह कैंसर शुक्राशय की बजाए छाती में या पेट की गुहा में बन जाता है। खास तौर पर पुरुषों में होने वाला यह कैंसर 20 से 35 की उम्र में सबसे ज्यादा होता है। और अच्छी बात यह है कि इसके लक्षण फौरन दिख जाते हैं और कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का इन पर अच्छा असर होता है इसलिए ठीक होने की संभावना काफी ज्यादा होती है।
हमारे देश में जहां कैंसर के 25 लाख से ज्यादा मरीज हैं, उनमें हर साल आठ लाख और जुड़ते हैं और साढ़े पांच लाख लोग मर जाते हैं, जहां 70 फीसदी लोगों का कैंसर इतनी विकसित अवस्था में होता है कि डॉक्टर भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाते, वहां स्वाभाविक है कि इस बीमारी का नाम ही दिल दहला देता है। जानकारी की कमी भ्रम और आशंकाओं को बढ़ावा देती है। ऐसे में अच्छा है कि युवराज के बहाने ही सही, इस विषय पर चर्चा ने जोर तो पकड़ा।
वह समय अभी बीता नहीं है जब कैंसर का मतलब मौत का वारंट होता था, लोग जीने की उम्मीद छोड़ देते थे। ईश्वर की तरह आयुर्वेद आदि पर विश्वास होने के नाते लोग वैद्यों, हकीमों, होमियोपेथिक डॉक्टरों, “कैंसर से एड्स तक” हर मर्ज का इलाज करने का दावा करने वाले नींम चिकित्सकों के पास पहले जाते थे क्योंकि उनका विश्वास होता था कि एलोपेथी में कोई कारगर इलाज हो ही नहीं सकता। अस्पताल जाना तभी होता था, जब तकलीफ असहनीय हो जाती थी। इसके अलावा कैंसर के लिए अच्छे अस्पतालों की बेतरह कमी, लंबा, खर्चीला, तकलीफदेह और अनिश्चित परिणाम वाला इलाज करवा पाना आम हिंदुस्तानी के लिए आसान नहीं।
लेकिन पिछले कुछ साल में मीडिया ने कई सेलीब्रिटीज़ के कैंसर पर विशेष रूप से चर्चाएं छेड़ी हैं। सिंगर काइली मिनोग से लेकर बिग बॉस की जेड गुडी, लीसा रे और पर्सनल कंप्यूटर क्रांति शुरू करने वाले स्टीव जोब्स तक ने कैंसर पर लोगों की जागरूकता, जानकारी बढ़ाने के लिए मीडिया को उकसाया। एक ऐसा शब्द जिससे कई भ्रम और वर्जनाएं जुड़ी थीं, लोग उच्चारने से डरते थे, अब लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा है। अखबार और न्यूज चैनल अपने हीरोज़ के साथ-साथ इस बीमारी के अलग-अलग पहलुओं को भी तरह-तरह से उभारते हैं। विशेषज्ञों का ज्ञान, कैंसर-साथियों के अनुभव लोगों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। इंटरनेट और, खासकर सोशल मीडिया का भी इसमें बड़ा योगदान है।
हमारे देश में भी कैंसर की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इसके बारे में जागरूकता, इसकी जल्द पहचान और पूरा इलाज जरूरी है। कई तरह के कैंसरों को खुद पहचानने; धूम्रपान, नशा न करने; नियमित, सक्रिय जीवनचर्या; नियंत्रित और संतुलित खान-पान जैसी आधारभूत जानकारियां देने और इलाज के लिए प्रेरित करने जैसे काम मीडिया के जरिए संपन्न हो रहे हैं। युवराज के बहाने हम कई हस्तियों के अनुभवों को जान पा रहे हैं जिन्होंने इस बीमारी के बाद भी बहुत उपलब्धियां पाईं, नए आसमान छुए और कैंसर पीड़ितों और समाज के लिए प्रेरणा बने।
शहरों में कम से कम इतना असर हुआ है कि लोग कैंसर होने की बातें छुपाते नहीं हैं। वे जान रहे हैं कि हर तरह के लोगों को कैंसर हो सकता है। जानकारी से बीमारी की घटनाएं तो कम नहीं होतीं, लेकिन वे इलाज करवा रहे हैं और कई ठीक होकर या कैंसर के साथ ही, लंबा और बेहतर जीवन बिता रहे हैं। लोगों के भ्रम और डर खत्म हो रहे हैं, कैंसर से अपरिचय और सदमे का भाव कम हो रहा है। दूसरी तरफ मीडिया कैंसर के इलाज की कमियों को सामने लाकर व्यवस्था में सुधार लाने के लिए दबाव बनाने का काम भी जाने-अनजाने कर रहा है। आंखें बंद करके डॉक्टर की अंगुली पकड़ चलते जाने वाले लोगों को विकल्पों की पगडंडियां भी ये चर्चाएं दिखा रही हैं, नई खोजों, इलाजों, उनकी खामियों को सबके सामने रख रही हैं।
हालांकि मीडिया अति भी करता है और बीसीसीआई को अपील करनी पड़ती है कि युवराज की निजता का सम्मान करें। कैंसर के बहाने उसके निजी जीवन के हर मिनट की खबर देना समाचार मीडिया का काम नहीं है।
तो, युवराज सिंह, तुम्हें धन्यवाद और शुभकामनाएं। अपना इलाज करवाकर जल्द लौटो और उन सबके लिए एक और मिसाल बनो जिनके जीवन में उम्मीद की कमी है।
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Sunday, February 19, 2012
जिम्मेदार होना कैंसर के बारे में
राष्ट्रीय सहारा, हस्तक्षेप में 4 फरवरी 2012 को विश्व कैंसर दिवस पर मेरा यह आलेख छपा था। चित्र के नीचे पूरा लेख संलग्न है।
पीछे मुड़कर देखूं तो अपने ही जीवन की घटनाएं चलचित्र-सी, किसी और के साथ घटी लगती हैं। महज 30 की उम्र में स्तन कैंसर होने के बारे में कौन सोच पाता है? चौदह साल पहले जब मुझे पहली बार कैंसर होने का पता चला तब तक वह तीसरे स्टेज की विकसित अवस्था में पहुंच चुका था। अच्छी बात बस यह थी कि वह छिटक कर किसी दूसरे महत्वपूर्ण अंग तक नहीं पहुंच पाया था। इस बीमारी या इसके कारण, बचाव, निदान, इलाज के बारे में कुछ भी नहीं पता था। इसलिए जब इलाज शुरू हुआ तो मेरे लिए एक ही सूत्र वाक्य था- इसके बारे में जानो, जानो और ज्यादा जानो। और जानने की इस प्रक्रिया ने दिमाग और मन को लगातार व्यस्त और उलझाकर रखा। जानने की इस लगन ने ग्यारह महीने लंबे कठिन इलाज के बीच किसी वक्त उकता कर रुक जाने का ख्याल भी न आने दिया।
कैंसर के बारे में हर संभव स्रोत से खोज-खोज कर पढ़ने-जानने की उत्सुकता ने मुझे उन कठिन अपरिचित रास्तों के कई बड़े-छोटे रोड़ों से पहले ही परिचित करा दिया। जानकारी ने मुझे जीने का भरोसा दिया और और डॉक्टरों से अपने हित में बीमारी के बारे में, उसके इलाज और बुरे नतीजों के बारे में सवाल करने आत्मविश्वास भी। कई तरह की सुनी-सुनाई बातों की सच्चाई-झुठाई समझ में आने लगी। दवाओं के संभावित साइड इफेक्ट्स के लिए काफी हद तक तैयारी कर पाने और मानसिक रूप से तैयार रहने का मौका दिया। कम उम्र मेरा भरपूर साथ दे रही थी लेकिन इसे संतुलित करने के लिए नकारात्मक पक्ष भी मौजूद था- उस कड़े इलाज के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील और प्रतिक्रियावादी मेरा शरीर।
पूरी जिंदगी की साधः लड़ाई के दो मोर्चे
इलाज के दौरान बाल सारे झड़ गए, सर्जरी के बाद शरीर बेडौल हो गया। लेकिन ये छोटी बातें थीं और अस्थायी भी। ज्यादा जरूरी था- जीवन को बनाए रखना ताकि इन बाहरी कमियों के बाद भी जिंदगी के ज्यादा महत्वपूर्ण, दिलचस्प हिस्सों को बरकरार रख पाऊं। इन छोटे दिखावटी हिस्सों को खोकर अगर एक अधूरी जिंदगी को पूरी लंबाई तक ले जाने में मदद मिलती है तो उन्हें मैं सौ बार गंवाने को तैयार थी।
इलाज पूरा हुआ। उसके बाद पहले तीन महीने पर, फिर छह और फिर 12 महीने पर फॉलो-अप, डॉक्टरी और तरह-तरह की लैबोरेटरी में जांचों और स्कैन इत्यादि का सिलसिला। लेकिन बड़ी बात यह थी कि मैं जिंदा थी और जीना चाहती थी। इसके सामने बाकी सारी बातें नजरअंदाज करने लायक थीं। खुद अपने लिए नहीं बल्कि अपने लोगों के लिए जीना, जिनको मेरी परवाह थी। दरअसल कैंसर के खिलाफ लड़ाई कभी अकेले की नहीं होती। यह साझा लड़ाई होती है जिसमें डॉक्टर-नर्स, परिवार के लोग मित्र-शुभचिंतक सभी शामिल होते हैं। बीमार के शरीर को मैदान बनाकर लड़ी जा रही इस लड़ाई में कोई आयुध पहुंचाता है तो कोई रसद। कोई शुभकामनाएं देकर ही मनोबल बनाए रखता है। दुश्मन यानी इस बीमारी की कमजोरियों और ताकतों के बारे में जागरूकता लड़ाई में जीत की संभावना को बढ़ा देते हैं।
कैंसर होने का पता चलने के बाद पांच साल जी लेना किसी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। डॉक्टर आम तौर पर इसके बाद जीवन को सुरक्षित, कैंसर को ठीक हुआ मान लेते हैं। मेरे पांच साल पूरे होने पर डॉक्टरों की बधाई मिली। लगा मुक्ति मिली। एक आत्मकथात्मक किताब भी छप कर आ गई। मैंने सोचा, मेरे जीवन की एक कठिन कहानी खत्म हुई।
मगर नहीं। दो और साल बीते तो पता चला कि वह तो जीवन की एक लंबी किताब का सिर्फ एक अध्याय था। दूसरा अध्याय अभी बाकी था। यह एक और लड़ाई थी मेरी, कैंसर के खिलाफ जिसमें मैं फिर से अनचाहे ही धकेल दी गई थी। उसी अस्पताल में उन्हीं डॉक्टरों के पास मैं फिर पहुंच गई अपनी कहानी के इस नए अध्याय की भूमिका लेकर। डॉक्टरों ने मुझे ‘वेटरन’ करार दिया, इस बिनाह पर कि पिछले अनुभवों के बाद मेरे लिए कुछ भी नया नहीं होगा और आसानी से मैं इसके इलाज को दोबारा भी झेल पाऊंगी। लेकिन अनुभवी हो जाने भर से दर्द की अनुभूति कम तो नहीं हो जाती। इस बार भी वही इलाज- सर्जरी, 25 दिन रेडियोथेरेपी और छह साइकिल कीमोथेरेपी- बिना किसी छूट, कोताही या राहत के।
सीखने होंगे कुछ गुर बेहतर जिंदगी के
