Monday, April 25, 2011

क्या कहते हैं आंकड़े कैंसर के बारे में


दुनिया में
# हर साल एक करोड़ नए कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं।

# हर साल 60 लाख से ज्यादा कैंसर मरीज जान से हाथ धो बैठते हैं। ये कुल होने वाली मौतों का 12 फीसदी है।

# 2020 तक हर साल नए कैंसर मरीजों की संख्या में डेढ़ करोड़ और सालाना मौतों की संख्या एक करोड़ तक हो जाने का अंदेशा है।

# नैशनल कैंसर कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2000 में विकसित देशों में कैंसर रोगियों की संख्या 54 लाख और विकासशील देशों में 47 लाख थी। 2020 तक ये आंकड़ा उलट कर 60 लाख और 93 लाख हो जाने की संभावना है।

#1950 के मुकाबले आज पेट के कैंसर के मामले आधे रह गए हैं जबकि फेफड़ों के कैंसर के मामले बेतरह बढ़े हैं।

# 1980 के बाद विकसित देशों में धूम्रपान से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूकता की वजह से पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर में कमी आई है जबकि विकासशील देशों में और महिलाओं में यह अब भी बढ़ ही रहा है।

# स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश में आज की तारीख में कोई 20-25 लाख कैंसर के मरीज हैं। हर साल सात लाख से ज्यादा नए मरीज इस लिस्ट में जुड़ रहे हैं और इनमें से तीन लाख हर साल दम तोड़ देते हैं।
देश में हर लाख में 70-90 लोगों को कैंसर होने की आशंका है।

भारत में पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर सबसे आम हैं। इसके बाद पेट और मुंह के कैंसर आते हैं।

महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले सबसे ज्यादा हैं। शहरों में हर 8-10 महिलाओं में से एक को और गांवों में हर 35-40 में एक को स्तन कैंसर होने की संभावना है।

इसके बाद बच्चेदानी के मुंह के (सर्वाइकल) कैंसर का नंबर आता है। कुछेक साल पहले तक महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के मामले सबसे ज्यादा थे।

Sunday, April 24, 2011

बेहतर सेहत कैंसर से लड़ने की ज्यादा ताकत देती है

सेहत पहले से ही अच्छी हो तो कैंसर से होने वाली 65 फीसदी मौतों को रोका जा सकता है


स्तन कैंसर का इलाज कराने वाली महिलाओं के लिए उनकी कैंसर होने के पहले की सेहत भी बहुत मायने रखती है। अमेरिका के After Breast Cancer Pooling Project में शामिल शुरुआती स्तन कैंसर की 9,400 महिलाओं पर कैसर का पता लगने के दिन से अगले सात साल तक लगातार नजर रखी गई। पाया गया कि इनमें से करीब आधी महिलाओं का बॉडी-मास इंडेक्स (बीएमआई) यानी लंबाई और वजन का अनुपात गड़बड़ था। सरल शब्दों में कहें तो वे मोटी थीं, उनका वजन लंबाई और उम्र के अनुपात में ज्यादा था। और इस वजह से उनकी कुल सेहत भी खराब थी। जिन महिलाओं की सेहत इलाज के शुरू में खराब आंकी गई उनमें से 27 फीसदी को दोबारा कैंसर हुआ- उसी जगह या फिर नई जगह पर नया कैंसर। जबकि आम तौर पर शुरुआती स्टेज का कैंसर ज्यादा खतरनाक नहीं माना जाता।
इन महिलाओं की सेहत के आंकड़ों का विश्लेषण करके यह भी पाया गया कि इन कम स्वस्थ महिलाओं की कैंसर या किसी और बीमारी से मरने की संभावना सामान्य वजन वाली महिलाओं की तुलना में 65 फीसदी ज्यादा रही। इनके बारे में पाया गया कि वे कम सक्रिय थीं, इन्हें नींद की समस्या रही, और उच्च रक्तचाप या डाइबिटीज होने की संभावना 50 फीसदी ज्यादा थी और आर्थराइटिस होने की संभावना भी दोगुनी रही। American Association for Cancer Research (AACR), के ओरलैंडो में हुए सम्मेलन में इस अध्ययन को प्रस्तुत किया गया। डॉक्टरों का कहना था कि सिर्फ कैंसर के इलाज के बजाए महिलाओं के कुल स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर उनके सामान्य स्वास्थ्य में पांच फीसदी का भी सुधार होता है तो उनके जीवन की गुणवत्ता और जीवित रहने के अवसरों में खासा सुधार होता है।

