Friday, June 28, 2013

प्राणदात्री और प्राणलेवा कीमोथेरेपी के दिन लदने वाले हैं?

क्या सचमुच दशकों से कैंसर के मरीजों की प्राणदात्री और प्राणलेवा कीमोथेरेपी के दिन लदने वाले हैं?
कैंसर के इलाज की अब तक आजमाई जा रही विधियों में जोर होता है- चाहे कैसे भी हो, कैंसर को खत्म करो। सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी ये तीनों ही बेहद क्रूर प्रक्रियाएं हैं जो कैंसर पर जितना असर करती हैं, शरीर के बाकी स्वस्थ हिस्सों पर भी उतना ही।

अगर इलाज को कैंसर के खिलाफ युद्ध कहें तो इलाज का प्रचलित तरीका कार्पेट बॉम्बिंग है। यानी अंधाधुंध बम बरसाते चलो, हर जगह। दुश्मन जहां भी होगा, मारा जाएगा। जब तक कोई और उपाय न हो, यही तरीका चलने दिया जाए।

लेकिन ताजा खबरें बताती हैं कि अब वैज्ञानिक कार्पेट बॉम्बिंग की जगह टार्गेट बॉम्बिंग तरीके से इलाज खोजने के काफी करीब पहुंच गए हैं। यानी दुश्मन की जगह का पता करो और ठीक उसी जगह बम बरसाओ, स्वस्थ जगहों को नुकसान पहुंचाए बिना।
http://news.yahoo.com/no-more-chemo-doctors-not-far-fetched-094524778.html

हालांकि हर तरह का कैंसर अलग होता है, इसलिए टार्गेटेड थेरेपी करनी हो तो यह हर ट्यूमर की अलग होगी। यानी हर कैंसर के लिए आम तौर पर अलग रिसर्च और टार्गेटेड दवाएं। फिर भी कई प्रकार के कैंसरों, खास तौर पर रक्त कैंसरों के लिए कुछेक टार्गेटेड इलाज सफलता के करीब हैं और वैज्ञानिकों ने इनके सफल परीक्षण भी कर लिए हैं। इससे मरीजों में भी बहुत उम्मीदें बंधी हैं।

अगर ऐसा हो गया, सभी या ज्यादातर कैंसरों के लिए सफल टार्गेटेड थेरेपी खोजी जा सके तो यह मानवता के लिए एक कीमती तोहफा होगा।

मेरा नकारात्मक विचारः पिछले 15 वर्षों से कई  तरह के ब्रेक-थ्रू (http://ranuradha.blogspot.in/2012/01/1.html

http://ranuradha.blogspot.in/2012/01/2.html)

की खबरें पढ़ रही हूं लेकिन अपना इलाज उन्हीं पुरानी पद्यतियों से होता देख रही हूं।। अब, जबकि परंपरागत इलाज की गुंजाइश बाकी नहीं रही तो नई आई दवाओं का ट्रायल एंड एरर मुझ पर भी आजमाया जा रहा है। जमीनी स्तर पर जब उन चमत्कारी, सनसनीखेज़ खबरे और उम्मीदें जगाने वाली दवाओं को अपने ऊपर आजमाने का मौका आया है तो पता चल रहा है कि वास्तव में वे दवाएं चौथे स्टेज के मरीज को तीन से पांच महीने ज्यादा तक लक्षण-मुक्त रख सकती हैं। आखिरी स्टेज के मरीज का कुल जीवन-समय बढ़ाने का कोई दावा इनका नहीं है। ध्यान रहे ये दवाएं आम आदमी की पहुंच के बाहर हैं। हर महीने की इनकी खुराक 50 हज़ार से लेकर दो-ढाई लाख तक कुछ भी हो सकती है। और आम तौर पर यह लंबे समय तक चलने वाला इलाज होता है।)

Monday, June 24, 2013

स्तन कैंसर पर मेरी कुछ कविताएं

बड़े दिनों के बाद ख्याल आया। एक ब्लॉग है, जानकीपुल, जो साहित्य चर्चाओं पर केंद्रित है। उस पर मेरी कुछ कविताएं इस साल फरवरी में प्रकाशित हुईं।

मित्र प्रियदर्शन के बार-बार कहने पर आखिर एक तरह से संकोच और निर्लिप्त भाव से अपनी तब तक टाइप कर पाई कुछ कविताएं उन्हें भेजीं। उनमें से कुछ चुनकर ब्लॉग पर लगाई गईं। प्रियदर्शन ने एक परिचय भी लिखा जो मुझे लगा, एकदम सटीक था।

कविताएं भेजते समय, यहां तक कि उनके प्रकाशित होने तक भी मैं कतई उत्साहित नहीं थी। लेकिन उस पर जैसी और जितनी प्रतिक्रियाएं आईं, जितने (शायद तब तक का रिकॉर्ड) लोगों ने उसे 'लाइक' किया, मुझे लगा कि लोग यह सब पढ़ना चाहते हैं। मेरा उत्साह बढ़ा, लेकिन उसके बाद मित्र प्रियदर्शन के कई तरह के सुझावों के बाद भी अपनी कविताओं का कुछ नहीं किया।

फिलहाल, जानकीपुल के उस लिंक के साथ ही एर कविता यहां लगा रही हूं।
http://www.jankipul.com/2013/02/blog-post_2.html

अधूरा
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सुनती हूं बहुत कुछ
जो लोग कहते हैं
असंबोधित
कि
अधूरी हूं मैं- एक बार
अधूरी हूं मैं- दूसरी बार
क्या दो अधूरे मिलकर
एक पूरा नहीं होते?
होते ही हैं
चाहे रोटी हो या
मेरा समतल सीना
और अधूरा आखिर
होता क्या है!
जैसे अधूरा चांद? आसमान? पेड़? धरती?
कैसे हो सकता है
कोई इंसान अधूरा!