दूसरे अध्याय को भी कोई सात साल बीत चुके हैं। इन चौदह वर्षों में जीवन के उतार-चढ़ावों से गुजरकर मैंने जीने के कुछ गुर सीख लिए हैं। बेहतर जिंदगी पाने का पहला गुर है- अपने को जानना, अपने शरीर को पहचानना, समझना, कहीं पर आए बदलावों पर नजर रखना और अपनी जिम्मेदारी खुद लेना। बदलाव या बीमारी का पता लगते ही उसके इलाज का उपाय करना पहला महत्वपूर्ण कदम है। ठोस कैंसर की गांठों का पता आम तौर पर मरीज को ही सबसे पहले चलता है। डॉक्टर भले ही न पहचान पाए, लेकिन व्यक्ति अगर नियमित रूप से सही तरीके से अपने शरीर को जांचे तो उसमें आ रहे बदलावों को पहचान सकता है। कैंसर के मामले में जल्दी पहचान उसके सफल इलाज की कुंजी है। हमारे देश में कोई 70 फीसदी कैंसर के मामले जब तक सही अस्पताल तक पहुंचकर इलाज की स्थिति में आते हैं, ठीक होने की संभावना से काफी आगे निकल चुके होते हैं। देरी हो चुकी होती है और ट्यूमर फैल चुका होता है। इसलिए बीमारी का पता जितनी जल्दी लग जाए, इलाज उतना ही कामयाब और सरल होता है।
हालांकि पिछले समय में कैंसर के नए-नए कम साइड इफेक्ट वाले इलाज खोजे गए हैं, जो पहले के इलाज से ज्यादा कारगर हैं। टार्गेटेड थेरेपी कैंसर के मरीज की जरूरत के अनुसार डिजाइनर दवाओं से इलाज की पद्यति है, जो स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान किए बिना सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को खत्म करती है, जबकि पारंपरिक इलाज में कैंसर के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाएं भी बुरी तरह प्रभावित होती हैं। कुछ प्रकार के कैंसरों में टार्गेटेड थेरेपी शुरुआती परीक्षणों के स्तर पर सफल साबित हो रही है।
उम्मीद की लौ में है जिंदगी
विकसित देशों में कैंसर के पुख्ता इलाज की खोज में लगातार अनुसंधान चल रहे हैं, हालांकि पिछले कुछ दशकों में जितना समय और धन इस पर खर्च किया गया है, उसके मुताबिक परिणाम नहीं मिल पाए हैं। विकसित अवस्था के ज्यादातर कैंसर अब भी ठीक नहीं हो पाते, फिर भी कैंसर के साथ जीवन अब पहले से कहीं ज्यादा लंबा और ज्यादा आसान हो गया है। वैसे भी कैंसर मूलतः शरीर के भीतर की रासायनिक संरचनाओं में गड़बड़ी के कारण होने वाली बीमारी है। ऐसे में सेहतमंद खान-पान, शारीरिक क्रियाशीलता, बेहतर जीवनचर्या सभी के लिए महत्वपूर्ण है, ताकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत हो कि कैंसर दूर रहे या कुछ ज्यादा समय तक शरीर इसके खिलाफ लड़ पाए।
अपने शरीर और मन की क्षमताओं की सीमाओं को टटोलना और बढ़ाते जाने की लगातार कोशिश करते रहना भी जीने की कला है जो कैंसर जैसी शरीर के भीतर पैदा होने वाली गड़बड़ियों पर लगाम रखती है। साथ ही जरूरी है- जीवन की उम्मीद बनाए रखना और इसे आगे बढ़ाना, उन सब तक, जिनके जीवन में बस इसी एक लौ की सख्त जरूरत है।
-आर अनुराधा
पीछे मुड़कर देखूं तो अपने ही जीवन की घटनाएं चलचित्र-सी, किसी और के साथ घटी लगती हैं। महज 30 की उम्र में स्तन कैंसर होने के बारे में कौन सोच पाता है? चौदह साल पहले जब मुझे पहली बार कैंसर होने का पता चला तब तक वह तीसरे स्टेज की विकसित अवस्था में पहुंच चुका था। अच्छी बात बस यह थी कि वह छिटक कर किसी दूसरे महत्वपूर्ण अंग तक नहीं पहुंच पाया था। इस बीमारी या इसके कारण, बचाव, निदान, इलाज के बारे में कुछ भी नहीं पता था। इसलिए जब इलाज शुरू हुआ तो मेरे लिए एक ही सूत्र वाक्य था- इसके बारे में जानो, जानो और ज्यादा जानो। और जानने की इस प्रक्रिया ने दिमाग और मन को लगातार व्यस्त और उलझाकर रखा। जानने की इस लगन ने ग्यारह महीने लंबे कठिन इलाज के बीच किसी वक्त उकता कर रुक जाने का ख्याल भी न आने दिया।
कैंसर के बारे में हर संभव स्रोत से खोज-खोज कर पढ़ने-जानने की उत्सुकता ने मुझे उन कठिन अपरिचित रास्तों के कई बड़े-छोटे रोड़ों से पहले ही परिचित करा दिया। जानकारी ने मुझे जीने का भरोसा दिया और और डॉक्टरों से अपने हित में बीमारी के बारे में, उसके इलाज और बुरे नतीजों के बारे में सवाल करने आत्मविश्वास भी। कई तरह की सुनी-सुनाई बातों की सच्चाई-झुठाई समझ में आने लगी। दवाओं के संभावित साइड इफेक्ट्स के लिए काफी हद तक तैयारी कर पाने और मानसिक रूप से तैयार रहने का मौका दिया। कम उम्र मेरा भरपूर साथ दे रही थी लेकिन इसे संतुलित करने के लिए नकारात्मक पक्ष भी मौजूद था- उस कड़े इलाज के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील और प्रतिक्रियावादी मेरा शरीर।
पूरी जिंदगी की साधः लड़ाई के दो मोर्चे
इलाज के दौरान बाल सारे झड़ गए, सर्जरी के बाद शरीर बेडौल हो गया। लेकिन ये छोटी बातें थीं और अस्थायी भी। ज्यादा जरूरी था- जीवन को बनाए रखना ताकि इन बाहरी कमियों के बाद भी जिंदगी के ज्यादा महत्वपूर्ण, दिलचस्प हिस्सों को बरकरार रख पाऊं। इन छोटे दिखावटी हिस्सों को खोकर अगर एक अधूरी जिंदगी को पूरी लंबाई तक ले जाने में मदद मिलती है तो उन्हें मैं सौ बार गंवाने को तैयार थी।
इलाज पूरा हुआ। उसके बाद पहले तीन महीने पर, फिर छह और फिर 12 महीने पर फॉलो-अप, डॉक्टरी और तरह-तरह की लैबोरेटरी में जांचों और स्कैन इत्यादि का सिलसिला। लेकिन बड़ी बात यह थी कि मैं जिंदा थी और जीना चाहती थी। इसके सामने बाकी सारी बातें नजरअंदाज करने लायक थीं। खुद अपने लिए नहीं बल्कि अपने लोगों के लिए जीना, जिनको मेरी परवाह थी। दरअसल कैंसर के खिलाफ लड़ाई कभी अकेले की नहीं होती। यह साझा लड़ाई होती है जिसमें डॉक्टर-नर्स, परिवार के लोग मित्र-शुभचिंतक सभी शामिल होते हैं। बीमार के शरीर को मैदान बनाकर लड़ी जा रही इस लड़ाई में कोई आयुध पहुंचाता है तो कोई रसद। कोई शुभकामनाएं देकर ही मनोबल बनाए रखता है। दुश्मन यानी इस बीमारी की कमजोरियों और ताकतों के बारे में जागरूकता लड़ाई में जीत की संभावना को बढ़ा देते हैं।
कैंसर होने का पता चलने के बाद पांच साल जी लेना किसी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। डॉक्टर आम तौर पर इसके बाद जीवन को सुरक्षित, कैंसर को ठीक हुआ मान लेते हैं। मेरे पांच साल पूरे होने पर डॉक्टरों की बधाई मिली। लगा मुक्ति मिली। एक आत्मकथात्मक किताब भी छप कर आ गई। मैंने सोचा, मेरे जीवन की एक कठिन कहानी खत्म हुई।
मगर नहीं। दो और साल बीते तो पता चला कि वह तो जीवन की एक लंबी किताब का सिर्फ एक अध्याय था। दूसरा अध्याय अभी बाकी था। यह एक और लड़ाई थी मेरी, कैंसर के खिलाफ जिसमें मैं फिर से अनचाहे ही धकेल दी गई थी। उसी अस्पताल में उन्हीं डॉक्टरों के पास मैं फिर पहुंच गई अपनी कहानी के इस नए अध्याय की भूमिका लेकर। डॉक्टरों ने मुझे ‘वेटरन’ करार दिया, इस बिनाह पर कि पिछले अनुभवों के बाद मेरे लिए कुछ भी नया नहीं होगा और आसानी से मैं इसके इलाज को दोबारा भी झेल पाऊंगी। लेकिन अनुभवी हो जाने भर से दर्द की अनुभूति कम तो नहीं हो जाती। इस बार भी वही इलाज- सर्जरी, 25 दिन रेडियोथेरेपी और छह साइकिल कीमोथेरेपी- बिना किसी छूट, कोताही या राहत के।
सीखने होंगे कुछ गुर बेहतर जिंदगी के
दूसरे अध्याय को भी कोई सात साल बीत चुके हैं। इन चौदह वर्षों में जीवन के उतार-चढ़ावों से गुजरकर मैंने जीने के कुछ गुर सीख लिए हैं। बेहतर जिंदगी पाने का पहला गुर है- अपने को जानना, अपने शरीर को पहचानना, समझना, कहीं पर आए बदलावों पर नजर रखना और अपनी जिम्मेदारी खुद लेना। बदलाव या बीमारी का पता लगते ही उसके इलाज का उपाय करना पहला महत्वपूर्ण कदम है। ठोस कैंसर की गांठों का पता आम तौर पर मरीज को ही सबसे पहले चलता है। डॉक्टर भले ही न पहचान पाए, लेकिन व्यक्ति अगर नियमित रूप से सही तरीके से अपने शरीर को जांचे तो उसमें आ रहे बदलावों को पहचान सकता है। कैंसर के मामले में जल्दी पहचान उसके सफल इलाज की कुंजी है। हमारे देश में कोई 70 फीसदी कैंसर के मामले जब तक सही अस्पताल तक पहुंचकर इलाज की स्थिति में आते हैं, ठीक होने की संभावना से काफी आगे निकल चुके होते हैं। देरी हो चुकी होती है और ट्यूमर फैल चुका होता है। इसलिए बीमारी का पता जितनी जल्दी लग जाए, इलाज उतना ही कामयाब और सरल होता है।
हालांकि पिछले समय में कैंसर के नए-नए कम साइड इफेक्ट वाले इलाज खोजे गए हैं, जो पहले के इलाज से ज्यादा कारगर हैं। टार्गेटेड थेरेपी कैंसर के मरीज की जरूरत के अनुसार डिजाइनर दवाओं से इलाज की पद्यति है, जो स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान किए बिना सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को खत्म करती है, जबकि पारंपरिक इलाज में कैंसर के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाएं भी बुरी तरह प्रभावित होती हैं। कुछ प्रकार के कैंसरों में टार्गेटेड थेरेपी शुरुआती परीक्षणों के स्तर पर सफल साबित हो रही है।
उम्मीद की लौ में है जिंदगी
विकसित देशों में कैंसर के पुख्ता इलाज की खोज में लगातार अनुसंधान चल रहे हैं, हालांकि पिछले कुछ दशकों में जितना समय और धन इस पर खर्च किया गया है, उसके मुताबिक परिणाम नहीं मिल पाए हैं। विकसित अवस्था के ज्यादातर कैंसर अब भी ठीक नहीं हो पाते, फिर भी कैंसर के साथ जीवन अब पहले से कहीं ज्यादा लंबा और ज्यादा आसान हो गया है। वैसे भी कैंसर मूलतः शरीर के भीतर की रासायनिक संरचनाओं में गड़बड़ी के कारण होने वाली बीमारी है। ऐसे में सेहतमंद खान-पान, शारीरिक क्रियाशीलता, बेहतर जीवनचर्या सभी के लिए महत्वपूर्ण है, ताकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत हो कि कैंसर दूर रहे या कुछ ज्यादा समय तक शरीर इसके खिलाफ लड़ पाए।
