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Friday, June 28, 2013

प्राणदात्री और प्राणलेवा कीमोथेरेपी के दिन लदने वाले हैं?

क्या सचमुच दशकों से कैंसर के मरीजों की प्राणदात्री और प्राणलेवा कीमोथेरेपी के दिन लदने वाले हैं?
कैंसर के इलाज की अब तक आजमाई जा रही विधियों में जोर होता है- चाहे कैसे भी हो, कैंसर को खत्म करो। सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी ये तीनों ही बेहद क्रूर प्रक्रियाएं हैं जो कैंसर पर जितना असर करती हैं, शरीर के बाकी स्वस्थ हिस्सों पर भी उतना ही।

अगर इलाज को कैंसर के खिलाफ युद्ध कहें तो इलाज का प्रचलित तरीका कार्पेट बॉम्बिंग है। यानी अंधाधुंध बम बरसाते चलो, हर जगह। दुश्मन जहां भी होगा, मारा जाएगा। जब तक कोई और उपाय न हो, यही तरीका चलने दिया जाए।

लेकिन ताजा खबरें बताती हैं कि अब वैज्ञानिक कार्पेट बॉम्बिंग की जगह टार्गेट बॉम्बिंग तरीके से इलाज खोजने के काफी करीब पहुंच गए हैं। यानी दुश्मन की जगह का पता करो और ठीक उसी जगह बम बरसाओ, स्वस्थ जगहों को नुकसान पहुंचाए बिना।
http://news.yahoo.com/no-more-chemo-doctors-not-far-fetched-094524778.html

हालांकि हर तरह का कैंसर अलग होता है, इसलिए टार्गेटेड थेरेपी करनी हो तो यह हर ट्यूमर की अलग होगी। यानी हर कैंसर के लिए आम तौर पर अलग रिसर्च और टार्गेटेड दवाएं। फिर भी कई प्रकार के कैंसरों, खास तौर पर रक्त कैंसरों के लिए कुछेक टार्गेटेड इलाज सफलता के करीब हैं और वैज्ञानिकों ने इनके सफल परीक्षण भी कर लिए हैं। इससे मरीजों में भी बहुत उम्मीदें बंधी हैं।

अगर ऐसा हो गया, सभी या ज्यादातर कैंसरों के लिए सफल टार्गेटेड थेरेपी खोजी जा सके तो यह मानवता के लिए एक कीमती तोहफा होगा।

मेरा नकारात्मक विचारः पिछले 15 वर्षों से कई  तरह के ब्रेक-थ्रू (http://ranuradha.blogspot.in/2012/01/1.html

http://ranuradha.blogspot.in/2012/01/2.html)

की खबरें पढ़ रही हूं लेकिन अपना इलाज उन्हीं पुरानी पद्यतियों से होता देख रही हूं।। अब, जबकि परंपरागत इलाज की गुंजाइश बाकी नहीं रही तो नई आई दवाओं का ट्रायल एंड एरर मुझ पर भी आजमाया जा रहा है। जमीनी स्तर पर जब उन चमत्कारी, सनसनीखेज़ खबरे और उम्मीदें जगाने वाली दवाओं को अपने ऊपर आजमाने का मौका आया है तो पता चल रहा है कि वास्तव में वे दवाएं चौथे स्टेज के मरीज को तीन से पांच महीने ज्यादा तक लक्षण-मुक्त रख सकती हैं। आखिरी स्टेज के मरीज का कुल जीवन-समय बढ़ाने का कोई दावा इनका नहीं है। ध्यान रहे ये दवाएं आम आदमी की पहुंच के बाहर हैं। हर महीने की इनकी खुराक 50 हज़ार से लेकर दो-ढाई लाख तक कुछ भी हो सकती है। और आम तौर पर यह लंबे समय तक चलने वाला इलाज होता है।)

Saturday, April 13, 2013

लोगों की जिंदगी अहम है या झूठमूठ का पेटेंट?

(साप्ताहिक समाचार पत्रिका 'शुक्रवार' के 16 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित) 

आप इसे पांच रुपए में क्यों नहीं बेचते, एक लाख बीस हज़ार रुपए तो बहुत ज्यादा हैं।- यह सवाल भारत की आम जनता की ओर से उच्चतम न्यायालय ने स्विटजरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस के ग्लीवैक नाम की दवा को भारत में दोबारा पेटेंट दिए जाने के दावे पर सुनवाई के दौरान किया था।

इस दो अप्रैल 2013 को इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने नोवार्टिस के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। नोवार्टिस का दावा था कि कैंसर के खिलाफ काम आने वाली उसकी नई दवा ग्लीवैक (इमैटिनिब मेसिलेट) को भारत में दोबारा पेटेंट मिलना चाहिए जबकि कंपनी के दावे को भारत का पेटेंट अपीली बोर्ड पहले ही खारिज कर चुका था। न्यायालय का कहना था कि यह पुरानी दवा का ही थोड़ा सुधरा हुआ रूप है, और इस आधार पर इसे नई दवा के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय का यह फैसला न सिर्फ अकल्पनीय रूप से महंगी विदेशी जीवनरक्षक दवाओं के भारतीय कंपनियों द्वारा सस्ते विकल्प यानी जेनेरिक दवाएं बनाने को बढ़ावा देने, बल्कि कैंसर एचआईवी/एड्स, हिपेटाइटिस-सी जैसी जानलेवा बीमारियों के इलाज तक गरीबों की पहुंच को बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगा। इस क्रम में अपनी विभिन्न दवाओं के भारत में पेटेंट के लिए लड़ रही अनेक विदेशी कंपनियों का उत्साह जरूर कम हुआ होगा।

ग्लीवैक का मामला-

स्विटजरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस ने 90 के दशक के अंत में इलाज के सहारे लंबे समय तक चलने वाले रक्त कैंसर क्रॉनिक मायसॉयड ल्यूकेमिया के इलाज के लिए ग्लीवैक (इमैटिनिब) दवा विकसित की। 2001 में इसे अमरीकी खाद्य और दवा कार्यालय से मंजूरी मिली और वहां का पेटेंट भी। इसी साल कंपनी ने भारत सहित कई अन्य देशों में भी इस दवा का पेटेंट और बेचने का अधिकार हासिल किया। इसे चमत्कारी कैंसर-रोधी दवा बताया गया जो मारक रक्त कैंसर को लंबे समय तक चलने वाले कैंसर में बदल सकती है। लगातार ली जाने वाली यह दवा कैंसर मरीजों की उम्र 3 से 10 साल तक बढ़ा सकती है। इसकी एक महीने की खुराक का खर्च एक लाख 20 हजार रुपए है, जो ज्यादातर भारतीयों की पहुंच के बाहर है। 

इस बीच सिपला और नैटको जैसी भारतीय कंपनियों ने इसी दवा के सस्ते भारतीय जेनेरिक संस्करण बनाए जिनके दाम ग्लीवैक के दसवें हिस्से से भी कम हैं। वीनेट नाम से इसी दवा की महीने की खुराक की कीमत 10 हज़ार रुपए है तो सिपला ने इसे आठ हज़ार रुपए में बाजार में उतारा। एक अन्य कंपनी इसे मात्र 5720 रुपए में बेचती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का बड़ा फायदा मरीजों के साथ-साथ भारतीय दवा निर्माता कंपनियों को भी हुआ है।