जैसे कि
केकड़ों की थैलियों से भरा
मेरा बायां स्तन
और कोई सात बरस बाद
दाहिना भी
अगर हट जाए,
कट जाए
मेरे शरीर का कोई हिस्सा
किसी दुर्घटना में
व्याधि में/ उससे निजात पाने में
एक हिस्सा गया तो जाए
बाकी तो बचा रहा!
बाकी शरीर/मन चलता तो है
अपनी पुरानी रफ्तार!
अधूरी हैं वो कोठरियां
शरीर/स्तन के भीतर
जहां पल रहे हों वो केकड़े
अपनी ही थाली में छेद करते हुए।

कोई इंसान हो सकता है भला अधूरा?
जब तक कोई जिंदा है, पूरा है
जान कभी आधी हो सकती है भला!
अधूरा कौन है-
वह, जिसके कंधे ऊंचे हैं
या जिसकी लंबाई नीची
जिसे भरी दोपहरी में अपना ऊनी टोप चाहिए
या जिसे सोने के लिए अपना तकिया
वह, जिसका पेट आगे
या वह,जिसकी पीठ
जो सूरज को बर्दाश्त नहीं कर सकता
या जिसे अंधेरे में परेशानी है
जिसे सुनने की परेशानी है
या जिसे देखने-बोलने की
जो हाजमे से परेशान है या जो भूख से?
आखिर कौन?
मेरी परिभाषा में-
जो टूटने-कटने पर बनाया नहीं जा सकता
जिसे जिलाया नहीं जा सकता
वह अधूरा नहीं हो सकता
अधूरा वह
जो बन रहा है
बन कर पूरा नहीं हुआ जो
जिसे पूरा होना है
देर-सबेर।
कुछ और नहीं।
न इंसान
न कुत्ता
न गाय-बैल
न चींटी
न अमलतास
न धरती
न आसमान
न चांद
न विचार
न कल्पना
न सपने
न कोशिश
न जिजीविषा
कुछ भी नहीं।
पूंछ कटा कुत्ता
बिना सींग के गाय-बैल
पांच टांगों वाली चींटी
छंटा हुआ अमलतास
बंजर धरती
क्षितिज पर रुका आसमान
ग्रहण में ढंका चांद
कोई अधूरा नहीं अगर
तो फिर कैसे
किसी स्त्री के स्तन का न होना
अधूरापन है
सूनापन है?

स्तन कैंसर के 12 आधारभूत लक्षण

स्तन कैंसर के लक्षणों पर नज़र रखना ही बुद्धिमानी है। फिर से तीन बाते दोहरा दूं कि-

1. स्तन कैंसर का पता सबसे पहले खुद को ही लगता है।

2. कैंसर का पता जितनी जल्दी चले, इलाज जितनी जल्दी हो पाए उतना ही ज्यादा सफल, सस्ता और आसान होता है। कैंसर की आशंका के बाद भी चुप बैठने का सीधा मतलब जान को जोखिम में डालना है।

3. हर महीने सिर्फ 10 मिनट का समय अपनी अंगुलियों से स्तनों की जांच के लिए तय करके अपने-आप को इस जोखिम में डालने से बचा जा सकता है।

शब्दों के मुकाबले चित्र ज्यादा बातें समझा सकते हैं। स्तन कैंसर के 12 आधारभूत लक्षणण ः


Saturday, April 13, 2013

लोगों की जिंदगी अहम है या झूठमूठ का पेटेंट?

(साप्ताहिक समाचार पत्रिका 'शुक्रवार' के 16 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित) 

“आप इसे पांच रुपए में क्यों नहीं बेचते, एक लाख बीस हज़ार रुपए तो बहुत ज्यादा हैं।”- यह सवाल भारत की आम जनता की ओर से उच्चतम न्यायालय ने स्विटजरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस के ग्लीवैक नाम की दवा को भारत में दोबारा पेटेंट दिए जाने के दावे पर सुनवाई के दौरान किया था।

इस दो अप्रैल 2013 को इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने नोवार्टिस के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। नोवार्टिस का दावा था कि कैंसर के खिलाफ काम आने वाली उसकी ‘नई’ दवा ग्लीवैक (इमैटिनिब मेसिलेट) को भारत में दोबारा पेटेंट मिलना चाहिए जबकि कंपनी के दावे को भारत का पेटेंट अपीली बोर्ड पहले ही खारिज कर चुका था। न्यायालय का कहना था कि यह पुरानी दवा का ही थोड़ा सुधरा हुआ रूप है, और इस आधार पर इसे नई दवा के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय का यह फैसला न सिर्फ अकल्पनीय रूप से महंगी विदेशी जीवनरक्षक दवाओं के भारतीय कंपनियों द्वारा सस्ते विकल्प यानी जेनेरिक दवाएं बनाने को बढ़ावा देने, बल्कि कैंसर एचआईवी/एड्स, हिपेटाइटिस-सी जैसी जानलेवा बीमारियों के इलाज तक गरीबों की पहुंच को बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगा। इस क्रम में अपनी विभिन्न दवाओं के भारत में पेटेंट के लिए लड़ रही अनेक विदेशी कंपनियों का उत्साह जरूर कम हुआ होगा।

ग्लीवैक का मामला-

स्विटजरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस ने 90 के दशक के अंत में इलाज के सहारे लंबे समय तक चलने वाले रक्त कैंसर क्रॉनिक मायसॉयड ल्यूकेमिया के इलाज के लिए ग्लीवैक (इमैटिनिब) दवा विकसित की। 2001 में इसे अमरीकी खाद्य और दवा कार्यालय से मंजूरी मिली और वहां का पेटेंट भी। इसी साल कंपनी ने भारत सहित कई अन्य देशों में भी इस दवा का पेटेंट और बेचने का अधिकार हासिल किया। इसे चमत्कारी कैंसर-रोधी दवा बताया गया जो मारक रक्त कैंसर को लंबे समय तक चलने वाले कैंसर में बदल सकती है। लगातार ली जाने वाली यह दवा कैंसर मरीजों की उम्र 3 से 10 साल तक बढ़ा सकती है। इसकी एक महीने की खुराक का खर्च एक लाख 20 हजार रुपए है, जो ज्यादातर भारतीयों की पहुंच के बाहर है। 

इस बीच सिपला और नैटको जैसी भारतीय कंपनियों ने इसी दवा के सस्ते भारतीय जेनेरिक संस्करण बनाए जिनके दाम ग्लीवैक के दसवें हिस्से से भी कम हैं। वीनेट नाम से इसी दवा की महीने की खुराक की कीमत 10 हज़ार रुपए है तो सिपला ने इसे आठ हज़ार रुपए में बाजार में उतारा। एक अन्य कंपनी इसे मात्र 5720 रुपए में बेचती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का बड़ा फायदा मरीजों के साथ-साथ भारतीय दवा निर्माता कंपनियों को भी हुआ है।

भारत में दवाओं पर अनुसंधान और विकास की स्थिति बेहद खराब है। बाहर की कंपनियां इस स्थिति का फायदा उठा कर अपनी दवाएं इस बड़े और विविधता भरे बाजार में लगातार उतारती रहती हैं। कोई दवा बनाने से लेकर उसे बाजार में उतारने के बीच अनुसंधान, विकास, परीक्षण, स्वीकृति जैसी अनेक प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है जिनमें काफी समय और बेहिसाब धन खर्च होता है। जबकि उन दवाओं को मिले पेटेंट की अवधि सीमित होती है। ऐसे में कंपनी पुराना सिक्का ही फिर-फिर चलाने की कोशिश करती है। हर बार कोई नई दवा विकसित करने के बजाए पेटेंट की हुई दवा में ही कुछ सुधार-संशोधन और उसके लिए नया पेटेंट पाने की कोशिश करती है ताकि बिना ज्यादा समय और धन खर्च किए उसका कारोबार चलता रहे, बढ़ता रहे। 