अपने शरीर और मन की क्षमताओं की सीमाओं को टटोलना और बढ़ाते जाने की लगातार कोशिश करते रहना भी जीने की कला है जो कैंसर जैसी शरीर के भीतर पैदा होने वाली गड़बड़ियों पर लगाम रखती है। साथ ही जरूरी है- जीवन की उम्मीद बनाए रखना और इसे आगे बढ़ाना, उन सब तक, जिनके जीवन में बस इसी एक लौ की सख्त जरूरत है।
-आर अनुराधा
Saturday, January 7, 2012
हाल के समय में हुईं कैंसर के इलाज की कुछ महत्वपूर्ण खोजें
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी- त्वचा का कैंसर मेलानोमा तेजी से फैलता है और विकसित अवस्था में इसका इलाज मुश्किल होता है। इसीलिए इस अवस्था में मरीज के जीने की संभावना औसतन 8 से 18 माह ही होती है। अब तक इसका इलाज डाकार्बाज़ाइन नाम की कीमोथेरेपी दवा से ही किया जाता है। यह दवा सीधे ट्यूमर पर हमला करती है। क्योंकि कैंसर की रक्त के जरिए फैलने की प्रवृत्ति होती है इसलिए एक सीमा के बाद दवा असरकारक नहीं रहती। ऐसे में कैंसर विकसित होता रहता है और आखिर जानलेवा साबित होता है। लेकिन न्यू यॉर्क के स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ने विकसित मेलानोमा के मोनोक्लोनल एंटीबॉडी यानी शरीर में ही इस खास कैंसर से निकलने वाले सहयोगी प्रोटीन के खिलाफ बनाई गई एंटीबॉडी से इलाज के लिए डाकार्बाज़ाइन के साथ इपिलिमुमाब नाम के रसायन का इस्तेमाल किया। तुलना करके देखा गया कि जिन मरीजों को सिर्फ डाकार्बाज़ाइन दी गई उनके एक साल तक जीवित रहने की उनकी संभावना 36.3 फीसदी रही जबकि दोनों दवाएं पाने वालों के लिए यह प्रतिशत 50 रहा। इसे पिछले 30 साल में त्वचा के कैंसर की सबसे जबर्दस्त खोज कहा जा रहा है।
एक अन्य शोध में इसी संस्थान की एक और टीम ने डाकार्बाज़ाइन की तुलना में वेमुराफेनिब दवा का इस्तेमाल करके देखा कि यह बी-आरएएफ नामक जीन के कैंसरकारी म्यूटेशन के असर को रोकती है। यह म्यूटेशन त्वचा के कैंसर के करीब आधे ट्यूमरों में मौजूद पाया गया है। बी-आरएएफ जीन एक एंजाइम छोड़ता है, जो ज्यादा सक्रिय होने पर त्वचा की रंजक कोशिकाओं मेलानोसाइट्स के कैंसर की संभावना को बढ़ा देता है। वेमुराफेनिब एक एंजाइम है जो म्यूटेटेड बी-आरएएफ जीन की गतिविधियों पर रोक लगा कर कैंसर बनने को ही रोक देता है। इस इलाज से मरीजों का छह माह जीवित रहने की संभावना 84 फीसदी थी जबकि डाकार्बाज़ाइन लेने वाले समूह की 64 फीसदी। यह इलाज इतना प्रभावी रहा कि इस परीक्षण को बीच में ही रोक दिया गया ताकि सभी मरीजों को इसमें शामिल करके उन्हें भी इस टार्गेटेड इलाज का लाभ दिया जा सके।
एंटी एंजियोजेनिक थेरेपी- इस साल अप्रैल के पहले हफ्ते में खबर आई कि क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट, इंग्लैंड के फार्मेसी स्कूल और अल्माक डिस्कवरी लिमिटेड के वैज्ञानिकों ने ऐसा इलाज खोजा है जिसमें दवा ट्यूमर पर सीधे हमला करने की बजाए उसकी रक्त नलिकाओं की बढ़त को रोक देती है। इस तरह ट्यूमर कोशिकाओं को ऑक्सीजन और पोषण मिलना बंद हो जाता है और वे मर जाती हैं। वैसे तो 1985 से ही वैज्ञानिक जानते थे कि रक्त नलिकाएं ट्यूमर के लिए विशेष आपूर्ति हेतु विकसित हो जाती हैं। लेकिन उन्हें बढ़ने से रोका कैसे जाए, इस सवाल का जवाब उन्हें अब मिल गया है। उम्मीद है कि यह थेरेपी सभी तरह के ठोस ट्यूमरों के लिए असरदार रहेगी। अभी प्राकृतिक प्रोटीन और पेप्टाइड पर आधारित यह एंटी एंजियोजेनिक पद्यति प्रि-क्लीनिकल स्तर से गुजर रही है।
इसी तरह के एक और परीक्षण के बारे में ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के कैंसर थेरैप्यूटिक संस्थान की रिपोर्ट जर्नल कैंसर रिपोर्ट में प्रकाशित हुई है। इसके मुताबिक सूजन, जलन आदि के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑटम क्रोकस के फूल में पाया जाने वाला जहरीला रसायन कोल्चिसिन कैंसर के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि अपने आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपने लिए जगह बनाने के लिए सभी ट्यूमर कुछ एंजाइम पैदा करते हैं। संवर्धित कोल्चिसिन अणु में एर प्रोटीन होता है जिससे यह अक्रिय बना रहता है। लेकिन जब यह प्रोटीन इन एंजाइमों के संपर्क में आता है तो वह नष्ट हो जाता है और कोल्चिसिन सक्रिय हो जाता है। और तब वह ट्यूमर को पोषण देने वाली रक्त नलियों को नष्ट कर देता है और ट्यूमर खत्म हो जता है। इस तरह यह दवा सिर्फ ट्यूमर पर ही असर करती है, स्वस्थ कोशिका पर नहीं।
सीरियल किलर टी-सेल- इसी प्रक्रिया से जुड़ी एक खोज पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने विकसित अवस्था के ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर के इलाज के लिए टी-लिंफोसाइट को जेनेटिकली इंजीनियर किया है। इस प्रयोग में शामिल तीन में से दो मरीज एक साल से ज्यादा समय तक स्वस्थ रहे, उनमें कैंसर लौट कर नहीं आया। हार्वर्ड मेडीकल स्कूल ने कैंसर कोशिकाओं में एक खास रसायन की मौजूदगी को खोजा था, जिसे इस ताजा प्रयोग में निशाना बनाया गया है। कैंसर पर हमला करने वाली कोशिका बनाने के लिए एक वायरस के जीन में बदलाव किए गए ताकि वह ऐसा रसायन बनाए जो ल्यूकेमिया कोशिका से जुड़ जाए और वहां रक्त में मौजूद टी-लिंफोसाइट को उकसाए कि वह कैंसर कोशिकाओं को मार दे। फिर मरीज के शरीर से रक्त निकाल कर उसमें यह वायरस डाल दिया गया। जब संक्रमित खून वापस मरीज के शरीर में डाला गया तो हर इंजीनियर्ड टी-लिंफोसाइट हजार से ज्यादा बार बहुगुणित हुई और कई महीने जिंदा रह कर कैंसर को खत्म कर दिया। इनसे अक्रिय ‘यादगार’ टी-कोशिकाएं भी बनीं, जो कैंसर के दोबारा पनपने पर उसे पहचान कर अपने आप ही उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू देंगी।
आई-बेट 151- इंग्लैंड में ग्लैक्सो स्मिथ क्लीन व कैंसर रिसर्च यूके (क्रुक) ने खोजा कि 2 साल से छोटे बच्चों में एक्यूट ल्यूकेमिया के 80 फीसदी मामलों और वयस्कों में 1-10 फीसदी मामलों में मिक्स्ड लीनिएज ल्यूकेमिया या एमएलएल होता है। एमएलएल जीन एक अन्य जीन के साथ मिल कर फ्यूजन प्रोटीन बनाता है जो कि ल्यूकेमिया बनाने वाले जीन को काम शुरू करने को उकसा देता है। लैब में चूहों की और मानव कोशिकाओं में आई-बेट 151 प्रोटीन से यह प्रक्रिया रोकी जा सकी है। यह थेरेपी अभी परीक्षण के शुरुआती चरण में है।
रेनियम-186 और लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी- क्वींस यूनिवर्सिटी, बेलफास्ट में एडवांस प्रोस्टेट कैंसर के फेस-1 ट्रायल में मरीजों को कीमोथेरेपी के साथ रेडियोएक्टिव रेनियम-186 (Rhenium) दी गई। दूसरा फेज़ 6 माह में शुरू होगा, जिसके नतीजे दो साल में आएंगे। यूसी सांता बारबरा में प्रोस्टेट कैंसर का एक और इलाज खोजा गया। लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक कैंसर कोशिका और स्वस्थ कोशिका में अंतर करती है। इस गुण की जानकारी से स्वस्थ कोशिकाओं को बचाते हुए केवल बीमार कोशिकओँ को नष्ट करने के लिए रेडियोथेरेपी का उपयोग किया गया है।
इन पद्यतियों को बाजार तक आने में अभी बरसों लगेंगे।
एक अन्य शोध में इसी संस्थान की एक और टीम ने डाकार्बाज़ाइन की तुलना में वेमुराफेनिब दवा का इस्तेमाल करके देखा कि यह बी-आरएएफ नामक जीन के कैंसरकारी म्यूटेशन के असर को रोकती है। यह म्यूटेशन त्वचा के कैंसर के करीब आधे ट्यूमरों में मौजूद पाया गया है। बी-आरएएफ जीन एक एंजाइम छोड़ता है, जो ज्यादा सक्रिय होने पर त्वचा की रंजक कोशिकाओं मेलानोसाइट्स के कैंसर की संभावना को बढ़ा देता है। वेमुराफेनिब एक एंजाइम है जो म्यूटेटेड बी-आरएएफ जीन की गतिविधियों पर रोक लगा कर कैंसर बनने को ही रोक देता है। इस इलाज से मरीजों का छह माह जीवित रहने की संभावना 84 फीसदी थी जबकि डाकार्बाज़ाइन लेने वाले समूह की 64 फीसदी। यह इलाज इतना प्रभावी रहा कि इस परीक्षण को बीच में ही रोक दिया गया ताकि सभी मरीजों को इसमें शामिल करके उन्हें भी इस टार्गेटेड इलाज का लाभ दिया जा सके।
एंटी एंजियोजेनिक थेरेपी- इस साल अप्रैल के पहले हफ्ते में खबर आई कि क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट, इंग्लैंड के फार्मेसी स्कूल और अल्माक डिस्कवरी लिमिटेड के वैज्ञानिकों ने ऐसा इलाज खोजा है जिसमें दवा ट्यूमर पर सीधे हमला करने की बजाए उसकी रक्त नलिकाओं की बढ़त को रोक देती है। इस तरह ट्यूमर कोशिकाओं को ऑक्सीजन और पोषण मिलना बंद हो जाता है और वे मर जाती हैं। वैसे तो 1985 से ही वैज्ञानिक जानते थे कि रक्त नलिकाएं ट्यूमर के लिए विशेष आपूर्ति हेतु विकसित हो जाती हैं। लेकिन उन्हें बढ़ने से रोका कैसे जाए, इस सवाल का जवाब उन्हें अब मिल गया है। उम्मीद है कि यह थेरेपी सभी तरह के ठोस ट्यूमरों के लिए असरदार रहेगी। अभी प्राकृतिक प्रोटीन और पेप्टाइड पर आधारित यह एंटी एंजियोजेनिक पद्यति प्रि-क्लीनिकल स्तर से गुजर रही है।