भारत में दवाओं पर अनुसंधान और विकास की स्थिति बेहद खराब है। बाहर की कंपनियां इस स्थिति का फायदा उठा कर अपनी दवाएं इस बड़े और विविधता भरे बाजार में लगातार उतारती रहती हैं। कोई दवा बनाने से लेकर उसे बाजार में उतारने के बीच अनुसंधान, विकास, परीक्षण, स्वीकृति जैसी अनेक प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है जिनमें काफी समय और बेहिसाब धन खर्च होता है। जबकि उन दवाओं को मिले पेटेंट की अवधि सीमित होती है। ऐसे में कंपनी पुराना सिक्का ही फिर-फिर चलाने की कोशिश करती है। हर बार कोई नई दवा विकसित करने के बजाए पेटेंट की हुई दवा में ही कुछ सुधार-संशोधन और उसके लिए नया पेटेंट पाने की कोशिश करती है ताकि बिना ज्यादा समय और धन खर्च किए उसका कारोबार चलता रहे, बढ़ता रहे। 

एवरग्रीनिंग की इस प्रक्रिया में कंपनियां दवा बाजार में अपनी विशिष्ट पेटेंट दवाओं का एकाधिकार बनाए रख कर खूब मुनाफा कमाती हैं। देखा गया है कि कंपनियां अपना पुराना पेटेंट खत्म होने के ठीक पहले नए पेटेंट के दावे दाखिल करने में सक्रिय हो जाती हैं। आंकड़े बताते हैं कि नई दवाओं के पेटेंट पाने वाले 12-13 फीसदी मामले महत्वपूर्ण खोजों के, 40 फीसदी से कम मामले सामान्य इलाज के और 50 फीसदी मामले पहले से उपलब्ध दवाओं के संशोधित संस्करण होते हैं।

ग्लीवैक के मामले में भी कंपनी ने अपनी दवा के पुराने संस्करण में कुछ सुधार किए और बताया कि यह मरीज के शरीर में 30 फीसदी ज्यादा जज़्ब होती है, इससे उसका असर बढ़ जाता है। इस लिहाज से दवा के संशोधित संस्करण को नया पेटेंट मिलना चाहिए। 2006 में दाखिल मामले को पेटेंट अपील बोर्ड ने 2009 में खारिज कर दिया। हालांकि फैसले के कुछ बिंदु कंपनी के हक में थे। इसी आत्मविश्वास पर कंपनी ने सीधे उच्चतम न्यायालय में मामला दाखिल कर दिया।

न्यायालय ने भारतीय पेटेंट संशोधन अधिनियम-2005 की धारा 3 (डी) का हवाला देते हुए दो मुद्दों पर कंपनी के खिलाफ फैसला दिया- (1) यह वास्तव में नई दवा नहीं है (2) पुरानी दवा में किया गया सुधार इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि दवा के असर में गुणात्मक सुधार हो। इस आधार पर यह दवा पेटेंट की हकदार नहीं है।

धारा 3 (डी) के मुताबिक उत्पाद पेटेंट के उपयुक्त नहीं है यदि-
किसी ज्ञात पदार्थ के नए रूप की खोज मात्र, जो उस पदार्थ की ज्ञात क्षमता में वृद्धि में परिणत नहीं होती या ज्ञात पदार्थ के किसी नए गुण या नए उपयोग या ज्ञात पदार्थ, प्रक्रिया, मशीन या उपकरण का मात्र उपयोग, जबकि यह ज्ञात प्रक्रिया नए उत्पाद में परिणत नहीं होती या उसमें कम से कम एक नया क्रियात्मक पदार्थ शामिल नहीं होता।

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने कानून की मूल भावना को कायम रखा और माना कि लोगों का जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार किसी पेटेंट के दावे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह देश में सस्ती दवाओं के हक में बड़ी जीत है। इस फैसले पर नोवार्टिस का कहना है कि देश में नए अनुसंधान-प्रयासों और नई दवाओं के विकास पर बुरा असर पड़ेगा क्योंकि बिक्री से हुए मुनाफे को कंपनी आगे के अनुसंधान कार्य पर खर्च करती है। सोच कर देखा जाए तो अगर यही नए अनुसंधान हैं जिसके लिए कंपनी फंड जुटाना चाहती है, तो क्या भारत जैसे गरीब देश में नई दवा के लिए यह कीमत उचित है? उल्टे, इस फैसले से, यह संभावना बनती है कि अब विदेशी कंपनियां पेटेंट के मामले में संभल कर चलें और वास्तविक अनुसंधान और नई दवाओं की खोज पर जोर दें।

भारत में पेटेंट व्यवस्था-

भारत 2005 से पहले दवाओं का पेटेंट नहीं करता था। 1970 में देश का पहला पेटेंट अधिनियम बना था। इसके तहत खाद्य पदार्थों और रसायनों का पेटेंट नहीं किया जाता था। सिर्फ उनके निर्माण की प्रक्रिया का पेटेंट (प्रोसेस पेटेंट) होता था। पेटेंट की अवधि 5 साल या आवेदन की अवधि से 7 साल- इनमें से जो भी कम हो, होती थी। इस कानून की सरलता का लाभ उठाकर कई दवा कंपनियों ने विदेशी दवाओं के जेनेरिक उत्पाद बनाने शुरू कर दिए। किसी दवा को बनाने की प्रक्रिया में मामूली सा बदलाव लाना आसान है, खास तौर पर जब पता हो कि लक्षित रसायन कौन-सा है। भारतीय दवा कंपनियों की तो चांदी हो गई। 

उन्हें उत्पाद पेटेंट के इस्तेमाल का शुल्क भी नहीं देना पड़ता था, जो कि काफी अधिक होता। दूसरा रास्ता यह था कि कंपनी थोड़ा इंतजार करे और पेटेंट की अवधि खत्म होते ही प्रक्रिया और उत्पाद दोनों का साधिकार उपयोग करे। इससे मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध हो गईं। इनकी कीमतें विदेशी मूल दवाओं से आधी से लेकर दसवें हिस्से तक कम थी।

विश्व व्यापार संगठन के दोहा चक्र में व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकार समझौते (ट्रिप्स) पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत के लिए जरूरी हो गया कि वह अपने दशकों पुराने पेटेंट कानून की धूल झाड़ कर उसे आधुनिक रूप दे। इसी से जन्म हुआ बौद्धिक संपदा अधिनियम-2005 का। इस कानून के तहत नए रसायनों के अलावा सम्मिश्रण दवाओं, दवाएं देने के तरीकों, दवा निर्माण प्रक्रिया आदि का भी पेटेंट किया जाने लगा। यह पेटेंट दवा के आने के 20 साल या उससे ज्यादा समय तक लागू होता है।

ट्रिप्स समझौते में विकासशील देशों के लिए अनिवार्य लाइसेंस का विशेष प्रावधान रखा गया है जिसके तहत जन-स्वास्थ्य की आपात स्थितियों में सरकारें राष्ट्र हित में और गैर-व्यावसायिक कारणों से पेटेंट-प्राप्त दवाओं के सस्ते स्वदेशी संस्करण बनाने की इजाजत दे सकती है। दिलचस्प बात यह है कि भारत से कहीं पहले अमरीका, कनाडा, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड जैसे देशों ने इस प्रावधान को आजमाया। जन-स्वास्थ्य संस्थानों, इस क्षेत्र में काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों और दवा उद्योग की मांगों के दबाव में सरकार ने लंबे इंतजार के बाद इस प्रावधान का उपयोग करना शुरू किया और कई मामलों में सक्रिय रूप से इस प्रावधान के पक्ष में विदेशी कंपनियों के बजाए देसी जेनेरिक दवा उत्पादन को प्राथमिकता देने की शुरुआत की। 