न सिर्फ कैंसर के मौके के लिए बल्कि हमेशा हम अपनी सेहत पर ध्यान देते रहें और खान-पान, कसरत आदि पर ध्यान देते रहें तो किसी भी बीमारी से बेहतर लड़ सकेंगे, बल्कि कई बीमारियों को आने के पहले ही जरूर रोक सकेंगे।

Saturday, April 23, 2011

हर हाल में खराब है शराब


हाल के एक रिसर्च से पता चला है कि ‘सीमित मात्रा में’ शराब पीना भी कैंसर को बढ़ावा देता है। और अगर कोई कम ही सही, पर लंबे समय तक नियमित शराब पीता रहा तो उसे कैंसर होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। और यह खतरा उस समय भी रहता है, जबकि उसने अब यह आदत छोड़ दी हो। ब्रिटेन में 10 में से एक पुरुष और 33 में से एक महिला को शराब के कारण कैंसर होने का खतरा होता है। और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। वहां हर साल 13,000 लोगों को शराब पीने के कारण कैंसर हो रहा है, जिसमें स्तन, मुंह, खाने की नली का ऊपरी हिस्सा, स्वर यंत्र, जिगर और मलाशय के कैंसर शामिल हैं। महिलाएं एक यूनिट या 125 मिली लीटर वाइन, आधा पिंट बियर या सिंगल व्हिस्की के बराबर और पुरुष इससे दोगुनी शराब यदि नियमित पीते हैं तो उन्हें अल्कोहल से जुड़े कैंसर का खतरा बताया जाता है।

1992 से चल रहा ईपीआईसी (एपिक)कार्यक्रम पूरे यूरोप में खाने-पीने और कैंसर के संबंधों का अध्ययन करता है। इस अध्ययन में यूरोप में पिछले 10 साल से शराब पीने की आदतों और कैंसर के संबंध पर रिसर्च चल रहा है। इसमें 35 से 70 साल के 3.6 लाख लोग शामिल हुए। रिसर्च से पता चला है कि ज्यादातर लोग कैंसर और शराब के इस मारक संबंध से अनजान हैं। अनेकों का तो मानना है कि शराब पीने से उनकी सेहत बेहतर होती है। जबकि वास्तविकता यह सामने आई है कि एक पेग रोज पीने वाले भी अपने लिए कैंसर को निमंत्रण दे रहे हैं। यह भी भ्रम है कि ठंड में और ठंडे इलाकों में शराब पीना शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है। जबकि यह अध्ययन ऐसे सभी भ्रमों के जाले साफ कर रहा है।

Thursday, April 8, 2010

मरीज न सही, डॉक्टर तो जानें इस मर्ज को!

महानगरों, खासकर दिल्ली में स्तन कैंसर जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, डॉक्टर भी हैरान हैं। कारण कई हैं, जिनमें से एक लाइफ-स्टाइल भी है। सेहतमंद रहने के लिए अच्छा खाने और कसरत करने की नसीहतें तो कई बार दे चुकी हूं। फिलहाल खास तौर, पर दिल्ली की महिलाओं में कैंसर और स्तन से जुड़ी दूसरी समस्याओँ के मूल कारणों की पड़ताल करने की कोशिश कर रही हूं।

सबसे पहली बात है, स्तन की बीमारियों के बारे में जानकारी का पूर्णतः अभाव। स्तनों के बारे में भारतीय महिलाओं में जानकारी का कतई अभाव है। वे इसे बेहद निजी, शर्मिंदा करने वाले अंग के रूप में देखती हैं या फिर पुरुषों को रिझाने और उसी इस्तेमाल के अंग के रूप में सहेजती हैं। कभी हाथ-पैर-सिर में दर्द हो, परेशानी हो तो वह फौरन सबसे चर्चा करती है, पर स्तन में कुछ गंभीर हुआ-सा लगे तो भी किसी से चर्चा तक नहीं करती। मानो वह उसके जीवित शरीर का जीवित हिस्सा हो ही नहीं। स्तनों में गांठ होना, निप्पल से कोई सफेद या रंगीन (पीला, लाल, हरा कोई भी) पानी का निकलना, उसका आकार बेवजह बदलना, दूध पिलाने के समय समस्याएं, स्तनों में सूजन और उनका पक जाना जैसी दसियों समस्याएं महिलाएं आए दिन झेलती हैं, पर बिना किसी से कहे, चुपचाप। यह गलत है। स्कूलों में छोटी उम्र से ही लड़कियों को यह जानकारी मिलनी चाहिए, जो नहीं मिलती। मीडिया में भी कैंसर पर बात करना तो फैशनेबल है, लेकिन स्तन की दूसरी समस्याओं पर बिरले ही कुछ पढ़ने-देखने को मिलता है।