‘एवरग्रीनिंग’ की इस प्रक्रिया में कंपनियां दवा बाजार में अपनी विशिष्ट पेटेंट दवाओं का एकाधिकार बनाए रख कर खूब मुनाफा कमाती हैं। देखा गया है कि कंपनियां अपना पुराना पेटेंट खत्म होने के ठीक पहले नए पेटेंट के दावे दाखिल करने में सक्रिय हो जाती हैं। आंकड़े बताते हैं कि नई दवाओं के पेटेंट पाने वाले 12-13 फीसदी मामले महत्वपूर्ण खोजों के, 40 फीसदी से कम मामले सामान्य इलाज के और 50 फीसदी मामले पहले से उपलब्ध दवाओं के संशोधित संस्करण होते हैं।

ग्लीवैक के मामले में भी कंपनी ने अपनी दवा के पुराने संस्करण में कुछ सुधार किए और बताया कि यह मरीज के शरीर में 30 फीसदी ज्यादा जज़्ब होती है, इससे उसका असर बढ़ जाता है। इस लिहाज से दवा के संशोधित संस्करण को नया पेटेंट मिलना चाहिए। 2006 में दाखिल मामले को पेटेंट अपील बोर्ड ने 2009 में खारिज कर दिया। हालांकि फैसले के कुछ बिंदु कंपनी के हक में थे। इसी आत्मविश्वास पर कंपनी ने सीधे उच्चतम न्यायालय में मामला दाखिल कर दिया।

न्यायालय ने भारतीय पेटेंट संशोधन अधिनियम-2005 की धारा 3 (डी) का हवाला देते हुए दो मुद्दों पर कंपनी के खिलाफ फैसला दिया- (1) यह वास्तव में नई दवा नहीं है (2) पुरानी दवा में किया गया सुधार इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि दवा के असर में गुणात्मक सुधार हो। इस आधार पर यह दवा पेटेंट की हकदार नहीं है।

धारा 3 (डी) के मुताबिक उत्पाद पेटेंट के उपयुक्त नहीं है यदि-
“किसी ज्ञात पदार्थ के नए रूप की खोज मात्र, जो उस पदार्थ की ज्ञात क्षमता में वृद्धि में परिणत नहीं होती या ज्ञात पदार्थ के किसी नए गुण या नए उपयोग या ज्ञात पदार्थ, प्रक्रिया, मशीन या उपकरण का मात्र उपयोग, जबकि यह ज्ञात प्रक्रिया नए उत्पाद में परिणत नहीं होती या उसमें कम से कम एक नया क्रियात्मक पदार्थ शामिल नहीं होता।”

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने कानून की मूल भावना को कायम रखा और माना कि लोगों का जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार किसी पेटेंट के दावे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह देश में सस्ती दवाओं के हक में बड़ी जीत है। इस फैसले पर नोवार्टिस का कहना है कि देश में नए अनुसंधान-प्रयासों और नई दवाओं के विकास पर बुरा असर पड़ेगा क्योंकि बिक्री से हुए मुनाफे को कंपनी आगे के अनुसंधान कार्य पर खर्च करती है। सोच कर देखा जाए तो अगर यही नए अनुसंधान हैं जिसके लिए कंपनी फंड जुटाना चाहती है, तो क्या भारत जैसे गरीब देश में नई दवा के लिए यह कीमत उचित है? उल्टे, इस फैसले से, यह संभावना बनती है कि अब विदेशी कंपनियां पेटेंट के मामले में संभल कर चलें और वास्तविक अनुसंधान और नई दवाओं की खोज पर जोर दें।

भारत में पेटेंट व्यवस्था-

भारत 2005 से पहले दवाओं का पेटेंट नहीं करता था। 1970 में देश का पहला पेटेंट अधिनियम बना था। इसके तहत खाद्य पदार्थों और रसायनों का पेटेंट नहीं किया जाता था। सिर्फ उनके निर्माण की प्रक्रिया का पेटेंट (प्रोसेस पेटेंट) होता था। पेटेंट की अवधि 5 साल या आवेदन की अवधि से 7 साल- इनमें से जो भी कम हो, होती थी। इस कानून की सरलता का लाभ उठाकर कई दवा कंपनियों ने विदेशी दवाओं के जेनेरिक उत्पाद बनाने शुरू कर दिए। किसी दवा को बनाने की प्रक्रिया में मामूली सा बदलाव लाना आसान है, खास तौर पर जब पता हो कि लक्षित रसायन कौन-सा है। भारतीय दवा कंपनियों की तो चांदी हो गई। 

उन्हें उत्पाद पेटेंट के इस्तेमाल का शुल्क भी नहीं देना पड़ता था, जो कि काफी अधिक होता। दूसरा रास्ता यह था कि कंपनी थोड़ा इंतजार करे और पेटेंट की अवधि खत्म होते ही प्रक्रिया और उत्पाद दोनों का साधिकार उपयोग करे। इससे मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध हो गईं। इनकी कीमतें विदेशी मूल दवाओं से आधी से लेकर दसवें हिस्से तक कम थी।

विश्व व्यापार संगठन के दोहा चक्र में व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकार समझौते (ट्रिप्स) पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत के लिए जरूरी हो गया कि वह अपने दशकों पुराने पेटेंट कानून की धूल झाड़ कर उसे आधुनिक रूप दे। इसी से जन्म हुआ बौद्धिक संपदा अधिनियम-2005 का। इस कानून के तहत नए रसायनों के अलावा सम्मिश्रण दवाओं, दवाएं देने के तरीकों, दवा निर्माण प्रक्रिया आदि का भी पेटेंट किया जाने लगा। यह पेटेंट दवा के आने के 20 साल या उससे ज्यादा समय तक लागू होता है।

ट्रिप्स समझौते में विकासशील देशों के लिए ‘अनिवार्य लाइसेंस’ का विशेष प्रावधान रखा गया है जिसके तहत जन-स्वास्थ्य की आपात स्थितियों में सरकारें राष्ट्र हित में और गैर-व्यावसायिक कारणों से पेटेंट-प्राप्त दवाओं के सस्ते स्वदेशी संस्करण बनाने की इजाजत दे सकती है। दिलचस्प बात यह है कि भारत से कहीं पहले अमरीका, कनाडा, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड जैसे देशों ने इस प्रावधान को आजमाया। जन-स्वास्थ्य संस्थानों, इस क्षेत्र में काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों और दवा उद्योग की मांगों के दबाव में सरकार ने लंबे इंतजार के बाद इस प्रावधान का उपयोग करना शुरू किया और कई मामलों में सक्रिय रूप से इस प्रावधान के पक्ष में विदेशी कंपनियों के बजाए देसी जेनेरिक दवा उत्पादन को प्राथमिकता देने की शुरुआत की। 