ऐसा पहला फैसला जर्मनी की दवा कंपनी बायर की जिगर गुर्दे और फेफड़ों के कैंसर की दवा नेक्सावार (रासायनिक नाम- सोराफेनिब) और उसकी भारतीय जेनेरिक नकल के मामले में दिया। अनिवार्य लाइसेंस के प्रावधान के तहत सरकार पेटेंट के 3 वर्ष बाद जन-हित में पेटेंट धारक की अनुमति के बिना भी किसी अन्य कंपनी को सस्ती जेनेरिक दवा के उत्पादन की मंजूरी दे सकती है। नेक्सावार की भारत में एक महीने की खुराक की गगनचुंबी कीमत 2 लाख 80 हजार रुपए के मुकाबले नैटको कंपनी ने इसे 8800 रुपए में बाजार में उतार दिया। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने पेटेंट दफ्तर के फैसले को कायम रखा कि नैटको जेनेरिक दवा के उत्पादन और विपणन अधिकार के बदले बायर को सात फीसदी की रॉयल्टी देगी।

इस फैसले के बाद कई विदेशी कंपनियों ने अपनी कई दवाओं के दाम खुद ही कम कर दिए। उधर नैटको के मुकाबले में कई भारतीय दवा कंपनियां आईं और प्रतियोगिता के माहौल में सोराफेनिब दवा की कीमत 6600 रुपए तक गिर गई। ऐसे कई मामले सरकार और न्यायालयों में लंबित हैं और उम्मीद है नोवार्टिस पर ताजा फैसले से इन मामलों को भी दिशा मिलेगी।

जीत जनता की या भारतीय दवा उद्योग की-

पेटेंट अधिकार के संरक्षण के मामले में भारत का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा। इस स्थिति का पूरा फायदा देसी दवा कंपनियों को मिला। लचीले पेटेंट कानूनों के कारण आजादी के बाद से ही कई दवा कंपनियां फलीं-फूलीं और दूसरे विकासशील देशों में भी भारतीय कंपनियों की जेनेरिक दवाएं पहुंचने लगीं। पिछले दशकों में जब अफ्रीका में एचआईवी/एड्स की दवाओं की बहुत कमी थी और ब्रांडेड दवाओं का खर्च उठाना उस गरीब देश के लाखों लोगों के बूते के बाहर था, तब भारत से इसकी जेनेरिक दवाएं निर्यात हुईं। कोई 10 हजार डॉलर सालाना की कीमत वाली मूल दवाओं के बदले भारतीय जेनेरिक विकल्प 150 डॉलर में मिल जाते थे। 

आज भारत का जेनेरिक दवा का कारोबार बहुत बड़ा है। आंकड़ों के अनुसार 80 फीसदी विकासशील विश्व में भारत में बनी जेनेरिक दवाएं पहुंच रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमरीका, अफ्रीका, जापान और योरोप तक भारतीय दवाओं का आयात कर रहे हैं। कैंसर, एचआईवी/एड्स, हेपेटाइटिस-सी, टीबी से लेकर, साधारण बीमारियों तक की सस्ती भारतीय दवाएं विश्व भर में मरीजों के काम आ रही हैं। यूनिसेफ भी विकासशील देशों में मुफ्त बांटने के लिए सबसे ज्यादा दवाएं भारत से ही मंगवाता है।

भारत हर साल 11 अरब डॉलर मूल्य की जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है। मात्रा के हिसाब से विश्व का तीसरा और मूल्य के हिसाब से 14वां सबसे बड़ा दवा उद्योग भारत का है जो जेनेरिक दवाओं के बल-बूते पर ही है। देश के भीतर भी बिकने वाली 90 फीसदी दवाएं जेनेरिक हैं। साफ है कि पेटेंट अधिकारों के प्रति स्वाभाविक अनदेखी ने भारत के जेनेरिक दवा कंपनियों को देश में ही नहीं, दुनिया भर में फैलने और उद्योगपतियों को अरबपति बनने में मदद की है। इस फैसले के बाद और पेटेंट संबंधी कई और मामलों में सरकार के रुख को देखते हुए उनकी आभा में निश्चित रूप से और चमक आएगी।

कैंसर के मामलों में चीन और अमरीका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। सालाना, दुनिया के कुल 7.5 फीसदी मामले भारत में रिपोर्ट किए जा रहे हैं। कोई 10 लाख नए मरीज हर साल जुड़ रहे हैं जिनकी मृत्यु दर सालाना आठ फीसदी है। कैंसर की दवाओं का बाजार दवा उद्योग का सबसे ज्यादा तेजी से उभरते क्षेत्रों में से है। मरीजों की बढ़ती संख्या, नई दवाएं और बेहतर इलाज के तरीके ये सभी इस क्षेत्र में तेज विकास की संभावना की ओर इशारा करते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष की 10 कैंसर-रोधी दवाओं का बाजार में हिस्सा 70 फीसदी तक है और 2009 में इस वर्ग की दवाओं की बिक्री 2,60,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की थी। अनुमान है कि साल 2013 के लिए यह आंकड़ा 3,90,000 करोड़ रुपए के करीब होगा। 
 
कैंसर का इलाज अक्सर लंबा चलता है। नई तकनीकों, दवाओं के कारण अब कैंसर के साथ लंबा जीवन जीने की संभावना बढ़ गई है। इसके मुकाबले आम जन से जुड़े कुछ तथ्यों पर अगर नजर डालें तो देश के 40 फीसदी लोगों की दैनिक आमदनी 60 रुपए से कम है। सेहत पर प्रति व्यक्ति सालाना खर्च 500 रुपए से कम है। इसके अलावा 60 फीसदी स्वास्थ्य-रक्षा का काम निजी सेक्टर के हाथ में है और 70 फीसदी लोग किसी सरकारी या निजी स्वास्थ्य योजना से बाहर हैं, यानि वे अपना मेडीकल का खर्च खुद ही वहन करते हैं। ऐसे में देश का आम आदमी कैंसर के इलाज पर कितना और कब तक खर्च कर पाएगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। कोई जीवन-रक्षा के लिए धन का इंतजाम कर पाता है तो उसमें जमा-पूंजी के अलावा चल-अचल संपत्ति, उधार, दान, रोजगार सभी कुछ शामिल हो जाता है। इसके सीधे असर की जद में पूरा परिवार आता है जो महंगी दवाओं के कुचक्र का शिकार होता है। मध्य वर्ग के लोगों को गरीबी रेखा ने नीचे धकेलने वाला यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है। 

प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टर और निजी अस्पताल ही नहीं, सरकारी तंत्र में भी जेनेरिक की बजाए दवाओं के ब्रांड नाम लिखने का चलन है, जो सीधे-सीधे दवा कंपनियों को मुनाफा दिलाता है, जबकि गरीब मरीज चुनने का विकल्प होते हुए भी विकल्पहीन होता है। कैंसर के मरीज को दोहरी चोट लगती है जब उसे सस्ते विकल्प बताए बिना, उसकी आर्थिक स्थिति को देखे बिना डॉक्टर दवाएं लिख देते हैं। और अक्सर यह अनजाने में नहीं होता। डॉक्टर जानते-बूझते हुए किसी कंपनी या ब्रांड की दवाएं लिखते हैं जिसके बदले कई तरह के प्रलोभन और प्रोत्साहन पाते हैं। मेडिकल क्षेत्र में यह नैतिकता संबंधी सबसे बड़ी बहस और मेडिकल काउंसिल भी इस चलन को रोकने की कोशिश कर रहा है।

इसके तोड़ के रूप में केंद्र सरकार ने एक नीति बनाई है जिसके तहत सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए अनिवार्य होगा कि वे मरीजों के लिए जेनेरिक दवाएं ही लिखें। ऐसा न करने पर सज़ा का भी प्रावधान होगा। इसी योजना में ब्रांडेड दवाएं लिखने की भी सीमा निर्धारित की गई है। ज्यादातर मरीजों को जेनेरिक दवाएं मुफ्त दी जाएंगी। अगले कुछ वर्षों में देश की 50 फीसदी आबादी को इस स्वास्थ्य योजना में शामिल करने की परिकल्पना है।