दूसरी समस्या डॉक्टरों से संबंधित है। कोई महिला मरीज सबसे पहले अपने नजदीक के, परिचित डॉक्टर के पास ही पहुंचती है। और उसकी बीमारी का भविष्य उस डॉक्टर की जानकारी और कुशलता पर निर्भर करता है। कई सर्वेक्षणों से बार-बार साबित हो चुका है कि आम फिजीशियन स्तन कैंसर और स्तन की दूसरी बीमारियों के बारे में बहुत कम जानते हैं। आश्चर्य हो सकता है, लेकिन वे भी आम जनता के बराबर ही भ्रम में जीते हैं। वे भी स्तन की गांठ, स्राव, दर्द, बदलाव आदि लक्षणों को नजरअंदाज कर दते हैं या फिर इन्हें संक्रमण जैसी कोई स्थानीय समस्या मानकर एंटीबायोटिक आदि का एक कोर्स तस्कीद कर देते हैं। जबकि इमेजिंग यानी अल्ट्रासाउंड और मेमोग्राफी, बायोप्सी या एफएनएसी जैसी नैदानिक जांचों की तत्काल जरूरत उन्हें महसूस होनी चाहिए। इस तरह बीमारी की पहचान में देर हो जाती है और बीमारी को खतरनाक हद तक बढ़ने का मौका मिल जाता है। दूसरी तरफ कई बार अतिउत्साह में छोटी लड़कियों की भी मेमोग्राफी कर दी जाती है जबकि मेडिकल नियमों के अनुसार 35 साल से कम उम्र की महिला की मेमोग्राफी अपरिहार्य स्थितियों में ही करनी चाहिए।

तीसरी बात है, स्तन कैंसर और स्तन की दूसरी समस्याओं का गलत तरीके से इलाज। यह तथ्य भी डॉक्टरों के बीच सर्वेक्षणों से सामने आया है कि अकुशल और अधूरी जानकारी वाले डॉक्टर स्तन कैंसर, निप्पल से स्राव या स्तन के फोड़े और सूजन का इलाज मनमाने ढंग से कर देते हैं। दूध पिलाने के समय अक्सर महिलाओं को स्तन में सूजन और गांठ यानी मास्टिटिस से जूझना पड़ता है। थोड़े-बहुत घरेलू इलाज के बाद मरीज दर्द से परेशान, डॉक्टर के पास पहुंचता है और डॉक्टर बच्चे का दूध छुड़ा कर स्तन में चीरा लगा देते हैं ताकि जमा हुआ दूध, मवाद निकल जाए। यह तो हुआ डॉक्टर के लिए सरल, मशीनी तरीका, जिसे कोई अंतर्राष्ट्रीय मानक मंजूर नहीं करता। इसके लिए बिना चीरा लगाए सुई से मवाद निकालने और बच्चे को दूध पिलाते रहने का कायदा दुनिया के डॉक्टरों ने मंजूर किया है। लेकिन हमारे यहां कम ही डॉक्टर/सर्जन इसे जानते या मानते हैं।

कई बार बिना मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड, बायोप्सी आदि के टेढ़ा-मेढ़ा चीरा लगाकर स्तन कैंसर तक का इलाज कर दिया जाता है। बाद का इलाज यानी कीमोथेरेपी, रेडियो थेरेपी आदि किए बिना मरीज को घर भेज दिया जाता है। इसका नतीजा होता है, कुछ महीनों या साल भर बाद बीमारी का फिर उभरना और ज्यादा तेजी से, मारक अंदाज में उभरना। इस समय तक बीमारी भीतर ही भीतर कई अंगों तक फैल चुकी होती है। विशेषज्ञ के लिए ऐसे मरीज का इलाज करना टेढ़ी खीर ही होता है। ऐसे में हजारों रुपए खर्च करने के बावजूद मरीज का इलाज कितना कारगर होगा, इसमें शक ही होता है।