इसी तरह के एक और परीक्षण के बारे में ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के कैंसर थेरैप्यूटिक संस्थान की रिपोर्ट जर्नल कैंसर रिपोर्ट में प्रकाशित हुई है। इसके मुताबिक सूजन, जलन आदि के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑटम क्रोकस के फूल में पाया जाने वाला जहरीला रसायन कोल्चिसिन कैंसर के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि अपने आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपने लिए जगह बनाने के लिए सभी ट्यूमर कुछ एंजाइम पैदा करते हैं। संवर्धित कोल्चिसिन अणु में एर प्रोटीन होता है जिससे यह अक्रिय बना रहता है। लेकिन जब यह प्रोटीन इन एंजाइमों के संपर्क में आता है तो वह नष्ट हो जाता है और कोल्चिसिन सक्रिय हो जाता है। और तब वह ट्यूमर को पोषण देने वाली रक्त नलियों को नष्ट कर देता है और ट्यूमर खत्म हो जता है। इस तरह यह दवा सिर्फ ट्यूमर पर ही असर करती है, स्वस्थ कोशिका पर नहीं।
सीरियल किलर टी-सेल- इसी प्रक्रिया से जुड़ी एक खोज पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने विकसित अवस्था के ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर के इलाज के लिए टी-लिंफोसाइट को जेनेटिकली इंजीनियर किया है। इस प्रयोग में शामिल तीन में से दो मरीज एक साल से ज्यादा समय तक स्वस्थ रहे, उनमें कैंसर लौट कर नहीं आया। हार्वर्ड मेडीकल स्कूल ने कैंसर कोशिकाओं में एक खास रसायन की मौजूदगी को खोजा था, जिसे इस ताजा प्रयोग में निशाना बनाया गया है। कैंसर पर हमला करने वाली कोशिका बनाने के लिए एक वायरस के जीन में बदलाव किए गए ताकि वह ऐसा रसायन बनाए जो ल्यूकेमिया कोशिका से जुड़ जाए और वहां रक्त में मौजूद टी-लिंफोसाइट को उकसाए कि वह कैंसर कोशिकाओं को मार दे। फिर मरीज के शरीर से रक्त निकाल कर उसमें यह वायरस डाल दिया गया। जब संक्रमित खून वापस मरीज के शरीर में डाला गया तो हर इंजीनियर्ड टी-लिंफोसाइट हजार से ज्यादा बार बहुगुणित हुई और कई महीने जिंदा रह कर कैंसर को खत्म कर दिया। इनसे अक्रिय ‘यादगार’ टी-कोशिकाएं भी बनीं, जो कैंसर के दोबारा पनपने पर उसे पहचान कर अपने आप ही उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू देंगी।
आई-बेट 151- इंग्लैंड में ग्लैक्सो स्मिथ क्लीन व कैंसर रिसर्च यूके (क्रुक) ने खोजा कि 2 साल से छोटे बच्चों में एक्यूट ल्यूकेमिया के 80 फीसदी मामलों और वयस्कों में 1-10 फीसदी मामलों में मिक्स्ड लीनिएज ल्यूकेमिया या एमएलएल होता है। एमएलएल जीन एक अन्य जीन के साथ मिल कर फ्यूजन प्रोटीन बनाता है जो कि ल्यूकेमिया बनाने वाले जीन को काम शुरू करने को उकसा देता है। लैब में चूहों की और मानव कोशिकाओं में आई-बेट 151 प्रोटीन से यह प्रक्रिया रोकी जा सकी है। यह थेरेपी अभी परीक्षण के शुरुआती चरण में है।
रेनियम-186 और लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी- क्वींस यूनिवर्सिटी, बेलफास्ट में एडवांस प्रोस्टेट कैंसर के फेस-1 ट्रायल में मरीजों को कीमोथेरेपी के साथ रेडियोएक्टिव रेनियम-186 (Rhenium) दी गई। दूसरा फेज़ 6 माह में शुरू होगा, जिसके नतीजे दो साल में आएंगे। यूसी सांता बारबरा में प्रोस्टेट कैंसर का एक और इलाज खोजा गया। लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक कैंसर कोशिका और स्वस्थ कोशिका में अंतर करती है। इस गुण की जानकारी से स्वस्थ कोशिकाओं को बचाते हुए केवल बीमार कोशिकओँ को नष्ट करने के लिए रेडियोथेरेपी का उपयोग किया गया है।
इन पद्यतियों को बाजार तक आने में अभी बरसों लगेंगे।
कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 2
कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1
कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।
-आर. अनुराधा
किसी कोशिका के भीतर जेनेटिक रसायनों यानी जीनों में अचानक बदलाव आने के कारण उसके अनियंत्रित हो जाने और अपनी तरह की बीमार, अधूरी कोशिकाओं की संख्या बढ़ाते जाने का नाम ही कैंसर है। यह अचानक बदलाव म्यूटेशन कहलाता है। जीनोम की जानकारी के बाद अब वैज्ञानिक ट्यूमर के बजाए उसके बनने की प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, ताकि ट्यूमर की जड़ को ही खत्म किया जा सके। इसी के साथ-साथ काम करती है शरीर में फैल चुकी कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए टार्गेटेड कीमोथेरेपी। इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर वैज्ञानिक हर म्यूटेशन और उसके रासायनिक वातावरण को समझ कर उसी के अनुरूप दवाएं खोजने में जुटे हैं। इस तरह पर्सनलाइज्ड और टार्गेटेड इलाज से एकदम सटीक इलाज तय किया जा सकता है, बिना स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए। इस तरह का इलाज छोटा और सस्ता होगा, मरीज को इलाज की तकलीफ भी नहीं झेलनी होगी। इसलिए सिर्फ ट्यूमर पर फोकस करने की बजाए अब वैज्ञानिक मरीज की रासायनिक बनावट को भी जांच के दायरे में ला रहे हैं।
दूसरी तरफ हमारे बाहरी रासायनिक वातावरण का गहरा असर शरीर के रासायनिक संतुलन पर पड़ता है। रसायनों का यह हमला हमारे जीवन पर बढ़ता जा रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय आयुधों के लिए या लोगों के सामूहिक संहार के लिए बने ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे रसायनों को उद्योगों ने हमारे रोज के इस्तेमाल की चीजों में तब्दील कर दिया। धुलाई, सफाई और सौंदर्यवर्धन से लेकर कीटाणु-जीवाणु, मच्छर-मक्खी और फसलों की खरपतवार के नाश तक के लिए बने उत्पादों में ये जहरीले रसायन भरपूर हैं, जिन्हें हम बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं। इनका इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही कैंसर होने की संभावना भी बढ़ती है। इसी के साथ हमारी जीवनशैली की कमियां भी नत्थी हैं, जो कैंसर को बढ़ावा देती हैं। इस अर्थ में कैंसर कोई ऐसी बीमारी नहीं जो कीटाणुओं से होती है, बल्कि कई कारकों का दुष्परिणाम है जो शरीर के मेटाबॉलिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं और यह बिगड़ाव कैंसर के रूप में सामने आता है। यह दरअसल कैंसर की रोकथाम का एक महत्वपूर्ण बिंदु है।
इन बाहरी और भीतरी हमलों के खिलाफ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र लगातार काम करता रहता है। जीवन भर हर एक के शरीर में लगातार ‘कैंसर’ कोशिकाएं बनती रहती हैं और उन्हें शरीर नष्ट भी करता रहता है। लेकिन एक सीमा के बाद जब उन्हें रोक पाना प्रतिरक्षा तंत्र के बस में नहीं होता, तब कैंसर बीमारी के रूप में फैलने लगता है, जिसे रोकने के लिए इलाज की जरूरत होती है।
इलाज की इन तकनीकों ने कई तरह के कैंसरों में मरीजों का जीवन बचाया है, या पहले से आसान बनाया है। अमरीका में 1990 से 2007 के बीच कैंसर से मृत्यु दर में पुरुषों में 22 और महिलाओं में 14 फीसदी की कमी आई है। 1975 में आधी संख्या में ही मरीज 5 साल तक जी पाते थे, अब करीब 70 फीसदी मरीजों का जीवन पांच साल तक खिंच जाता है। यह प्रगति महत्वपूर्ण है, पर काफी नहीं। इतना आगे बढ़ पाने के बाद भी हम अभी कैंसर से मुक्ति के उपाय के आस-पास भी नहीं हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर साल सवा करोड़ नए कैंसर मरीजों की पहचान होती है और इस साल 75 लाख लोग इस बीमारी से मर जाएंगे। 20 साल में कैंसर से मरने वालों की संख्या सालाना लगभग दोगुनी- 1.2 करोड़ तक हो जाएगी। कैंसर दरअसल बड़ी उम्र की बीमारी है। पुराने होते शरीर की कोशिकाएं भी करोड़ों बार के विभाजन के बाद स्वाभाविक ही, थक जाती हैं, असामान्य होने लगती हैं उनमें बदलाव, म्यूटेशन आने लगते हैं। इसलिए लोगों की उम्र लंबी होने के और बड़ी उम्र के लोगों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
भारत में 25 लाख कैंसर के मरीज हैं और हर साल 8 लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज होते हैं और साढ़े पांच लाख मर भी जाते हैं। इनके अलावा हज़ारों हैं जो कैंसर अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। हमारे यहां 70 फीसदी मामलों में एडवांस स्टेज में ही मरीज इलाज के लिए पहुंच पाता है। तब तक बीमारी काबू के बाहर हो जाती है। आर्थिक स्थिति भी कई बार पूरे इलाज से मरीज को वंचित रखती है और इस तरह बहुमूल्य मानव संसाधन का नुकसान होता है। जो आर्थिक क्षमता रखता है, वह मौजूदा महंगे, लंबे इलाज से बंधा रहता है। इलाज कितना कारगर होगा, वह बच पाएगा या नहीं इसी अनिश्चितता में लगातार भावनात्मक ऊहा-पोह की स्थिति में रहता है। कैंसर व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के लिए भी आर्थिक और भावनात्मक सदमे का कारण है।
अगर पहली या दूसरी अवस्था में ही कैंसर को पहचान कर पूरा इलाज करवाया जाए तो 80 फीसदी तक मरीजों का जीवन बच सकता है जबकि स्टेज तीन या चार के मरीजों के बचने की संभावना 20 फीसदी तक ही होती है।