जेनेरिक दवाओं और सरकारी योजनाओं के आने के बाद भी कैंसर, एड्स/एचआईवी, हिपेटाइटिस-सी जैसी कुछ समय पहले तक लाइलाज मानी जाने वाली लेकिन अब नई दवाओं में उम्मीदें देखने वाली बीमारियों का इलाज आम आदमी तक पहुंच पाएगा, इसकी बहुत उम्मीद नहीं दिखती। हालांकि जेनेरिक दवाएं विदेशी दवाओं के मुकाबले सस्ती हैं लेकिन यह भी आसमान से टपक कर खजूर पर अटकने जैसी स्थिति है क्योंकि इनका मकसद भी कंपनी का मुनाफा ही है। यानी इलाज उतना सस्ता नहीं होगा जितना कि हो सकता है या होना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय द्वारा नोवार्टिस से किया गया सवाल दरअसल चिकित्सा व्यवस्था के बड़े सवाल का एक हिस्सा भर है। घरेलू दवा निर्माता हो या विदेशी, जब तक इस सवाल का जवाब हां में नहीं मिलता, आम मरीज की जीत अधूरी है।
-आर. अनुराधा


Saturday, January 7, 2012

हाल के समय में हुईं कैंसर के इलाज की कुछ महत्वपूर्ण खोजें

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी- त्वचा का कैंसर मेलानोमा तेजी से फैलता है और विकसित अवस्था में इसका इलाज मुश्किल होता है। इसीलिए इस अवस्था में मरीज के जीने की संभावना औसतन 8 से 18 माह ही होती है। अब तक इसका इलाज डाकार्बाज़ाइन नाम की कीमोथेरेपी दवा से ही किया जाता है। यह दवा सीधे ट्यूमर पर हमला करती है। क्योंकि कैंसर की रक्त के जरिए फैलने की प्रवृत्ति होती है इसलिए एक सीमा के बाद दवा असरकारक नहीं रहती। ऐसे में कैंसर विकसित होता रहता है और आखिर जानलेवा साबित होता है। लेकिन न्यू यॉर्क के स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ने विकसित मेलानोमा के मोनोक्लोनल एंटीबॉडी यानी शरीर में ही इस खास कैंसर से निकलने वाले सहयोगी प्रोटीन के खिलाफ बनाई गई एंटीबॉडी से इलाज के लिए डाकार्बाज़ाइन के साथ इपिलिमुमाब नाम के रसायन का इस्तेमाल किया। तुलना करके देखा गया कि जिन मरीजों को सिर्फ डाकार्बाज़ाइन दी गई उनके एक साल तक जीवित रहने की उनकी संभावना 36.3 फीसदी रही जबकि दोनों दवाएं पाने वालों के लिए यह प्रतिशत 50 रहा। इसे पिछले 30 साल में त्वचा के कैंसर की सबसे जबर्दस्त खोज कहा जा रहा है।

एक अन्य शोध में इसी संस्थान की एक और टीम ने डाकार्बाज़ाइन की तुलना में वेमुराफेनिब दवा का इस्तेमाल करके देखा कि यह बी-आरएएफ नामक जीन के कैंसरकारी म्यूटेशन के असर को रोकती है। यह म्यूटेशन त्वचा के कैंसर के करीब आधे ट्यूमरों में मौजूद पाया गया है। बी-आरएएफ जीन एक एंजाइम छोड़ता है, जो ज्यादा सक्रिय होने पर त्वचा की रंजक कोशिकाओं मेलानोसाइट्स के कैंसर की संभावना को बढ़ा देता है। वेमुराफेनिब एक एंजाइम है जो म्यूटेटेड बी-आरएएफ जीन की गतिविधियों पर रोक लगा कर कैंसर बनने को ही रोक देता है। इस इलाज से मरीजों का छह माह जीवित रहने की संभावना 84 फीसदी थी जबकि डाकार्बाज़ाइन लेने वाले समूह की 64 फीसदी। यह इलाज इतना प्रभावी रहा कि इस परीक्षण को बीच में ही रोक दिया गया ताकि सभी मरीजों को इसमें शामिल करके उन्हें भी इस टार्गेटेड इलाज का लाभ दिया जा सके।

एंटी एंजियोजेनिक थेरेपी- इस साल अप्रैल के पहले हफ्ते में खबर आई कि क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट, इंग्लैंड के फार्मेसी स्कूल और अल्माक डिस्कवरी लिमिटेड के वैज्ञानिकों ने ऐसा इलाज खोजा है जिसमें दवा ट्यूमर पर सीधे हमला करने की बजाए उसकी रक्त नलिकाओं की बढ़त को रोक देती है। इस तरह ट्यूमर कोशिकाओं को ऑक्सीजन और पोषण मिलना बंद हो जाता है और वे मर जाती हैं। वैसे तो 1985 से ही वैज्ञानिक जानते थे कि रक्त नलिकाएं ट्यूमर के लिए विशेष आपूर्ति हेतु विकसित हो जाती हैं। लेकिन उन्हें बढ़ने से रोका कैसे जाए, इस सवाल का जवाब उन्हें अब मिल गया है। उम्मीद है कि यह थेरेपी सभी तरह के ठोस ट्यूमरों के लिए असरदार रहेगी। अभी प्राकृतिक प्रोटीन और पेप्टाइड पर आधारित यह एंटी एंजियोजेनिक पद्यति प्रि-क्लीनिकल स्तर से गुजर रही है।

इसी तरह के एक और परीक्षण के बारे में ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के कैंसर थेरैप्यूटिक संस्थान की रिपोर्ट जर्नल कैंसर रिपोर्ट में प्रकाशित हुई है। इसके मुताबिक सूजन, जलन आदि के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑटम क्रोकस के फूल में पाया जाने वाला जहरीला रसायन कोल्चिसिन कैंसर के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि अपने आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपने लिए जगह बनाने के लिए सभी ट्यूमर कुछ एंजाइम पैदा करते हैं। संवर्धित कोल्चिसिन अणु में एर प्रोटीन होता है जिससे यह अक्रिय बना रहता है। लेकिन जब यह प्रोटीन इन एंजाइमों के संपर्क में आता है तो वह नष्ट हो जाता है और कोल्चिसिन सक्रिय हो जाता है। और तब वह ट्यूमर को पोषण देने वाली रक्त नलियों को नष्ट कर देता है और ट्यूमर खत्म हो जता है। इस तरह यह दवा सिर्फ ट्यूमर पर ही असर करती है, स्वस्थ कोशिका पर नहीं।

सीरियल किलर टी-सेल- इसी प्रक्रिया से जुड़ी एक खोज पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने विकसित अवस्था के ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर के इलाज के लिए टी-लिंफोसाइट को जेनेटिकली इंजीनियर किया है। इस प्रयोग में शामिल तीन में से दो मरीज एक साल से ज्यादा समय तक स्वस्थ रहे, उनमें कैंसर लौट कर नहीं आया। हार्वर्ड मेडीकल स्कूल ने कैंसर कोशिकाओं में एक खास रसायन की मौजूदगी को खोजा था, जिसे इस ताजा प्रयोग में निशाना बनाया गया है। कैंसर पर हमला करने वाली कोशिका बनाने के लिए एक वायरस के जीन में बदलाव किए गए ताकि वह ऐसा रसायन बनाए जो ल्यूकेमिया कोशिका से जुड़ जाए और वहां रक्त में मौजूद टी-लिंफोसाइट को उकसाए कि वह कैंसर कोशिकाओं को मार दे। फिर मरीज के शरीर से रक्त निकाल कर उसमें यह वायरस डाल दिया गया। जब संक्रमित खून वापस मरीज के शरीर में डाला गया तो हर इंजीनियर्ड टी-लिंफोसाइट हजार से ज्यादा बार बहुगुणित हुई और कई महीने जिंदा रह कर कैंसर को खत्म कर दिया। इनसे अक्रिय ‘यादगार’ टी-कोशिकाएं भी बनीं, जो कैंसर के दोबारा पनपने पर उसे पहचान कर अपने आप ही उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू देंगी।

