<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935</id><updated>2012-01-26T01:47:24.200+05:30</updated><category term='living healthy'/><category term='शराब और कैंसर'/><category term='नया इलाज'/><category term='कैंसर रिसर्च'/><category term='शोक/आक्रोश'/><category term='जीना इसी का नाम life style and cancer'/><category term='धूम्रपान'/><category term='अनुराधा'/><category term='स्टीव सॉब्स'/><category term='एंटी ऑक्सीडेंट'/><category term='सर्वाइकल कैंसर'/><category term='तंबाकू'/><category term='स्तन कैंसर जागरूकता'/><category term='दिलचस्प तथ्य'/><category term='फ्री-रैडिकल्स'/><category term='मोटापा'/><category term='cancer research hype or hope?'/><category term='life style and cancer'/><category term='R Anuradha'/><category term='स्तन कैंसर जागरूकता अभियान'/><category term='स्तन कैंसर जागरूकता माह'/><category term='कीमोथेरेपी'/><category term='About Cancer'/><category term='कैंसर को हराते लोग'/><category term='लाइफ स्टाइल'/><category term='कैंसर फैक्ट्स'/><category term='अपने ब्लॉग की चर्चा'/><category term='कॉफी'/><category term='पिंक रिबन'/><category term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category term='कैंसर और कविता'/><category term='हंसी का कोना'/><category term='Living with cancer'/><category term='सेल फोन और कैंसर'/><category term='दिलचस्प किस्से'/><category term='जीना इसी का नाम'/><category term='कुछ इधर-उधर की'/><category term='चर्चा में'/><category term='अनुभव'/><category term='रसायन और कैंसर'/><category term='कैंसर अनुसंधान'/><category term='कैंसर की पहचान'/><category term='कैंसर क्यों होता है'/><category term='एक कैंसर विजेता की डायरी'/><category term='इंद्रधनुष'/><category term='कैंसर का इलाज'/><category term='कैंसर खबर'/><category term='कैंसर के बारे में'/><title type='text'>RAINBOW/इंद्रधनुष</title><subtitle type='html'>This blog is of all those whose lives or hearts have been touched by cancer.


यह ब्लॉग उन सबका है जिनकी ज़िंदगियों या दिलों के किसी न किसी कोने को कैंसर ने छुआ है।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>71</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-284693590395089474</id><published>2012-01-07T08:55:00.000+05:30</published><updated>2012-01-07T08:55:24.451+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर अनुसंधान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर का इलाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='cancer research hype or hope?'/><title type='text'>हाल के समय में हुईं कैंसर के इलाज की कुछ महत्वपूर्ण खोजें</title><content type='html'>&lt;b&gt;मोनोक्लोनल एंटीबॉडी-&lt;/b&gt; त्वचा का कैंसर मेलानोमा तेजी से फैलता है और विकसित अवस्था में इसका इलाज मुश्किल होता है। इसीलिए इस अवस्था में मरीज के जीने की संभावना औसतन 8 से 18 माह ही होती है। अब तक इसका इलाज डाकार्बाज़ाइन नाम की कीमोथेरेपी दवा से ही किया जाता है। यह दवा सीधे ट्यूमर पर हमला करती है। क्योंकि कैंसर की रक्त के जरिए फैलने की प्रवृत्ति होती है इसलिए एक सीमा के बाद दवा असरकारक नहीं रहती। ऐसे में कैंसर विकसित होता रहता है और आखिर जानलेवा साबित होता है। लेकिन न्यू यॉर्क के स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर ने विकसित मेलानोमा के मोनोक्लोनल एंटीबॉडी यानी शरीर में ही इस खास कैंसर से निकलने वाले सहयोगी प्रोटीन के खिलाफ बनाई गई एंटीबॉडी से इलाज के लिए डाकार्बाज़ाइन के साथ इपिलिमुमाब नाम के रसायन का इस्तेमाल किया। तुलना करके देखा गया कि जिन मरीजों को सिर्फ डाकार्बाज़ाइन दी गई उनके एक साल तक जीवित रहने की उनकी संभावना 36.3 फीसदी रही जबकि दोनों दवाएं पाने वालों के लिए यह प्रतिशत 50 रहा। इसे पिछले 30 साल में त्वचा के कैंसर की सबसे जबर्दस्त खोज कहा जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अन्य शोध में इसी संस्थान की एक और टीम ने डाकार्बाज़ाइन की तुलना में वेमुराफेनिब दवा का इस्तेमाल करके देखा कि यह बी-आरएएफ नामक जीन के कैंसरकारी म्यूटेशन के असर को रोकती है। यह म्यूटेशन त्वचा के कैंसर के करीब आधे  ट्यूमरों में मौजूद पाया गया है। बी-आरएएफ जीन एक एंजाइम छोड़ता है, जो ज्यादा सक्रिय होने पर त्वचा की रंजक कोशिकाओं मेलानोसाइट्स के कैंसर की संभावना को बढ़ा देता है। वेमुराफेनिब एक एंजाइम है जो म्यूटेटेड बी-आरएएफ जीन की गतिविधियों पर रोक लगा कर कैंसर बनने को ही रोक देता है। इस इलाज से मरीजों का छह माह जीवित रहने की संभावना 84 फीसदी थी जबकि डाकार्बाज़ाइन लेने वाले समूह की 64 फीसदी। यह इलाज इतना प्रभावी रहा कि इस परीक्षण को बीच में ही रोक दिया गया ताकि सभी मरीजों को इसमें शामिल करके उन्हें भी इस टार्गेटेड इलाज का लाभ दिया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;एंटी एंजियोजेनिक थेरेपी-&lt;/b&gt; इस साल अप्रैल के पहले हफ्ते में खबर आई कि क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट, इंग्लैंड के फार्मेसी स्कूल और अल्माक डिस्कवरी लिमिटेड के वैज्ञानिकों ने ऐसा इलाज खोजा है जिसमें दवा ट्यूमर पर सीधे हमला करने की बजाए उसकी रक्त नलिकाओं की बढ़त को रोक देती है। इस तरह ट्यूमर कोशिकाओं को ऑक्सीजन और पोषण मिलना बंद हो जाता है और वे मर जाती हैं। वैसे तो 1985 से ही वैज्ञानिक जानते थे कि रक्त नलिकाएं ट्यूमर के लिए विशेष आपूर्ति हेतु विकसित हो जाती हैं। लेकिन उन्हें बढ़ने से रोका कैसे जाए, इस सवाल का जवाब उन्हें अब मिल गया है। उम्मीद है कि यह थेरेपी सभी तरह के ठोस ट्यूमरों के लिए असरदार रहेगी। अभी प्राकृतिक प्रोटीन और पेप्टाइड पर आधारित यह एंटी एंजियोजेनिक पद्यति प्रि-क्लीनिकल स्तर से गुजर रही है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इसी तरह के एक और परीक्षण के बारे में ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के कैंसर थेरैप्यूटिक संस्थान की रिपोर्ट जर्नल कैंसर रिपोर्ट में प्रकाशित हुई है। इसके मुताबिक सूजन, जलन आदि के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑटम क्रोकस के फूल में पाया जाने वाला जहरीला रसायन कोल्चिसिन कैंसर के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि अपने आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपने लिए जगह बनाने के लिए सभी ट्यूमर कुछ एंजाइम पैदा करते हैं। संवर्धित कोल्चिसिन अणु में एर प्रोटीन होता है जिससे यह अक्रिय बना रहता है। लेकिन जब यह प्रोटीन इन एंजाइमों के संपर्क में आता है तो वह नष्ट हो जाता है और कोल्चिसिन सक्रिय हो जाता है। और तब वह ट्यूमर को पोषण देने वाली रक्त नलियों को नष्ट कर देता है और ट्यूमर खत्म हो जता है। इस तरह यह दवा सिर्फ ट्यूमर पर ही असर करती है, स्वस्थ कोशिका पर नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सीरियल किलर टी-सेल-&lt;/b&gt; इसी प्रक्रिया से जुड़ी एक खोज पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने विकसित अवस्था के ल्यूकेमिया यानी रक्त कैंसर के इलाज के लिए टी-लिंफोसाइट को जेनेटिकली इंजीनियर किया है। इस प्रयोग में शामिल तीन में से दो मरीज एक साल से ज्यादा समय तक स्वस्थ रहे, उनमें कैंसर लौट कर नहीं आया। हार्वर्ड मेडीकल स्कूल ने कैंसर कोशिकाओं में एक खास रसायन की मौजूदगी को खोजा था, जिसे इस ताजा प्रयोग में निशाना बनाया गया है। कैंसर पर हमला करने वाली कोशिका बनाने के लिए एक वायरस के जीन में बदलाव किए गए ताकि वह ऐसा रसायन बनाए जो ल्यूकेमिया कोशिका से जुड़ जाए और वहां रक्त में मौजूद टी-लिंफोसाइट को उकसाए कि वह कैंसर कोशिकाओं को मार दे। फिर मरीज के शरीर से रक्त निकाल कर उसमें यह वायरस डाल दिया गया। जब संक्रमित खून वापस मरीज के शरीर में डाला गया तो हर इंजीनियर्ड टी-लिंफोसाइट हजार से ज्यादा बार बहुगुणित हुई और कई महीने जिंदा रह कर कैंसर को खत्म कर दिया। इनसे