जो इलाज की तकनीकें और दवाएं मरीज को उपलब्ध हैं, वे भी फिलहाल कैंसर से मुक्ति का तरीका नहीं हैं। कैंसर से मुक्ति का रास्ता लंबा है और इसका भविष्य इन्हीं मौजूदा आजमाइशों की सफलता पर निर्भर करेगा।
कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।
-आर. अनुराधा
किसी कोशिका के भीतर जेनेटिक रसायनों यानी जीनों में अचानक बदलाव आने के कारण उसके अनियंत्रित हो जाने और अपनी तरह की बीमार, अधूरी कोशिकाओं की संख्या बढ़ाते जाने का नाम ही कैंसर है। यह अचानक बदलाव म्यूटेशन कहलाता है। जीनोम की जानकारी के बाद अब वैज्ञानिक ट्यूमर के बजाए उसके बनने की प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, ताकि ट्यूमर की जड़ को ही खत्म किया जा सके। इसी के साथ-साथ काम करती है शरीर में फैल चुकी कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए टार्गेटेड कीमोथेरेपी। इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर वैज्ञानिक हर म्यूटेशन और उसके रासायनिक वातावरण को समझ कर उसी के अनुरूप दवाएं खोजने में जुटे हैं। इस तरह पर्सनलाइज्ड और टार्गेटेड इलाज से एकदम सटीक इलाज तय किया जा सकता है, बिना स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए। इस तरह का इलाज छोटा और सस्ता होगा, मरीज को इलाज की तकलीफ भी नहीं झेलनी होगी। इसलिए सिर्फ ट्यूमर पर फोकस करने की बजाए अब वैज्ञानिक मरीज की रासायनिक बनावट को भी जांच के दायरे में ला रहे हैं।
दूसरी तरफ हमारे बाहरी रासायनिक वातावरण का गहरा असर शरीर के रासायनिक संतुलन पर पड़ता है। रसायनों का यह हमला हमारे जीवन पर बढ़ता जा रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय आयुधों के लिए या लोगों के सामूहिक संहार के लिए बने ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे रसायनों को उद्योगों ने हमारे रोज के इस्तेमाल की चीजों में तब्दील कर दिया। धुलाई, सफाई और सौंदर्यवर्धन से लेकर कीटाणु-जीवाणु, मच्छर-मक्खी और फसलों की खरपतवार के नाश तक के लिए बने उत्पादों में ये जहरीले रसायन भरपूर हैं, जिन्हें हम बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं। इनका इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही कैंसर होने की संभावना भी बढ़ती है। इसी के साथ हमारी जीवनशैली की कमियां भी नत्थी हैं, जो कैंसर को बढ़ावा देती हैं। इस अर्थ में कैंसर कोई ऐसी बीमारी नहीं जो कीटाणुओं से होती है, बल्कि कई कारकों का दुष्परिणाम है जो शरीर के मेटाबॉलिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं और यह बिगड़ाव कैंसर के रूप में सामने आता है। यह दरअसल कैंसर की रोकथाम का एक महत्वपूर्ण बिंदु है।
इन बाहरी और भीतरी हमलों के खिलाफ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र लगातार काम करता रहता है। जीवन भर हर एक के शरीर में लगातार ‘कैंसर’ कोशिकाएं बनती रहती हैं और उन्हें शरीर नष्ट भी करता रहता है। लेकिन एक सीमा के बाद जब उन्हें रोक पाना प्रतिरक्षा तंत्र के बस में नहीं होता, तब कैंसर बीमारी के रूप में फैलने लगता है, जिसे रोकने के लिए इलाज की जरूरत होती है।
इलाज की इन तकनीकों ने कई तरह के कैंसरों में मरीजों का जीवन बचाया है, या पहले से आसान बनाया है। अमरीका में 1990 से 2007 के बीच कैंसर से मृत्यु दर में पुरुषों में 22 और महिलाओं में 14 फीसदी की कमी आई है। 1975 में आधी संख्या में ही मरीज 5 साल तक जी पाते थे, अब करीब 70 फीसदी मरीजों का जीवन पांच साल तक खिंच जाता है। यह प्रगति महत्वपूर्ण है, पर काफी नहीं। इतना आगे बढ़ पाने के बाद भी हम अभी कैंसर से मुक्ति के उपाय के आस-पास भी नहीं हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर साल सवा करोड़ नए कैंसर मरीजों की पहचान होती है और इस साल 75 लाख लोग इस बीमारी से मर जाएंगे। 20 साल में कैंसर से मरने वालों की संख्या सालाना लगभग दोगुनी- 1.2 करोड़ तक हो जाएगी। कैंसर दरअसल बड़ी उम्र की बीमारी है। पुराने होते शरीर की कोशिकाएं भी करोड़ों बार के विभाजन के बाद स्वाभाविक ही, थक जाती हैं, असामान्य होने लगती हैं उनमें बदलाव, म्यूटेशन आने लगते हैं। इसलिए लोगों की उम्र लंबी होने के और बड़ी उम्र के लोगों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
भारत में 25 लाख कैंसर के मरीज हैं और हर साल 8 लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज होते हैं और साढ़े पांच लाख मर भी जाते हैं। इनके अलावा हज़ारों हैं जो कैंसर अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। हमारे यहां 70 फीसदी मामलों में एडवांस स्टेज में ही मरीज इलाज के लिए पहुंच पाता है। तब तक बीमारी काबू के बाहर हो जाती है। आर्थिक स्थिति भी कई बार पूरे इलाज से मरीज को वंचित रखती है और इस तरह बहुमूल्य मानव संसाधन का नुकसान होता है। जो आर्थिक क्षमता रखता है, वह मौजूदा महंगे, लंबे इलाज से बंधा रहता है। इलाज कितना कारगर होगा, वह बच पाएगा या नहीं इसी अनिश्चितता में लगातार भावनात्मक ऊहा-पोह की स्थिति में रहता है। कैंसर व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के लिए भी आर्थिक और भावनात्मक सदमे का कारण है।
अगर पहली या दूसरी अवस्था में ही कैंसर को पहचान कर पूरा इलाज करवाया जाए तो 80 फीसदी तक मरीजों का जीवन बच सकता है जबकि स्टेज तीन या चार के मरीजों के बचने की संभावना 20 फीसदी तक ही होती है।
जो इलाज की तकनीकें और दवाएं मरीज को उपलब्ध हैं, वे भी फिलहाल कैंसर से मुक्ति का तरीका नहीं हैं। कैंसर से मुक्ति का रास्ता लंबा है और इसका भविष्य इन्हीं मौजूदा आजमाइशों की सफलता पर निर्भर करेगा।
कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1
कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।
-आर. अनुराधा
दुनिया की तीन बड़ी हस्तियों का कैंसर की वजह से असमय गुज़र जाना हाल के दिनों में चर्चा का बड़ा विषय रहा। हेवीवेट मुक्केबाजी के विश्व चैंपियन मुहम्मद अली को कई बार पछाड़ने वाले ‘स्मोकिंग’ जो फ्रेज़र को लिवर के कैंसर ने पछाड़ दिया। पर्सनल कंप्यूटर के पितामह और एप्पल कंप्यूटर कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स सात साल तक पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझते हुए आखिर हार गए। इस साल फिजियोलॉजी या मेडीसिन के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले तीन इम्यूनोलॉजिस्ट में से एक प्रो. राल्फ स्टीनमैन की भी सितंबर के अंत में पैंक्रियाटिक कैंसर से मौत हुई।
दिलचस्प बात यह है कि प्रो. स्टीनमैन ने ही 1973 में प्रतिरक्षा प्रणाली की डेंड्रीटिक कोशिकाओं का पता लगाया था जो प्रतिरक्षा तंत्र को संक्रमण और कैंसर के खिलाफ चेताने का काम करती है। उनकी इसी तकनीक के आधार पर 2001 में इमैटिनिब नाम की पहली थेरैप्यूटिक कैंसर वैक्सीन बनाई गई जो कैंसर हो जाने पर उसके इलाज के लिए दी जाती है। इस क्रांतिकारी खोज के बाद से ही कैंसर के लिए कीमोथेरेपी में अनुसंधानों को नई दिशा मिली।
इमैटिनिब जैसी टार्गेटेड दवाओं की खासियत यह है कि ये स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना सीधे कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर उन पर हमला करती हैं और उन्हें खत्म कर देती हैं। जबकि परंपरागत कीमोथेरेपी की दवाएं बीमार और स्वस्थ कोशिकाओं में अंतर किए बिना शरीर की सभी तेजी से बढ़ती कोशिकाओं पर हमला करती चलती हैं। इलाज की इस तकनीक में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हर मरीज और मर्ज की खासियत के मुताबिक खासतौर पर उसी को लक्ष्य करती है। इन डिजाइनर दवाओं का दायरा छोटा लेकिन सटीक होता है। जबकि पहले कुछ ही दवाएं हर प्रकार के कैंसर के इलाज में काम में लाई जाती थीं।
पिछले कुछेक साल में कई तरह के कैंसरों के खिलाफ विभिन्न टार्गेटेड इलाज यानी ‘स्मार्ट बम’ विकसित किए गए। थेरेप्यूटिक वैक्सीन के अलावा ल्यूकेमिया यानी रक्त के कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी, त्वचा के कैंसर मेलानोमा के लिए टार्गेटेड थेरेपी, ठोस कैंसरों के लिए एंटीएंजियोजेनिक यानी ट्यूमर को पोषण पहुंचाने वाली बारीक रक्त नलियों से आपूर्ति रोककर उसे मार देने की थेरेपी का सफल ईजाद किया गया। यहां तक कि जेनेटिक कीमोथेरेपी यानी जीन में हुए कैंसरकारी बदलावों को दवाओं के जरिए उलट देने, प्रतिरोधक तंत्र की कोशिकाओं में जेनेटिक बदलाव करके उन्हें कैंसर को पहचानने और लड़कर उसे खत्म कर देने के लिए प्रशिक्षित करने जैसी नई तकनीकों के प्रयोगों को भी ट्रायल के विभिन्न चरणों में सफलता मिली है।
परंपरागत तरीकों में भी कम रेडिएशन और सरल कीमोथेरेपी से बेहतर प्रभाव पैदा करने जैसे सुधार मरीजों के लिए काफी कारगर सिद्ध हुए हैं। इन खोजों और सफलताओं का सिलसिला लगातार जारी है। इनके असर से चमत्कृत वैज्ञानिक तो यहां तक कहने लगे हैं कि कैंसर भविष्य में डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन जैसी बीमारी हो जाएगी जो पूरी तरह ठीक भले ही न हो पर उसके साथ बेधड़क लंबा जीवन जिया जा सकेगा।
