Thursday, November 27, 2008

शोक/आक्रोश


य़ह आक्रोश, विरोध और दुख का चित्र है। कल/आज की मुंबई की और पिछली तमाम ऐसी घटनाओं के खिलाफ। इस चित्र को अपने ब्लॉग पोस्ट मे भी डालें और साथ दें । इस एक दिन हम सब हिन्दी ब्लॉग पर अपना सम्मिलित आक्रोश व्यक्त करें।

Friday, November 7, 2008

इन्हें ज़रा सांस तो लेने दो!

आज हमारे देश में राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर ये दोहराना सही होगा कि देश में पुरुषों के कैंसर के मामलों में 45 फीसदी मुंह, श्वास नली या फेफड़ों का कैंसर होता है और इनमें 95 फीसदी का कारण तंबाकू और धूम्रपान है। सरकार ने इस साल मई में धूम्रपान पर रोक लगाने के लिए कड़े नियम लागू कर दिए हैं, जिनका पालन, जाहिर है, आम तौर पर नहीं ही होता है।

कुछ तो सांस लीजिए, सिगरेट पीना बंद कीजिए।

यू-ट्यूब पर फेफड़ों को बचाने की धूम्रपान-विरोधी मुहिम का रियलिस्टिक वीडियो।-

Friday, October 31, 2008

जो पहले ज़ख्म था, नासूर बन गया

इन पृष्ठों पर कैंसर के रिस्क फैक्टर्स यानी कैंसर की संभावना बढ़ाने वाले कारकों के बारे में चर्चा हुई है। लेकिन कैंसर का एक और रिस्क फैक्टर है जिसके बारे में हम लोकोक्तियों/कहावतों में तो कई बार कहते हैं लेकिन उसे भाषा की सुंदरता बढ़ाने वाले अलंकार से ज्यादा नहीं समझते। दिल के किसी पुरानी चोट/दर्द के ठीक होने की सूरत नहीं नज़र आती तो हम अक्सर कहते हैं कि जो पहले ज़ख्म था, अब नासूर बन गया है। नासूर यानी कैंसर। लंबे समय का दिल का जख्म या दुख जब ठीक नहीं होता तो सिर्फ दिल में नहीं शरीर में भी नासूर बना सकता है।

इज़राइल में रिसर्चरों की एक टीम ने 255 स्तन कैंसर की मरीज़ों और 367 स्वस्थ महिलाओं के जीवन में बीमारी शुरू होने के पहले खुशी, आशावादिता, तनाव, अवसाद जैसी स्थितियों के आंकड़े जुटाए। डाक्टरों ने पाया कि जिन महिलाओं के जीवन में एक या एक से ज्यादा बड़े दुख की घटनाएं हुईं उन्हें कैंसर की संभावना ज्यादा थी। जबकि आम तौर पर सामान्य, खुशमिजाज़, आशावादी रहने वाली महिलाओं को स्तन कैंसर कम हुआ।

उनका कहना है कि केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सेंट्रल नर्वस सिस्टम), हार्मोन और रोग प्रतिरक्षा तंत्र आपस में संबंधित हैं और व्यक्ति का व्यवहार और बाहरी कारक इनकी कार्यक्षमता पर असर डालते हैं।

तो, हम बाकी सकारात्मक कोशिशों के साथ साथ- खुश रहने और कैंसर दूर भगाने के इस मंत्र को भी याद रखें ।

Wednesday, October 29, 2008

गुलाबी रिबन में पुरुष अजीब नहीं लगते

गुलाबी रिबन के बारे में पिछली पोस्ट क्या आपने आज कुछ गुलाबी पहना है? पर एक टिप्पणी थी – ‘गुलाबी रंग में पुरुष - शायद कुछ अजीब लगे।‘ उसके जवाब में अपने ई-मेल बॉक्स पर मिली यह दिलचस्प और सार्थक कहानी आपके साथ बांट रही हूं।