अक्रिय ‘यादगार’ टी-कोशिकाएं भी बनीं, जो कैंसर के दोबारा पनपने पर उसे पहचान कर अपने आप ही उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू देंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आई-बेट 151-&lt;/b&gt; इंग्लैंड में ग्लैक्सो स्मिथ क्लीन व कैंसर रिसर्च यूके (क्रुक) ने खोजा कि 2 साल से छोटे बच्चों में एक्यूट ल्यूकेमिया के 80 फीसदी मामलों और वयस्कों में 1-10 फीसदी मामलों में मिक्स्ड लीनिएज ल्यूकेमिया या एमएलएल होता है। एमएलएल जीन एक अन्य जीन के साथ मिल कर फ्यूजन प्रोटीन बनाता है जो कि ल्यूकेमिया बनाने वाले जीन को काम शुरू करने को उकसा देता है। लैब में चूहों की और मानव कोशिकाओं में आई-बेट 151 प्रोटीन से यह प्रक्रिया रोकी जा सकी है। यह थेरेपी अभी परीक्षण के शुरुआती चरण में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रेनियम-186 और लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी-&lt;/b&gt; क्वींस यूनिवर्सिटी, बेलफास्ट में एडवांस प्रोस्टेट कैंसर के फेस-1 ट्रायल में मरीजों को कीमोथेरेपी के साथ रेडियोएक्टिव रेनियम-186 (Rhenium) दी गई। दूसरा फेज़ 6 माह में शुरू होगा, जिसके नतीजे दो साल में आएंगे। यूसी सांता बारबरा में प्रोस्टेट कैंसर का एक और इलाज खोजा गया। लेसर स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक कैंसर कोशिका और स्वस्थ कोशिका में अंतर करती है। इस गुण की जानकारी से स्वस्थ कोशिकाओं को बचाते हुए केवल बीमार कोशिकओँ को नष्ट करने के लिए रेडियोथेरेपी का उपयोग किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;इन पद्यतियों को बाजार तक आने में अभी बरसों लगेंगे। &lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-284693590395089474?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/284693590395089474/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=284693590395089474' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/284693590395089474'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/284693590395089474'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='हाल के समय में हुईं कैंसर के इलाज की कुछ महत्वपूर्ण खोजें'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-299449436997275256</id><published>2012-01-07T08:51:00.000+05:30</published><updated>2012-01-07T08:51:27.051+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर अनुसंधान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर क्यों होता है'/><title type='text'>कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 2</title><content type='html'>&lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2012/01/1.html"&gt;कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।&lt;br /&gt;-आर. अनुराधा&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी कोशिका के भीतर जेनेटिक रसायनों यानी जीनों में अचानक बदलाव आने के कारण उसके अनियंत्रित हो जाने और अपनी तरह की बीमार, अधूरी कोशिकाओं की संख्या बढ़ाते जाने का नाम ही कैंसर है। यह अचानक बदलाव म्यूटेशन कहलाता है। जीनोम की जानकारी के बाद अब वैज्ञानिक ट्यूमर के बजाए उसके बनने की प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, ताकि ट्यूमर की जड़ को ही खत्म किया जा सके। इसी के साथ-साथ काम करती है शरीर में फैल चुकी कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए टार्गेटेड कीमोथेरेपी। इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर वैज्ञानिक हर म्यूटेशन और उसके रासायनिक वातावरण को समझ कर उसी के अनुरूप दवाएं खोजने में जुटे हैं। इस तरह पर्सनलाइज्ड और टार्गेटेड इलाज से एकदम सटीक इलाज तय किया जा सकता है, बिना स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए। इस तरह का इलाज छोटा और सस्ता होगा, मरीज को इलाज की तकलीफ भी नहीं झेलनी होगी। इसलिए सिर्फ ट्यूमर पर फोकस करने की बजाए अब वैज्ञानिक मरीज की रासायनिक बनावट को भी जांच के दायरे में ला रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ हमारे बाहरी रासायनिक वातावरण का गहरा असर शरीर के रासायनिक संतुलन पर पड़ता है। रसायनों का यह हमला हमारे जीवन पर बढ़ता जा रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय आयुधों के लिए या लोगों के सामूहिक संहार के लिए बने ऑर्गैनोक्लोरीन जैसे रसायनों को उद्योगों ने हमारे रोज के इस्तेमाल की चीजों में तब्दील कर दिया। धुलाई, सफाई और सौंदर्यवर्धन से लेकर कीटाणु-जीवाणु, मच्छर-मक्खी और फसलों की खरपतवार के नाश तक के लिए बने उत्पादों में ये जहरीले रसायन भरपूर हैं, जिन्हें हम बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं। इनका इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही कैंसर होने की संभावना भी बढ़ती है। इसी के साथ हमारी जीवनशैली की कमियां भी नत्थी हैं, जो कैंसर को बढ़ावा देती हैं। इस अर्थ में  कैंसर कोई ऐसी बीमारी नहीं जो कीटाणुओं से होती है, बल्कि कई कारकों का दुष्परिणाम है जो शरीर के मेटाबॉलिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं और यह बिगड़ाव कैंसर के रूप में सामने आता है। यह दरअसल कैंसर की रोकथाम का एक महत्वपूर्ण बिंदु है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन बाहरी और भीतरी हमलों के खिलाफ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र लगातार काम करता रहता है। जीवन भर हर एक के शरीर में लगातार ‘कैंसर’ कोशिकाएं बनती रहती हैं और उन्हें शरीर नष्ट भी करता रहता है। लेकिन एक सीमा के बाद जब उन्हें रोक पाना प्रतिरक्षा तंत्र के बस में नहीं होता, तब कैंसर बीमारी के रूप में फैलने लगता है, जिसे रोकने के लिए इलाज की जरूरत होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाज की इन तकनीकों ने कई तरह के कैंसरों में मरीजों का जीवन बचाया है, या पहले से आसान बनाया है। अमरीका में 1990 से 2007 के बीच कैंसर से मृत्यु दर में पुरुषों में 22 और महिलाओं में 14 फीसदी की कमी आई है। 1975 में आधी संख्या में ही मरीज 5 साल तक जी पाते थे, अब करीब 70 फीसदी मरीजों का जीवन पांच साल तक खिंच जाता है। यह प्रगति महत्वपूर्ण है, पर काफी नहीं। इतना आगे बढ़ पाने के बाद भी हम अभी कैंसर से मुक्ति के उपाय के आस-पास भी नहीं हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर साल सवा करोड़ नए कैंसर मरीजों की पहचान होती है और इस साल 75 लाख लोग इस बीमारी से मर जाएंगे। 20 साल में कैंसर से मरने वालों की संख्या सालाना लगभग दोगुनी- 1.2 करोड़ तक हो जाएगी। कैंसर दरअसल बड़ी उम्र की बीमारी है। पुराने होते शरीर की कोशिकाएं भी करोड़ों बार के विभाजन के बाद स्वाभाविक ही, थक जाती हैं, असामान्य होने लगती हैं उनमें बदलाव, म्यूटेशन आने लगते हैं। इसलिए लोगों की उम्र लंबी होने के और बड़ी उम्र के लोगों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में 25 लाख कैंसर के मरीज हैं और हर साल 8 लाख से ज्यादा नए मामले दर्ज होते हैं और साढ़े पांच लाख मर भी जाते हैं। इनके अलावा हज़ारों हैं जो कैंसर अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते। हमारे यहां 70 फीसदी मामलों में एडवांस स्टेज में ही मरीज इलाज के लिए पहुंच पाता है। तब तक बीमारी काबू के बाहर हो जाती है। आर्थिक स्थिति भी कई बार पूरे इलाज से मरीज को वंचित रखती है और इस तरह बहुमूल्य मानव संसाधन का नुकसान होता है। जो आर्थिक क्षमता रखता है, वह मौजूदा महंगे, लंबे इलाज से बंधा रहता है। इलाज कितना कारगर होगा, वह बच पाएगा या नहीं इसी अनिश्चितता में लगातार भावनात्मक ऊहा-पोह की स्थिति में रहता है। कैंसर व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के लिए भी आर्थिक और भावनात्मक सदमे का कारण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर पहली या दूसरी अवस्था में ही कैंसर को पहचान कर पूरा इलाज करवाया जाए तो 80 फीसदी तक मरीजों का जीवन बच सकता है जबकि स्टेज तीन या चार के मरीजों के बचने की संभावना 20 फीसदी तक ही होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो इलाज की तकनीकें और दवाएं मरीज को उपलब्ध हैं, वे भी फिलहाल कैंसर से मुक्ति का तरीका नहीं हैं। कैंसर से मुक्ति का रास्ता लंबा है और इसका भविष्य इन्हीं मौजूदा आजमाइशों की सफलता पर निर्भर करेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-299449436997275256?