Sunday, September 28, 2008

बेटियों के दिन पर उनके लिए खास: कैंसर विजेता की डायरी के पन्ने

आज बेटियों के अपने दिन अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘इंद्रधनुष के पीछे-पीछे: एक कैंसर विजेता की डायरी’ के कुछ संबंधित हिस्से उनके और सबके साथ बांट रही हूं।

मैंने अपने को हमेशा एक वंचित बेटी समझा है जिसे पदार्थ के रूप में तो समृद्धि हमेशा मिली लेकिन भावनात्मक संतुष्टि की तलाश में परिवार के बाहर सहृदय लोगों का मुंह देखना पड़ा। इसमें मां की गलती नहीं है कि वे मुझे उम्र के उस बदलावों भरे तूफानी दौर में दिलासा नहीं दे पाईं, जिसकी मुझे सख्त जरूरत थी। दरअसल मां ने भी जो सीखा था, वही व्यवहार मेरे साथ किया। लेकिन आज की मांएं यह बेहतर समझती हैं कि अपनी बेटी को उस कठिन समय में संभालना, जानकारी देना, मजबूती देना और भरोसा दिलाना हर मां के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होती है।

तो ये रहे पुस्तक के पृष्ठ 56-57-58 से कुछ हिस्से:

“मन के कोने में एक बात छुपी हुई है जिसे संकोच के परदे हटा कर बाहर लाने की पूरी कोशिश करती हूं- इस बात को कहने का यह, शायद जीवन का एकमात्र, मौका मैं खोना नहीं चाहती। मैं नहीं जानती, ऐसा कुछ मेरे जमाने में हर किशोर होती लड़की को सहना पड़ा होगा या नहीं। लेकिन मेरे दिलो-दिमाग में वे बातें गहरी खुदी हुई हैं। अच्छा लगता है आज की किशोरियों की मांओं यानी अपनी पीढ़ी की परिचित औरतों को अपनी बेटियों के सामान्य विकास की परवाह करता देख कर।

मैं उस समय चौदह साल की थी और अपने आप से ही जूझ रही थी- शरीर और मन के बदलावों से। लगता था सारी दुनिया की नज़रें मुझ पर हैं। हर जगह, हर समय बंदिश है, कुछ अपने संकोच की, कुछ मां की हिदायतों की। मन करता था, किसी ऐसी जगह जा कर रहा जाए जहां मन-मुताबिक हाथों-पैरों और दिलो-दिमाग को पूरी तरह ढीला छोड़कर कुछ देर जिया जा सके। छातियों के बढ़ने के दर्द को सहा पर कभी किसी से कह नहीं पाई। मां ने कभी इन सब विषयों पर बात नहीं की। मुझसे बड़ी एक बहन भी थी, लेकिन कभी खयाल नहीं आया कि उससे ही कुछ पूछा जाए। उस स्तर पर उससे कभी बातचीत ही नहीं होती थी। मां ने कभी बात तो नहीं की लेकिन कभी शाम को कॉलोनी की ही सहेलियों के घर से लौटने में देरी हो तो ताने जरूर दिए- लाज-शर्म नहीं है। और जबाव मेरी आवेश भरी आंखों में होता था- हां, तो मैं क्या करूं। इसमें मेरी क्या गलती है। और एक बार नहीं, अनेक बार मैंने मनाया कि मैं लड़की रहूं भी तो इन छातियों के साथ नहीं। उन्हें छुपाने की कोशिश में कसी हुई शमीज पहनने से लेकर स्कर्ट या मिडी में टक-इन की हुई शर्ट को ढीला रखते हुए उसके नीचे पहनी शमीज़ को खींच-खींच कर रखने जैसे न जाने कितने उपाय किए लेकिन उनका आकार नहीं घटा, बल्कि बढ़ता ही गया।...