एक अधेड़ उम्र का सुदर्शन पुरुष कैफे में पहुंचा और शांति से कोने की एक टेबल पर बैठ गया। कुछ देर में उसका ध्यान बगल वाली टेबल पर बैठे कुछ नौजवानों की तरफ गया जो उसे ही देख कर हंस रहे थे। फिर अचानक उसे कुछ ख्याल आया और वह समझ गया कि वे क्यों हंस रहे हैं। उसे याद आया कि उसने कोट के कॉलर वह गुलाबी रिबन टांका था, जिसे देख कर वे नौजवान उसका मज़ाक उड़ा रहे थे।

थोड़ी देर तो वह उनकी ठिठोली को नज़रअंदाज़ करता रहा। फिर रिबन पर अंगुली रखी और उनमें से सबसे उच्श्रृंखल लगने वाले लड़के की तरफ देख कर पूछा- “क्या इस पर हंस रहे हो?”

वह लड़का बोला,- “माफ करें, लेकिन नीले कोट पर यह गुलाबी रिबन बिल्कुल नहीं जंच रहा है।“

उस अधेड़ ने उसे इशारे से बुलाया और पास बैठने का न्यौता दिया। नौजवान असहज होकर उसके पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। उस अधेड़ ने धीमी आवाज़ में कहा- “मैं स्तन कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए, अपनी मां के सम्मान में इसे पहनता हूं।”

“मुझे अफसोस है। क्या स्तन कैंसर ने उनकी जान ले ली थी?”

“नहीं, वह मरी नहीं हैं। लेकिन शैशवकाल में उनके स्तनों से मेरा पोषण हुआ, और लड़कपन में जब भी मैं डर या अकेलापन महसूस करता था तो अपना सिर उन पर रख कर आश्वस्त हो जाता था। मैं उनका शुक्रगुज़ार हूं।”

“अच्छा!।”

“मैं यह रिबन अपनी पत्नी के सम्मान में भी पहनता हूं।”

“उम्मीद है, अब वे भी ठीक हो गई होंगी?”

“हां, उन स्तनों ने 23 साल पहले मेरी प्यारी सी बेटी को पोषित किया, दिलासा दिया। वे हमारे स्नेहिल संबंधों में खुशी का स्रोत रहे हैं। मैं उनका भी आभारी हूं।”

“और आप इसे अपनी बेटी के सम्मान में भी पहनते होंगे?” नौजवान ने उकता कर कहा।

“नहीं। उसके सम्मान में इसे पहनने के लिए बहुत देर हो चुकी है। मेरी बेटी एक माह पहले स्तन कैंसर से मर गई। उसका ख्याल था कि इस कम उम्र में उसे स्तन कैंसर नहीं हो सकता। इसलिए जब एक दिन अचानक उसने गांठ महसूस की तो भी वह चैतन्य नहीं हुई, उसे नज़रअंदाज़ करती रही। उसे लगा कि चूंकि उसे दर्द नहीं होता है, उसलिए चिंता की कोई बात नहीं है।”

इस कहानी से विचलित नौजवान बरबस बोल उठा- “ओह, मुझे बहुत दुख हुआ जानकर।“

अधेड़ बोला- “अब मैं अपनी बेटी की याद में गर्व से यह रिबन लगाता हूं। यह मुझे, दूसरों को इस बारे में सतर्क और जागरूक करने में मदद करता है। अब घर जाकर अपनी पत्नी, मां, बेटी, रिश्तेदारों और मित्रों को इस बारे में बताना।

और यह लो ”- कहते हुए उस अधेड़ ने अपनी कोट की जेब से एक गुलाबी रिबन निकाल कर उसे थमा दिया।

Saturday, October 25, 2008

क्या आपने आज कुछ गुलाबी पहना है?

