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Saturday, January 7, 2012

कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 2

कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1

कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।
-आर. अनुराधा


किसी कोशिका के भीतर जेनेटिक रसायनों यानी जीनों में अचानक बदलाव आने के कारण उसके अनियंत्रित हो जाने और अपनी तरह की बीमार, अधूरी कोशिकाओं की संख्या बढ़ाते जाने का नाम ही कैंसर है। यह अचानक बदलाव म्यूटेशन कहलाता है। जीनोम की जानकारी के बाद अब वैज्ञानिक ट्यूमर के बजाए उसके बनने की प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, ताकि ट्यूमर की जड़ को ही खत्म किया जा सके। इसी के साथ-साथ काम करती है शरीर में फैल चुकी कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए टार्गेटेड कीमोथेरेपी। इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर वैज्ञानिक हर म्यूटेशन और उसके रासायनिक वातावरण को समझ कर उसी के अनुरूप दवाएं खोजने में जुटे हैं। इस तरह पर्सनलाइज्ड और टार्गेटेड इलाज से एकदम सटीक इलाज तय किया जा सकता है, बिना स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए। इस तरह का इलाज छोटा और सस्ता होगा, मरीज को इलाज की तकलीफ भी नहीं झेलनी होगी। इसलिए सिर्फ ट्यूमर पर फोकस करने की बजाए अब वैज्ञानिक मरीज की रासायनिक बनावट को भी जांच के दायरे में ला रहे हैं।

दूसरी तरफ हमारे बाहरी रासायनिक वातावरण का गहरा असर शरीर के रासायनिक संतुलन पर पड़ता है। रसायनों का यह हमला हमारे जीवन पर बढ़ता जा रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय आयुधों के लिए या लोगों के सामूहिक संहार के लिए बने ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे रसायनों को उद्योगों ने हमारे रोज के इस्तेमाल की चीजों में तब्दील कर दिया। धुलाई, सफाई और सौंदर्यवर्धन से लेकर कीटाणु-जीवाणु, मच्छर-मक्खी और फसलों की खरपतवार के नाश तक के लिए बने उत्पादों में ये जहरीले रसायन भरपूर हैं, जिन्हें हम बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं। इनका इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही कैंसर होने की संभावना भी बढ़ती है। इसी के साथ हमारी जीवनशैली की कमियां भी नत्थी हैं, जो कैंसर को बढ़ावा देती हैं। इस अर्थ में कैंसर कोई ऐसी बीमारी नहीं जो कीटाणुओं से होती है, बल्कि कई कारकों का दुष्परिणाम है जो शरीर के मेटाबॉलिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं और यह बिगड़ाव कैंसर के रूप में सामने आता है। यह दरअसल कैंसर की रोकथाम का एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

इन बाहरी और भीतरी हमलों के खिलाफ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र लगातार काम करता रहता है। जीवन भर हर एक के शरीर में लगातार ‘कैंसर’ कोशिकाएं बनती रहती हैं और उन्हें शरीर नष्ट भी करता रहता है। लेकिन एक सीमा के बाद जब उन्हें रोक पाना प्रतिरक्षा तंत्र के बस में नहीं होता, तब कैंसर बीमारी के रूप में फैलने लगता है, जिसे रोकने के लिए इलाज की जरूरत होती है।

इलाज की इन तकनीकों ने कई तरह के कैंसरों में मरीजों का जीवन बचाया है, या पहले से आसान बनाया है। अमरीका में 1990 से 2007 के बीच कैंसर से मृत्यु दर में पुरुषों में 22 और महिलाओं में 14 फीसदी की कमी आई है। 1975 में आधी संख्या में ही मरीज 5 साल तक जी पाते थे, अब करीब 70 फीसदी मरीजों का जीवन पांच साल तक खिंच जाता है। यह प्रगति महत्वपूर्ण है, पर काफी नहीं। इतना आगे बढ़ पाने के बाद भी हम अभी कैंसर से मुक्ति के उपाय के आस-पास भी नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर साल सवा करोड़ नए कैंसर मरीजों की पहचान होती है और इस साल 75 लाख लोग इस बीमारी से मर जाएंगे। 20 साल में कैंसर से मरने वालों की संख्या सालाना लगभग दोगुनी- 1.2 करोड़ तक हो जाएगी। कैंसर दरअसल बड़ी उम्र की बीमारी है। पुराने होते शरीर की कोशिकाएं भी करोड़ों बार के विभाजन के बाद स्वाभाविक ही, थक जाती हैं, असामान्य होने लगती हैं उनमें बदलाव, म्यूटेशन आने लगते हैं। इसलिए लोगों की उम्र लंबी होने के और बड़ी उम्र के लोगों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