आई-बेट 151- इंग्लैंड में ग्लैक्सो स्मिथ क्लीन व कैंसर रिसर्च यूके (क्रुक) ने खोजा कि 2 साल से छोटे बच्चों में एक्यूट ल्यूकेमिया के 80 फीसदी मामलों और वयस्कों में 1-10 फीसदी मामलों में मिक्स्ड लीनिएज ल्यूकेमिया या एमएलएल होता है। एमएलएल जीन एक अन्य जीन के साथ मिल कर फ्यूजन प्रोटीन बनाता है जो कि ल्यूकेमिया बनाने वाले जीन को काम शुरू करने को उकसा देता है। लैब में चूहों की और मानव कोशिकाओं में आई-बेट 151 प्रोटीन से यह प्रक्रिया रोकी जा सकी है। यह थेरेपी अभी परीक्षण के शुरुआती चरण में है।

रेनियम-186 और लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी- क्वींस यूनिवर्सिटी, बेलफास्ट में एडवांस प्रोस्टेट कैंसर के फेस-1 ट्रायल में मरीजों को कीमोथेरेपी के साथ रेडियोएक्टिव रेनियम-186 (Rhenium) दी गई। दूसरा फेज़ 6 माह में शुरू होगा, जिसके नतीजे दो साल में आएंगे। यूसी सांता बारबरा में प्रोस्टेट कैंसर का एक और इलाज खोजा गया। लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक कैंसर कोशिका और स्वस्थ कोशिका में अंतर करती है। इस गुण की जानकारी से स्वस्थ कोशिकाओं को बचाते हुए केवल बीमार कोशिकओँ को नष्ट करने के लिए रेडियोथेरेपी का उपयोग किया गया है।

इन पद्यतियों को बाजार तक आने में अभी बरसों लगेंगे।

कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 2

कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1

कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।
-आर. अनुराधा


किसी कोशिका के भीतर जेनेटिक रसायनों यानी जीनों में अचानक बदलाव आने के कारण उसके अनियंत्रित हो जाने और अपनी तरह की बीमार, अधूरी कोशिकाओं की संख्या बढ़ाते जाने का नाम ही कैंसर है। यह अचानक बदलाव म्यूटेशन कहलाता है। जीनोम की जानकारी के बाद अब वैज्ञानिक ट्यूमर के बजाए उसके बनने की प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, ताकि ट्यूमर की जड़ को ही खत्म किया जा सके। इसी के साथ-साथ काम करती है शरीर में फैल चुकी कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए टार्गेटेड कीमोथेरेपी। इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर वैज्ञानिक हर म्यूटेशन और उसके रासायनिक वातावरण को समझ कर उसी के अनुरूप दवाएं खोजने में जुटे हैं। इस तरह पर्सनलाइज्ड और टार्गेटेड इलाज से एकदम सटीक इलाज तय किया जा सकता है, बिना स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए। इस तरह का इलाज छोटा और सस्ता होगा, मरीज को इलाज की तकलीफ भी नहीं झेलनी होगी। इसलिए सिर्फ ट्यूमर पर फोकस करने की बजाए अब वैज्ञानिक मरीज की रासायनिक बनावट को भी जांच के दायरे में ला रहे हैं।

दूसरी तरफ हमारे बाहरी रासायनिक वातावरण का गहरा असर शरीर के रासायनिक संतुलन पर पड़ता है। रसायनों का यह हमला हमारे जीवन पर बढ़ता जा रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय आयुधों के लिए या लोगों के सामूहिक संहार के लिए बने ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे रसायनों को उद्योगों ने हमारे रोज के इस्तेमाल की चीजों में तब्दील कर दिया। धुलाई, सफाई और सौंदर्यवर्धन से लेकर कीटाणु-जीवाणु, मच्छर-मक्खी और फसलों की खरपतवार के नाश तक के लिए बने उत्पादों में ये जहरीले रसायन भरपूर हैं, जिन्हें हम बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं। इनका इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही कैंसर होने की संभावना भी बढ़ती है। इसी के साथ हमारी जीवनशैली की कमियां भी नत्थी हैं, जो कैंसर को बढ़ावा देती हैं। इस अर्थ में कैंसर कोई ऐसी बीमारी नहीं जो कीटाणुओं से होती है, बल्कि कई कारकों का दुष्परिणाम है जो शरीर के मेटाबॉलिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं और यह बिगड़ाव कैंसर के रूप में सामने आता है। यह दरअसल कैंसर की रोकथाम का एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

इन बाहरी और भीतरी हमलों के खिलाफ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र लगातार काम करता रहता है। जीवन भर हर एक के शरीर में लगातार ‘कैंसर’ कोशिकाएं बनती रहती हैं और उन्हें शरीर नष्ट भी करता रहता है। लेकिन एक सीमा के बाद जब उन्हें रोक पाना प्रतिरक्षा तंत्र के बस में नहीं होता, तब कैंसर बीमारी के रूप में फैलने लगता है, जिसे रोकने के लिए इलाज की जरूरत होती है।

इलाज की इन तकनीकों ने कई तरह के कैंसरों में मरीजों का जीवन बचाया है, या पहले से आसान बनाया है। अमरीका में 1990 से 2007 के बीच कैंसर से मृत्यु दर में पुरुषों में 22 और महिलाओं में 14 फीसदी की कमी आई है। 1975 में आधी संख्या में ही मरीज 5 साल तक जी पाते थे, अब करीब 70 फीसदी मरीजों का जीवन पांच साल तक खिंच जाता है। यह प्रगति महत्वपूर्ण है, पर काफी नहीं। इतना आगे बढ़ पाने के बाद भी हम अभी कैंसर से मुक्ति के उपाय के आस-पास भी नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर साल सवा करोड़ नए कैंसर मरीजों की पहचान होती है और इस साल 75 लाख लोग इस बीमारी से मर जाएंगे। 20 साल में कैंसर से मरने वालों की संख्या सालाना लगभग दोगुनी- 1.2 करोड़ तक हो जाएगी। कैंसर दरअसल बड़ी उम्र की बीमारी है। पुराने होते शरीर की कोशिकाएं भी करोड़ों बार के विभाजन के बाद स्वाभाविक ही, थक जाती हैं, असामान्य होने लगती हैं उनमें बदलाव, म्यूटेशन आने लगते हैं। इसलिए लोगों की उम्र लंबी होने के और बड़ी उम्र के लोगों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

भारत में 25 लाख कैंसर के मरीज हैं और हर साल 8 लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज होते हैं और साढ़े पांच लाख मर भी जाते हैं। इनके अलावा हज़ारों हैं जो कैंसर अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। हमारे यहां 70 फीसदी मामलों में एडवांस स्टेज में ही मरीज इलाज के लिए पहुंच पाता है। तब तक बीमारी काबू के बाहर हो जाती है। आर्थिक स्थिति भी कई बार पूरे इलाज से मरीज को वंचित रखती है और इस तरह बहुमूल्य मानव संसाधन का नुकसान होता है। जो आर्थिक क्षमता रखता है, वह मौजूदा महंगे, लंबे इलाज से बंधा रहता है। इलाज कितना कारगर होगा, वह बच पाएगा या नहीं इसी अनिश्चितता में लगातार भावनात्मक ऊहा-पोह की स्थिति में रहता है। कैंसर व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के लिए भी आर्थिक और भावनात्मक सदमे का कारण है।