चौथी बात, अगर कोई मरीज शुरुआत में ही विशेषज्ञ के पास जाना चाहे तो उसे कहां मिलता है कोई स्तन विशेषज्ञ? उसे पता ही नहीं चल पाता कि कौन सा डॉक्टर स्तन की बीमारियों को ज्यादा समझता है। कारण यह है कि ऐसे विशेषज्ञों की बेहद कमी है। और यह स्थिति गांव-कस्बे में ही नहीं दिल्ली जैसे महानगर में भी है। और अंत में भीड़-भाड़ वाले बड़े सरकारी अस्पताल या फिर बेहिसाब महंगे 5 सितारा अस्पताल में ही उसे गति दिखती है, जिससे वह हमेशा बचने की कोशिश करता रहा था।

अगर कोई मरीज सौभाग्य से विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंच भी गया तो अच्छे डॉक्टर का काम होना चाहिए कि वह मरीज को बीमारी और इलाज के बारे में बताए, उसकी प्रक्रिया समझाए, नतीजे बताए और उसे उपलब्ध विकल्पों के बारे में भी जरूर ही बताए। पर ऐसा कब हो पाता है? डॉक्टर लिख देता है और मरीज बिना जाने-समझे बल्कि पढ़े बिना भी (क्योंकि जटिल हस्तलेख में, जटिल भाषा में पर्चा पढ़ना हरेक के बस का नहीं) बस, रोबोट की तरह उन निर्देशों का पालन करता रहता है।

किसी महंगी दवा का सस्ता विकल्प बाजार में उपलब्ध हो तो भी उसके पास ऐसा करने की चॉइस नहीं होती क्योंकि हमारे देश में दवाओं के जेनेरिक नाम यानी रसायन का नाम लिखने के बजाए ब्रांड का नाम लिखने का चलन है, जो मरीज के खिलाफ जाता है। यह वैसा ही हुआ जैसे किसी को जींस खरीदनी हो तो उसके पास डेनिम, कॉटन या कॉर्डरॉय जैसे नहीं बल्कि लीवाइज, रैंगलर या डीज़ल जैसे विकल्प सामने रख दिए जाएं। ऐसे में जानकारी के अभाव में वह गरीब मरीज हर हाल में महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर होगा क्योंकि बराबर असर वाली सस्ती दवाओं के बारे में उसे कौन बताए? उसे अपनी जिंदगी, अपने इलाज, अपने शरीर के बारे में इलाज, विकल्पों को जानने का हक कोई डॉक्टर, अस्पताल नहीं देता। क्या यह भी मानवाधिकार हनन का मामला नहीं होना चाहिए?

Saturday, December 19, 2009

मिल गई कैंसरों के जीववैज्ञानिक इतिहास की चाभी

फेफड़ों और त्वचा के कैंसरों के जीववैज्ञानिक इतिहास का पता लगा लिया गया है। इंग्लैंड के सेंगर इंस्टीट्यूट में कैंसर जीनोम परियोजना में लगे वैज्ञानिकदल ने इन दोनों प्रकार के कैंसरों के मरीजों की बीमार कोशिकाओं के जीन में पाए जाने वाले अंतरों को ढूंढ लिया है जो कैंसर के कारण पैदा होते हैं। सेंगर इंस्ट्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पहली बार त्वचा और फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की कोशिकाओं के हर म्यूटेशन को पहचाना है जो स्वस्थ कोशिका को कैंसर की स्थिति की ओर धकेलते हैं। यह खोज कैंसर के सटीक इलाज के रास्ते में मील का पत्थर है। अब कैसर कोशिकाओं के साथ-साथ शरीर की तेजी से बढ़ती स्वस्थ कोशिकाओं को भी खत्म कर देने वाली कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की जगह सिर्फ कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को खत्म करने के तरीके ढूंढने में मदद मिलेगी।

वैज्ञानिकों ने 45 साल के मेलानोमा (त्वचा का कैंसर) से पीड़ित और 55 साल के स्मॉल सेल लंग कैंसर से पीड़ित पुरुषों की बीमार कोशिकाओं का उन्हीं की स्वस्थ कोशिकाओं के साथ मिलान किया और दोनों में अंतर ढूंढते गए। इस तरह दोनों प्रकार की कैंसर कोशाओं के जीन में म्यूटेशन (अचानक आए असामान्य बदलाव) को दर्ज किया। यह शोध त्वचा और फेफड़ों के कैंसर पर ही किया गया क्योंकि इन दोनों के होने में पर्यावरण के हाथ का पता लग चुका है। ज्यादातर मेलानोमा बचपन में ज्यादा अल्ट्रावॉयलट किरणों को झेलने से और स्मॉल-सेल लंग कैंसर बीड़ी-सिगरेट के धुएं से होता है।