भारत में 25 लाख कैंसर के मरीज हैं और हर साल 8 लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज होते हैं और साढ़े पांच लाख मर भी जाते हैं। इनके अलावा हज़ारों हैं जो कैंसर अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। हमारे यहां 70 फीसदी मामलों में एडवांस स्टेज में ही मरीज इलाज के लिए पहुंच पाता है। तब तक बीमारी काबू के बाहर हो जाती है। आर्थिक स्थिति भी कई बार पूरे इलाज से मरीज को वंचित रखती है और इस तरह बहुमूल्य मानव संसाधन का नुकसान होता है। जो आर्थिक क्षमता रखता है, वह मौजूदा महंगे, लंबे इलाज से बंधा रहता है। इलाज कितना कारगर होगा, वह बच पाएगा या नहीं इसी अनिश्चितता में लगातार भावनात्मक ऊहा-पोह की स्थिति में रहता है। कैंसर व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के लिए भी आर्थिक और भावनात्मक सदमे का कारण है।

अगर पहली या दूसरी अवस्था में ही कैंसर को पहचान कर पूरा इलाज करवाया जाए तो 80 फीसदी तक मरीजों का जीवन बच सकता है जबकि स्टेज तीन या चार के मरीजों के बचने की संभावना 20 फीसदी तक ही होती है।

जो इलाज की तकनीकें और दवाएं मरीज को उपलब्ध हैं, वे भी फिलहाल कैंसर से मुक्ति का तरीका नहीं हैं। कैंसर से मुक्ति का रास्ता लंबा है और इसका भविष्य इन्हीं मौजूदा आजमाइशों की सफलता पर निर्भर करेगा।

Monday, August 17, 2009

‘ऊंची नाक’ के कारण कैंसर से ज्यादा मारे जाते हैं पुरुष?!

कुछ दिनों पहले खबर आई है कि पुरुषों को अपनी अकड़ की कीमत कैंसर से मौत के रुप में भी देनी पड़ रही है। इंग्लैंड में हाल ही में हुए एक अध्ययन के हैरान करने वाले नतीजे निकले हैं। पता लगा है कि स्त्री-पुरुष दोनों को होने वाले कैंसरों से मरने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं के मुकाबले 60 फीसदी ज्यादा होती है। और दिलचस्प बात ये है कि यह अवलोकन बिना किसी अपवाद के इस कैटेगरी के हर तरह के कैंसर पर लागू होता है।

वैज्ञानिकों को इसका कोई बायोलॉजिकल कारण नहीं समझ में आया है।

वैज्ञानकों ने पाया कि पुरुषों के कैंसर से मरने की संभावना महिलाओं से 40 फीसदी तक ज्यादा है। लीड्स मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालय की इस रपोर्ट के लेखकों में से एक प्रो. ऐलन व्हाइट का मानना है कि पुरुषों की जीवनचर्या यानी लाइफ स्टाइल (सिगरेट, मद्यपान, पान मसाला आदि) ही इसका कारण है।

डॉक्टरों का मानना है कि पुरुष जानते हुए भी इस बात को नजरअंदाज करते हैं कि उनके शरीर के बीच के भाग का मोटापा यानी तोंद मोटापे से जुड़े कैंसर और उससे मौत तक होने की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है। एक विचार यह भी है कि पुरुष डाक्टर के पास जाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि शायद इसीलिए समय पर निदान और इलाज न होना भी इसका एक कारण हो सकता है।

2006 और 2007 में कैंसर के मामलों और इसकी वजह से जान गंवा चुके लोगों के बारे में इकट्ठे किए गए आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों में किसी भी प्रकार का कैंसर होने की संभावना महिलाओं के मुकाबले 16 फीसदी ज्यादा है लेकिन उन्हें दोनों में होने वाले कैंसरों के होने की संभावना 60 फीसदी ज्यादा है।

और जैसा कि अक्सर होता है, इन नतीजों पर भी विवाद शुरू हो गया है। इंग्लैंड के जाने-माने कैंसर विशेषज्ञ कैरोल सिकोरा का मानना है कि पुरुषों में कैंसर से ज्यादा मौतों का कारण वहां की राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना (एन एच एस) का पुरुषों के खिलाफ भेद-भाव है। वे कहते हैं कि वहां एन एच एस बरसों से महिलाओं के हित में काम कर रही है जबकि पुरुषों की सेहत की लगातार अनदेखी होती रही है।