कैंसर के इलाज की खोज की दिशा में तूफानी रफ्तार से चल रहे अनुसंधानों, परीक्षणों को देखते हुए इसे कैंसर अनुसंधान का स्वर्ण काल कहना शायद गलत न होगा, जैसा कि कैंसर रिसर्च यूके के हरपाल कुमार भी कहते हैं। दुनिया भर में इस समय कैंसर के इलाज की सैकड़ों नई पद्यतियों के परीक्षण चल रहे हैं। अकेले अमेरिका में ही कैंसर के इलाज के लिए वैक्सीनों के कोई साढ़े चार सौ क्लीनिकल ट्रायल इस समय विभिन्न स्तरों पर चल रहे हैं। कैंसर से बचाव की वैक्सीन के भी अनेक ट्रायल विभिन्न अनुसंधान संस्थानों और अस्पतालों में जारी हैं। इनमें से कुछेक ही सफल होते हैं। जो असफल होते हैं, वे भी कैंसर के डेटाबैंक में महत्वपूर्ण जानकारियां जोड़ते हैं। वैज्ञानिकों के पास अब पहले से ज्यादा दवाएं और ज्यादा असरदार विकल्प मौजूद हैं।
इतनी उम्मीदों के बाद भी तथ्य यह है कि कैंसर ज्यादातर लोगों की जिंदगियों पर भारी है। कैंसर का टार्गेटेड इलाज उपलब्ध होने और वैज्ञानिकों द्वारा उनकी सफलताओं के दावों के बाद भी स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन तक को इस बीमारी के आगे झुकना पड़ा। टार्गेटेड थेरेपी खोज लेने वाला वैज्ञानिक कैंसर होने का पता लगने के चार साल में भी अपने लिए कैंसर का सटीक इलाज नहीं खोज पाया।
लैबोरेटरी के नियंत्रित माहौल में इलाज के सफल उदाहरण अगर वास्तविकता की जमीन पर खड़े नहीं हो पा रहे हैं तो आखिर कसर कहां छूट रही है। क्या कैंसर के इलाज से बंधी उम्मीदें अवास्तविक हैं? एक हद तक। लैब में मिली किसी शुरुआती सफलता को प्रायोजक कंपनी अपने फायदे के लिए खूब प्रचारित करती है। चूंकि यह बीमारी जानलेवा और सनसनीखेज़ मानी जाती है, इसलिए मीडिया भी इसके इलाज की छोटी खबरों को बड़ा बनाकर पेश करता है। और आम आदमी समझता है कि इस मारक बीमारी का पक्का इलाज उसके बेद करीब है। अनुसंधानकर्ता भी कभी-कभार अतिउत्साह में अपनी खोजों को कैंसर का अंतिम इलाज मान बैठते हैं। जबकि परिपक्व अनुसंधानकर्ता समझते हैं कि कैंसर के कारणों की बहुलता के कारण उसके इलाज की पद्यति तय कर पाना सहज नहीं है। फिर भी कैंसर के इलाज ढूंढने के कई रास्ते बड़ी उम्मीदों से भरे हैं।
40 साल पहले 1971 में अमरीका में नैशनल कैंसर एक्ट 1971 बना था जिसमें कैंसर रिसर्च के लिए सरकारी फंडिंग का भी वादा था। पिछले कुछ वर्षों में अमरीका के नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का सालाना बजट करीब 5 अरब डॉलर का रहा है। इन अनुसंधानों से कैंसर के बारे में काफी कुछ पता चला है। यह एक बीमारी नहीं बल्कि सैकड़ों किस्म की बीमारियां हैं। अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ कैंसर रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर 200 से ज्यादा प्रकार की बीमारियां हैं, जिनमें हर एक के कारण और इलाज में थोड़ा-थोड़ा अंतर है। इस जानकारी में ही इस सवाल का आधा जबाव शामिल है कि इतने वर्षों बाद भी क्यों कैंसर का इलाज नहीं ढूंढा जा पाया। दरअसल कैंसर का कोई एक इलाज होगा, इसमें संदेह है। बल्कि ज्यादा संभावना यह है कि जिस तरह कई वायरल बीमारियों के अलग-अलग टीके लगाए जाते हैं, उसी तरह हर कैंसर का इलाज अलग तरह से होगा जो मरीज की और कैंसर की रासायनिक विशेषताओं के आधार पर डिजाइन किया जाएगा।
किसी भी बीमारी के इलाज के लिए प्रयोगशाला में मिली सफलता को बाजार तक आने के पहले लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इन पद्यतियों को कई स्वीकृतियों के बाद पहले जीवों पर, फिर कुछ चुनिंदा मरीजों पर, और फिर बड़ी संख्या में मरीजों पर आजमाया जाता है। इनके नतीजों के आधार पर ही किसी तकनीक या दवा को इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिलती है। इसमें काफी समय और धन खर्च होता है। किसी नए इलाज का बाजार तक पहुंचने का सफर एक बड़ी छलांग की बजाए धीमी चाल से ही तय हो पाता है। इस धीमी चाल की वजह से कई इलाज उपलब्ध होने के बावजूद हरेक स्थिति, व्यक्ति पर आजमाये नहीं जा सके हैं, और इसलिए पता नहीं है कि किन मरीजों के लिए वे कारगर होंगे या फिर उनका बेहतरीन इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
प्रयोगशाला से सफल होकर बाहर आए कई टार्गेटेड इलाज कुछेक वर्षों से कैंसर के मरीजों के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ ही प्रकार के कैंसरों के लिए। स्तन कैंसर के लिए हरसेप्टिन विश्व भर में उपलब्ध है। स्तन कैंसर के सौ में से 20 से 30 मरीजों में कैंसर कोशिकाएं बहुत ज्यादा हर-2 प्रोटीन पैदा करती हैं। इसे हर-2 पॉजिटिव कैंसर कहा जाता है। हर-2 कैंसर की सतह पर पाया जाने वाला प्रोटीन है जो कैंसर को बढ़ने का संकेत करता है और ट्यूमर बढ़ता जाता है। इसी प्रोटीन से कैंसर के प्रकार की पहचान करके हरसेप्टिन नाम की टार्गेटेड कीमोथेरेपी, सामान्य कीमोथेरेपी के साथ दी जाती है। हरसेप्टिन हर-2 प्रोटीन को ब्लॉक कर देती है जिससे कैंसर कोशिकाओं को बढ़ोत्तरी का इशारा नहीं मिलता और वे नष्ट हो जाती हैं। इस इलाज का असर अभूतपूर्व रहा है और कई बार सामान्य कीमो करा चुके, हार चुके मरीज भी स्वस्थ हो गए। इमैटिनिब मैसिलेट या ग्लीवैक भी क्रॉनिक मायलॉयड ल्यूकेमिया के लिए टार्गेटेड थेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा है।
स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन दोनों ही पैंक्रियास के कैंसर से पीड़ित थे जिसमें सिर्फ 4 फीसदी मरीज ही पांच साल तक जी पाते हैं और ज्यादातर मरीजों का जीवन एक साल के भीतर ही सिमट जाता है। ऐसे में दोनों कैंसर का पता लगने के बाद सात या चार साल तक जी पाए तो इसमें टार्गेटेड इलाज की नई तकनीकों का भी बड़ा हाथ रहा है। कैंसर के इलाज में पूरी सफलता या कैंसर के साथ जीवन लंबा हो पाने के दो मुख्य कारक हैं – मानव जीनोम की मैपिंग जो 2001 में पूरी हो चुकी है, और जीवन शैली जैसे सरल कारकों के कैंसर होने में योगदान की जानकारी।
(...जारी)
-आर. अनुराधा
दुनिया की तीन बड़ी हस्तियों का कैंसर की वजह से असमय गुज़र जाना हाल के दिनों में चर्चा का बड़ा विषय रहा। हेवीवेट मुक्केबाजी के विश्व चैंपियन मुहम्मद अली को कई बार पछाड़ने वाले ‘स्मोकिंग’ जो फ्रेज़र को लिवर के कैंसर ने पछाड़ दिया। पर्सनल कंप्यूटर के पितामह और एप्पल कंप्यूटर कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स सात साल तक पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझते हुए आखिर हार गए। इस साल फिजियोलॉजी या मेडीसिन के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले तीन इम्यूनोलॉजिस्ट में से एक प्रो. राल्फ स्टीनमैन की भी सितंबर के अंत में पैंक्रियाटिक कैंसर से मौत हुई।
दिलचस्प बात यह है कि प्रो. स्टीनमैन ने ही 1973 में प्रतिरक्षा प्रणाली की डेंड्रीटिक कोशिकाओं का पता लगाया था जो प्रतिरक्षा तंत्र को संक्रमण और कैंसर के खिलाफ चेताने का काम करती है। उनकी इसी तकनीक के आधार पर 2001 में इमैटिनिब नाम की पहली थेरैप्यूटिक कैंसर वैक्सीन बनाई गई जो कैंसर हो जाने पर उसके इलाज के लिए दी जाती है। इस क्रांतिकारी खोज के बाद से ही कैंसर के लिए कीमोथेरेपी में अनुसंधानों को नई दिशा मिली।
इमैटिनिब जैसी टार्गेटेड दवाओं की खासियत यह है कि ये स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना सीधे कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर उन पर हमला करती हैं और उन्हें खत्म कर देती हैं। जबकि परंपरागत कीमोथेरेपी की दवाएं बीमार और स्वस्थ कोशिकाओं में अंतर किए बिना शरीर की सभी तेजी से बढ़ती कोशिकाओं पर हमला करती चलती हैं। इलाज की इस तकनीक में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हर मरीज और मर्ज की खासियत के मुताबिक खासतौर पर उसी को लक्ष्य करती है। इन डिजाइनर दवाओं का दायरा छोटा लेकिन सटीक होता है। जबकि पहले कुछ ही दवाएं हर प्रकार के कैंसर के इलाज में काम में लाई जाती थीं।
पिछले कुछेक साल में कई तरह के कैंसरों के खिलाफ विभिन्न टार्गेटेड इलाज यानी ‘स्मार्ट बम’ विकसित किए गए। थेरेप्यूटिक वैक्सीन के अलावा ल्यूकेमिया यानी रक्त के कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी, त्वचा के कैंसर मेलानोमा के लिए टार्गेटेड थेरेपी, ठोस कैंसरों के लिए एंटीएंजियोजेनिक यानी ट्यूमर को पोषण पहुंचाने वाली बारीक रक्त नलियों से आपूर्ति रोककर उसे मार देने की थेरेपी का सफल ईजाद किया गया। यहां तक कि जेनेटिक कीमोथेरेपी यानी जीन में हुए कैंसरकारी बदलावों को दवाओं के जरिए उलट देने, प्रतिरोधक तंत्र की कोशिकाओं में जेनेटिक बदलाव करके उन्हें कैंसर को पहचानने और लड़कर उसे खत्म कर देने के लिए प्रशिक्षित करने जैसी नई तकनीकों के प्रयोगों को भी ट्रायल के विभिन्न चरणों में सफलता मिली है।