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/299449436997275256/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=299449436997275256' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/299449436997275256'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/299449436997275256'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2012/01/2.html' title='कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 2'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-8754190711463060914</id><published>2012-01-07T08:44:00.001+05:30</published><updated>2012-01-07T08:55:52.845+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर अनुसंधान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><title type='text'>कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1</title><content type='html'>&lt;i&gt;कैंसर को समझने और इसका इलाज ढूंढने के लिए दुनिया भर में चल रहे हजारों-लाखों प्रयोगों का सार दे पाना आसान नहीं है। इस विषय पर कुछ जानकारी पाने के बाद यह आमुख-कथा लिखी,जो नवंबर में शुक्रवार पत्रिका में प्रमुखता से छपी। उस लंबे लेख को दो टुकड़ों में दे रही हूं। और, चूंकि यह एक व्यावसायिक पत्रिकाके लिए, मास कंजम्शन के लिए लिखा गया लेख है, इसलिए इसमें अनुसंधान की राजनीतिकी बारीकियां शामिल नहीं हो पाई हैं। उस पर आगे कभी। वैसे, मूल बात यह है किअखबार,टीवी और पत्रिकाएं जिस उत्साह से कैंसर ब्रेकथ्रू की खबरें देते हैं, वे मरीज के उत्साह का कारण कभी नहीं बन पातीं। यह बात विस्तार से अगले किसी लेख में।&lt;br /&gt;-आर. अनुराधा&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया की तीन बड़ी हस्तियों का कैंसर की वजह से असमय गुज़र जाना हाल के दिनों में चर्चा का बड़ा विषय रहा। हेवीवेट मुक्केबाजी के विश्व चैंपियन मुहम्मद अली को कई बार पछाड़ने वाले ‘स्मोकिंग’ जो फ्रेज़र को लिवर के कैंसर ने पछाड़ दिया। पर्सनल कंप्यूटर के पितामह और एप्पल कंप्यूटर कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स सात साल तक पैंक्रियाटिक कैंसर से जूझते हुए आखिर हार गए। इस साल फिजियोलॉजी या मेडीसिन के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले तीन इम्यूनोलॉजिस्ट में से एक प्रो. राल्फ स्टीनमैन की भी सितंबर के अंत में पैंक्रियाटिक कैंसर से मौत हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि प्रो. स्टीनमैन ने ही 1973 में प्रतिरक्षा प्रणाली की डेंड्रीटिक कोशिकाओं का पता लगाया था जो प्रतिरक्षा तंत्र को संक्रमण और कैंसर के खिलाफ चेताने का काम करती है। उनकी इसी तकनीक के आधार पर 2001 में  इमैटिनिब नाम की पहली थेरैप्यूटिक कैंसर वैक्सीन बनाई गई जो कैंसर हो जाने पर उसके इलाज के लिए दी जाती है। इस क्रांतिकारी खोज के बाद से ही कैंसर के लिए कीमोथेरेपी में अनुसंधानों को नई दिशा मिली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इमैटिनिब जैसी टार्गेटेड दवाओं की खासियत यह है कि ये स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना सीधे कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर उन पर हमला करती हैं और उन्हें खत्म कर देती हैं। जबकि परंपरागत कीमोथेरेपी की दवाएं बीमार और स्वस्थ कोशिकाओं में अंतर किए बिना शरीर की सभी तेजी से बढ़ती कोशिकाओं पर हमला करती चलती हैं।  इलाज की इस तकनीक में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हर मरीज और मर्ज की खासियत के मुताबिक खासतौर पर उसी को लक्ष्य करती है। इन डिजाइनर दवाओं का दायरा छोटा लेकिन सटीक होता है। जबकि पहले कुछ ही दवाएं हर प्रकार के कैंसर के इलाज में काम में लाई जाती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछेक साल में कई तरह के कैंसरों के खिलाफ विभिन्न टार्गेटेड इलाज यानी ‘स्मार्ट बम’ विकसित किए गए। थेरेप्यूटिक वैक्सीन के अलावा ल्यूकेमिया यानी रक्त के कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी, त्वचा के कैंसर मेलानोमा के लिए टार्गेटेड थेरेपी, ठोस कैंसरों के लिए एंटीएंजियोजेनिक यानी ट्यूमर को पोषण पहुंचाने वाली बारीक रक्त नलियों से आपूर्ति रोककर उसे मार देने की थेरेपी का सफल ईजाद किया गया। यहां तक कि जेनेटिक कीमोथेरेपी यानी जीन में हुए कैंसरकारी बदलावों को दवाओं के जरिए उलट देने, प्रतिरोधक तंत्र की कोशिकाओं में जेनेटिक बदलाव करके उन्हें कैंसर को पहचानने और लड़कर उसे खत्म कर देने के लिए प्रशिक्षित करने जैसी नई तकनीकों के प्रयोगों को भी ट्रायल के विभिन्न चरणों में सफलता मिली है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरागत तरीकों में भी कम रेडिएशन और सरल कीमोथेरेपी से बेहतर प्रभाव पैदा करने जैसे सुधार मरीजों के लिए काफी कारगर सिद्ध हुए हैं। इन खोजों और सफलताओं का सिलसिला लगातार जारी है। इनके असर से चमत्कृत वैज्ञानिक तो यहां तक कहने लगे हैं कि कैंसर भविष्य में डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन जैसी बीमारी हो जाएगी जो पूरी तरह ठीक भले ही न हो पर उसके साथ बेधड़क लंबा जीवन जिया जा सकेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैंसर के इलाज की खोज की दिशा में तूफानी रफ्तार से चल रहे अनुसंधानों, परीक्षणों को देखते हुए इसे कैंसर अनुसंधान का स्वर्ण काल कहना शायद गलत न होगा, जैसा कि कैंसर रिसर्च यूके के हरपाल कुमार भी कहते हैं। दुनिया भर में इस समय कैंसर के इलाज की सैकड़ों नई पद्यतियों के परीक्षण चल रहे हैं। अकेले अमेरिका में ही कैंसर के इलाज के लिए वैक्सीनों के कोई साढ़े चार सौ क्लीनिकल ट्रायल इस समय विभिन्न स्तरों पर चल रहे हैं। कैंसर से बचाव की वैक्सीन के भी अनेक ट्रायल विभिन्न अनुसंधान संस्थानों और अस्पतालों में जारी हैं। इनमें से कुछेक ही सफल होते हैं। जो असफल होते हैं, वे भी कैंसर के डेटाबैंक में महत्वपूर्ण जानकारियां जोड़ते हैं। वैज्ञानिकों के पास अब पहले से ज्यादा दवाएं और ज्यादा असरदार विकल्प मौजूद हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी उम्मीदों के बाद भी तथ्य यह है कि कैंसर ज्यादातर लोगों की जिंदगियों पर भारी है। कैंसर का टार्गेटेड इलाज उपलब्ध होने और वैज्ञानिकों द्वारा उनकी सफलताओं के दावों के बाद भी स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन तक को इस बीमारी के आगे झुकना पड़ा। टार्गेटेड थेरेपी खोज लेने वाला वैज्ञानिक कैंसर होने का पता लगने के चार साल में भी अपने लिए कैंसर का सटीक इलाज नहीं खोज पाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लैबोरेटरी के नियंत्रित माहौल में इलाज के सफल उदाहरण अगर वास्तविकता की जमीन पर खड़े नहीं हो पा रहे हैं तो आखिर कसर कहां छूट रही है। क्या कैंसर के इलाज से बंधी उम्मीदें अवास्तविक हैं? एक हद तक। लैब में मिली किसी शुरुआती सफलता को प्रायोजक कंपनी अपने फायदे के लिए खूब प्रचारित करती है। चूंकि यह बीमारी जानलेवा और सनसनीखेज़ मानी जाती है, इसलिए मीडिया भी इसके इलाज की छोटी खबरों को बड़ा बनाकर पेश करता है। और आम आदमी समझता है कि इस मारक बीमारी का पक्का इलाज उसके बेद करीब है। अनुसंधानकर्ता भी कभी-कभार अतिउत्साह में अपनी खोजों को कैंसर का अंतिम इलाज मान बैठते हैं। जबकि परिपक्व अनुसंधानकर्ता समझते हैं कि कैंसर के कारणों की बहुलता के कारण उसके इलाज की पद्यति तय कर पाना सहज नहीं है। फिर भी कैंसर के इलाज ढूंढने के कई रास्ते बड़ी उम्मीदों से भरे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;40 साल पहले 1971 में अमरीका में नैशनल कैंसर एक्ट 1971 बना था जिसमें कैंसर रिसर्च के लिए सरकारी फंडिंग का भी वादा था। पिछले कुछ वर्षों में अमरीका के नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का सालाना बजट करीब 5 अरब डॉलर