पाया गया कि लंग कैंसर की कोशिकाओं में 23 हजार तरह के म्यूटेशन होते हैं जो सिर्फ लंग कैंसर पीड़ित कोशाओं में ही होते हैं और स्वस्थ कोशाओं में कभी नहीं पाए जाते। त्वचा के कैंसर, मेलानोमा की बीमार कोशिका में 32 हजार प्रकार के म्यूटेशन पाए गए। लंग कैंसर के सभी म्यूटेशन यानी कोशिकाओँ के जीन में बदलाव सिगरेट में पाए जाने वाले 60 तरह के रसायनों के कारण होते हैं जो डीएनए के साथ जुड़ कर उसे अपना सामान्य कामकाज करने से रोकते हैं और उसकी संरचना को बिगाड़ देते हैं। लंग कैंसर पर शोधदल का नेतृत्व करने वाले डॉ. पीटर कैंपबेल के मुताबिक - “ हर 15 सिगरेटों का धुआं स्वस्थ कोशिका के जीनोम में एक म्यूटेशन लाता हैं। और यह असर पहली सिगरेट से ही शुरू हो जाता है। यह तथ्य भयानक है क्योंकि कई लोग हैं जो हर दिन एक पैकेट सिगरेट का धुंआ पी जाते हैं।”

खास बात यह है कि हमारे देश में मुंह, गले और फेफड़ों के कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यहां मुंह का कैंसर कुल मामलों में से 45 फीसदी से ज्यादा है। इनमें से 90 फीसदी से ज्यादा मामलों में कारण तंबाकू और उससे बने उत्पाद हैं। जबकि योरोप के देशों में जागरूकता के कारण यह आंकड़ा लगातार घट रहा है और 4-5 फीसदी के आस-पास तक पहुंच गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर साल 13 लाख से ज्यादा लोग फेफड़ों के कैंसर से मर जाते हैं।

मानव कोशिकाओं में क्रोमोसोम के 23 जोड़े होते हैं जिनमें जेनेटिक मटीरियल या जनन द्रव्य अक्षरों (A,G,C और T प्रोटीनों ) के तीन अरब जोड़ों के रूप में होता है। ये सभी अक्षर जिगसॉ-पजल के जोड़ों की तरह होते हैं जो किसी खास अक्षर से किसी खास तरफ से ही जुड़ते हैं। इन अक्षरों के जोड़ों में से किसी एक जोड़े में बदलाव आता है तो इसे म्यूटेशन कहा जाता हैं। एक अक्षर का जोड़ा दूसरे अक्षर से जुड़ जाए, या किसी का जोड़ा ही न मिले या किसी के दो जोड़े हो जाएं, किसी परफेक्ट जोड़ी का डुप्लिकेट ही बन जाए या फिर किसी क्रोमोसोम श्रृंखला का कोई हिस्सा टूट जाए या फिर गलत तरीके से जुड़े हो तो यह म्यूटेशन हुआ।
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10 साल तक चलने वाली इस कैंसर जीनोम परियोजना में 50 तरह के कैंसरों के जीनोम और कोशिकाओं के म्यूटेशन का नक्शा बनाने की योजना है। आम कैंसरों के इस स्तर तक खुलासे के बाद इनका इलाज आसान हो जाएगा। हालांकि इलाज के पहले हर मरीज की अलग-अलग जेनेटिक मैपिंग करनी पड़ेगी जिसका फिलहाल खर्च कोई एक लाख डॉलर है, और डेढ़-दो साल बाद इसके करीब 20 हजार डॉलर हो जाने की उम्मीद है। और 10 साल बाद जबकि इस तरह का टारगेटेड इलाज बाजार में आ जाएगा, इस तरह की जेनेटिक मैपिंग भी सस्ती हो जाएगी।

पर कितनी? अगर मान लें कि एक हजार रुपए तक भी सस्ती हो जाए तो भी....क्या किसी भी कीमत पर जिंदगी इतनी सस्ती है कि उस पर कुछेक पैकेट सिगरेट-बिड़ी के खर्च किए जाएं और यह तमाम हो जाए!?? नहीं न!!

सिगरेट-बिड़ी-पान मसाला-तंबाकू पर पैसे, समय, ऊर्जा और आखिरकार पूरी जिंदगी खर्च कर देना कहां की अक्लमंदी है? इन सबसे तो आसान होता है, सिगरेट के साथ-साथ कैंसर की जांच और इलाज के पैसे बचाना और इस तरह अपनी जान को जोखिम में डालने से बचाना। क्या सोच रहे हैं??