परंपरागत तरीकों में भी कम रेडिएशन और सरल कीमोथेरेपी से बेहतर प्रभाव पैदा करने जैसे सुधार मरीजों के लिए काफी कारगर सिद्ध हुए हैं। इन खोजों और सफलताओं का सिलसिला लगातार जारी है। इनके असर से चमत्कृत वैज्ञानिक तो यहां तक कहने लगे हैं कि कैंसर भविष्य में डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन जैसी बीमारी हो जाएगी जो पूरी तरह ठीक भले ही न हो पर उसके साथ बेधड़क लंबा जीवन जिया जा सकेगा।
कैंसर के इलाज की खोज की दिशा में तूफानी रफ्तार से चल रहे अनुसंधानों, परीक्षणों को देखते हुए इसे कैंसर अनुसंधान का स्वर्ण काल कहना शायद गलत न होगा, जैसा कि कैंसर रिसर्च यूके के हरपाल कुमार भी कहते हैं। दुनिया भर में इस समय कैंसर के इलाज की सैकड़ों नई पद्यतियों के परीक्षण चल रहे हैं। अकेले अमेरिका में ही कैंसर के इलाज के लिए वैक्सीनों के कोई साढ़े चार सौ क्लीनिकल ट्रायल इस समय विभिन्न स्तरों पर चल रहे हैं। कैंसर से बचाव की वैक्सीन के भी अनेक ट्रायल विभिन्न अनुसंधान संस्थानों और अस्पतालों में जारी हैं। इनमें से कुछेक ही सफल होते हैं। जो असफल होते हैं, वे भी कैंसर के डेटाबैंक में महत्वपूर्ण जानकारियां जोड़ते हैं। वैज्ञानिकों के पास अब पहले से ज्यादा दवाएं और ज्यादा असरदार विकल्प मौजूद हैं।
इतनी उम्मीदों के बाद भी तथ्य यह है कि कैंसर ज्यादातर लोगों की जिंदगियों पर भारी है। कैंसर का टार्गेटेड इलाज उपलब्ध होने और वैज्ञानिकों द्वारा उनकी सफलताओं के दावों के बाद भी स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन तक को इस बीमारी के आगे झुकना पड़ा। टार्गेटेड थेरेपी खोज लेने वाला वैज्ञानिक कैंसर होने का पता लगने के चार साल में भी अपने लिए कैंसर का सटीक इलाज नहीं खोज पाया।
लैबोरेटरी के नियंत्रित माहौल में इलाज के सफल उदाहरण अगर वास्तविकता की जमीन पर खड़े नहीं हो पा रहे हैं तो आखिर कसर कहां छूट रही है। क्या कैंसर के इलाज से बंधी उम्मीदें अवास्तविक हैं? एक हद तक। लैब में मिली किसी शुरुआती सफलता को प्रायोजक कंपनी अपने फायदे के लिए खूब प्रचारित करती है। चूंकि यह बीमारी जानलेवा और सनसनीखेज़ मानी जाती है, इसलिए मीडिया भी इसके इलाज की छोटी खबरों को बड़ा बनाकर पेश करता है। और आम आदमी समझता है कि इस मारक बीमारी का पक्का इलाज उसके बेद करीब है। अनुसंधानकर्ता भी कभी-कभार अतिउत्साह में अपनी खोजों को कैंसर का अंतिम इलाज मान बैठते हैं। जबकि परिपक्व अनुसंधानकर्ता समझते हैं कि कैंसर के कारणों की बहुलता के कारण उसके इलाज की पद्यति तय कर पाना सहज नहीं है। फिर भी कैंसर के इलाज ढूंढने के कई रास्ते बड़ी उम्मीदों से भरे हैं।
40 साल पहले 1971 में अमरीका में नैशनल कैंसर एक्ट 1971 बना था जिसमें कैंसर रिसर्च के लिए सरकारी फंडिंग का भी वादा था। पिछले कुछ वर्षों में अमरीका के नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का सालाना बजट करीब 5 अरब डॉलर का रहा है। इन अनुसंधानों से कैंसर के बारे में काफी कुछ पता चला है। यह एक बीमारी नहीं बल्कि सैकड़ों किस्म की बीमारियां हैं। अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ कैंसर रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर 200 से ज्यादा प्रकार की बीमारियां हैं, जिनमें हर एक के कारण और इलाज में थोड़ा-थोड़ा अंतर है। इस जानकारी में ही इस सवाल का आधा जबाव शामिल है कि इतने वर्षों बाद भी क्यों कैंसर का इलाज नहीं ढूंढा जा पाया। दरअसल कैंसर का कोई एक इलाज होगा, इसमें संदेह है। बल्कि ज्यादा संभावना यह है कि जिस तरह कई वायरल बीमारियों के अलग-अलग टीके लगाए जाते हैं, उसी तरह हर कैंसर का इलाज अलग तरह से होगा जो मरीज की और कैंसर की रासायनिक विशेषताओं के आधार पर डिजाइन किया जाएगा।
किसी भी बीमारी के इलाज के लिए प्रयोगशाला में मिली सफलता को बाजार तक आने के पहले लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इन पद्यतियों को कई स्वीकृतियों के बाद पहले जीवों पर, फिर कुछ चुनिंदा मरीजों पर, और फिर बड़ी संख्या में मरीजों पर आजमाया जाता है। इनके नतीजों के आधार पर ही किसी तकनीक या दवा को इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिलती है। इसमें काफी समय और धन खर्च होता है। किसी नए इलाज का बाजार तक पहुंचने का सफर एक बड़ी छलांग की बजाए धीमी चाल से ही तय हो पाता है। इस धीमी चाल की वजह से कई इलाज उपलब्ध होने के बावजूद हरेक स्थिति, व्यक्ति पर आजमाये नहीं जा सके हैं, और इसलिए पता नहीं है कि किन मरीजों के लिए वे कारगर होंगे या फिर उनका बेहतरीन इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
प्रयोगशाला से सफल होकर बाहर आए कई टार्गेटेड इलाज कुछेक वर्षों से कैंसर के मरीजों के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ ही प्रकार के कैंसरों के लिए। स्तन कैंसर के लिए हरसेप्टिन विश्व भर में उपलब्ध है। स्तन कैंसर के सौ में से 20 से 30 मरीजों में कैंसर कोशिकाएं बहुत ज्यादा हर-2 प्रोटीन पैदा करती हैं। इसे हर-2 पॉजिटिव कैंसर कहा जाता है। हर-2 कैंसर की सतह पर पाया जाने वाला प्रोटीन है जो कैंसर को बढ़ने का संकेत करता है और ट्यूमर बढ़ता जाता है। इसी प्रोटीन से कैंसर के प्रकार की पहचान करके हरसेप्टिन नाम की टार्गेटेड कीमोथेरेपी, सामान्य कीमोथेरेपी के साथ दी जाती है। हरसेप्टिन हर-2 प्रोटीन को ब्लॉक कर देती है जिससे कैंसर कोशिकाओं को बढ़ोत्तरी का इशारा नहीं मिलता और वे नष्ट हो जाती हैं। इस इलाज का असर अभूतपूर्व रहा है और कई बार सामान्य कीमो करा चुके, हार चुके मरीज भी स्वस्थ हो गए। इमैटिनिब मैसिलेट या ग्लीवैक भी क्रॉनिक मायलॉयड ल्यूकेमिया के लिए टार्गेटेड थेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा है।
स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन दोनों ही पैंक्रियास के कैंसर से पीड़ित थे जिसमें सिर्फ 4 फीसदी मरीज ही पांच साल तक जी पाते हैं और ज्यादातर मरीजों का जीवन एक साल के भीतर ही सिमट जाता है। ऐसे में दोनों कैंसर का पता लगने के बाद सात या चार साल तक जी पाए तो इसमें टार्गेटेड इलाज की नई तकनीकों का भी बड़ा हाथ रहा है। कैंसर के इलाज में पूरी सफलता या कैंसर के साथ जीवन लंबा हो पाने के दो मुख्य कारक हैं – मानव जीनोम की मैपिंग जो 2001 में पूरी हो चुकी है, और जीवन शैली जैसे सरल कारकों के कैंसर होने में योगदान की जानकारी।
(...जारी)
Wednesday, November 16, 2011
विज्ञान या स्वास्थ पत्रकार को क्या नहीं करना चाहिए कैंसर की रिपोर्टिंग या तमाशा
कैंसर ब्रेक-थ्रू की खबरें आए दिन जोर-शोर से देते रहने वाले पत्रकार यह भी करते हैं। एक नमूना देखिए।
लंदन की प्रतिष्ठित डेली मेल में एक हालिया खबर है कि रेड वाइन से ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम में मदद मिल सकती है। "लैबोरेटरी में परीक्षणों से पता चला है कि अंगूर के छिलके में पाया जाने वाला रसायन ज्यादातर मामलों में इस बीमारी को रोक सकता है।"
खबर में कहानी कुछ इस तरह बताई गई है कि किसी खाद्य पदार्थ में कोई खास रसायन होता है जिसके किसी खास गुण को प्रयोगशाला की पेट्री डिश में देखा गया। इस तरह साबित होता है कि वह खाद्य पदार्थ कैंसर को खत्म करता है।
रेड वाइन में रेसवेराट्रोल नाम का रसायन पाया जाता है जो कि अंगूर के छिलके में होता है। पाया गया है कि यह रसायन क्विनोन रिडक्टेज़ नाम के एंजाइम की सक्रियता को बढ़ाता है, जो कि ईस्ट्रोजेन हार्मोन के एक व्युत्पन्न को वापस ईस्ट्रोजन में बदल देता है। देखा गया है कि वह व्युत्पन्न डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और डीएनए को नुकसान होने से उसमें म्यूटेशन हो सकता है और म्यूटेशन से कैंसर होने की संभावना होती है। इस तरह पत्रकारों ने यह साबित कर दिया कि रेड वाइन पीने से कैंसर की रोकथाम होती है।
यह कहानी है, एक अनुसंधान से मिले तथ्यों की एक पत्रकार के नजरिए से ‘खबर’ की। वास्तविक जगत में देखें तो रेड वाइन में उस जरा से रसायन के मुकाबले कई हजार गुना ज्यादा मात्रा में कई और रसायन होते हैं, जिनके किसी व्यक्ति के बड़े से विविधता भरे शरीर पर कई तरह के असर होते हैं। उसका सबसे महत्वपूर्ण रसायन अल्कोहल है, जो टूट कर एसीटेल्डिहाइड बनाता है जो कि खुद डीएनए को बड़ा नुकसान पहुंचाता है। यानी अल्कोहल भयानक रूप से कैंसरकारी है। इसकी छोटी सी मात्रा भी डीएनए को नुकसान पहुंचाने का माद्दा रखती है।
तो, खबर को क्या इस नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए? क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि इस खबर को लिखने-छापने वाला किसी रेड वाइन बनने वाली कंपनी के हाथों बिक गया?
सबसे मजेदार तथ्य तो मैंने यह खोज निकाला कि इंग्लैंड के डेली मेल अखबार के ऑनलाइन एडीशन में यह खबर 30 सितंबर 2011 को आई है। और वहीं के टेलीग्राफ के ऑनलाइन संस्करण में यह सात जुलाई 2008 को ही छप चुकी है। तो क्या पुरानी खबरे दोबारा लिखने के लिए किसी पत्रकारीय आचार-संहिता को देखने की जरूरत नहीं है? पाठक तो विद्वान पत्रकारों के सामने मूर्ख हैं, लेकिन ये पत्रकार खुद इस तरह मूर्ख बन रहे हैं, क्या उन्हें यह पता भी है?