का रहा है। इन अनुसंधानों से कैंसर के बारे में काफी कुछ पता चला है। यह एक बीमारी नहीं बल्कि सैकड़ों किस्म की बीमारियां हैं। अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ कैंसर रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर 200 से ज्यादा प्रकार की बीमारियां हैं, जिनमें हर एक के कारण और इलाज में थोड़ा-थोड़ा अंतर है। इस जानकारी में ही इस सवाल का आधा जबाव शामिल है कि इतने वर्षों बाद भी क्यों कैंसर का इलाज नहीं ढूंढा जा पाया। दरअसल कैंसर का कोई एक इलाज होगा, इसमें संदेह है। बल्कि ज्यादा संभावना यह है कि जिस तरह कई वायरल बीमारियों के अलग-अलग टीके लगाए जाते हैं, उसी तरह हर कैंसर का इलाज अलग तरह से होगा जो मरीज की और कैंसर की रासायनिक विशेषताओं के आधार पर डिजाइन किया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी बीमारी के इलाज के लिए प्रयोगशाला में मिली सफलता को बाजार तक आने के पहले लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इन पद्यतियों को कई स्वीकृतियों के बाद पहले जीवों पर, फिर कुछ चुनिंदा मरीजों पर, और फिर बड़ी संख्या में मरीजों पर आजमाया जाता है। इनके नतीजों के आधार पर ही किसी तकनीक या दवा को इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिलती है। इसमें काफी समय और धन खर्च होता है। किसी नए इलाज का बाजार तक पहुंचने का सफर एक बड़ी छलांग की बजाए धीमी चाल से ही तय हो पाता है। इस धीमी चाल की वजह से कई इलाज उपलब्ध होने के बावजूद हरेक स्थिति, व्यक्ति पर आजमाये नहीं जा सके हैं, और इसलिए पता नहीं है कि किन मरीजों के लिए वे कारगर होंगे या फिर उनका बेहतरीन इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रयोगशाला से सफल होकर बाहर आए कई टार्गेटेड इलाज कुछेक वर्षों से कैंसर के मरीजों के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ ही प्रकार के कैंसरों के लिए। स्तन कैंसर के लिए हरसेप्टिन विश्व भर में उपलब्ध है। स्तन कैंसर के सौ में से 20 से 30 मरीजों में कैंसर कोशिकाएं बहुत ज्यादा हर-2 प्रोटीन पैदा करती हैं। इसे हर-2 पॉजिटिव कैंसर कहा जाता है। हर-2 कैंसर की सतह पर पाया जाने वाला प्रोटीन है जो कैंसर को बढ़ने का संकेत करता है और ट्यूमर बढ़ता जाता है। इसी प्रोटीन से कैंसर के प्रकार की पहचान करके हरसेप्टिन नाम की टार्गेटेड कीमोथेरेपी, सामान्य कीमोथेरेपी के साथ दी जाती है। हरसेप्टिन हर-2 प्रोटीन को ब्लॉक कर देती है जिससे कैंसर कोशिकाओं को बढ़ोत्तरी का इशारा नहीं मिलता और वे नष्ट हो जाती हैं। इस इलाज का असर अभूतपूर्व रहा है और कई बार सामान्य कीमो करा चुके, हार चुके मरीज भी स्वस्थ हो गए। इमैटिनिब मैसिलेट या ग्लीवैक भी क्रॉनिक मायलॉयड ल्यूकेमिया के लिए टार्गेटेड थेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टीव जॉब्स और डॉ स्टीनमैन दोनों ही पैंक्रियास के कैंसर से पीड़ित थे जिसमें सिर्फ 4 फीसदी मरीज ही पांच साल तक जी पाते हैं और ज्यादातर मरीजों का जीवन एक साल के भीतर ही सिमट जाता है। ऐसे में दोनों कैंसर का पता लगने के बाद सात या चार साल तक जी पाए तो इसमें टार्गेटेड इलाज की नई तकनीकों का भी बड़ा हाथ रहा है। कैंसर के इलाज में पूरी सफलता या कैंसर के साथ जीवन लंबा हो पाने के दो मुख्य कारक हैं – मानव जीनोम की मैपिंग जो 2001 में पूरी हो चुकी है, और जीवन शैली जैसे सरल कारकों के कैंसर होने में योगदान की जानकारी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; (...जारी)&lt;i&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-8754190711463060914?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/8754190711463060914/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=8754190711463060914' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8754190711463060914'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8754190711463060914'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2012/01/1.html' title='कैंसर से निजात की उम्मीदें और संभावनाएं- 1'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-3624285892889461044</id><published>2011-11-16T22:04:00.020+05:30</published><updated>2011-11-16T22:04:00.164+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शराब और कैंसर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर अनुसंधान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर खबर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><title type='text'>विज्ञान या स्वास्थ पत्रकार को क्या नहीं करना चाहिए कैंसर की रिपोर्टिंग या तमाशा</title><content type='html'>कैंसर ब्रेक-थ्रू की खबरें आए दिन जोर-शोर से देते रहने वाले पत्रकार यह भी करते हैं। एक नमूना देखिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंदन की प्रतिष्ठित डेली मेल में एक हालिया खबर है कि रेड वाइन से&lt;a href="http://www.dailymail.co.uk/health/article-2043814/Red-wine-compound-stops-breast-cancer-growing-blocking-female-hormone.html"&gt; ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम में मदद मिल सकती है&lt;/a&gt;। "लैबोरेटरी में परीक्षणों से पता चला है कि अंगूर के छिलके में पाया जाने वाला रसायन ज्यादातर मामलों में इस बीमारी को रोक सकता है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबर में कहानी कुछ इस तरह बताई गई है कि किसी खाद्य पदार्थ में कोई खास रसायन होता है जिसके किसी खास गुण को प्रयोगशाला की पेट्री डिश में देखा गया। इस तरह साबित होता है कि वह खाद्य पदार्थ कैंसर को खत्म करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेड वाइन में रेसवेराट्रोल नाम का रसायन पाया जाता है जो कि अंगूर के छिलके में होता है। पाया गया है कि यह रसायन क्विनोन रिडक्टेज़ नाम के एंजाइम की सक्रियता को बढ़ाता है, जो कि ईस्ट्रोजेन हार्मोन के एक व्युत्पन्न को वापस ईस्ट्रोजन में बदल देता है। देखा गया है कि वह व्युत्पन्न डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और डीएनए को नुकसान होने से उसमें म्यूटेशन हो सकता है और म्यूटेशन से कैंसर होने की संभावना होती है। इस तरह पत्रकारों ने यह साबित कर दिया कि रेड वाइन पीने से कैंसर की रोकथाम होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहानी है, एक अनुसंधान से मिले तथ्यों की एक पत्रकार के नजरिए से ‘खबर’ की। वास्तविक जगत में देखें तो रेड वाइन में उस जरा से रसायन के मुकाबले कई हजार गुना ज्यादा मात्रा में कई और रसायन होते हैं, जिनके किसी व्यक्ति के बड़े से विविधता भरे शरीर पर कई तरह के असर होते हैं। उसका सबसे महत्वपूर्ण रसायन अल्कोहल है, जो टूट कर एसीटेल्डिहाइड बनाता है जो कि खुद डीएनए को बड़ा नुकसान पहुंचाता है। यानी अल्कोहल भयानक रूप से कैंसरकारी है। इसकी छोटी सी मात्रा भी डीएनए को नुकसान पहुंचाने का माद्दा रखती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो, खबर को क्या इस नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए? क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि इस खबर को लिखने-छापने वाला किसी रेड वाइन बनने वाली कंपनी के हाथों बिक गया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे मजेदार तथ्य तो मैंने यह खोज निकाला कि इंग्लैंड के डेली मेल अखबार के ऑनलाइन एडीशन में यह खबर 30 सितंबर 2011 को आई है। और वहीं के &lt;a href="http://www.telegraph.co.uk/news/uknews/2262150/Red-wine-could-help-prevent-breast-cancer.html"&gt;टेलीग्राफ के ऑनलाइन संस्करण में यह&lt;/a&gt; सात जुलाई 2008 को ही छप चुकी है। तो क्या पुरानी खबरे दोबारा लिखने के लिए किसी पत्रकारीय आचार-संहिता को देखने की जरूरत नहीं है? पाठक तो विद्वान पत्रकारों के सामने मूर्ख हैं, लेकिन ये पत्रकार खुद इस तरह मूर्ख बन रहे हैं, क्या उन्हें यह पता भी है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-3624285892889461044?