Thursday, November 12, 2009

सिगरेट पीना हॉट है या कूल?

वैसे तो धुआं पीना कई जगहों पर मना हो गया है। फिर भी पीने वाले को तो सिगरेट-बिड़ी पीनी ही होती है। भई, जिसको पीना है, वो कहीं भी जाकर अपनी तलब पूरी करेगा। भले ही कड़ी सर्दी में बाहर मैदान में खड़े होना पड़े या फिर कड़ी तपती गर्मी में मैदान में या सड़क पर पेड़ की एक पत्ता छांव भी न मिले। भले ही अपने मित्रों का झुंड छोड़कर अजनबियों के बीच खड़ा होना पड़े या फिर नो-स्मोकिंग जोन के अंदर पकड़े जाने पर इज्जत जाती रहे। और ये सब एक दिन की नहीं, रोज-ब-रोज की बात है।

एक जमाना था जब सिगरेट पीना स्टाइल माना जाता था, शान की निशानी मानी जाती थी। फिल्मों के हीरो स्टाइल से धुआं छोड़ते हुए ‘अदाएं’ दिखाते थे और दर्शक फिदा हुए जाते थे। पर आज समय बदल गया है। अब फिल्मों में सिगरेट पीना टशन नहीं बल्कि टेंशन की निशानी बन गया है। या तो विलेन पिएगा या फिर परेशान-हाल हीरो। कोई स्वस्थ-प्रसन्न चरित्र फिल्मों में धुआं करता कम ही दिखता है।

आज भी सोचिए कोई लती बुजुर्ग धुंए की तलब में अपने दफ्तर से निकल कर दूर चला जाता है, काम-काज, दफ्तर के भीतर के अनुकूलत वातावरण को छोड़कर। छुपकर जिंदगी को धुंए में उड़ाने के लिए। और वहां से लौटता है, एक बदबू का भभका लेकर जिसे हर कोई पास से गुजर कर महसूस कर सकता है, नाक भौं सिकोड़ सकता है।

कोलंबस के जमाने से भी पहले से अमरीकी रेड इंडयन नशे के लिए तंबाकू की पत्तियां जलाकर धुंआ पीना जानते थे। लेकिन उसी अमरीका में मार्लबोरो सिगरेट कंपनी के अभिमानी मालिक की जान उसी की कंपनी की बनाई सिगरेट के धुंए ने ले ली। हमारे देश में पुरुषों के कैंसर के मामलों में 45 फीसदी मुंह, श्वास नली या फेफड़ों का कैंसर होता है। इनमें 95 फीसदी बीमारी का कारण तंबाकू और धूम्रपान है।

अब सिगरेट से लोगों का तिरस्कार ही मिलता है, और ज्यादा समय होने पर लती होते देर नहीं लगती और लोग उसे निरीह, बीमार समझने लगते हैं। यानी सिगरेट पीने वाला न तो ‘हॉट’ लगता है, और न यह कोई ‘कूल’ अदा है।

इस बारे में आपकी राय क्या है, जरूर बताएं।

नवंबर फेफड़ों के कैंसर की जागरूकता का महीना है।

Saturday, November 7, 2009

सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन कितनी कारगर होगी?

दिल्ली में कई सरकार और गैर-सरकारी अस्पतालों में कैंसर विभाग या महिला रोग और प्रसूती विभाग की दीवारों पर सर्वाइकल कैंसर को रोकने की वैक्सीन के पोस्टर लगे मिल जाते हैं जो कि एक कंपनी के अपने उत्पाद का विज्ञापन है। इसमें एक 22-25 साल की महिला इस वैक्सीन को लगवाने की वकालत कर रही है जिससे सर्वाइकल कैंसर को रोका जा सकता है।

मेरी एक परिचता ने भी इस बारे में मुझसे चर्चा की। उसे लंबे समय से गर्भाशय के मुंह में संक्रमण की समस्या रही। गर्भाशय और अंडाशय (ओवरी) से जुड़ी कुछ दूसरी तकलीफें भी रहीं। लंबे समय से लगातार इलाज करवा रही मेरी सखी को किसी क्लीनिक में यही- वैक्सीन वाला विज्ञापन देखने को मिला। इसके बाद से वह बेचैन हो रही है इस वैक्सीन का कोर्स करवाने के लिए। उसे लग रहा है, जैसे बादल वाले किसी दिन बाहर निकलने के छतरी लिए बिना नहीं निकलती, उसी तरह उस वैक्सीन की सुरक्षा से वह अपने को संभावित सर्वाइकल कैंसर से आसानी से बचा सकती है। उसे डर है कि यह कसर पूरी किए बिना उसे खुदा न खास्ता सर्वाइकल कैंसर हो गया तो वह खुद को माफ नहीं कर पाएगी।