क्या आपने आज कुछ गुलाबी पहना है? गुलाबी कपड़े, जूते, मोज़े, कड़े, रुमाल, रिबन... कुछ भी। अगर नहीं तो मेरी गुज़ारिश है कि जरूर पहनें। यह स्तन कैंसर का प्रतीक रंग है। आज का दिन गुलाबी पहनने के लिए खास इसलिए है कि, कहते हैं न, जब जागे, तभी सवेरा। जागरूकता के लिए तो कोई भी दिन अच्छा है। आप सोच रहे हैं, कि एक दिन एक खास रंग पहनने से क्या हो जाएगा! तो जनाब, इस लेख को पूरा पढ़ जाइए, आपको जवाब मिल जाएगा।

अक्टूबर का महीना स्तन कैंसर जागरूकता को समर्पित है। अक्टूबर को नैशनल ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाने की शुरुआत अमरीका में हुई। अब इसे कई देशों ने अपना लिया है।

गुलाबी रंगत में व्हाइट हाउस, अक्टूबर 2008





पिंक रिबन का इतिहास

स्तन कैंसर की मरीज सूज़न जी. कोमेन को मौत के करीब पहुंची हालत में देखकर बहन नैंसी जी. ब्रिकनर ने उससे वादा किया कि वह इस बीमारी के बारे में जागरुकता फैलाने की हर कोशिश करेगी। इसी वादे को निभाने के लिए 1982 में ‘सूज़न जी. कोमेन फॉर क्योर’ नाम की संस्था बनी। इसके जरिए नैंसी ने स्तन कैंसर के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। आज यह स्तन कैंसर के मरीजों, विजेताओं और कार्यकर्ताओं का संभवतः दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है।

अक्टूबर 2007- स्तन कैंसर जागरूकता माह, गुलाबी रोशनी में नहाया टोकियो टावर

1991 में इस संस्था ने न्यूयॉर्क में आयोजित कैंसर जागरूकता दौड़ में सहभागियों को प्रतीक के रूप में गुलाबी रिबन बांटे। तब से गुलाबी रिबन दुनिया भर में स्तन कैंसर का प्रतीक चिन्ह बन गया है।




गुलाबी रंगत

सामाजिक संस्थाओं को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में गुलाबी रिबन कामयाब रहा है। इसके नाम पर ‘पिंक रिबन इंटरैशनल’ जैसी संस्थाएं और ‘वियर इट पिंक’ और ‘इन द पिंक’ जैसी स्तन कैंसर से जुड़ी परियोजनाएँ खासा बड़ा काम समाज के लिए कर रही हैं। गुलाबी रिबन के अलावा इस रंग के दूसरे उत्पाद भी इस कैंसर जागरूकता माह में खूब बेचे और खरीदे जाते हैं और इससे तथा दान में मिले धन का इस्तेमाल स्तन कैंसर जागरूकता, इलाज और अनुसंधान के लिए किया जाता है।

स्तन कैंसर पर सार्वजनिक आयोजनों के अलावा एक दिन तय किया जाता है जब संस्था से जुड़े सभी लोग और यहां तक कि उसे प्रायोजित करने वाली कंपनियों के कर्मचारी भी गुलाबी पहनते हैं। इसे ‘पिंक डे’ कहा जाता है।

'पिंक फॉर अक्टोबर' पिंक फॉर अक्टोबर का लोगो

एक और अभियान है जिसके तहत स्तन कैंसर जागरूकता अभियान का समर्थन करने वाले सभी वेबसाइट इस महीने अपने पृष्ठों पर गुलाबी रंग बिखेर देते हैं। (आप भी बिखेर सकते हैं)

अक्टूबर 2006 में मैथ्यू ओलीफैंट का मज़ाक-मज़ाक में बनाया गुलाबी रंग से भरा मज़ाहिया वेबसाइट कैसे स्तन कैंसर जागरूकता अभियान के लिए प्रेरणा बन गया, यह कहानी भी दिलचस्प है।

कैंसर की दवाएं बनाने वाली कंपनियों ने भी आदतन इस चिन्ह को व्यावसायिक फायदे के लिए खूब इस्तेमाल किया है। दरअसल शुरू में गुलाबी रिबन को बड़े पैमाने पर प्रायोजित करने वाली संस्था खुद एक रसायन कंपनी थी, जिसके उत्पाद स्तन कैंसर को बढ़ावा देते हैं। इसी तरह की परिघटनाओं के लिए ‘पिंकवाशिंग’ शब्द निकला है। यानी अपने बुरे कर्मों (ज़हरीले रसायनों का उत्पादन) की कालिख को (कैंसर के उपचार, जागरूकता आदि अभियानों के लिए खुले आम धन दे कर) धोने की कोशिश।