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/3624285892889461044/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=3624285892889461044' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3624285892889461044'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3624285892889461044'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html' title='विज्ञान या स्वास्थ पत्रकार को क्या नहीं करना चाहिए कैंसर की रिपोर्टिंग या तमाशा'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-1822635403112707818</id><published>2011-11-15T22:30:00.002+05:30</published><updated>2011-11-15T22:31:55.995+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर अनुसंधान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर का इलाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='cancer research hype or hope?'/><title type='text'>कैंसर अनुसंधान की मीडिया कवरेजः ब्रेक-थ्रू के बाद हार्ट-ब्रेक?</title><content type='html'>पिछले कुछ दिन मैंने कैंसर के बेहतर इलाज ढूढने के लिए हो रहे अनुसंधानों को पढ़ने और जानने में लगाए। इंटरनेट पर ढेरों वैज्ञानिक सूचनाएं और आंकड़े मिल रहे हैं। हमेशा मिल जाते हैं। कोई नई बात नहीं। पर नई बात एक जो देखी, वह थी विभिन्न ट्रायल्स और अनुसंधानों को विभिन्न चरणों में मिली सफलता की खबरों का ऑनलाइन अखबारों में प्रस्तुतीकरण। कम से कम पांच अनुसंधानों के नतीजों को पिछले 10 या तीस साल का सबसे बड़ा&lt;a href="http://tv.ibtimes.com/new-leukemia-therapy-may-be-the-greatest-breakthrough-in-decades/1596.html"&gt; ब्रेकथ्रू, &lt;/a&gt;सबसे बड़ी खोज बताया गया था। ऐसे में मेरे लिए भी तय करना मुश्किल हो रहा था कि वास्तव में किसे सबसे बड़ी खबर मानूं। बल्कि सवाल यह भी था कि किसी भी नतीजे को अभी से अंतिम मानकर ‘सबसे बड़ी’ या छोटी ही सही, सफलता माना भी जाए या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल इलाज के लिए किसी भी दवा या तकनीक को अनुसंधानों में पहले प्रयोगशाला में पेट्रीडिश में जीवित ऊतकों और फिर जीवों पर आजमाया जाता है। यहां&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Clinical_trial"&gt; प्री-ट्रायल स्टेज &lt;/a&gt;के आंकड़ों के आधार पर उन्हें अगले चरण- मनुष्यों पर ट्रायल के लिए इजाजत मिलती है। स्टेज शून्य में कुछेक चुनिंदा मरीजों को बेहद हल्की डोज़ देकर इनके असर को देखा जाता है। इसके बाद पहले चरण के ट्रायल में 20 से 100 स्वस्थ लोगों पर उसे आजमाया जाता है। इसमें मिले नतीजों के अनुसार ही इसे दूसरे चरण के ट्रायल में लिया जाता है जिसमें 100 से 300 स्वस्थ और बीमार लोगों को शामिल किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद तीन सौ से तीन हजार लोगों पर इसे आजमाकर नतीजे देखे जाते हैं। इन सभी चरणों में जाने से पहले तकनीक को कई तरह की मंजूरियों के रोड़े पार करने पड़ते हैं। इसमें भी सफल होने के बाद ही किसी दवा या थेरेपी को आम क्लीनिकल व्यवहार के लिए मंजूरी मिल पाती है। इस पूरी प्रक्रिया में पैसे तो लगते ही हैं, समय भी खूब लगता है। न्यूनतम पांच-सात साल से लेकर दशकों तक। इसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती। दवा की बिक्री शुरू होने के बाद भी इसकी मार्केटिंग पर नजर रखी जाती है। इसके बाद भी उस दवा या तकनीक में सुधार-संशोधन के लिए विभिन्न अनुसंधान जारी रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच विभिन्न शुरुआती चरणों में मिल रही सफलता को भी भुना लेने के लिए उस परियोजना की प्रायोजक कंपनी उसका खूब प्रचार करती है। वैज्ञानिक भी कई बार अपनी सफलताओं से उत्साहित हो जाते हैं। उधर सनसनीखेज खबरों की ताक में बैठे पत्रकार भी इन महत्वपूर्ण लेकिन निचले स्तर की सफलताओं को अपनी खबरों में बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। मानो ये इलाज बस मरीजों तक पहुंचा ही चाहते हैं। और ये महान ब्रेकथ्रू तो जी एकदम सफल हैं। यह कैंसर को &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/home/science/-Wonder-drug-to-wipe-out-cancer-is-here/articleshow/10734753.cms"&gt;जड़ से मिटा देने&lt;/a&gt; वाला वंडर ड्रग है...आदि, इत्यादि। इस बीच वे यह भूल जाते हैं कि इन खबरों को गंभीरता से ले रहे पाठक-दर्शक की समझ का क्या होगा। उनमें से कई इस बीमारी से गुजर रहे होंगे और नाउम्मीद हो चुके होंगे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;लगभग मारक, ज्यादातर लोगों के लिए जानलेवा बीमारी कैंसर के मरीज और उससे जुड़े लोग इन अनुसंधानों को बड़ी उम्मीद से देखते हैं। लैबोरेटरी में जीवों या पेट्री डिश में रखे जीविक ऊतकों पर भी किसी दवा या तकनीक के कारगर होने की खबर जब जोर-शोर से मीडिया में उभारी जाती है तो इन मरीजों को वह दवा या तकनीक जीने की नई रौशनी की तरह दिखाई पड़ती हैं। बेशक, उस अनुसंधान में शामिल मरीजों को तो जीने का एक और मौका मिलने जैसा लगता होगा, लेकिन दूर बैठे देख रहे बाकी लोगों के लिए तो बस एक सपना ही रह जाता है, इस इलाज तक पहुंच पाना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में किसी भी वैज्ञानिक विषय, खास तौर पर लाइलाज-सी या कठिन बीमारियों के नए इलाज के ईजाद की कवरेज के समय पत्रकारों को संयत होकर लिखना जरूरी है ताकि भ्रम न फैलें और पाठक या दर्शक जान सके कि उस इलाज की जमीनी हकीकत क्या है और उसे उससे कितनी उम्मीद रखनी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-1822635403112707818?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/1822635403112707818/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=1822635403112707818' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1822635403112707818'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1822635403112707818'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='कैंसर अनुसंधान की मीडिया कवरेजः ब्रेक-थ्रू के बाद हार्ट-ब्रेक?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-5819509894630708129</id><published>2011-10-30T00:03:00.000+05:30</published><updated>2011-10-30T00:03:37.604+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हंसी का कोना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर अनुसंधान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>कैंसर रिसर्च फंडिंग और सपोर्ट का फंडाः व्यंग्य की नज़र से</title><content type='html'>अमरीका के नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का कैंसर अनुसंधान पर सालाना बजट कोई &lt;a href="http://www.cancer.gov/cancertopics/factsheet/NCI/research-funding"&gt;5 अरब डॉलर&lt;/a&gt; का है। इसके अलावा &lt;a href="http://ww5.komen.org/ResearchGrants/FundingOpportunities.html"&gt;सूज़न के. कोमेन फॉर क्योर&lt;/a&gt; नाम की संस्था हर साल अनेक लोगों और एजेंसियों को लाखों डॉलर देती है ताकि स्तन कैंसर का इलाज ढ़ूंढा जा सके। बीसियों साल से दुनिया भर की लैबोरेटरीज़ में ये रिसर्च चल रहे हैं, लेकिन अभी तक कैंसर के इलाज के नाम पर 99 फीसदी वही इलाज हैं जो 20 साल पहले थे, थोड़े-बहुत फाइन-ट्यूनिंग के साथ। मरीज को इस रिसर्च का कुछ भी हिस्सा नहीं मिला है। इसके पीछे क्या पॉलिटिक्स हैं, भ्रष्टाचार है? न उसका इलाज का खर्च कम हुआ, न कैंसर से बचाव और न ही इलाज की सफलता का भरोसा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन कार्टूनों से कुछ समझ सकें तो बताएं।&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-S9j3cx0Yfyk/TqxFTzJ7_BI/AAAAAAAAAY4/z_42ngHvsGM/s1600/cancer_cure_600_4.jpg" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="240" width="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-S9j3cx0Yfyk/TqxFTzJ7_BI/AAAAAAAAAY4/z_42ngHvsGM/s400/cancer_cure_600_4.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-NzbPAhJvypw/TqxFb9upniI/AAAAAAAAAZE/jFBLErHHFsM/s1600/bgrn621l.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="352" width="400" src="http://3.bp.blogspot.com/-NzbPAhJvypw/TqxFb9upniI/AAAAAAAAAZE/jFBLErHHFsM/s400/bgrn621l.