...लेकिन स्तन क्या इतने ही अवांछनीय और शर्मिंदगी का विषय हैं कि उनके बारे में चर्चा भी सहज होकर न की जा सके? दरअसल यह बात मुझे काफी देर हो जाने के बाद समझ में आई कि ये शर्मिंदगी का विषय तब हैं, जब छोटी-छोटी अनभिज्ञताओं की वजह से नवजात शिशु दूध न पी पाए। समय पर उनका वास्तविक इस्तेमाल न हो पाए।

समान कपड़ों और बालों वाले समूह में स्त्री-पुरुष की पहचान करनी हो तो नजर सबसे पहले सीने की तरफ जाती है। यह स्त्रीत्व का बाहरी निशान है। मेडिकल तथ्य यह है कि इसका आकार-प्रकार बच्चे को दूध पिलाने का अपना मकसद पूरा करने में आड़े नहीं आता। लेकिन पुरुष प्रधान समाज में इसे ही स्त्रीत्व मान लिया जाता है।

एक तरफ तो बार्बी डॉल जैसे अवास्तविक आदर्श हैं और मर्लिन मुनरो जैसी फैंटसी, जिनसे बराबरी की भावना समाज बचपन से ही हमारे मन में लगातार भरता रहता है। और इसी लक्ष्य को पाने की कोशिश में हम कभी अपने शरीर के इस हिस्से को जैसा है, उसी रूप में स्वीकार नहीं कर पातीं। उसमें हमेशा कमी-बेशी नजर आती है। हमें हमेशा याद दिलाया जाता है कि यही हमारे नारीत्व का केंद्र है और इसे आदर्श रूप में रखना है।

दूसरी तरफ हमें उसी पर शर्मिंदा होना भी सिखाया जाता है। शो बिजनेस से जुड़ी औरतें शरीर के इस हिस्से का प्रदर्शन कर सकती हैं। लेकिन सामान्य ' भद्र' महिला से उम्मीद की जाती है कि वह लोगों के बीच इसे ठीक ढंग से ढक-छुपा कर रखे। 'प्लेबॉय' और 'कॉस्मोपॉलिटन' के कवर पेज पर इस प्रदर्शन का स्वागत है लेकिन आम औरत का सार्वजनिक रूप से इस तरह के गैर-इरादतन व्यवहार का अंश मात्र भी निंदनीय और दंडनीय है।...

...स्तन कैंसर के शुरुआती लक्षण भी उन्हीं दिनों उभर रहे थे। अगर मैं इस बारे में जानती होती या डॉक्टर ध्यान देते तो सब समझा जा सकता था। अब (कैंसर के बारे में) इतना कुछ पढ़ने-जानने के बाद साफ-साफ एक ही दिशा (स्तन में कैंसर होने) की ओर इशारा करती उन घटनाओं का सिलसिला जोड़ने में कोई कठिनाई नहीं होती।“

Saturday, September 6, 2008

कैंसर हार रहा है

इंदौर में कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें कभी कैंसर ने दबोचा था लेकिन उनमें ऐसा कुछ था जिसके चलते उन्होंने न केवल इसे हराया बल्कि वापस जीवन में लौटकर वे फिर हंसते-गाते देखे जा सकते हैं। जीवन के रस से सराबोर, हर पल को अमूल्य समझते हुए अपने परिजनों और मित्रों के साथ खिलखिलाते हुए। उनके जीवन में आस्था के फूल खिले हैं और उनकी खुशबू में अपनी जिजीविषा को वे नए अर्थ दे रहे हैं। वेब दुनिया के रवींद्र व्यास ने 2002 में यह लेख लिखा था, लेकिन यह आज भी बराबर सामयिक और सार्थक है।- अनुराधा

गुडबाय कैंसर

रवींद्र व्यास

पता नहीं वह किस दिशा से आता है। कब आता है। बिना कोई आहट किए...देब पांव। धीरे-धीरे, चुपचाप। और आकर ऐसे दबोचता है कि जीवन का रस सूखने लगता है और जीवन के वसंत में पतझड़ का सन्नाटा पसर जाता है। लगता है जैसे वह किसी केकड़े की तरह सरकता हुआ भरे-पूरे जीवन को अपने जबड़ों जकड़ लेता है। उसका नाम सुनते ही भय पैदा होता है। सिहरन-सी दौड़ जाती है...कंपकंपी पैदा होती है....कैंसर।