इन आलोचनाओं से परे सोचने की बात यह है कि स्तन और दूसरे कैंसरों के बारे में जानने की जरूरत लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश में आज की तारीख में कोई 20-25 लाख कैंसर के मरीज हैं। हर साल सात लाख से ज्यादा नए मरीज इस लिस्ट में जुड़ रहे हैं और इनमें से तीन लाख हर साल दम तोड़ देते हैं।

स्तन कैंसर की बात करें तो हर साल शहरों में हर 8-10 महिलाओं में से एक को और गांवों में हर 35-40 में एक को स्तन कैंसर होने की संभावना है।


क्या अब तक आप समझ पाए कि मैंने आज के दिन आपसे गुलाबी पहनने की गुज़ारिश क्यों की? जवाब बहुत सरल है। जब आप गुलाबी पहनेंगे तो इस बारे में सोचेंगे भी, क्योंकि आपका गुलाबी पहनना स्वतःस्फूर्त नहीं है, बल्कि ऐसा करने को आपसे कहा गया है। और उसी सोच के दौरान यह भी जानने को उत्सुक होंगे कि आखिर गुलाबी रंग और स्तन कैंसर का क्या रिश्ता है। और इस प्रक्रिया में आप कैंसर के बारे में कुछ नया जानें या नहीं, पर यह आपकी विचार-प्रक्रिया में शामिल जरूर हुआ। है न! बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता अभियान में शामिल होने के लिए शुक्रिया।

Wednesday, October 22, 2008

तानाशाह हिटलर के शुक्रगुज़ार हैं कैंसर के मरीज़

जर्मनी के नाज़ी तानाशाह हिटलर की कैंसर के मरीजों को एक बड़ी देन है। हालांकि वे चले थे बुराई करने, अनेकों के साथ बुरा तो हुआ पर कुछेक का भला भी हो गया। नहीं, ज्यादा पहेलियां बुझाने का मेरा कोई इरादा नहीं है, बस एक कहानी सुनानी है। तो, हिटलर ने यहूदियों को मारने के लिए कई तरीके ईजाद किए। सैकड़ों को एक साथ मारने का उसका एक तरीका था- गैस चेंबर। झुंड-के-झुंड यहूदियों को बड़े-से हॉल में बंद कर देना और उसमें जहरीली गैस छोड़ना, जिसे सूंघ कर सबका काम तमाम हो जाए।

कुछेक बार ऐसा हुआ कि गैस-चेंबरों की जहरीली गैस सूंघने के बाद भी कुछ लोग जिंदा रह पाए और जान बचाकर निकल भागे। उन भागने वालों में कुछ कैंसर के मरीज भी थे। देखा गया कि गैस चेंबर से बचे कैंसर के मरीजों की हालत में अचानक चमत्कारी सुधार होने लगा। बाद में पता लगा कि उन जहरीली गैंसों से उनके शरीर की कैंसर कोशिकाएं नष्ट हो गईं। और इस तरह खोज हुई कैंसर को मारने वाले जहरीले रसायनों की। इन मारक रसायनों का इस्तेमाल कैंसर के मरीजों की जान बचाने के लिए होने लगा।


Auschwitz gas chamber









Aftermath



Inside a gas chamber


ये रसायन यानी कीमोथेरेपी की दवाएं जहरीली तो अब भी उतनी ही हैं, लेकिन अब यह भी पता लग गया है कि सबसे अच्छे परिणाम पाने के लिए वे कितनी मात्रा में और कैसे दी जाएं और उनके बुरे असर कम करने के लिए क्या-क्या किया या न किया जाए।

इस तरह की अब तक सैकड़ों दवाएं खोजी जा चुकी हैं। इनमें से कुछ दवाएं दूसरी एक या दो दवाओं के साथ दिए जाने पर कैंसर के खिलाफ ज्यादा कारगर साबित होती हैं। कीमोथेरेपी की इस पद्यति को कॉम्बिनेशन कीमोथेरेपी कहते हैं।

इन दवाओं का चुनाव कैंसर के प्रकार अवस्था और शरीर के अंग के आधार पर (और हां, हिंदुस्तान में खास तौर पर सरकारी अस्पतालों में पहुंचे गरीब मरीजों के लिए उनकी माली हालत के आधार पर!) किया जाता है। इन्हें मरीज के रक्त-संचार तंत्र में डाला जाता है जहां से यह रक्त नलियों के जरिए पूरे शरीर में फैल जाती हैं।

Sunday, October 19, 2008

थुल-थुल मोटापे से तौबा!