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-GDHc7TFJi2E/TqxFpJzO6ZI/AAAAAAAAAZc/4X3F6T43BRc/s1600/a-cancer-cure.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="324" width="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-GDHc7TFJi2E/TqxFpJzO6ZI/AAAAAAAAAZc/4X3F6T43BRc/s400/a-cancer-cure.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-vqsFZUlZXbY/TqxFiqE0CGI/AAAAAAAAAZQ/6BK-bqUA4E4/s1600/cartoon-prayer.gif" imageanchor="1" style="clear:left; float:left;margin-right:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="386" width="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-vqsFZUlZXbY/TqxFiqE0CGI/AAAAAAAAAZQ/6BK-bqUA4E4/s400/cartoon-prayer.gif" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-5819509894630708129?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/5819509894630708129/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=5819509894630708129' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5819509894630708129'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5819509894630708129'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/10/blog-post_30.html' title='कैंसर रिसर्च फंडिंग और सपोर्ट का फंडाः व्यंग्य की नज़र से'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-S9j3cx0Yfyk/TqxFTzJ7_BI/AAAAAAAAAY4/z_42ngHvsGM/s72-c/cancer_cure_600_4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-532724204092530877</id><published>2011-10-19T01:57:00.001+05:30</published><updated>2011-10-19T01:58:07.203+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्टीव सॉब्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुभव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर का इलाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>स्टीव जॉब्स- दुनिया को कैंसर से ऐसा नुकसान शायद न होता अगर...</title><content type='html'>&lt;a href="http://www.apple.com/"&gt;ऐप्पल डॉट कॉम&lt;/a&gt; के मुखपृष्ठ पर सिर्फ उस कंपनी के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स का चित्र है। उनका इस महीने के सुरू में निधन हो गया। मुखपृष्ठ का चित्र ऐसा है- &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-LIfuaHglWUU/Tp3ZYATwX7I/AAAAAAAAAYI/bRWLuM27ePE/s1600/steve%2Bjobs%2Bcopy.jpg" imageanchor="1" style="margin-left:1em; margin-right:1em"&gt;&lt;img border="0" height="203" width="400" src="http://4.bp.blogspot.com/-LIfuaHglWUU/Tp3ZYATwX7I/AAAAAAAAAYI/bRWLuM27ePE/s400/steve%2Bjobs%2Bcopy.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस व्यक्ति को हर अखबार पढ़ने वाला, टीवी देखने वाला व्यक्ति पहचनता है, भले ही उसके पास आईफोन, आईपॉड, आईमैक, आईपैड,... या कोई और 'आई' हो या नहीं। इतनी जल्दी, अपने सबसे ज्यादा प्रोडक्टिव समय में इस व्यक्ति का जाना न्यू मीडिया की दुनिया को कई औजारों से वंचित कर देगा/रहा है, यह तय है। हालांकि और बहुत से लोग एपल से सस्ते, उसी तरह के उत्पाद बना रहे हैं, लेकिन आई में जो बात है (कीमत सहित, जो कि और भी उत्सुकता, ललक पैदा करती है, मेरे जैसे लोगों के मन में, जो उन्हें नहीं खरीद पाते।) वह किसी और में कहां। खैर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल तकनीक की नहीं, स्टीव का जीवन लेने वाली बीमारी कैंसर की बात हो रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक 8 साल पहले, अक्टूबर 2003 में स्टाव जॉब्स को एक खास तरह के पैंक्रियास का कैंसर होने का पता चला, जो कि सर्जरी से ठीक हो सकता था। लेकिन स्टीव ने अपने शाकाहार और प्राकृतिक चिकित्सा पर ज्यादा भरोसा किया और खान-पान के जरिए ही अपने कैंसर का इलाज करने की कोशिश करने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्राकृतिक खान-पान चिकित्सा में उन्होंने नौ सबसे महत्वपूर्ण, कीमती शुरुआती महीने बर्बाद कर दिए जबकि व्यवस्थित इलाज का बेहतरीन परिणाम उन्हें मिल सकता था। जब आखिर उन्होंने अपना इलाज एलोपैथी पद्यति से कराने का फैसला किया, तब तक उनका कैंसर शरीर में फैल चुका था। जुलाई 2004 में उन्होंने सर्जरी भी करा ही ली। लेकिन बीच के इन नौ महीनों में सर्जरी या कहें, उचित इलाज से भागने का नतीजा यह रहा कि उनकी जिंदगी जरा छोटी हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई गारंटी तो नहीं थी कि वे कैंसर का इलाज कराकर पूरी तरह स्वस्थ हो जाते या उसके साथ ही दसियों साल और जीवित रहते, लेकिन निश्चित रूप से उनका सर्वाइवल लंबा और बेहतर होता। उनकी लंबी जिंदगी पूरी दुनिया के लिए नेमत होती। और अपनी जिंदगी को कौन ज़ाया करना चाहता है? कौन चाहता है कि वह ऐसे बेवक्त मरे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम स्टीव को सिर्फ अलविदा ही कह सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-532724204092530877?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/532724204092530877/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=532724204092530877' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/532724204092530877'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/532724204092530877'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/10/blog-post_19.html' title='स्टीव जॉब्स- दुनिया को कैंसर से ऐसा नुकसान शायद न होता अगर...'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-LIfuaHglWUU/Tp3ZYATwX7I/AAAAAAAAAYI/bRWLuM27ePE/s72-c/steve%2Bjobs%2Bcopy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-3507268716646026296</id><published>2011-10-16T13:21:00.003+05:30</published><updated>2011-10-19T00:46:43.886+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर रिसर्च'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नया इलाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>कैंसर के इलाज में शरीर के नफे-नुकसान का हिसाब</title><content type='html'>&lt;b&gt;स्तन कैंसर के इलाज और इसे रोकने की दवा टेमॉक्सिफेन के नुकसान भी हैं&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपनी किताब &lt;a href="http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&amp;zS=title%2Csubtitle%2Cauthor&amp;String=indradhanush+ke&amp;Field=prefix%2Ctitle%2Csubtitle%2Csetinfo%2Cbinding%2Cregionaltitle&amp;imageField.x=14&amp;imageField.y=4"&gt;‘इंद्रधनुष के पीछे-पीछेः एक कैंसर विजेता की डायरी’&lt;/a&gt; में अंतिम अध्याय में लिखा है कि मेरे सफल इलाज में, तीसरे स्टेज के कैंसर के बावजूद मेरा जीवन बच पाया तो इसमें ‘एक छोटी सी सफेद गोली टेमॉक्सिन का भी हाथ है’। अपने साइड इफेक्ट्स, जिसमें बच्चेदानी के आवरण का कैंसर तक शामिल है, के बावजूद यह स्तन कैंसर के मरीजों के लिए निश्चिक रूप से जीवन रक्षक है।&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-iVsAAeocFKY/TpqA-nzStDI/AAAAAAAAAX8/73roA2smVYQ/s1600/Cytotam-Tamoxifen-Citrate-10mg-10-Tablets-2.jpg" imageanchor="1" style="clear:right; float:right; margin-left:1em; margin-bottom:1em"&gt;&lt;img border="0" height="200" width="200" src="http://1.bp.blogspot.com/-iVsAAeocFKY/TpqA-nzStDI/AAAAAAAAAX8/73roA2smVYQ/s400/Cytotam-Tamoxifen-Citrate-10mg-10-Tablets-2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्तन कैंसर का एक बड़ा कारण ईस्ट्रोजन हार्मोन की अधिकता भी है, जिस पर लगाम लगाने के लिए इलाज के बाद पांच साल तक टेमॉक्सिफेन नाम की गोली खाने की सलाह दी जाती है। यह दवा हॉर्मोन रिसेप्टर टेस्ट सकारात्मक आने पर और भी ज्यादा जरूरी समझी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में कई कैंसर अनुसंधान पत्रिकाओं में एक रिपोर्ट छपी है, जिसमें बताया गया है कि टेमॉक्सिफेन से बड़ी उम्र की महिलाओं में मधुमेह होने का खतरा बढ़ जाता है। 