अगर पहली या दूसरी अवस्था में ही कैंसर को पहचान कर पूरा इलाज करवाया जाए तो 80 फीसदी तक मरीजों का जीवन बच सकता है जबकि स्टेज तीन या चार के मरीजों के बचने की संभावना 20 फीसदी तक ही होती है।

जो इलाज की तकनीकें और दवाएं मरीज को उपलब्ध हैं, वे भी फिलहाल कैंसर से मुक्ति का तरीका नहीं हैं। कैंसर से मुक्ति का रास्ता लंबा है और इसका भविष्य इन्हीं मौजूदा आजमाइशों की सफलता पर निर्भर करेगा।

कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1

कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।
-आर. अनुराधा


दुनिया की तीन बड़ी हस्तियों का कैंसर की वजह से असमय गुज़र जाना हाल के दिनों में चर्चा का बड़ा विषय रहा। हेवीवेट मुक्केबाजी के विश्व चैंपियन मुहम्मद अली को कई बार पछाड़ने वाले ‘स्मोकिंग’ जो फ्रेज़र को लिवर के कैंसर ने पछाड़ दिया। पर्सनल कंप्यूटर के पितामह और एप्पल कंप्यूटर कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स सात साल तक पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझते हुए आखिर हार गए। इस साल फिजियोलॉजी या मेडीसिन के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले तीन इम्यूनोलॉजिस्ट में से एक प्रो. राल्फ स्टीनमैन की भी सितंबर के अंत में पैंक्रियाटिक कैंसर से मौत हुई।

दिलचस्प बात यह है कि प्रो. स्टीनमैन ने ही 1973 में प्रतिरक्षा प्रणाली की डेंड्रीटिक कोशिकाओं का पता लगाया था जो प्रतिरक्षा तंत्र को संक्रमण और कैंसर के खिलाफ चेताने का काम करती है। उनकी इसी तकनीक के आधार पर 2001 में इमैटिनिब नाम की पहली थेरैप्यूटिक कैंसर वैक्सीन बनाई गई जो कैंसर हो जाने पर उसके इलाज के लिए दी जाती है। इस क्रांतिकारी खोज के बाद से ही कैंसर के लिए कीमोथेरेपी में अनुसंधानों को नई दिशा मिली।

इमैटिनिब जैसी टार्गेटेड दवाओं की खासियत यह है कि ये स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना सीधे कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर उन पर हमला करती हैं और उन्हें खत्म कर देती हैं। जबकि परंपरागत कीमोथेरेपी की दवाएं बीमार और स्वस्थ कोशिकाओं में अंतर किए बिना शरीर की सभी तेजी से बढ़ती कोशिकाओं पर हमला करती चलती हैं। इलाज की इस तकनीक में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हर मरीज और मर्ज की खासियत के मुताबिक खासतौर पर उसी को लक्ष्य करती है। इन डिजाइनर दवाओं का दायरा छोटा लेकिन सटीक होता है। जबकि पहले कुछ ही दवाएं हर प्रकार के कैंसर के इलाज में काम में लाई जाती थीं।

पिछले कुछेक साल में कई तरह के कैंसरों के खिलाफ विभिन्न टार्गेटेड इलाज यानी ‘स्मार्ट बम’ विकसित किए गए। थेरेप्यूटिक वैक्सीन के अलावा ल्यूकेमिया यानी रक्त के कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी, त्वचा के कैंसर मेलानोमा के लिए टार्गेटेड थेरेपी, ठोस कैंसरों के लिए एंटीएंजियोजेनिक यानी ट्यूमर को पोषण पहुंचाने वाली बारीक रक्त नलियों से आपूर्ति रोककर उसे मार देने की थेरेपी का सफल ईजाद किया गया। यहां तक कि जेनेटिक कीमोथेरेपी यानी जीन में हुए कैंसरकारी बदलावों को दवाओं के जरिए उलट देने, प्रतिरोधक तंत्र की कोशिकाओं में जेनेटिक बदलाव करके उन्हें कैंसर को पहचानने और लड़कर उसे खत्म कर देने के लिए प्रशिक्षित करने जैसी नई तकनीकों के प्रयोगों को भी ट्रायल के विभिन्न चरणों में सफलता मिली है।

परंपरागत तरीकों में भी कम रेडिएशन और सरल कीमोथेरेपी से बेहतर प्रभाव पैदा करने जैसे सुधार मरीजों के लिए काफी कारगर सिद्ध हुए हैं। इन खोजों और सफलताओं का सिलसिला लगातार जारी है। इनके असर से चमत्कृत वैज्ञानिक तो यहां तक कहने लगे हैं कि कैंसर भविष्य में डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन जैसी बीमारी हो जाएगी जो पूरी तरह ठीक भले ही न हो पर उसके साथ बेधड़क लंबा जीवन जिया जा सकेगा।

कैंसर के इलाज की खोज की दिशा में तूफानी रफ्तार से चल रहे अनुसंधानों, परीक्षणों को देखते हुए इसे कैंसर अनुसंधान का स्वर्ण काल कहना शायद गलत न होगा, जैसा कि कैंसर रिसर्च यूके के हरपाल कुमार भी कहते हैं। दुनिया भर में इस समय कैंसर के इलाज की सैकड़ों नई पद्यतियों के परीक्षण चल रहे हैं। अकेले अमेरिका में ही कैंसर के इलाज के लिए वैक्सीनों के कोई साढ़े चार सौ क्लीनिकल ट्रायल इस समय विभिन्न स्तरों पर चल रहे हैं। कैंसर से बचाव की वैक्सीन के भी अनेक ट्रायल विभिन्न अनुसंधान संस्थानों और अस्पतालों में जारी हैं। इनमें से कुछेक ही सफल होते हैं। जो असफल होते हैं, वे भी कैंसर के डेटाबैंक में महत्वपूर्ण जानकारियां जोड़ते हैं। वैज्ञानिकों के पास अब पहले से ज्यादा दवाएं और ज्यादा असरदार विकल्प मौजूद हैं।

इतनी उम्मीदों के बाद भी तथ्य यह है कि कैंसर ज्यादातर लोगों की जिंदगियों पर भारी है। कैंसर का टार्गेटेड इलाज उपलब्ध होने और वैज्ञानिकों द्वारा उनकी सफलताओं के दावों के बाद भी स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन तक को इस बीमारी के आगे झुकना पड़ा। टार्गेटेड थेरेपी खोज लेने वाला वैज्ञानिक कैंसर होने का पता लगने के चार साल में भी अपने लिए कैंसर का सटीक इलाज नहीं खोज पाया।