ऐसा पहला फैसला जर्मनी की दवा कंपनी बायर की जिगर गुर्दे और फेफड़ों के कैंसर की दवा नेक्सावार (रासायनिक नाम- सोराफेनिब) और उसकी भारतीय जेनेरिक नकल के मामले में दिया। अनिवार्य लाइसेंस के प्रावधान के तहत सरकार पेटेंट के 3 वर्ष बाद जन-हित में पेटेंट धारक की अनुमति के बिना भी किसी अन्य कंपनी को सस्ती जेनेरिक दवा के उत्पादन की मंजूरी दे सकती है। नेक्सावार की भारत में एक महीने की खुराक की गगनचुंबी कीमत 2 लाख 80 हजार रुपए के मुकाबले नैटको कंपनी ने इसे 8800 रुपए में बाजार में उतार दिया। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने पेटेंट दफ्तर के फैसले को कायम रखा कि नैटको जेनेरिक दवा के उत्पादन और विपणन अधिकार के बदले बायर को सात फीसदी की रॉयल्टी देगी।

इस फैसले के बाद कई विदेशी कंपनियों ने अपनी कई दवाओं के दाम खुद ही कम कर दिए। उधर नैटको के मुकाबले में कई भारतीय दवा कंपनियां आईं और प्रतियोगिता के माहौल में सोराफेनिब दवा की कीमत 6600 रुपए तक गिर गई। ऐसे कई मामले सरकार और न्यायालयों में लंबित हैं और उम्मीद है नोवार्टिस पर ताजा फैसले से इन मामलों को भी दिशा मिलेगी।

जीत जनता की या भारतीय दवा उद्योग की-

पेटेंट अधिकार के संरक्षण के मामले में भारत का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा। इस स्थिति का पूरा फायदा देसी दवा कंपनियों को मिला। लचीले पेटेंट कानूनों के कारण आजादी के बाद से ही कई दवा कंपनियां फलीं-फूलीं और दूसरे विकासशील देशों में भी भारतीय कंपनियों की जेनेरिक दवाएं पहुंचने लगीं। पिछले दशकों में जब अफ्रीका में एचआईवी/एड्स की दवाओं की बहुत कमी थी और ब्रांडेड दवाओं का खर्च उठाना उस गरीब देश के लाखों लोगों के बूते के बाहर था, तब भारत से इसकी जेनेरिक दवाएं निर्यात हुईं। कोई 10 हजार डॉलर सालाना की कीमत वाली मूल दवाओं के बदले भारतीय जेनेरिक विकल्प 150 डॉलर में मिल जाते थे। 

आज भारत का जेनेरिक दवा का कारोबार बहुत बड़ा है। आंकड़ों के अनुसार 80 फीसदी विकासशील विश्व में भारत में बनी जेनेरिक दवाएं पहुंच रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमरीका, अफ्रीका, जापान और योरोप तक भारतीय दवाओं का आयात कर रहे हैं। कैंसर, एचआईवी/एड्स, हेपेटाइटिस-सी, टीबी से लेकर, साधारण बीमारियों तक की सस्ती भारतीय दवाएं विश्व भर में मरीजों के काम आ रही हैं। यूनिसेफ भी विकासशील देशों में मुफ्त बांटने के लिए सबसे ज्यादा दवाएं भारत से ही मंगवाता है।

भारत हर साल 11 अरब डॉलर मूल्य की जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है। मात्रा के हिसाब से विश्व का तीसरा और मूल्य के हिसाब से 14वां सबसे बड़ा दवा उद्योग भारत का है जो जेनेरिक दवाओं के बल-बूते पर ही है। देश के भीतर भी बिकने वाली 90 फीसदी दवाएं जेनेरिक हैं। साफ है कि पेटेंट अधिकारों के प्रति स्वाभाविक अनदेखी ने भारत के जेनेरिक दवा कंपनियों को देश में ही नहीं, दुनिया भर में फैलने और उद्योगपतियों को अरबपति बनने में मदद की है। इस फैसले के बाद और पेटेंट संबंधी कई और मामलों में सरकार के रुख को देखते हुए उनकी आभा में निश्चित रूप से और चमक आएगी।

कैंसर के मामलों में चीन और अमरीका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। सालाना, दुनिया के कुल 7.5 फीसदी मामले भारत में रिपोर्ट किए जा रहे हैं। कोई 10 लाख नए मरीज हर साल जुड़ रहे हैं जिनकी मृत्यु दर सालाना आठ फीसदी है। कैंसर की दवाओं का बाजार दवा उद्योग का सबसे ज्यादा तेजी से उभरते क्षेत्रों में से है। मरीजों की बढ़ती संख्या, नई दवाएं और बेहतर इलाज के तरीके ये सभी इस क्षेत्र में तेज विकास की संभावना की ओर इशारा करते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष की 10 कैंसर-रोधी दवाओं का बाजार में हिस्सा 70 फीसदी तक है और 2009 में इस वर्ग की दवाओं की बिक्री 2,60,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की थी। अनुमान है कि साल 2013 के लिए यह आंकड़ा 3,90,000 करोड़ रुपए के करीब होगा। 
 
कैंसर का इलाज अक्सर लंबा चलता है। नई तकनीकों, दवाओं के कारण अब कैंसर के साथ लंबा जीवन जीने की संभावना बढ़ गई है। इसके मुकाबले आम जन से जुड़े कुछ तथ्यों पर अगर नजर डालें तो देश के 40 फीसदी लोगों की दैनिक आमदनी 60 रुपए से कम है। सेहत पर प्रति व्यक्ति सालाना खर्च 500 रुपए से कम है। इसके अलावा 60 फीसदी स्वास्थ्य-रक्षा का काम निजी सेक्टर के हाथ में है और 70 फीसदी लोग किसी सरकारी या निजी स्वास्थ्य योजना से बाहर हैं, यानि वे अपना मेडीकल का खर्च खुद ही वहन करते हैं। ऐसे में देश का आम आदमी कैंसर के इलाज पर कितना और कब तक खर्च कर पाएगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। कोई जीवन-रक्षा के लिए धन का इंतजाम कर पाता है तो उसमें जमा-पूंजी के अलावा चल-अचल संपत्ति, उधार, दान, रोजगार सभी कुछ शामिल हो जाता है। इसके सीधे असर की जद में पूरा परिवार आता है जो महंगी दवाओं के कुचक्र का शिकार होता है। मध्य वर्ग के लोगों को गरीबी रेखा ने नीचे धकेलने वाला यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है। 