लंदन की प्रतिष्ठित डेली मेल में एक हालिया खबर है कि रेड वाइन से ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम में मदद मिल सकती है। "लैबोरेटरी में परीक्षणों से पता चला है कि अंगूर के छिलके में पाया जाने वाला रसायन ज्यादातर मामलों में इस बीमारी को रोक सकता है।"
खबर में कहानी कुछ इस तरह बताई गई है कि किसी खाद्य पदार्थ में कोई खास रसायन होता है जिसके किसी खास गुण को प्रयोगशाला की पेट्री डिश में देखा गया। इस तरह साबित होता है कि वह खाद्य पदार्थ कैंसर को खत्म करता है।
रेड वाइन में रेसवेराट्रोल नाम का रसायन पाया जाता है जो कि अंगूर के छिलके में होता है। पाया गया है कि यह रसायन क्विनोन रिडक्टेज़ नाम के एंजाइम की सक्रियता को बढ़ाता है, जो कि ईस्ट्रोजेन हार्मोन के एक व्युत्पन्न को वापस ईस्ट्रोजन में बदल देता है। देखा गया है कि वह व्युत्पन्न डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और डीएनए को नुकसान होने से उसमें म्यूटेशन हो सकता है और म्यूटेशन से कैंसर होने की संभावना होती है। इस तरह पत्रकारों ने यह साबित कर दिया कि रेड वाइन पीने से कैंसर की रोकथाम होती है।
यह कहानी है, एक अनुसंधान से मिले तथ्यों की एक पत्रकार के नजरिए से ‘खबर’ की। वास्तविक जगत में देखें तो रेड वाइन में उस जरा से रसायन के मुकाबले कई हजार गुना ज्यादा मात्रा में कई और रसायन होते हैं, जिनके किसी व्यक्ति के बड़े से विविधता भरे शरीर पर कई तरह के असर होते हैं। उसका सबसे महत्वपूर्ण रसायन अल्कोहल है, जो टूट कर एसीटेल्डिहाइड बनाता है जो कि खुद डीएनए को बड़ा नुकसान पहुंचाता है। यानी अल्कोहल भयानक रूप से कैंसरकारी है। इसकी छोटी सी मात्रा भी डीएनए को नुकसान पहुंचाने का माद्दा रखती है।
तो, खबर को क्या इस नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए? क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि इस खबर को लिखने-छापने वाला किसी रेड वाइन बनने वाली कंपनी के हाथों बिक गया?
सबसे मजेदार तथ्य तो मैंने यह खोज निकाला कि इंग्लैंड के डेली मेल अखबार के ऑनलाइन एडीशन में यह खबर 30 सितंबर 2011 को आई है। और वहीं के टेलीग्राफ के ऑनलाइन संस्करण में यह सात जुलाई 2008 को ही छप चुकी है। तो क्या पुरानी खबरे दोबारा लिखने के लिए किसी पत्रकारीय आचार-संहिता को देखने की जरूरत नहीं है? पाठक तो विद्वान पत्रकारों के सामने मूर्ख हैं, लेकिन ये पत्रकार खुद इस तरह मूर्ख बन रहे हैं, क्या उन्हें यह पता भी है?
Tuesday, November 15, 2011
कैंसर अनुसंधान की मीडिया कवरेजः ब्रेक-थ्रू के बाद हार्ट-ब्रेक?
पिछले कुछ दिन मैंने कैंसर के बेहतर इलाज ढूढने के लिए हो रहे अनुसंधानों को पढ़ने और जानने में लगाए। इंटरनेट पर ढेरों वैज्ञानिक सूचनाएं और आंकड़े मिल रहे हैं। हमेशा मिल जाते हैं। कोई नई बात नहीं। पर नई बात एक जो देखी, वह थी विभिन्न ट्रायल्स और अनुसंधानों को विभिन्न चरणों में मिली सफलता की खबरों का ऑनलाइन अखबारों में प्रस्तुतीकरण। कम से कम पांच अनुसंधानों के नतीजों को पिछले 10 या तीस साल का सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू, सबसे बड़ी खोज बताया गया था। ऐसे में मेरे लिए भी तय करना मुश्किल हो रहा था कि वास्तव में किसे सबसे बड़ी खबर मानूं। बल्कि सवाल यह भी था कि किसी भी नतीजे को अभी से अंतिम मानकर ‘सबसे बड़ी’ या छोटी ही सही, सफलता माना भी जाए या नहीं।
दरअसल इलाज के लिए किसी भी दवा या तकनीक को अनुसंधानों में पहले प्रयोगशाला में पेट्रीडिश में जीवित ऊतकों और फिर जीवों पर आजमाया जाता है। यहां प्री-ट्रायल स्टेज के आंकड़ों के आधार पर उन्हें अगले चरण- मनुष्यों पर ट्रायल के लिए इजाजत मिलती है। स्टेज शून्य में कुछेक चुनिंदा मरीजों को बेहद हल्की डोज़ देकर इनके असर को देखा जाता है। इसके बाद पहले चरण के ट्रायल में 20 से 100 स्वस्थ लोगों पर उसे आजमाया जाता है। इसमें मिले नतीजों के अनुसार ही इसे दूसरे चरण के ट्रायल में लिया जाता है जिसमें 100 से 300 स्वस्थ और बीमार लोगों को शामिल किया जाता है।
इसके बाद तीन सौ से तीन हजार लोगों पर इसे आजमाकर नतीजे देखे जाते हैं। इन सभी चरणों में जाने से पहले तकनीक को कई तरह की मंजूरियों के रोड़े पार करने पड़ते हैं। इसमें भी सफल होने के बाद ही किसी दवा या थेरेपी को आम क्लीनिकल व्यवहार के लिए मंजूरी मिल पाती है। इस पूरी प्रक्रिया में पैसे तो लगते ही हैं, समय भी खूब लगता है। न्यूनतम पांच-सात साल से लेकर दशकों तक। इसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती। दवा की बिक्री शुरू होने के बाद भी इसकी मार्केटिंग पर नजर रखी जाती है। इसके बाद भी उस दवा या तकनीक में सुधार-संशोधन के लिए विभिन्न अनुसंधान जारी रहते हैं।
इस बीच विभिन्न शुरुआती चरणों में मिल रही सफलता को भी भुना लेने के लिए उस परियोजना की प्रायोजक कंपनी उसका खूब प्रचार करती है। वैज्ञानिक भी कई बार अपनी सफलताओं से उत्साहित हो जाते हैं। उधर सनसनीखेज खबरों की ताक में बैठे पत्रकार भी इन महत्वपूर्ण लेकिन निचले स्तर की सफलताओं को अपनी खबरों में बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। मानो ये इलाज बस मरीजों तक पहुंचा ही चाहते हैं। और ये महान ब्रेकथ्रू तो जी एकदम सफल हैं। यह कैंसर को जड़ से मिटा देने वाला वंडर ड्रग है...आदि, इत्यादि। इस बीच वे यह भूल जाते हैं कि इन खबरों को गंभीरता से ले रहे पाठक-दर्शक की समझ का क्या होगा। उनमें से कई इस बीमारी से गुजर रहे होंगे और नाउम्मीद हो चुके होंगे।
लगभग मारक, ज्यादातर लोगों के लिए जानलेवा बीमारी कैंसर के मरीज और उससे जुड़े लोग इन अनुसंधानों को बड़ी उम्मीद से देखते हैं। लैबोरेटरी में जीवों या पेट्री डिश में रखे जीविक ऊतकों पर भी किसी दवा या तकनीक के कारगर होने की खबर जब जोर-शोर से मीडिया में उभारी जाती है तो इन मरीजों को वह दवा या तकनीक जीने की नई रौशनी की तरह दिखाई पड़ती हैं। बेशक, उस अनुसंधान में शामिल मरीजों को तो जीने का एक और मौका मिलने जैसा लगता होगा, लेकिन दूर बैठे देख रहे बाकी लोगों के लिए तो बस एक सपना ही रह जाता है, इस इलाज तक पहुंच पाना।
ऐसे में किसी भी वैज्ञानिक विषय, खास तौर पर लाइलाज-सी या कठिन बीमारियों के नए इलाज के ईजाद की कवरेज के समय पत्रकारों को संयत होकर लिखना जरूरी है ताकि भ्रम न फैलें और पाठक या दर्शक जान सके कि उस इलाज की जमीनी हकीकत क्या है और उसे उससे कितनी उम्मीद रखनी है।
दरअसल इलाज के लिए किसी भी दवा या तकनीक को अनुसंधानों में पहले प्रयोगशाला में पेट्रीडिश में जीवित ऊतकों और फिर जीवों पर आजमाया जाता है। यहां प्री-ट्रायल स्टेज के आंकड़ों के आधार पर उन्हें अगले चरण- मनुष्यों पर ट्रायल के लिए इजाजत मिलती है। स्टेज शून्य में कुछेक चुनिंदा मरीजों को बेहद हल्की डोज़ देकर इनके असर को देखा जाता है। इसके बाद पहले चरण के ट्रायल में 20 से 100 स्वस्थ लोगों पर उसे आजमाया जाता है। इसमें मिले नतीजों के अनुसार ही इसे दूसरे चरण के ट्रायल में लिया जाता है जिसमें 100 से 300 स्वस्थ और बीमार लोगों को शामिल किया जाता है।
इसके बाद तीन सौ से तीन हजार लोगों पर इसे आजमाकर नतीजे देखे जाते हैं। इन सभी चरणों में जाने से पहले तकनीक को कई तरह की मंजूरियों के रोड़े पार करने पड़ते हैं। इसमें भी सफल होने के बाद ही किसी दवा या थेरेपी को आम क्लीनिकल व्यवहार के लिए मंजूरी मिल पाती है। इस पूरी प्रक्रिया में पैसे तो लगते ही हैं, समय भी खूब लगता है। न्यूनतम पांच-सात साल से लेकर दशकों तक। इसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती। दवा की बिक्री शुरू होने के बाद भी इसकी मार्केटिंग पर नजर रखी जाती है। इसके बाद भी उस दवा या तकनीक में सुधार-संशोधन के लिए विभिन्न अनुसंधान जारी रहते हैं।
इस बीच विभिन्न शुरुआती चरणों में मिल रही सफलता को भी भुना लेने के लिए उस परियोजना की प्रायोजक कंपनी उसका खूब प्रचार करती है। वैज्ञानिक भी कई बार अपनी सफलताओं से उत्साहित हो जाते हैं। उधर सनसनीखेज खबरों की ताक में बैठे पत्रकार भी इन महत्वपूर्ण लेकिन निचले स्तर की सफलताओं को अपनी खबरों में बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। मानो ये इलाज बस मरीजों तक पहुंचा ही चाहते हैं। और ये महान ब्रेकथ्रू तो जी एकदम सफल हैं। यह कैंसर को जड़ से मिटा देने वाला वंडर ड्रग है...आदि, इत्यादि। इस बीच वे यह भूल जाते हैं कि इन खबरों को गंभीरता से ले रहे पाठक-दर्शक की समझ का क्या होगा। उनमें से कई इस बीमारी से गुजर रहे होंगे और नाउम्मीद हो चुके होंगे।
लगभग मारक, ज्यादातर लोगों के लिए जानलेवा बीमारी कैंसर के मरीज और उससे जुड़े लोग इन अनुसंधानों को बड़ी उम्मीद से देखते हैं। लैबोरेटरी में जीवों या पेट्री डिश में रखे जीविक ऊतकों पर भी किसी दवा या तकनीक के कारगर होने की खबर जब जोर-शोर से मीडिया में उभारी जाती है तो इन मरीजों को वह दवा या तकनीक जीने की नई रौशनी की तरह दिखाई पड़ती हैं। बेशक, उस अनुसंधान में शामिल मरीजों को तो जीने का एक और मौका मिलने जैसा लगता होगा, लेकिन दूर बैठे देख रहे बाकी लोगों के लिए तो बस एक सपना ही रह जाता है, इस इलाज तक पहुंच पाना।
ऐसे में किसी भी वैज्ञानिक विषय, खास तौर पर लाइलाज-सी या कठिन बीमारियों के नए इलाज के ईजाद की कवरेज के समय पत्रकारों को संयत होकर लिखना जरूरी है ताकि भ्रम न फैलें और पाठक या दर्शक जान सके कि उस इलाज की जमीनी हकीकत क्या है और उसे उससे कितनी उम्मीद रखनी है।
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