लैबोरेटरी के नियंत्रित माहौल में इलाज के सफल उदाहरण अगर वास्तविकता की जमीन पर खड़े नहीं हो पा रहे हैं तो आखिर कसर कहां छूट रही है। क्या कैंसर के इलाज से बंधी उम्मीदें अवास्तविक हैं? एक हद तक। लैब में मिली किसी शुरुआती सफलता को प्रायोजक कंपनी अपने फायदे के लिए खूब प्रचारित करती है। चूंकि यह बीमारी जानलेवा और सनसनीखेज़ मानी जाती है, इसलिए मीडिया भी इसके इलाज की छोटी खबरों को बड़ा बनाकर पेश करता है। और आम आदमी समझता है कि इस मारक बीमारी का पक्का इलाज उसके बेद करीब है। अनुसंधानकर्ता भी कभी-कभार अतिउत्साह में अपनी खोजों को कैंसर का अंतिम इलाज मान बैठते हैं। जबकि परिपक्व अनुसंधानकर्ता समझते हैं कि कैंसर के कारणों की बहुलता के कारण उसके इलाज की पद्यति तय कर पाना सहज नहीं है। फिर भी कैंसर के इलाज ढूंढने के कई रास्ते बड़ी उम्मीदों से भरे हैं।

40 साल पहले 1971 में अमरीका में नैशनल कैंसर एक्ट 1971 बना था जिसमें कैंसर रिसर्च के लिए सरकारी फंडिंग का भी वादा था। पिछले कुछ वर्षों में अमरीका के नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का सालाना बजट करीब 5 अरब डॉलर का रहा है। इन अनुसंधानों से कैंसर के बारे में काफी कुछ पता चला है। यह एक बीमारी नहीं बल्कि सैकड़ों किस्म की बीमारियां हैं। अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ कैंसर रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर 200 से ज्यादा प्रकार की बीमारियां हैं, जिनमें हर एक के कारण और इलाज में थोड़ा-थोड़ा अंतर है। इस जानकारी में ही इस सवाल का आधा जबाव शामिल है कि इतने वर्षों बाद भी क्यों कैंसर का इलाज नहीं ढूंढा जा पाया। दरअसल कैंसर का कोई एक इलाज होगा, इसमें संदेह है। बल्कि ज्यादा संभावना यह है कि जिस तरह कई वायरल बीमारियों के अलग-अलग टीके लगाए जाते हैं, उसी तरह हर कैंसर का इलाज अलग तरह से होगा जो मरीज की और कैंसर की रासायनिक विशेषताओं के आधार पर डिजाइन किया जाएगा।

किसी भी बीमारी के इलाज के लिए प्रयोगशाला में मिली सफलता को बाजार तक आने के पहले लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इन पद्यतियों को कई स्वीकृतियों के बाद पहले जीवों पर, फिर कुछ चुनिंदा मरीजों पर, और फिर बड़ी संख्या में मरीजों पर आजमाया जाता है। इनके नतीजों के आधार पर ही किसी तकनीक या दवा को इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिलती है। इसमें काफी समय और धन खर्च होता है। किसी नए इलाज का बाजार तक पहुंचने का सफर एक बड़ी छलांग की बजाए धीमी चाल से ही तय हो पाता है। इस धीमी चाल की वजह से कई इलाज उपलब्ध होने के बावजूद हरेक स्थिति, व्यक्ति पर आजमाये नहीं जा सके हैं, और इसलिए पता नहीं है कि किन मरीजों के लिए वे कारगर होंगे या फिर उनका बेहतरीन इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।

प्रयोगशाला से सफल होकर बाहर आए कई टार्गेटेड इलाज कुछेक वर्षों से कैंसर के मरीजों के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ ही प्रकार के कैंसरों के लिए। स्तन कैंसर के लिए हरसेप्टिन विश्व भर में उपलब्ध है। स्तन कैंसर के सौ में से 20 से 30 मरीजों में कैंसर कोशिकाएं बहुत ज्यादा हर-2 प्रोटीन पैदा करती हैं। इसे हर-2 पॉजिटिव कैंसर कहा जाता है। हर-2 कैंसर की सतह पर पाया जाने वाला प्रोटीन है जो कैंसर को बढ़ने का संकेत करता है और ट्यूमर बढ़ता जाता है। इसी प्रोटीन से कैंसर के प्रकार की पहचान करके हरसेप्टिन नाम की टार्गेटेड कीमोथेरेपी, सामान्य कीमोथेरेपी के साथ दी जाती है। हरसेप्टिन हर-2 प्रोटीन को ब्लॉक कर देती है जिससे कैंसर कोशिकाओं को बढ़ोत्तरी का इशारा नहीं मिलता और वे नष्ट हो जाती हैं। इस इलाज का असर अभूतपूर्व रहा है और कई बार सामान्य कीमो करा चुके, हार चुके मरीज भी स्वस्थ हो गए। इमैटिनिब मैसिलेट या ग्लीवैक भी क्रॉनिक मायलॉयड ल्यूकेमिया के लिए टार्गेटेड थेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा है।

स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन दोनों ही पैंक्रियास के कैंसर से पीड़ित थे जिसमें सिर्फ 4 फीसदी मरीज ही पांच साल तक जी पाते हैं और ज्यादातर मरीजों का जीवन एक साल के भीतर ही सिमट जाता है। ऐसे में दोनों कैंसर का पता लगने के बाद सात या चार साल तक जी पाए तो इसमें टार्गेटेड इलाज की नई तकनीकों का भी बड़ा हाथ रहा है। कैंसर के इलाज में पूरी सफलता या कैंसर के साथ जीवन लंबा हो पाने के दो मुख्य कारक हैं – मानव जीनोम की मैपिंग जो 2001 में पूरी हो चुकी है, और जीवन शैली जैसे सरल कारकों के कैंसर होने में योगदान की जानकारी।

(...जारी)

Wednesday, November 16, 2011

विज्ञान या स्वास्थ पत्रकार को क्या नहीं करना चाहिए कैंसर की रिपोर्टिंग या तमाशा

कैंसर ब्रेक-थ्रू की खबरें आए दिन जोर-शोर से देते रहने वाले पत्रकार यह भी करते हैं। एक नमूना देखिए।

लंदन की प्रतिष्ठित डेली मेल में एक हालिया खबर है कि रेड वाइन से ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम में मदद मिल सकती है। "लैबोरेटरी में परीक्षणों से पता चला है कि अंगूर के छिलके में पाया जाने वाला रसायन ज्यादातर मामलों में इस बीमारी को रोक सकता है।"

खबर में कहानी कुछ इस तरह बताई गई है कि किसी खाद्य पदार्थ में कोई खास रसायन होता है जिसके किसी खास गुण को प्रयोगशाला की पेट्री डिश में देखा गया। इस तरह साबित होता है कि वह खाद्य पदार्थ कैंसर को खत्म करता है।

रेड वाइन में रेसवेराट्रोल नाम का रसायन पाया जाता है जो कि अंगूर के छिलके में होता है। पाया गया है कि यह रसायन क्विनोन रिडक्टेज़ नाम के एंजाइम की सक्रियता को बढ़ाता है, जो कि ईस्ट्रोजेन हार्मोन के एक व्युत्पन्न को वापस ईस्ट्रोजन में बदल देता है। देखा गया है कि वह व्युत्पन्न डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और डीएनए को नुकसान होने से उसमें म्यूटेशन हो सकता है और म्यूटेशन से कैंसर होने की संभावना होती है। इस तरह पत्रकारों ने यह साबित कर दिया कि रेड वाइन पीने से कैंसर की रोकथाम होती है।

यह कहानी है, एक अनुसंधान से मिले तथ्यों की एक पत्रकार के नजरिए से ‘खबर’ की। वास्तविक जगत में देखें तो रेड वाइन में उस जरा से रसायन के मुकाबले कई हजार गुना ज्यादा मात्रा में कई और रसायन होते हैं, जिनके किसी व्यक्ति के बड़े से विविधता भरे शरीर पर कई तरह के असर होते हैं। उसका सबसे महत्वपूर्ण रसायन अल्कोहल है, जो टूट कर एसीटेल्डिहाइड बनाता है जो कि खुद डीएनए को बड़ा नुकसान पहुंचाता है। यानी अल्कोहल भयानक रूप से कैंसरकारी है। इसकी छोटी सी मात्रा भी डीएनए को नुकसान पहुंचाने का माद्दा रखती है।

तो, खबर को क्या इस नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए? क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि इस खबर को लिखने-छापने वाला किसी रेड वाइन बनने वाली कंपनी के हाथों बिक गया?