प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टर और निजी अस्पताल ही नहीं, सरकारी तंत्र में भी जेनेरिक की बजाए दवाओं के ब्रांड नाम लिखने का चलन है, जो सीधे-सीधे दवा कंपनियों को मुनाफा दिलाता है, जबकि गरीब मरीज चुनने का विकल्प होते हुए भी विकल्पहीन होता है। कैंसर के मरीज को दोहरी चोट लगती है जब उसे सस्ते विकल्प बताए बिना, उसकी आर्थिक स्थिति को देखे बिना डॉक्टर दवाएं लिख देते हैं। और अक्सर यह अनजाने में नहीं होता। डॉक्टर जानते-बूझते हुए किसी कंपनी या ब्रांड की दवाएं लिखते हैं जिसके बदले कई तरह के प्रलोभन और प्रोत्साहन पाते हैं। मेडिकल क्षेत्र में यह नैतिकता संबंधी सबसे बड़ी बहस और मेडिकल काउंसिल भी इस चलन को रोकने की कोशिश कर रहा है।

इसके तोड़ के रूप में केंद्र सरकार ने एक नीति बनाई है जिसके तहत सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए अनिवार्य होगा कि वे मरीजों के लिए जेनेरिक दवाएं ही लिखें। ऐसा न करने पर सज़ा का भी प्रावधान होगा। इसी योजना में ब्रांडेड दवाएं लिखने की भी सीमा निर्धारित की गई है। ज्यादातर मरीजों को जेनेरिक दवाएं मुफ्त दी जाएंगी। अगले कुछ वर्षों में देश की 50 फीसदी आबादी को इस स्वास्थ्य योजना में शामिल करने की परिकल्पना है।

जेनेरिक दवाओं और सरकारी योजनाओं के आने के बाद भी कैंसर, एड्स/एचआईवी, हिपेटाइटिस-सी जैसी कुछ समय पहले तक लाइलाज मानी जाने वाली लेकिन अब नई दवाओं में उम्मीदें देखने वाली बीमारियों का इलाज आम आदमी तक पहुंच पाएगा, इसकी बहुत उम्मीद नहीं दिखती। हालांकि जेनेरिक दवाएं विदेशी दवाओं के मुकाबले सस्ती हैं लेकिन यह भी आसमान से टपक कर खजूर पर अटकने जैसी स्थिति है क्योंकि इनका मकसद भी कंपनी का मुनाफा ही है। यानी इलाज उतना सस्ता नहीं होगा जितना कि हो सकता है या होना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय द्वारा नोवार्टिस से किया गया सवाल दरअसल चिकित्सा व्यवस्था के बड़े सवाल का एक हिस्सा भर है। घरेलू दवा निर्माता हो या विदेशी, जब तक इस सवाल का जवाब ‘हां’ में नहीं मिलता, आम मरीज की जीत अधूरी है।
-आर. अनुराधा


Friday, October 5, 2012

ज़िंदगी के एहसास का मौक़ा

हिंदी की महत्वपूर्ण पाक्षिक पत्रिका द पब्लिक एजेंडा के ताजा अंक में मेरा संस्मरण कैंसर के बावजूद कुछ कर जाने वाले लोगों पर विशेष आयोजन के तहत प्रकाशित हुआ है। वही आलेख शब्दशः--

ज़िंदगी के एहसास का मौक़ा

इसे मैं मौका कहूंगी- जीने का, जिंदा होने के एहसास का तीसरा मौका। किसी कैंसर के मरीज को तीन मौके कम ही मिलते हैं- खास तौर पर उसे, जिसका ट्यूमर चौथे स्टेज का और बीमारी एडवांस करार दी गयी हो। डॉक्टर ने मुझे भाग्यशाली कहा, जब मैंने कैंसर के बाद पांच साल की खतरे की रेखा पार की थी। मगर सात साल होते-न-होते मैं फिर उसी जगह खड़ी थी, जहां कैंसर के रास्ते पर मेरी यात्रा शुरू हुई थी। 


इलाज के उन्हीं दुर्गम रास्तों से दोबारा गुजरने के सात साल बाद फिर तीसरी बार अब। सिर्फ जिंदा रहना भी अपने आप में एक नेमत है। वैसा सहज नहीं, जैसा हम आम तौर पर सोचते हैं। जीना तभी समझ में आता है जब जीवन पर खतरा महसूस होता है। जीने का एहसास होने पर इंसान तीन तरह से जीता है- बिसूरते हुए कि हाय, मुझे जिंदगी कितनी छोटी मिली, मेरे साथ अन्याय हुआ। जैसे कोई अपने घाव को लगातार खरोंचता रहे और दर्द से छटपटाता भी रहे। दूसरी स्थिति है कि वह सोचे, कम ही दिन रह गये हैं, चलो जल्दी-जल्दी जिया जाये, बहुत कुछ कर लिया जाये। और तीसरी स्थिति - जब वह बाकी बचे अनिश्चित समय को इत्मीनान से जीना चाहता हो, आने वाले समय का बिना खयाल किये। वह कई मामलों में तदर्थ हो जाता है कि बाद किसने देखा है, अभी समय बेहतर कटे, बस। मैं इस समय बाद वाली दोनों स्थितियों में एक साथ जी रही हूं।


हम अपने शरीर की बनावट-सजावट भले ही रोजाना करते हों, लेकिन हम इसकी जरूरतों और गड़बड़ियों का ध्यान कम ही रखते हैं। जब तक समय साथ देता है, हम कद्र नहीं करते। जब बिगड़ जाता है, तब फौरी राहत देकर छूटने की कोशिश में रहते हैं। अपने शरीर की साज-संभाल करने और जानकारी होने की जरूरत पहली बार महसूस हुई 14 साल पहले, जब स्तन कैंसर होने का पता चला। संतान जन्म के समय या ऐसी ही किसी जांच-मुलाकात में अगर किसी डॉक्टर ने कभी मुझे स्तन स्वयं-परीक्षा का मुफ्त, सरल-सा तरीका बता दिया होता तो स्थिति शायद खराब न होती। 