65 साल से बड़ी 14 हजार स्तन कैंसर विजेताओँ पर अनुसंधान के बाद पाया गया कि उनमें से 10 फीसदी को 5 साल के टेमॉक्सिफेन इलाज के दौरान मधुमेह हो गया। यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के  &lt;br /&gt;वीमेंस मेडीकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में हुए इस रिसर्च के मुताबिक टेमॉक्सिफेन लेने से बड़ी उम्र की महिलाओं में मधुमेह का खतरा बढ़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, रिसर्चर्स ने यह भी कहा है कि इसमें ‘खतरे’ की कोई बात नहीं है। क्योंकि टेमॉक्सिफेन का जितना फायदा मरीजों को मिलता है, उसके मुकाबले मधुमेह होने की संभावना का रिस्क बहुत ही छोटा है। कैंसर जानलेवा हो सकता है, पर मधुमेह के साथ वह बात नहीं, अगर उसे काबू में ऱखा जाए। दरअसल टेमॉक्सिफेन ईस्ट्रोजन नाम के हार्मोन को शरीर में बनने से रोकता है। यह हार्मोन महिलाओं के लिए जरूरी है, पर इसकी अधिकता या अनियमितता कई बार स्तन कैंसर को बढ़ावा भी देती है। ऐसे में स्तन कैंसर के मरीजों और कई बार, कैंसर होने की संभावना वाली महिलाओं को भी प्रिवेंशन के तौर पर टेमॉक्सिफेन दिया जाता है। ईस्ट्रोजन का एक काम शरीर में इंसुलिन हार्मोन को बढ़ाना भी है, जो कि रक्त में चीनी की मात्रा पर काबू रखता है। ऐसे में ईस्ट्रोजन की कमी का सीधा असर इंसुलिन पर भी पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेमॉक्सिफेन के कई और साइड इफेक्ट पहले से ज्ञात है, जैसे खून का थक्का बनना, बच्चेदानी के कैंसर की संभावना, मोतियाबिंद और स्ट्रोक। लेकिन इनके बावजूद यह दवा दसियों वर्षों से दी जा रही है और कारगर भी रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रिसर्च में दो और बातें सामने आईं। पहली- टेमॉक्सिफेन का इस्तेमाल बंद करने के बाद इसका असर भी खत्म हो जाता है, यानी इसकी वजह से मधुमेह का रिस्क भी खत्म हो जाता है। दूसरे, एक अन्य ईस्ट्रोजन इनहिबिटर एरोमाटेज़, जो कि अरिमिडेक्स और एरोमासिन नामों से हिंदुस्तान में मिलता है, का कोई ऐसा असर नहीं देखा गया जो मधुमेह से संबंधित हो। कारण यह है कि इसका काम करने का रासायनिक तरीका अलग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो, साफ बात यह है कि कैंसर के इलाज की हर पद्यति में, हर दवा में शरीर को लगातार बड़े नुकसान होने का खतरा रहता ही है, और ये नुकसान दिखाई भी पड़ते रहते हैं। लेकिन.... लेकिन यह बीमारी इतनी मारक और तेजी से फैलने वाली है कि इसे रोकने के लिए छोटे-मोटे खतरों को नजर-अंदाज कर हर संभव इलाज पहले कराना चाहिए। जीवन बचे, वह सबसे जरूरी है। &lt;br /&gt;शरीर होगा तो उसकी रिपेयर-मेंटेनेन्स होती रहेगी, उसका वक्त मिलेगा। लेकिन अगर कैंसर को न रोक गया तो यह जीवन को ही खत्म कर देगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-3507268716646026296?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/3507268716646026296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=3507268716646026296' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3507268716646026296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3507268716646026296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/10/blog-post_16.html' title='कैंसर के इलाज में शरीर के नफे-नुकसान का हिसाब'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-iVsAAeocFKY/TpqA-nzStDI/AAAAAAAAAX8/73roA2smVYQ/s72-c/Cytotam-Tamoxifen-Citrate-10mg-10-Tablets-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-8810796054652521962</id><published>2011-10-16T12:21:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.148+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर की पहचान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता माह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>आप भी हैं अपने हक में एक बड़े अभियान के हिस्सेदार</title><content type='html'>&lt;b&gt;पिंक हो या ब्ल्यू, अपने को जानना, जागरूक होना सबसे महत्वपूर्ण है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्तूबर स्तन कैंसर माह के तौर पर दुनिया भर में मनाया जाता है, ताकि इसके बारे में जागरूकता फैलाई जा सके। अमरीका में महिलाओं के मरने का एक बड़ा कारण यह है। हमारा देश भी अब हर तरह के कैंसर जिसमें स्तन कैंसर भी जोर-शोर से शामिल है, के मामले में पीछे नहीं है, और इसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। जागरूकता हमारे यहां भी बेहद जरूरी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्तन कैंसर के बारे में जागरूकता का पहचान का रंग गुलाबी है। इस पूरे महीने में कभी आप भी गुलाबी पहनें और अपने को इस बीमारी के बारे में जागरूक करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने शरीर को जानने-समझने और उसमें आए किसी भी &lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/blog-post_29.html"&gt;बदलाव पर नजर रखने&lt;/a&gt; का एक अभियान चलाएं, जो कि कैंसर को जल्द पकड़ पाने और उसका इलाज सहज बनाने का सबसे कारगर और आसान तरीका है। सिर्फ एक दिन या एक महीने नहीं, जीवन भर। इसमें 'खर्च' होगा, सिर्फ आपका थोड़ा सा समय महीने- पंद्रह दिन में एक बार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरूर शामिल हों कैंसर जागरूकता, अपने प्रति जागरूकता के इस अभियान में। यह छोटा लगने वाला निजी प्रयास एक बड़े अभियान का हिस्सा है- याद रखिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-8810796054652521962?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/8810796054652521962/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=8810796054652521962' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8810796054652521962'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8810796054652521962'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='आप भी हैं अपने हक में एक बड़े अभियान के हिस्सेदार'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-1312670705459792487</id><published>2011-08-02T20:48:00.003+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.149+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर की पहचान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिलचस्प तथ्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>कुत्ते धन ही नहीं जुटाते, कैंसर की पहचान भी कर सकते हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2011/08/13.html"&gt;एक कुत्ते ने मैराथन दौड़ में अनजाने ही भाग लेकर कैंसर अनुसंधान के लिए हजारों डॉलर जुटा दिए। &lt;/a&gt; लेकिन एक दिलचस्प तथ्य यह है कि कुत्ते कैंसर की पहचान भी कर सकते हैं। उनकी सूंघने की शक्ति कैंसर जैसी असामान्य स्थिति को 'सूंघ' सकते हैं। इस तरह से कई लोगों को अपने कुत्तों की वजह से कैंसर होने का पता लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक थ्योरी यह कहती है कि कैंसर की रोगी कोशिकाओं में अलग तरह की दुर्गंध होती है जिसे कुत्ते पकड़ पाते हैं। और उस गंध से परेशान होकर वे परिवार के उस सदस्य के शरीर के उस हिस्से को लगातार चाटते-टटोलते रहते हैं। इससे व्यक्ति को सचेत हो जाना चाहिए कि कुछ गड़बड़ है। इस तरह की घटनाओं में कुत्ते के बार-बार ध्यान खींचने पर लोग डॉक्टर के पास गए और उन्हें पता लगा कि उनके शरीर में कैंसर पनप रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछेक सप्ताह के प्रशिक्षण से ऐसे कुत्ते &lt;a href="http://news.nationalgeographic.com/news/2006/01/0112_060112_dog_cancer.html"&gt;लोगों की सांस सूंघकर भी&lt;/a&gt; कैंसर के होने का पता दे सकते हैं। वे सांस में मौजूद कुछ खास रसायनों के अरबवें हिस्से की मौजूदगी को भी सूंघ कर पहचान सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल कैंसर कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं से अलग कुछ जैवरासायनिक त्याज्य पदार्थ छोड़ती हैं, जिन्हें कुत्ते सूंघ कर जान सकते हैं। स्तन और फेफड़ों के कैंसर को वे आसानी से पहचान पाते हैं। अब कुत्तों को पेशाब सूंघकर व्यक्ति में प्रोस्टेट कैंसर का पता लगाने के लिए भी प्रसिक्षित किया जाने लगा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-1312670705459792487?