मेरे शहर इंदौर मे कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें कैंसर ने कभी दबोचा था लेकिन उनमें ऐसा कुछ माद्दा था जिसके चलते उन्होंने न केवल कैंसर को हराया बल्कि जीवन में वापस लौटकर वे फिर हंसते-गाते देखे जा सकते हैं। जीवन के रस से सराबोर, हर पल को अमूल्य समझते हुए। अपने परिजनों और मित्रों के साथ खिलखिलाते हुए। उनके जीवन में आस्था के फूल खिले हैं और उनकी खुशबू में अपनी जिजीविषा को वे नए अर्थ दे रहे हैं।

अपने आत्मबल, आत्मविश्वास, अदम्य और अथक संघर्ष के साथ वे एक भरा-पूरा जीवन जी रहे हैं। कुछ मित्र-परिजनों का आत्मीय साथ, हमेशा हिम्मत बंधाता हुआ। और मौन के समुद्र में प्रार्थना के मोती झिलमिला रहे हैं जिनसे निकलती रोशनी की किरणें उनके जीवन को सुनहरा बना रही हैं। श्रीमती सीमा नातू को सन् 98 में पता चला कि उन्हें कैंसर है। वे कहती हैं-तब मेरे सामने मेरा दो साल का बेटा था। मैंने ज्यादा सोचा नहीं क्योंकि आदमी सोच-सोचकर ही आधा मर जाता है। बेटे को देख-देखकर ही मैंने ठाना कि कि मुझे जीना है। स्वस्थ रहना है। मैंने कई शारीरिक और मानसिक तकलीफों को सहा और भोगा लेकिन हार नहीं मानी। आज मैं स्वस्थ हूं।

सुगम संगीत की शौकीन श्रीमती नातू अब सामान्य जीवन बिता रही हैं। वे कहती हैं-मैं जीवन का हर पल जीना चाहती हूं। हर पल का सदुपयोग करना चाहती हूं।

एक युवा हैं नितीन शुक्ल। हट्टे-कट्टे। हमेशा हंसते-खिलखिलाते। उन्हें देखकर कल्पना करना मुश्किल है कि उन्हें कैंसर हुआ था। उनका हंसमुख व्यक्तित्व बरबस ही आकर्षित करता है। वे बहुत ही मार्मिक बात कहते हैं-यह जानकर कि मुझे कैंसर है, मैं डरा नहीं। निराश भी नहीं हुआ। मुझे लगता है कैंसर रोगी उतना प्रभावित नहीं होता जितना उसके परिवार वाले। उनके चेहरों पर हमेशा दुःख और भय की परछाइयां देखी-महसूस की जा सकती हैं। इसलिए मैंने तय किया कि मैं कैंसर से फाइट करूंगा और अपने परिवार को बचा लूंगा। दो बेटियों के पिता नितीन कहते हैं मैं अपने छोटे भाई के साथ मुंबई अकेला गया। सारी टेस्ट कराईं। इलाज कराया। मैंने हिम्मत नहीं हारी औऱ आज आप मुझे अपने परिवार के साथ हंसता-खेलता देख रहे हैं।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने कैंसर पर विजय पाकर अपने जीवन को दूसरों के लिए समर्पित कर दिया है। इनमें से एक हैं श्रीमती विशाखा मराठे। वे इंदौर के एक वृद्धाश्रम में बुजुर्गों की सेवा करती हैं। उन्हें सन् 96 स्तन कैंसर हुआ था। पहला आपरेशन बिगड़ गया वे दुःखी थीं लेकिन टूटी नहीं, हारी नहीं। वे कहती हैं-मेरे तीन आपरेशन हुए और ठीक होने के बाद मैंने तय किया कि असहाय लोगों के लिए काम करूंगी। मुंबई में टाटा इंस्टिट्यूट में ट्रेनिंग ली, गाड़ी चलाना सीखा और आज मैं घर और बाहर के अपने सारे काम करती हूं।