लब्बो-लुबाब ये कि इंग्लैंड में पढ़े-लिखे पुरुषों को भी कैंसर के बारे में पढ़ाने-सिखाने की जरूरत महसूस की जा रही है। महज लाइफस्टाइल में सुधार करके ही करीब 50 फीसदी कैंसरों का होना रोका जा सकता है। मगर चिंता की बात ये है कि इन सलाहों पर कोई कान नहीं दे रहा है।

सबक सीखना हो तो- कैंसर को छुपाना, उसके बारे में बात न करना शुतुरमुर्ग का रेत में चोंच छुपाना है। इससे सामने आया खतरा टल नहीं जाता। बल्कि ज्यादा आक्रामक, ताकतवर होकर हमला करता है। कैंसर पर अंग्रेजी में 30 करोड़ से ज्यादा वेबसाइट हैं। कोई यहां पहुंचे तो सही!

Thursday, April 16, 2009

कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-2)

इंटरनेट पर कैंसर के बारे में ढेरों जानकारी बिखरी पड़ी है। इनका सार आपके सामने रखने की कोशिश में यह सीरीज दे रही हूं। यह मेरे नवभारत टाइम्स में 6 अप्रैल को जस्ट-जिंदगी पेज पर छपे लेख पर आधारित है।

कैंसर को बढ़ावा देते हैं ये सब

1. तंबाकू का सेवन

हमारे देश में पुरुषों में 48 फीसदी और महिलाओं में 20 फीसदी कैंसर की इकलौती वजह तंबाकू है। अगर आप बीड़ी-सिगरेट नहीं पीते, लेकिन मजबूरी में उसके धुएं में सांस लेनी पड़ती है तो भी आपको खतरा है। गुटखा (पान मसाला) चाहे तंबाकू वाला हो या बिना तंबाकू वाला, दोनों नुकसान करता है। हां, तंबाकू वाला गुटखा ज्यादा नुकसानदायक है। तंबाकू या पान मसाला चबाने वालों को मुंह का कैंसर ज्यादा होता है।

2. एक-दो पेग से ज्यादा शराब

रोज दो से ज्यादा पेग लेना मुंह, खाने की नली, गले, लिवर और ब्रेस्ट कैंसर को खुला न्योता है। ड्रिंक में अल्कोहल की ज्यादा मात्रा और साथ में तंबाकू का सेवन कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ा देता है। सबसे कम अल्कोहल बियर में, उससे ज्यादा वाइन में और उससे भी ज्यादा अल्कोहल विस्की व रम में होती है। बेस्ट है कि शराब न लें। अगर छोड़ना मुश्किल है तो एक-दो पेग से ज्यादा न लें।

3. ज्यादा चर्बी (फैट) वाला भोजन

तला हुआ खाना या ऊपर से घी-मक्खन लेने से बचना चाहिए। ज्यादा चर्बी खाने वाले लोगों में ब्रेस्ट, प्रॉस्टेट, कोलोन और मलाशय (रेक्टम) के कैंसर ज्यादा होते हैं। अनुमान है कि कैंसर से होनेवाली 30 फीसदी मौतों को सही खानपान के जरिए रोका जा सकता है। प्रेजर्वेटिव वाले प्रॉसेस्ड फूड और तेज आंच पर देर तक पकी चीजें कम खाएं।

4. नॉन-वेज डिशेज

मीट हजम करने में ज्यादा एंजाइम और ज्यादा वक्त लगता है। ज्यादा देर तक बिना पचे भोजन से पेट में एसिड व दूसरे जहरीले रसायन बनते हैं जिनसे कैंसर बढ़ता है। जर्मनी में 11 साल तक चली स्टडी में पाया गया कि वेजिटेरियन लोगों को आम लोगों के मुकाबले कैंसर कम हुआ। सब्जियों में मौजूद विविध विटामिन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और कैंसर सेल्स को बनने से रोकते हैं।

5. बार-बार एक्स-रे कराना

एक्स-रे, सीटी स्कैन आदि की किरणें हमारे शरीर में पहुंचकर सेल्स की रासायनिक गतिविधियां बढ़ा देती हैं जिससे स्किन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अगर आप अलग-अलग डॉक्टरों से इलाज कराते हैं और हर डॉक्टर अलग एक्सरे कराने के लिए कहे, तो डॉक्टर को जरूर बताएं कि आप पहले कितनी बार एक्सरे करा चुके हैं।