कैंसर इंसान को ढंग से जीना सिखा देता है। इसका इलाज बहुत जानकारी की मांग करता है, सहज ज्ञान और समझदारी के अलावा भी। इलाज लंबा, कई स्तरों पर होने वाला, जटिल और मारक होता है। इस दौरान मरीज बेहतर महसूस करने की बजाय इलाज के बुरे प्रभावों के कारण ज्यादा बीमार हो जाता है। कीमोथेरापी में इस्तेमाल होने वाली दवाएं मूलतः जहरीले रसायन हैं जो कभी हिटलर के नात्सी गैस-चेंबरों में यहूदियों को मारने के लिए इस्तेमाल किये जाते थे। इलाज में इनका मकसद बीमार, कमजोर कैंसर कोशिकाओं को मारना है, लेकिन इस दौरान ढेर सारी स्वस्थ कोशिकाएं भी मारी जाती हैं। रेडियोथेरेपी में रेडियो-सक्रिय किरणें स्वस्थ कोशिकाओं को भी उसी शिद्दत से जला डालती हैं। ऐसे समय में शरीर का स्वस्थ हिस्सा कमजोर न पड़ जाये, इस कोशिश में लगना पड़ता है। यह जिम्मेदारी मरीज की होती है। यह स्थिति सभी के लिए बराबर कठिन होती हो, ऐसा नहीं है, फिर भी शरीर के भीतर इलाज की चाल जानना लाजिमी होता है।


कुल मिला कर युद्ध सी स्थिति होती है। स्तन कैंसर पर चौतरफा हमले में सर्जरी, कीमो, रेडिएशन के 8-10 महीने लंबे इलाज के बाद कैंसर को रोके रखने के लिए पांच साल तक हार्मोन का इलाज दिया जाता है ताकि ओवरी, पैंक्रियाज और शरीर में कहीं और बन रहे स्त्री हार्मोनों को दबा कर रखा जा सके। कई मामलों में यही हार्मोन कैंसर को उकसाते हैं। इलाज के इन हमलों में स्वस्थ कोशिकाएं बची रहें और फलती-फूलती रहें, इसके लिए जानकारी से ही रणनीति बनाने की शुरुआत होती है। तत्काल और विस्तृत जानकारी पाने के कई साधन मेरी पहुंच में रहे, यह महत्वपूर्ण था। चौदह साल पहले जब इंटरनेट महानगरों के समृद्ध संस्थानों तक ही था, पत्र सूचना कार्यालय के मुख्यालय में नियुक्ति होने के कारण मेरी उस तक पहुंच और उसे इस्तेमाल करने की दक्षता सहज ही थी। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाएं भी मिल जाती थीं जिनमें तब कैंसर के चिकित्सकीय और गैर-चिकित्सकीय पक्षों पर विमर्श छपता था। इन सबसे मेरी जानकारी लगातार बढ़ती गयी। इलाज सरकारी अस्पताल एम्स में हो रहा था, जहां देश भर के मरीज आते हैं। ऐसे में कैंसर, खास तौर पर महिलाओं से जुड़े स्तन कैंसर की विविध स्थितियों को सुनने-जानने का मौका मिला। उनके साथ मैं अपने अनुभवों, ज्ञान और बेहतर जीवन जीने के नुस्खे साझा करती थी।


वहां एक बड़ी बात मुझे समझ में आयी कि लोगों में कैंसर, उसके इलाज, साइड इफेक्ट्स की जानकारी बहुत कम है और थोड़ी-बहुत जानकारी भी उनके जीवन में अंतर लाने में सक्षम थी। यहीं से यह विचार आया कि स्तन कैंसर पर क्यों न जानकारीपरक एक पुस्तक लिखी जाये। इसके दो मकसद थे, एक मेहनत से इकट्ठा की गयी जानकारियां और दूसरी महिलाओं के अलग-अलग अनुभव लोगों को सहज ही, उनकी अपनी भाषा में मिल जायें। दूसरे, इस विषय पर बार-बार वही बातें कहने की बजाय उन्हें लिख कर ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाये। मैं डॉक्टर तो थी नहीं, लेकिन इस बारे में कुछ सघन निजी अनुभव थे, जो आम तौर पर मरीजों को ज्यादा प्रभावित करते हैं। 


कुल मिला कर पुस्तक लिखने का उद्देश्य इस कठिन दौर से गुजर रहे लोगों का जीवन आसान बनाने के अपने अनुभव बताना था। यह पुस्तक "इंद्रधनुष के पीछे-पीछेः एक कैंसर विजेता की डायरी' मार्च 2005 में छप कर आयी, जब मैं कैंसर से दूसरी लड़ाई की तैयारी कर रही थी। जाहिर है, इस स्थिति के बारे में पुस्तक छपने के पहले सोचा भी नहीं था! 


(लेखिका ने कैंसर से जूझने की कहानी पुस्तक "इंद्रधनुष के पीछे-पीछेः एक कैंसर विजेता की डायरी' में लिखी है। वे प्रकाशन विभाग में संपादक हैं।)


Saturday, March 3, 2012

कुछ दिनों से सोच में हूं

कुछ दिनों से सोच में हूं। एक नव-परिचिता, 'कैंसर-बड्डी' का कैंसर दोबारा उभर आया है। पहली बार उन्हें कैसर का पता लगा था पिछले साल लगभग इसी समय। उसके बाद उन्होंने जम कर इलाज करवाया और अक्तूबर में फारिग होकर फिर से काम-काज में मन लगाया। इसी बीमारी-इलाज के बीच उनकी बेटी की धूम-धाम से शादी भी हो गई। हालांकि इलाज सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली में कराया, जो कि केंद्रीय सरकार के बड़े अस्पतालों में गिना जाता है।

उनसे मुलाकात के ठीक पांचवें दिन उनका फोन आया कि कैंसर उनके शरीर के कई हिस्सों में फैल गया है- लिवर सहित। यह मुलाकात भी संयोग ही रही। मेरा एक आत्मकथात्मक आलेख नवभारत टाइम्स में छपा। वहां के नंबर पर फोन करके उन्होंने संबंधित विभाग में संबंधित व्यक्ति से बात की, जिन्होंने मुझसे पूछ कर मेरा फोन नंबर उन्हें दिया और इस तरह हमारी पहली बात-चीत फोन पर हुई।

उसके दो ही दिन बाद वे मेरे दफ्तर पर मिलने आईं। वैसे दफ्तर में समय कम ही मिलता है, फिर भी उस दिन करते-न-करते वो करीब 40 मिनट साथ रहीं। उनसे कई तरह की बातें हुईं। कैंसर की, कैंसर के साथ और उसके बाद जीवन की, खाने पीने, सोने जागने की। फिर विदा, संपर्क में रहने, फिर मिलने के वादे के साथ। और इस के पांच ही दिन बाद उन्होंने कैंसर के शरीर के कई अंगों में फैल जाने की खबर अचानक दी। यह उनके लिए भी सदमे की तरह था, क्योंकि उन्हें कोई दर्द या तकलीफ नहीं हो रही थी, महज रूटीन चेक-अप में ही की गई कुछेक जाचों से इसका पता चला।