इसी तरह युवा आरती खेर का मामला भी बहुत विलक्षण है। परिवार में सबसे पहले उन्हें ही सन् 95 में पता लगा कि उन्हें ब्लड कैंसर है। वे कहती हैं- आप विश्वास नहीं करेंगे, मैं कतई दुःखी नहीं हुई। निराश भी नहीं। शारीरिक तकलीफ तो सहन करना ही पड़ती है। मुझे नहीं पता मुझे कहां से शक्ति आ गई थी। मैंने अपने डॉक्टर के निर्देशों का सख्ती से पालन किया। इसीलिए जल्दी अच्छे रिजल्ट्स मिलने लगे और एक दिन मैं ठीक हो गई। आरती ठीक हो गई हैं और पेंटिंग का अपना शौक बरकरार रखे हुए हैं। वे मनचाही तस्वीर बनाती हैं, मनचाहे रंग भरती हैं। वे बच्चों को पढ़ाती भी हैं।

श्रीमती आशा क्षीरसागर का मामला अलग है। उन्हें जब मालूम हुआ कि वे कैंसरग्रस्त हैं तो उन्हें धक्का लगा। वे बेहत हताश हो गईं। वे कहती हैं-मुझे लगा अब जिंदगी मेरे हाथ छूट गई है। मुंबई इलाज के लिए गई। वापस आई तो लगा जीवन ऐसे ही खत्म नहीं हो सकता। इसलिए अपने दुःख-निराशा को झाड़-पोंछकर फिर सामान्य जीवन में आ गई हूं। अब मैं घर के सारे काम बखूबी संभाल लेती हूं। खूब घुमती-फिरती हूं। फिल्में देखती हूं। लगता है कैंसर के बावजूद जीवन कितना सुंदर है।

बैंक के सेवानिवृत्त अधिकारी एम.एल. वर्मा को सन् 89 में इसोफेगस का कैंसर हुआ। उनकी आवाज चली गई थी। बोलने में बेहत तकलीफ होती थी। सांस लेने में जान जाती लगती थी। वे कहती हैं-मेरी चार लड़कियां हैं। मुझे ठीक होना ही था। मैं ठीक हुआ। कैंसर से लड़ने की ताकत मुझे अपनी बेटियों से मिली। मैं तीन की शादी कर चुका हूं, चौथी की तैयारी है। श्री वर्मा का स्वर यंत्र निकलने के बावजूद वे अब ठीक से बोल पाते हैं। खाने-पीने में शुरुआती तकलीफ के बाद अब इसमें कोई समस्या नहीं आती। वे कहते हैं-मौत एक बार आनी ही है लेकिन विल पावर के चलते आप बड़ी से बड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ सकते हैं। दो-तीन कीमो-थैरेपी और 30 रेडिएशन के बाद उनके गले में छेद किया गया था जिसके बदौलत वे बोल पाते हैं। पेट से हवा खींचकर वे अपने स्पीच को इम्प्रूव कर रहे हैं। यानी बिना स्वर यंत्र के जीवन से सुर मिला रहे हैं। वे कहते हैं-कैंसर होने के आठ साल तक यानी सेवानिवृत्त होने तक ईमानदारी से नौकरी की। आज मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूं।

तो ये वे लोग हैं जो कैंसर को पूरी तरह जीत चुके हैं। कहने की जरूरत नहीं, जीवन जीने की की अदम्य चाह के कारण ही वे एक बड़े रोग से गुजरकर, जीवन के वसंत में सांसें ले रहे हैं। जहां उनके स्वप्न हैं, उनकी आकांक्षाएं हैं, छोटे-छोटे सुख हैं और है एक भरा-पूरा संसार जो लगातार उन्हें कुछ सार्थक करने की प्रेरणा और उत्साह देता रहता है। क्या इनका जीवन दूसरे लोगों के लिए प्रेरणा नहीं बन सकता?