सबसे मजेदार तथ्य तो मैंने यह खोज निकाला कि इंग्लैंड के डेली मेल अखबार के ऑनलाइन एडीशन में यह खबर 30 सितंबर 2011 को आई है। और वहीं के टेलीग्राफ के ऑनलाइन संस्करण में यह सात जुलाई 2008 को ही छप चुकी है। तो क्या पुरानी खबरे दोबारा लिखने के लिए किसी पत्रकारीय आचार-संहिता को देखने की जरूरत नहीं है? पाठक तो विद्वान पत्रकारों के सामने मूर्ख हैं, लेकिन ये पत्रकार खुद इस तरह मूर्ख बन रहे हैं, क्या उन्हें यह पता भी है?

Tuesday, November 15, 2011

कैंसर अनुसंधान की मीडिया कवरेजः ब्रेक-थ्रू के बाद हार्ट-ब्रेक?

पिछले कुछ दिन मैंने कैंसर के बेहतर इलाज ढूढने के लिए हो रहे अनुसंधानों को पढ़ने और जानने में लगाए। इंटरनेट पर ढेरों वैज्ञानिक सूचनाएं और आंकड़े मिल रहे हैं। हमेशा मिल जाते हैं। कोई नई बात नहीं। पर नई बात एक जो देखी, वह थी विभिन्न ट्रायल्स और अनुसंधानों को विभिन्न चरणों में मिली सफलता की खबरों का ऑनलाइन अखबारों में प्रस्तुतीकरण। कम से कम पांच अनुसंधानों के नतीजों को पिछले 10 या तीस साल का सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू, सबसे बड़ी खोज बताया गया था। ऐसे में मेरे लिए भी तय करना मुश्किल हो रहा था कि वास्तव में किसे सबसे बड़ी खबर मानूं। बल्कि सवाल यह भी था कि किसी भी नतीजे को अभी से अंतिम मानकर ‘सबसे बड़ी’ या छोटी ही सही, सफलता माना भी जाए या नहीं।

दरअसल इलाज के लिए किसी भी दवा या तकनीक को अनुसंधानों में पहले प्रयोगशाला में पेट्रीडिश में जीवित ऊतकों और फिर जीवों पर आजमाया जाता है। यहां प्री-ट्रायल स्टेज के आंकड़ों के आधार पर उन्हें अगले चरण- मनुष्यों पर ट्रायल के लिए इजाजत मिलती है। स्टेज शून्य में कुछेक चुनिंदा मरीजों को बेहद हल्की डोज़ देकर इनके असर को देखा जाता है। इसके बाद पहले चरण के ट्रायल में 20 से 100 स्वस्थ लोगों पर उसे आजमाया जाता है। इसमें मिले नतीजों के अनुसार ही इसे दूसरे चरण के ट्रायल में लिया जाता है जिसमें 100 से 300 स्वस्थ और बीमार लोगों को शामिल किया जाता है।

इसके बाद तीन सौ से तीन हजार लोगों पर इसे आजमाकर नतीजे देखे जाते हैं। इन सभी चरणों में जाने से पहले तकनीक को कई तरह की मंजूरियों के रोड़े पार करने पड़ते हैं। इसमें भी सफल होने के बाद ही किसी दवा या थेरेपी को आम क्लीनिकल व्यवहार के लिए मंजूरी मिल पाती है। इस पूरी प्रक्रिया में पैसे तो लगते ही हैं, समय भी खूब लगता है। न्यूनतम पांच-सात साल से लेकर दशकों तक। इसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती। दवा की बिक्री शुरू होने के बाद भी इसकी मार्केटिंग पर नजर रखी जाती है। इसके बाद भी उस दवा या तकनीक में सुधार-संशोधन के लिए विभिन्न अनुसंधान जारी रहते हैं।

इस बीच विभिन्न शुरुआती चरणों में मिल रही सफलता को भी भुना लेने के लिए उस परियोजना की प्रायोजक कंपनी उसका खूब प्रचार करती है। वैज्ञानिक भी कई बार अपनी सफलताओं से उत्साहित हो जाते हैं। उधर सनसनीखेज खबरों की ताक में बैठे पत्रकार भी इन महत्वपूर्ण लेकिन निचले स्तर की सफलताओं को अपनी खबरों में बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। मानो ये इलाज बस मरीजों तक पहुंचा ही चाहते हैं। और ये महान ब्रेकथ्रू तो जी एकदम सफल हैं। यह कैंसर को जड़ से मिटा देने वाला वंडर ड्रग है...आदि, इत्यादि। इस बीच वे यह भूल जाते हैं कि इन खबरों को गंभीरता से ले रहे पाठक-दर्शक की समझ का क्या होगा। उनमें से कई इस बीमारी से गुजर रहे होंगे और नाउम्मीद हो चुके होंगे।

लगभग मारक, ज्यादातर लोगों के लिए जानलेवा बीमारी कैंसर के मरीज और उससे जुड़े लोग इन अनुसंधानों को बड़ी उम्मीद से देखते हैं। लैबोरेटरी में जीवों या पेट्री डिश में रखे जीविक ऊतकों पर भी किसी दवा या तकनीक के कारगर होने की खबर जब जोर-शोर से मीडिया में उभारी जाती है तो इन मरीजों को वह दवा या तकनीक जीने की नई रौशनी की तरह दिखाई पड़ती हैं। बेशक, उस अनुसंधान में शामिल मरीजों को तो जीने का एक और मौका मिलने जैसा लगता होगा, लेकिन दूर बैठे देख रहे बाकी लोगों के लिए तो बस एक सपना ही रह जाता है, इस इलाज तक पहुंच पाना।

ऐसे में किसी भी वैज्ञानिक विषय, खास तौर पर लाइलाज-सी या कठिन बीमारियों के नए इलाज के ईजाद की कवरेज के समय पत्रकारों को संयत होकर लिखना जरूरी है ताकि भ्रम न फैलें और पाठक या दर्शक जान सके कि उस इलाज की जमीनी हकीकत क्या है और उसे उससे कितनी उम्मीद रखनी है।

Sunday, October 30, 2011

कैंसर रिसर्च फंडिंग और सपोर्ट का फंडाः व्यंग्य की नज़र से

अमरीका के नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का कैंसर अनुसंधान पर सालाना बजट कोई 5 अरब डॉलर का है। इसके अलावा सूज़न के. कोमेन फॉर क्योर नाम की संस्था हर साल अनेक लोगों और एजेंसियों को लाखों डॉलर देती है ताकि स्तन कैंसर का इलाज ढ़ूंढा जा सके। बीसियों साल से दुनिया भर की लैबोरेटरीज़ में ये रिसर्च चल रहे हैं, लेकिन अभी तक कैंसर के इलाज के नाम पर 99 फीसदी वही इलाज हैं जो 20 साल पहले थे, थोड़े-बहुत फाइन-ट्यूनिंग के साथ। मरीज को इस रिसर्च का कुछ भी हिस्सा नहीं मिला है। इसके पीछे क्या पॉलिटिक्स हैं, भ्रष्टाचार है? न उसका इलाज का खर्च कम हुआ, न कैंसर से बचाव और न ही इलाज की सफलता का भरोसा।

इन कार्टूनों से कुछ समझ सकें तो बताएं।



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