एक समय मैं मानती थी कि कैंसर लौट आने का मतलब है- मौत के करीब खड़े हो जाना। पर अपनी जानकारी और दूसरों के अनुभवों से जाना कि यह हमेशा सही नहीं होता। मेरे साथ खुद यह हुआ था- कोई 7साल पहले। दोबारा, दूसरे स्तन में फिर से तीसरी स्टेज का कैंसर,जो बड़ी तेजी से फैला था, या ऐसा मुझे लगा था, क्योंकि अचानक ही उस बड़ी गांठ पर ध्यान गया था। लेकिन उस इलाज के बीच और बाद में कई महिलाओं से मुलाकातें हुईं जिन्होंने पिछले कई बरसों से कैंसर के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था, उनका इलाज लगातार जारी था- कभी यहां, तो कभी वहां।

लेकिन इस नव-परिचिता का कैंसर लिवर, पसलियों आदि पेट के कई महत्वपूर्ण अंगों तक फैल चुका है, जहां यह जानलेवा भी हो सकता है। इस स्थिति को वे अच्छी तरह समझती हैं। इनके साथ बातचीत में दो बातें मुझे असहज करती हैं- पहली कि उन्हें इस नए, प्राइवेट, विशेषज्ञता वाले अस्पताल के डॉक्टरों ने समझा दिया है इसलिए वे लगातार यह मानती हैं, कि पिछली बार सरकारी अस्पताल के इलाज में डॉक्टरों द्वारा भयानक लापरवाही और कोताही बरती गई, इसीलिए उनका कैंसर खत्म होने के बजाए फिर उभरा है। वे डॉक्टरों और सरकारी अस्पताल पर मामला ठोक देने की धमकी देते हुए बार-बार कहती हैं कि उनको जो कीमो दी गई उससे कैंसर खत्म नहीं हुआ बल्कि उसके ‘जर्म्स’ गांठ में से निकलकर पूरे शरीर में ‘भाग कर फैल गए और यहां-वहां छुप गए’। केस बिगाड़ दिया गया है। कोई एक टेस्ट जो एक बार नेगेटिव और फिर एक बार माइल्डली पॉजिटिव आया था, उसे ‘फिर’ नहीं कराया गया। इलाज खत्म होते ही सीटी स्कैन आदि नहीं करवाया गया। इत्यादि। ये सारी बातें उन्हें निजी अस्पताल के डॉक्टरों ने ऐसी अच्छी तरह समझा दी है कि वे दोबारा कभी इलाज के सरकारी तंत्र में जाना चाहेंगी ही नहीं, हालांकि वे खुद सरकारी नौकरी में हैं।

कितना आसान है किसी अनुभवी,पढ़े-लिखे मरीज तक को भी डराकर, प्यार से, अपने दिखावटी नरम व्यवहार से फुसला ले जाना कि वह इलाजके निजी तंत्र में ही उलझा रहे, सरकारी तंत्र के आजमाए हुए रूखे और मशीनी-से लगने वाले प्रोटोकॉल में विश्वास न करे। दर असल तथ्य यह है कि कैंसर के जर्म्स नहीं होते, यह शरीर के, कोशिकाओं के भीतर ही बनता है और इन कोशिकाओं की प्रवृत्ति छिटककर खून के साथ दूर जाकर नई बस्तियां बसाने की होती है। अगर किसी कीमो से एक जगह का ट्यूमर खत्म होता है तो वह खून के सहारे पूरे शरीर में हर कोने में जाकर उसकी हर बिखरी कोशिका को खत्म करने की प्रवृत्ति रखता है। यह नहीं होता कि कोशिकाएं एक जगह से भागकर कहीं और जाकर छिप जाती हैं। कीमोथेरेपी सिस्टमिक यानी पूरे शरीर में एक साथ, रक्त के बहाव के जरिए किया जाने वाला इलाज है।

फिर उनका वह हॉर्मोन जांच का पॉजिटिव या नेगेटिव नतीजा इलाज की दिशा को कतई प्रभावित नहीं करता है, सिर्फ इलाज की सफलता का अंदाजा लगाने में मदद देता। हर स्तन कैंसर के मरीज को पांच साल तक खाने के लिए ईस्ट्रोजन हॉर्मोन-निरोधक गोलियां खाने को दी जाती हैं ताकि अगर उस कैंसर के होने में हॉर्मोन का जरा भी हाथ हो तो वह हॉर्मोन के असर को खत्म करके इसके दोबारा होने को रोक पाए। और यह साबित बात है कि वह हॉर्मोन जांच कई साधारण कारणों से गलत भी आती है, इसलिए इसे दो-तीन बार भी कराया जाता है। तो, इस अर्थ में उनका इलाज पूरा किया गया, पांच साल के लिए हॉर्मोन की गोली के प्रिस्क्रिप्शन सहित।

दूसरा मसला जो इनके दोबारा कैंसर होने और उसके फैलाव के बारे में जानने के बाद मेरे सामने आता है, कि मैं उनसे बातें करना चाहती हूं, उनकी व्यग्रता, उद्विग्नता, आशा-निराशा को साझा करना चाहती हूं ताकि उन्हें अच्छा लगे और मुझे भी उनके हालात को समझने का मौका मिले। हालांकि वे खुद बार-बार कहती हैंकि वे फाइटकरेंगी और इसमें जीतें या हारें, मन को नहीं हारने देंगी। लेकिन ठीक होने का उन्हें कतई भरोसा नहीं है, और अपने जल्द ही इस दुनिया से कूचकर जाने की भी पूरी-पूरी आशंका देख रही हैं। ऐसे कठिन समय में उनकी आशंका में आप यह दिलासा नहीं दे सकते कि चिंता न करें, जल्द ही ठीक हो जाएंगे। खास तौर पर ऐसे वक्त में, जब उन्हें भी पता है कि शायद यह बीमारी अब ठीक न होने की जद पर आ पहुंची है। सोच ही रही हूं।

Monday, February 20, 2012

जरा और हंगामे की जरूरत है- युवराज के बहाने कैंसर


(यह आलेख शुक्रवार पत्रिका के 17-23 फरवरी के अंक में छपा है।)

वैसे तो पिछले साल से ऐसी आशंकाओं का सिलसिला चल रहा था कि क्रिकेटर युवराज सिंह को फेफड़ों में ट्यूमर है। लेकिन जनवरी के आखिरी हफ्ते में पक्की खबर आई कि युवराज सिंह को जर्म सेल ट्यूमर ऑफ मीडियास्टिनम या मीडियास्टिनल सेमिनोमा नाम का फेफड़ों का कैंसर है। हर तरफ सनसनी फैल गई। युवराज सिंह की कीमोथेरेपी यानी दवाओं से इलाज शुरू होने की खबरों के बीच उसके ठीक होने की संभावनाओं, अटकलों, माता-पिता से बातचीत, दूसरे क्रिकेटरों, दुनिया भर की सेलिब्रिटीज़ की शुभकामनाओं की खबरों से भी पूरी दुनिया का मीडिया पट गया। युवराज मीडिया के लिए इस समय खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पिछले साल ही हमारी क्रिकेट टीम विश्वकप जीत लाई है, जिसमें युवराज मैन ऑफ द सीरीज रहे।