इस बारे में कुछ जानने की इच्छा से मैंने थोड़ी-बहुत खोज की तो पता चला कि इंग्लैंड के नैशनल हेल्थ स्कीम के तहत सर्वाइकल कैंसर के लिए वैक्सिनेशन प्लान चल रहा है। वहां राष्ट्रीय वैक्सिनेशन कार्यक्रम के तहत 12 से 18 साल की लड़कियों को यह दवा स्कूलों में मुफ्त दी जा रही है।

वहां बड़ी उम्र की महिलाएं भी इसकी मांग कर रही हैं लेकिन सरकारी फार्मेसी में उनके लिए यह दवा नहीं रखी गई है। और इसका ठोस कारण है। हालांकि बाजार इस बेकार मांग की पूर्ति में भी अपना मुनाफा काटने के लिए तैयार है। दुकानों में प्राइवेट कंपनियों की वैक्सीन 18 से 54 साल की महिलाओं के लिए उपलब्ध है। इस तीन इंजेक्शन वाले इस पूरे कोर्स की कीमत है- 405 पौंड।

महिलाओं को होने वाले सर्विक्स (बच्चेदानी के मुंह) के कैंसर का सबसे बड़ा कारण (80 फीसदी से ज्यादा) ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) है जिसके खिलाफ इस वैक्सीन का इस्तेमाल होने लगा है। वैज्ञानिकों ने कम उम्र की लड़कयों के लिए यह वैक्सीन लंबे दौर में कारगर बताई है। उनकी सिफारिश है कि 12 साल तक की हर लड़की को वैक्सीन दी जाए। जो छूट जाएं उन्हें भी हर हाल में 18 वर्ष तक की उम्र तक वैक्सीन जरूर दे दी जाए।

वैज्ञानकों का मानना है कि इस उम्र के बाद एच पी वी वैक्सीन देने की खर्चीली योजना का ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस, सेक्शुअली फैलने वाला वायरस है और इस उम्र तक लड़कियां सेक्शुअली एक्टिव हो जाती हैं। इसलिए इसके बाद वैक्सीन लगाने का ज्यादा फायदा नहीं, क्योंकि तब तक वायरस का संक्रमण सर्विक्स में पहुंच जाने की काफी संभावना होती है।

कई देशों में इस वैक्सीन के इस्तेमाल के लिए दिशानिर्देश हैं। अमरीका की मेयो क्लीनिक के मुताबिक 11 से 12 वर्ष की उम्र में छह माह के भीतर इस वैक्सीन के तीनों डोज़ दे दिए जाने चाहिए। पहले डोज़ के दो महीने बाद दूसरा और उसके चार महीने बाद तीसरा। अगर कोई महिला उस वक्त वैक्सीन न ले पाए या तीन डोज़ का यह कोर्स बीच में छूट जाए तो 13 से 26 साल की महिलाओं को कैच-अप डोज दिया जा सकता है।

इंग्लैंड में एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 20 से 29 वर्ष की 10 में से एक महिला में एचपीवी संक्रमण है। इन महिलाओं को वैक्सीन का फायदा नहीं होगा क्योंकि संक्रमण हो जाने के बाद वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचने में मदद नहीं करती। इस तरह उनमें इस बीमारी से बचने की झूठी सुरक्षा भावना जागेगी और वे खुद को वैक्सीन से सुरक्षित मान कर सर्वाइकल कैंसर की जांच के लिए होने वाली नियमित पैप-स्मीयर जांच भी नहीं करवाएंगी। नतीजा वैक्सीन के पहले के समय से ज्यादा भयावह होगा। हालांकि सफल वैक्सिनेशन के बाद भी विशेषज्ञ रूटीन जांच के महत्व को कम नहीं आंकते।

वैक्सीन बनने के पहले भी इंग्लैंड में नैशनल हेल्थ स्कीम के तहत सर्वाइकल स्क्रीनिंग कार्यक्रम 1988 से चल रहा है जिसमें क्लीनिकल जांच के अलावा मुख्यतह पैप स्मीयर जांच की जाती है जिससे अब तक वहां एक लाख से ज्यादा महिलाएं मरने से बच सकी हैं।