6. हार्मोन थेरपी

हार्मोन थेरपी बहुत जरूरी होने पर ही लें। महिलाओं को मीनोपॉज़ के दौरान होनेवाली तकलीफों से बचने के लिए उन्हें इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिन हार्मोन थेरपी दी जाती है। हाल की स्टडीज से पता चला है कि मीनोपॉजल हार्मोन थेरपी से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। हार्मोन थेरपी लेने के पहले इसके खतरों पर जरूर गौर कर लेना चाहिए।

7. लगातार धूप में रहना

सूरज से निकलने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणों से स्किन कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है। धूप में निकलना हो तो पूरी बाजू के कपड़े, कैप, अल्ट्रावॉयलेट किरणें रोकने वाला चश्मा और कम-से-कम 15 एसपीएफ वाले सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना चाहिए। वैसे, हम भारतीयों की स्किन में मेलानिन पिग्मेंट ज्यादा होता है, जो अल्ट्रावॉयलेट किरणों को रोकता है। इससे स्किन को कैंसर का खतरा कम होता है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होता।

8. पेनकिलर दवाएं ज्यादा लेना

पेनकिलर और दूसरी दवाएं खुद ही बेवजह खाते रहने की आदत छोड़ें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं खाना शरीर के लिए घातक हो सकता है।

Sunday, April 5, 2009

आसां है कैंसर के डंक से बचे रहना

कैंसर का नाम सुनते ही कुछ बरसों पहले तक मन में एक डर-सा पैदा हो जाता था। वजह, इस बीमारी का लाइलाज होना। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब न सिर्फ कैंसर का इलाज मुमकिन है, बल्कि ठीक होने के बाद सामान्य जिंदगी भी जी जा सकती है। शर्त यह है कि शुरुआती स्टेज पर बीमारी की पहचान हो जाए और फिर उसका मुकम्मल इलाज कराया जाए। वैसे, अगर कुछ चीजों से बचें और लाइफस्टाइल को सुधार लें तो कैंसर के शिकंजे में आने की आशंका भी काफी कम हो जाती है।

कैंसर से बचाव और जांच के विभिन्न पहलुओं पर मेरी ये रिपोर्ट : आसां है कैंसर के डंक से बचे रहना

साथियो

ये मेरा ताजा लेख है जो आज के नवभारत टाइम्स के जस्ट जिंदगी पेज (पेज 9) पर छपा है। आप भी पढ़ें और अपनी राय दें।

Friday, October 31, 2008

जो पहले ज़ख्म था, नासूर बन गया

इन पृष्ठों पर कैंसर के रिस्क फैक्टर्स यानी कैंसर की संभावना बढ़ाने वाले कारकों के बारे में चर्चा हुई है। लेकिन कैंसर का एक और रिस्क फैक्टर है जिसके बारे में हम लोकोक्तियों/कहावतों में तो कई बार कहते हैं लेकिन उसे भाषा की सुंदरता बढ़ाने वाले अलंकार से ज्यादा नहीं समझते। दिल के किसी पुरानी चोट/दर्द के ठीक होने की सूरत नहीं नज़र आती तो हम अक्सर कहते हैं कि जो पहले ज़ख्म था, अब नासूर बन गया है। नासूर यानी कैंसर। लंबे समय का दिल का जख्म या दुख जब ठीक नहीं होता तो सिर्फ दिल में नहीं शरीर में भी नासूर बना सकता है।

इज़राइल में रिसर्चरों की एक टीम ने 255 स्तन कैंसर की मरीज़ों और 367 स्वस्थ महिलाओं के जीवन में बीमारी शुरू होने के पहले खुशी, आशावादिता, तनाव, अवसाद जैसी स्थितियों के आंकड़े जुटाए। डाक्टरों ने पाया कि जिन महिलाओं के जीवन में एक या एक से ज्यादा बड़े दुख की घटनाएं हुईं उन्हें कैंसर की संभावना ज्यादा थी। जबकि आम तौर पर सामान्य, खुशमिजाज़, आशावादी रहने वाली महिलाओं को स्तन कैंसर कम हुआ।

उनका कहना है कि केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सेंट्रल नर्वस सिस्टम), हार्मोन और रोग प्रतिरक्षा तंत्र आपस में संबंधित हैं और व्यक्ति का व्यवहार और बाहरी कारक इनकी कार्यक्षमता पर असर डालते हैं।

तो, हम बाकी सकारात्मक कोशिशों के साथ साथ- खुश रहने और कैंसर दूर भगाने के इस मंत्र को भी याद रखें ।
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