खबरों की कहानी के पहले इस कैंसर को समझ लें। मीडियास्टिनम मोटे तौर पर छाती के बीच की जगह है जहां दिल, इससे निलकने वाली खून की नलियां और संवेदी तंत्रिकाएं, श्वसन नलियां, खाने की नली का कुछ हिस्सा वगैरह होते हैं। इन नाजुक अंगों को सुरक्षित समेटे हुए इस हिस्से को घेरे एक झिल्ली होती है। युवराज का जर्म सेल ट्यूमर ऑफ मीडियास्टिनम दुर्लभ इसलिए है कि यह आम तौर पर जर्म सेल, यानी पुरुषों के शुक्राशय की कोशिकाओं में होता है। सेमीनोमा का मतलब ही है, शुक्राशय की सेमीनिफेरस नलिकाओं की सतह की कोशिकाओं का ट्यूमर। वैज्ञानिक समझ नहीं पाए हैं कि कैसे, पर कभी-कभार यह कैंसर शुक्राशय की बजाए छाती में या पेट की गुहा में बन जाता है। खास तौर पर पुरुषों में होने वाला यह कैंसर 20 से 35 की उम्र में सबसे ज्यादा होता है। और अच्छी बात यह है कि इसके लक्षण फौरन दिख जाते हैं और कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का इन पर अच्छा असर होता है इसलिए ठीक होने की संभावना काफी ज्यादा होती है।

हमारे देश में जहां कैंसर के 25 लाख से ज्यादा मरीज हैं, उनमें हर साल आठ लाख और जुड़ते हैं और साढ़े पांच लाख लोग मर जाते हैं, जहां 70 फीसदी लोगों का कैंसर इतनी विकसित अवस्था में होता है कि डॉक्टर भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाते, वहां स्वाभाविक है कि इस बीमारी का नाम ही दिल दहला देता है। जानकारी की कमी भ्रम और आशंकाओं को बढ़ावा देती है। ऐसे में अच्छा है कि युवराज के बहाने ही सही, इस विषय पर चर्चा ने जोर तो पकड़ा।

वह समय अभी बीता नहीं है जब कैंसर का मतलब मौत का वारंट होता था, लोग जीने की उम्मीद छोड़ देते थे। ईश्वर की तरह आयुर्वेद आदि पर विश्वास होने के नाते लोग वैद्यों, हकीमों, होमियोपेथिक डॉक्टरों, “कैंसर से एड्स तक” हर मर्ज का इलाज करने का दावा करने वाले नींम चिकित्सकों के पास पहले जाते थे क्योंकि उनका विश्वास होता था कि एलोपेथी में कोई कारगर इलाज हो ही नहीं सकता। अस्पताल जाना तभी होता था, जब तकलीफ असहनीय हो जाती थी। इसके अलावा कैंसर के लिए अच्छे अस्पतालों की बेतरह कमी, लंबा, खर्चीला, तकलीफदेह और अनिश्चित परिणाम वाला इलाज करवा पाना आम हिंदुस्तानी के लिए आसान नहीं।

लेकिन पिछले कुछ साल में मीडिया ने कई सेलीब्रिटीज़ के कैंसर पर विशेष रूप से चर्चाएं छेड़ी हैं। सिंगर काइली मिनोग से लेकर बिग बॉस की जेड गुडी, लीसा रे और पर्सनल कंप्यूटर क्रांति शुरू करने वाले स्टीव जोब्स तक ने कैंसर पर लोगों की जागरूकता, जानकारी बढ़ाने के लिए मीडिया को उकसाया। एक ऐसा शब्द जिससे कई भ्रम और वर्जनाएं जुड़ी थीं, लोग उच्चारने से डरते थे, अब लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा है। अखबार और न्यूज चैनल अपने हीरोज़ के साथ-साथ इस बीमारी के अलग-अलग पहलुओं को भी तरह-तरह से उभारते हैं। विशेषज्ञों का ज्ञान, कैंसर-साथियों के अनुभव लोगों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। इंटरनेट और, खासकर सोशल मीडिया का भी इसमें बड़ा योगदान है।

हमारे देश में भी कैंसर की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इसके बारे में जागरूकता, इसकी जल्द पहचान और पूरा इलाज जरूरी है। कई तरह के कैंसरों को खुद पहचानने; धूम्रपान, नशा न करने; नियमित, सक्रिय जीवनचर्या; नियंत्रित और संतुलित खान-पान जैसी आधारभूत जानकारियां देने और इलाज के लिए प्रेरित करने जैसे काम मीडिया के जरिए संपन्न हो रहे हैं। युवराज के बहाने हम कई हस्तियों के अनुभवों को जान पा रहे हैं जिन्होंने इस बीमारी के बाद भी बहुत उपलब्धियां पाईं, नए आसमान छुए और कैंसर पीड़ितों और समाज के लिए प्रेरणा बने।

शहरों में कम से कम इतना असर हुआ है कि लोग कैंसर होने की बातें छुपाते नहीं हैं। वे जान रहे हैं कि हर तरह के लोगों को कैंसर हो सकता है। जानकारी से बीमारी की घटनाएं तो कम नहीं होतीं, लेकिन वे इलाज करवा रहे हैं और कई ठीक होकर या कैंसर के साथ ही, लंबा और बेहतर जीवन बिता रहे हैं। लोगों के भ्रम और डर खत्म हो रहे हैं, कैंसर से अपरिचय और सदमे का भाव कम हो रहा है। दूसरी तरफ मीडिया कैंसर के इलाज की कमियों को सामने लाकर व्यवस्था में सुधार लाने के लिए दबाव बनाने का काम भी जाने-अनजाने कर रहा है। आंखें बंद करके डॉक्टर की अंगुली पकड़ चलते जाने वाले लोगों को विकल्पों की पगडंडियां भी ये चर्चाएं दिखा रही हैं, नई खोजों, इलाजों, उनकी खामियों को सबके सामने रख रही हैं।

हालांकि मीडिया अति भी करता है और बीसीसीआई को अपील करनी पड़ती है कि युवराज की निजता का सम्मान करें। कैंसर के बहाने उसके निजी जीवन के हर मिनट की खबर देना समाचार मीडिया का काम नहीं है।

तो, युवराज सिंह, तुम्हें धन्यवाद और शुभकामनाएं। अपना इलाज करवाकर जल्द लौटो और उन सबके लिए एक और मिसाल बनो जिनके जीवन में उम्मीद की कमी है।

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