Thursday, September 4, 2008

युवावस्था में भी दिख जाते हैं स्तन कैंसर के लक्षण


ज्यदातर लोग जानते हैं कि फैमिली हिस्ट्री, ज्यादा उम्र जैसे कारक स्तन कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं।

ताजा खबर ये है कि महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर के खतरे का आकलन उनकी युवावस्था में भी काफी हद तक किया जा सकता है।

ताजा रिसर्च बताता है कि कुछ सामान्य और कैंसर से जुड़े न लगने वाले कम उम्र के लक्षण भी किसी को स्तन कैंसर होने की संभावना को आंकने में मदद कर सकते हैं। यहां तक कि उनके ट्यूमर के प्रकार का भी अंदाजा भी देते है। इसलिए अपनी कुछ आदतों में बदलाव करके वे महिलाएं ज्यादा आक्रामक प्रकार के कैंसर की संभावना को कम आक्रामक कैंसर में बदलने की कोशिश भी कर सकती हैं।

इसीलिए डॉक्टर हमेशा कहते हैं कि शरीर का ज्यादा वज़न, खास तौर पर युवावस्था में अचानक बढ़ने वाला वज़न हमेशा खतरे की घंटी होता है, इसे अनसुना करना खतरनाक है।

कुछ महिलाओं के कैंसर का इलाज आसानी से हो जाता है जबकि दूसरों का स्तन कैंसर ज्यादा खतरनाक होता है, क्यों? इसमें जीन और अनुवांशिकता का हाथ जरूर होता है। लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि महिलाओं की पर्सनल हिस्ट्री से भी उनके कैंसर का प्रकार काफी हद तक निर्धारित होता है।

फ्रेड हचिंसन कैंसर रिसर्च सेंटर के डॉक्टरों ने 1100 विभिन्न प्रकार के स्तन कैंसरों की मरीज महिलाओं और 1500 स्वस्थ महिलाओं में युवावस्था के दौरान कुछ खास लक्षणों और आदतों की तुलना की। उन्होंने पाया कि जिन महिलाओं ने अपने बच्चों को कम से कम 6 माह तक स्तनपान कराया था उन्हें ज्यादा खतरनाक कैंसर का खतरा दूसरों के मुकाबले आधा था।

इसके अलावा जिन महिलाओं के पीरियड जल्दी शुरू होते हैं उनके ट्यूमर का इलाज, देर से रजस्वला होने वाली महिलाओं के कैंसर की तुलना में दो गुना ज्यादा कठिन होता है। देर से रजस्वला होने वाली महिलाओं का ट्यूमर ईस्ट्रोजन सेंसिटिव होने की संभावना ज्यादा होती है। इसका सीधा सरल मतलब यह है कि उन्हें अगर कैंसर हो तो उसका इलाज ज्यादा सरल और सफल होता है।

अभी इससे आगे का रिसर्च जारी है इसलिए यहां जानकारी का अंत नहीं होता। हम सब इंतज़ार करें, इस क्षेत्र में किसी ब्रेकथ्रू का जो इस मानवीय त्रासदी से निबटने का रास्ता दिखाए।

Saturday, August 30, 2008

'नई दुनिया' में 'इंद्रधनुष'


इंदौर से निकलने वाले अखबार नई दुनिया के ब्लाग्स पर रवंद्र व्यास जी के कालम में इस बार, 29 अगस्त को अपने इसी ब्लाग की चर्चा हुई है। इस कालम का लिंक नीचे है। आप भी देखें। http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0808/29/1080829044_1.htm

Wednesday, August 27, 2008

कैंसर पहेली - 2

इस हिस्से में त्वचा, कोलोन, प्रोस्टेट के कैंसर से जुड़े सवाल-जवाब। जवाब अंत में दिए गए हैं।