आंकड़े कहते हैं कि दुनिया की पांच लाख सर्वाइकल कैंसर की मरीजों में से एक लाख सिर्फ भारत में हैं यानी दुनिया की 1/5 सर्वाइकल कैंसर का बोझ भारतीय महिलाएं उठा रही हैं। दक्षिण भारत में यह महिलाओं में सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है। सर्वाइकल कैंसर सीधे तौर पर निर्धनता और अज्ञानता से जुड़ा हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसे रोका जा सकता है, सेक्शुआल हाइजीन और कंडोम जैसे बैरियर गर्भनिरोधक जैसे आसान तरीकों से। लेकिन इसके साथ ही लोगों के सामान्य स्वास्थ्य, रोग-निरोधक शक्ति खान-पान, और जीवन स्तर को भी सुधारने की जरूरत है।

हमारे देश में लड़कियां जल्दी सेक्शुअली एक्टिव हो जाती हैं। इसका कारण कम उम्र में लड़कियों की शादी हो जाना है। इससे उनमें सर्वाइकल कैंसर होने की संभावना भी ज्यादा होती है। ऐसी स्थिति में हमारे देश में भी अगर कोई एचपीवी के खिलाफ वैक्सीनेशन करवाना चाहे तो किशोरावस्था में ही करवाना होगा। ध्यान देने की बात है कि यह वैक्सीन कैंसर को सिर्फ रोक सकती है, संक्रमण हो जाने के बाद इसका इलाज नहीं कर सकती। बड़ी उम्र की महिलाओं के वैक्सीनेशन का कोई फायदा नहीं रह जाता। और इस महंगे वैक्सीनेशन के बाद महिलाएँ झूठे ही सुरक्षित महसूस करके इस तरफ से लापरवाह हो जाएं और पैप स्मीयर जैसी सरल, सुरक्षित जांच भी न करवाएं, यह ज्यादा खतरनाक है।

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी एमएसडी ने अक्टूबर 2008 में सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ भारत में पहली वैक्सीन बाजार में उतारी। इसके साथ ही कई नैतिकता और व्यावहारिक प्रश्नों से जुड़े विवाद भी उठ खड़े हुए। इस वैक्सीन के पुख्ता परीक्षण, साइड इफेक्ट, दूरगामी प्रभावों, नौ-दस साल की कच्ची उम्र में सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ वैक्सीन देने, समाज में इसके बारे में जानकारी की कमी, इसकी कीमत आदि के अलावा इसके टीवी विज्ञापनों में सूचना देने के बजाए लोगों में डर पैदा करने की कोशिश पर काफी बवाल मचा है।

इधर भारत में एक और नामी कंपनी ग्लैक्सोस्मिथक्लीन ने सर्वाइकल कैंसर के लिए वैक्सीन उतारी है जिसे वे 10 से 40 साल की उम्र तक की महिलाओं को दे सकने लायक बताते हैं। इन कंपनियों ने अपनी वैक्सीन के समर्थन में आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (एम्स) और ऑब्स्टेट्रिक एंड गाइनेकोलॉजिकल सोसाइटीज़ जैसे स्वीकृत संस्थानों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों तक से कहलवाया है। हालांकि इनके कथनों से साफ पता चलता है कि सभी उपलब्ध आंकड़े दूसरे, विकसित देशों को हैं और भारत जैसे विकासशील देश में इनका कोई ट्रायल नहीं हुआ है।

भारत में सर्वाइकल कैंसर के लिए वैक्सीन को मान्यता देने, इसकी जरूरत और उपयोगिता पर वैज्ञानिक-सामाजिक जगत में चर्चा जारी है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे यहां सर्वाइकल कैंसर और साफ-सफाई से जुड़ी दूसरी बीमारियों से बचने के लिए कम उम्र में स्कूलों, आंगनबाड़ी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए लड़कियों, और लड़कों को भी, शरीर की साफ-सफाई, संक्रमणों और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उचित पोषण के बारे में बताने की बहुत ज्यादा जरूरत है। चिकित्सा व्यवस्था में महिलाओं की पैप स्मीयर जैसी सरल और सस्ती जांच के जरिए नियमित स्क्रनिंग को सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है ताकि हर साल कोई सवा लाख महिलाएं सर्वाइकल कैंसर और उसके इलाज की पीड़ा को झेलने से बच सकें और 75 हजार महिलाओँ की मौत को रोका जा सके।

इसी विषय पर मेरा एक लेख 'कितनी उपयोगी होगी सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन'- आज के नवभारत टाइम्स में छपा है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन पर लेख है- महिलाओं में फैल रहा है सर्वाइकल कैंसर
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