जिराफ कभी मोटा नहीं होता।इसीलिए अव्वल तो उसे कैंसर होता नहीं। और खुदा-न-खास्ता कभी हो भी गया तो उसके बचने के चांसेस काफी मोटे होंगे क्योंकि वह खुद मोटा नहीं होता।

मोटे और थुल-थुल शरीर वाले कैंसर मरीजों की ठीक होने की संभावना कम होती है। यह ताजा नतीजा हाल के एक रिसर्च के बाद सामने आया है। लान्सेट ऑन्कोलॉजी पत्रिका में छपे लेख के मुताबिक वैज्ञानिकों ने पाया कि मोटे लेकिन कमज़ोर मांस-पेशियों वाले लोगों में इलाज के लिए दी जाने वाली कीमोथेरेपी का वितरण पूरे शरीर में आसानी से नहीं हो पाता। इस कारण दवाओं का पूरा फायदा शरीर को नहीं मिल पाता।

मोटे लोगों में भी उपापचय की दर, पेशियों और मांस का अनुपात शरीर के गठन के मुताबिक अलग-अलग होता है। इसलिए उनको दी गई समान कीमोथेरेपी का पूरे शरीर में वितरण और असर होने का समय अलग-अलग हो सकता है। इसलिए इलाज के दौरान शरीर की सक्रियता, खान-पान और मोटापे का असर इलाज के कुल फायदे पर भी पड़ता है।

कनाडा में हुए एक क्लीनिकल ट्रायल में कैंसर के कमजोर मांस-पेशियों वाले मोटे मरीजों (सार्कोपीनिक ओबीज़) पर दवाओं के असर और उनकी ठीक होने की संभावना का अध्ययन किया गया। इसमें 250 मोटे मरीजों को शामिल किया गया , जिनमें से 38 फीसदी सार्कोपीनिक ओबीज़ माने गये।

इस अध्ययन के कुछ नतीजे थे-
• सार्कोपीनिक ओबेसिटी वाले मरीज़ों की मृत्यु दर दूसरे ओबीज़ मरीजों के मुकाबले चार गुना ज्यादा थी।

• सार्कोपीनिक ओबीज़ मरीजों की सक्रियता यानी अपना रोज़ का काम करने और अपनी देखभाल कर पाने की क्षमता दूसरे मोटे मरीजों के मुकाबले बहुत कम थी।

• शरीर में कीमोथेरेपी के असमान वितरण के कारण सार्कोपीनिक ओबीज़ में कीमो के साइड इफेक्ट पर भी नकारात्मक असर पड़ा।

वैज्ञानिकों ने निश्कर्ष निकाला कि शरीर की रचना और गठन, खास तौरपर सार्कोपीनिक ओबेसिटी का मरीज़ की उत्तरजीविता, सामान्य जीवन, कीमोथेरेपी के जहरीले बुरे असर आदि से गहरा संबंध है। यह भी पाया गया कि ऐसे मरीजों में समान शारीरिक वजन और ऊंचाई के बावजूद उपयुक्त दवा की मात्रा में तीन-गुने तक का अंतर आ सकता है।

इस ट्रायल पर ज्यादा अध्ययन के बाद हो सकता है भविष्य में सार्कोपीनिक ओबेसिटी से पीड़ित कैंसर मरीजों के लिए दवा की मात्रा तय करते समय इन कारकों को भी गिनती में लिया जाए।

कुल मिला कर सबक यही है कि हर कीमत पर मोटापे से बचा जाए, चाहे हम सार्कोपीनिक ओबीज़ हों या नहीं, चाहे हम कैंसर के मरीज़ हों या नहीं।
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