9. कोलोन कैंसर का संबंध जेनेटिक बीमारियों से है।
O सही
O गलत

10. प्रोस्टेट कैंसर की नियमित जांच करवाने की कोई जरूरत नहीं है।
O सही
O गलत

11. खून की जांच से प्रोस्टेट कैंसर का पता लग सकता है।
O सही
O गलत

12. त्वचा का कैंसर गोरे लोगों को ही होता है, कालों को नहीं हो सकता।
O सही
O गलत

13. जन्म के समय त्वचा पर ज्यादा तिल हों तो त्वचा के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
O सही
O गलत

14. बचपन में ज्यादा धूप सेकने सा त्वचा के कैंसर से कोई संबंध नहीं है।
O सही
O गलत

9. परिवार में किसी को मधुमेह, अल्ज़ाइमर्स, ग्लैकोमा या कैंसर रहा हो तो कोलोन (मलाशय) कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।

10. पुरुषों को 50 साल की उम्र से प्रोस्टेट कैंसर के लिए नियमित जांच करवानी चाहिए। परिवार में इसकी हिस्ट्री होने पर यह जांच 45 की उम्र में शुरू कर देनी चाहिए।

11. खून की पीएसए जांच से उसमें मौजूद एंटीजेन की मौजूदगी का पता लगता है। इस एंटीजेन के ज्यादा होने से प्रोस्टेट कैंसर का अंदेशा होता है।

12. त्वचा का कैंसर किसी को भी हो सकता है। गहरे रंग की त्वचा में मेलानिन पिगमेंट ज्यादा होता है जो सूर्य की पराबैंगनी (अल्ट्रावॉयलेट) किरणों को रोकता है। इसलिए त्वचा में ज्यादा मेलानिन हो तो कैंसर का खतरा कम हो जाता है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होता।

13. ज्यादातर तिल जन्म के बाद ही बनते हैं। लेकिन कुछ लोगों को जन्म से ही तिल होते हैं। पैदाइसी तिलों से त्वचा के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

14. लंबे समय तक खाई तेज धूप त्वचा पर स्थाई असर डाल सकती है। बचपन में ज्यादा धूप खाने से बड़े होने पर मेलानोमा का खतरा बढ़ जाता है।

Tuesday, July 22, 2008

कैंसर पहेली - 1

कैंसर के बारे में आप कितना जानते हैं? इन सवालों का जबाव दीजिए और लीजिए अपने कैंसर ज्ञान की परीक्षा।

सवालों के जवाब अंत में दिए गए हैं। खास बात ये है कि इस पहेली में चोरी से जवाब देख लेने की पूरी छूट है। तो हैं तैयार?

1. कम उम्र की खान-पान, सिगरेट-तंबाकू की बुरी आदतों का बड़ी उम्र में कोई असर नहीं पड़ता।
* सही
* गलत

2. सर्जरी से कैंसर का इलाज करने से वह फैलता है
* सही
* गलत

3. विशेषज्ञ कैंसर का पुख्ता इलाज ढू़ढ चुके हैं। लेकिन महंगे, लंबे इलाज से वे ज्यादा धन कमाना चाहते हैं।
* सही
* गलत

4. ग्रिल्ड मीट नियमित रूप से खाने से कैंसर का कोई संबंध नहीं है।
* सही
* गलत

5. घरेलू कीटनाशक स्प्रे से कैंसर नहीं होता।
* सही
* गलत

6. पुरुषों को स्तन कैंसर नहीं होता।
* सही
* गलत

7. स्तन कैंसर शहरी महिलाओं में सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है।
* सही
* गलत

8. स्तन कैंसर की जांच के लिए विशेषज्ञ किस उम्र से नियमित मैमोग्राम कराने की सलाह देते हैं?
* 40 साल
* 50 साल

जवाब:

1. ज्यादातर मामलों में लंबे समय से काम कर रहे कई कारक मिलकर कैंसर को जन्म देते हैं। इसलिए युवावस्था के खान-पान, धूम्रपान, शारीरिक गतिविधियों का असर शरीर पर बाद के जीवन में भी दिखाई पड़ता है।

2. कैंसर के विशेषज्ञ सर्जन जानते हैं कि किस तरह सुरक्षित डंग से बायोप्सी या ऑपरेशन किया जाए कि कंसर न फैले। कई तरह के कैंसरों में तो सर्जरी ही सबसे पक्का इलाज है।

3. यह लोगों का वहम है। जरा खुद सोचिए, डॉक्टरों के अपने रिश्तेदार कैंसर का वही इलाज करवा रहे हैं जो बाकी लोग। उनमें से कई मर भी रहे हैं। ऐसे में क्या यह सही हो सकता है कि कोई भी डॉक्टर इलाज जानबूझ कर न करे? कैंसर एक नहीं बल्कि कई तरह का होता है और सबका इलाज अलग-अलग होता है। इनमें से कुछ का इलाज ढूंढा जा चुका है।

4. बार्बेक्यू के ज्यादा इस्तेमाल से कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है। मीट को ग्रिल करने, कास तौर पर ज्यादा पकाने या जलाने से उसमें कैंसरकारी तत्व बन जाते हैं। ज्यादा अनाज, फल और सब्जियां काना इसका अच्छा विकल्प है।

5. मौजूदा रिसर्च साबित नहीं करते कि घरेलू कीटनाशक स्प्रे और कैंसर में सीधा संबंध है। लेकिन इनका फेफड़ों में जाना या सीधे संपर्क में आना खतरनाक है। हालांकि पेड़-पौधों में डाले जाने वाले कीटनाशक कई तरह के कैंसरों को बढ़ावा देते हैं।

6. स्तन कैंसर के हर 200 मरीजों में से एक पुरुष हो सकता है।

7. दुनिया में महिलाओं को सबसे ज्यादा स्तन कैंसर ही हो रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तान में हर एक लाख औरतों में 32 स्तन कैंसर से पीड़ित हैं। बड़े शहरों में दस में से एक महिला को स्तन कैंसर होने की संभावना है।

8. अमरीका की नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट, अमेरिकन कैंसर सोसाइटी और अमेरिकन मेडीकल एसोसिएशन के मुताबिक 40 की उम्र के बाद महिलाओं को एक या दो साल में मैमोग्राम करवाना चाहिए।

Tuesday, July 8, 2008

आसान हो रहा है कैंसर के साथ जीना

# अब लोग कैंसर के साथ लंबा और बेहतर जीवन जी रहे हैं।

# नई दवाओं और इलाज के तरीकों ने माहौल और लोगों के सोचने का ढंग बदल दिया है।

# अस्पतालों में ऐसे कई कैंसर के मरीज आपको मिल जाएंगे जो पिछले 24-25 साल से तमाम आशंकाओं को नकारते हुए अपना सफर ज़िंदादिली के साथ तय कर रहे हैं। काफी संभव है कि जब मृत्यु आए तो उसकी वजह कैंसर न हो।

# मरीज़ के ठीक होने की अनिवार्यता की जगह उसका जीवन बेहतर बनाने की कोशिश को अहमियत दी जा रही है।

# चिकित्सा समाज में यह बदलाव क्रांतिकारी है।

# मेटास्टैटिक (शरीर के दूसरे हिस्सों में फैले) कैंसर के मरीजों में भी भविष्य को लेकर उम्मीद जाग रही है।

# कैंसर के मरीज़ों के लिए अच्छी तरह जीने का इससे बेहतर वक्त कभी नहीं रहा।

ये कुछ बिंदु मैंने लेख आखिरकार हार रहा है कैंसर में उठाए हैं। यह लेख 8 जुलाई 2008 को नवभारत टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित हुआ है।

आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है।
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