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/1312670705459792487/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=1312670705459792487' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1312670705459792487'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1312670705459792487'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='कुत्ते धन ही नहीं जुटाते, कैंसर की पहचान भी कर सकते हैं'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-510157648360265966</id><published>2011-08-01T09:24:00.002+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.151+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीना इसी का नाम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ इधर-उधर की'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>कैंसर अनुसंधान के लिए एक कुत्ते ने जुटाए 13 हज़ार डॉलर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-u_BNvc8nIr8/TjZE46b2H8I/AAAAAAAAAVg/8lJ2SMtUNso/s1600/article-2008529-0CBF8C2700000578-666_233x404.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 185px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-u_BNvc8nIr8/TjZE46b2H8I/AAAAAAAAAVg/8lJ2SMtUNso/s320/article-2008529-0CBF8C2700000578-666_233x404.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5635767728250167234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.dailymail.co.uk/news/article-2008529/Dog-runs-half-marathon-stumbling-track--ends-raising-13-000.html"&gt;डोज़र&lt;/a&gt; तीन साल का है। अपने मालिक के घर से छूट भागा तो एक मैराथन रेस के ट्रैक पर पहुंच गया। यह हाफ मैराथन कैंसर अनुसंधान के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी। फिर तो डोज़र अनजाने ही दौड़ का प्रतिभागी हो गया और पूरे सवा दो घंटे लगातार दौड़ में शामिल रह कर हाफ मैराथन पूरी कर गया। जैसे ही वह फिनिश लाइन तक पहुंचा तो लोगों ने उत्साह से उसकी अगवानी की। आयोजकों की तरफ से उसे विशेष पदक देकर सम्मानित भी किया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि कुत्ते ने इस दौड़ के लिए खुद को रजिस्टर नहीं किया था, पर इससे क्या। सच्चे सपोर्टर को कोई कैसे मना कर सकता था भला! इस तरह डोज़र के कारण 13 हजार डॉलर से ज्यादा धन इकट्ठा हुआ। इकट्ठा किया गया पैसा मैरीलैंड विश्वविद्यालय के ग्रीनबाम कैंसर सेंटर को मिलेगा। इधर उस कुत्ते के मालिकों ने भी उसके नाम से एक वेब पेज खोल लिया है। इस पर मिला धन भी कैंसर रिसर्च के लिए दिया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम भी अपने देश में ऐसे कामों के लिए कुछ देने की आदत डाल लें, तो कैसा रहे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-510157648360265966?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/510157648360265966/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=510157648360265966' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/510157648360265966'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/510157648360265966'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/08/13.html' title='कैंसर अनुसंधान के लिए एक कुत्ते ने जुटाए 13 हज़ार डॉलर'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-u_BNvc8nIr8/TjZE46b2H8I/AAAAAAAAAVg/8lJ2SMtUNso/s72-c/article-2008529-0CBF8C2700000578-666_233x404.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-8803160881930710741</id><published>2011-07-19T23:57:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.152+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शराब और कैंसर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='living healthy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>शराब के नतीजों की जिम्मेदारी लेने की कोई उम्र नहीं हो सकती</title><content type='html'>पिछले दिनों महाराष्ट्र में 25 साल से कम उम्र के युवाओं को शराब पीने की मनाही कर दी है। इससे पहले पाबंदी 21 साल से कम उम्र के किशोरों पर ही लागू की थी। अब 21 साल के युवाओं को सिर्फ बियर और वाइन खरीदने और पीने की इजाजत है। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि कम उम्र में नशे की तरफ रुझान और मित्र-वर्ग का दबाव भी ज्यादा होता है। इसलिए कम उम्र में ही शराब की लत पर रोक लगाने की कोशिश में यह नियम बनाया गया है। शराब पर आबकारी कर से राज्य सरकारों को खासी आमदनी होती है। यह नुकसान झेलकर भी महाराष्ट्र में यह पाबंदी लगाई गई है। मणिपुर, मिजोरम और गुजरात में पूरी तरह शराबबंदी लागू है। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश जैसे कई और राज्यों में भी समय-समय पर थोड़ी-पूरी शराबबंदी लागू रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में 30 फीसदी तक अल्कोहल की खपत 25 साल से कम उम्र के युवाओं में ही होती है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में शराब की औसत खपत 10 लीटर प्रति माह है। इनमें हार्ड लिकर की खपत सबसे ज्यादा है। बीयर जैसे हल्के अल्कोहल की कुल खपत एक फीसदी से भी कम है। मजदूरों, कामगारों, खेतिहर किसानों में अल्कोहल की खपत सबसे ज्यादा है। और शराब की लत से इन्हें दूर रखने की ही सबसे ज्यादा जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शराब पीने के लिए उम्र की सीमा 25 साल कर दिए जाने का घोर विरोध हुआ है। अमिताभ बच्चन और कई दूसरे फिल्मी सितारों ने फेसबुक-ट्विटर पर ऐलानिया विरोध किया और उम्र बढ़ाने के इस नए नियम के खिलाफ मुहिम सी छेड़ दी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी&lt;a href="http://superblog.crazyengineers.com/wp-content/uploads/2011/06/Times-Of-India-Insanity.jpg"&gt; इट्स माई लाइफ &lt;/a&gt;नाम से एक कैंपेन चला दिया । इसका कोई ठोस नतीजा तो नहीं निकला, लेकिन ये साफ हो गया कि युवा इससे खुश नहीं हैं। उनका तर्क है कि जब वे 25 की उम्र के पहले वोट डालने, अपना प्रतिनिधि चुनने, वाहन चलाने, शादी करने यहां तक कि सेना में भर्ती होने और देश के लिए लड़ाई पर जाने लायक जिम्मेदार और समझदार मान लिए गए हैं तो फिर उनकी शराब पीने की जिम्मेदारी और समझदारी पर शक क्यों? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचने की बात यह है कि अल्कोहल शरीर पर बुरा असर डालता ही है, तो उसके उपभोग में समझदारी कैसी। और जब शरीर और सेहत पर तत्काल और लंबे समय में होने वाले उसके असर पर अपना जरा सा बस भी नहीं है तो उसकी जिम्मेदारी कैसे ले कोई?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अल्कोलह पीने के इसके समर्थन में वे योरोप-अमरीका का उदाहरण भी देते हैं। लेकिन वहां भी अल्कोहल को लेकर कई तरह की और कड़ी पाबंदियां हैं, सिर्फ दिखावे के नियम वहां नहीं। ज्यादातर देशों में उपभोग के लिए कम से कम 18 साल और कुछेक देशों में अल्कोहल खरीदने के लिए 20-24 साल तक की उम्र की न्यूनतम सीमा है। इसके बरअक्स एक और स्थिति को रखें तो 18 की उम्र में शराब पीने की छूट चाहने वाले किशोर उन विदेशी किशोरों की तरह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होते हैं। यानी वे अपनी जिम्मेदारी खुद नहीं उठा सकते हैं। इसके साथ इस तथ्य पर भी विचार करना चाहिए कि कई देशों में अल्कोहल पिए जाने की मात्रा पर पाबंदी है। आयरलैंड में पुरुष सप्ताह में 14 पिंट से अधिक शराब नहीं पी सकते तो अमरीका में महिलाओं का हफ्ते का कोटा अधिकतम 7 पिंट अल्कोहल तक का है। भारत में ऐसी कोई रोक नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस स्तर पर तो ये एक लंबी बहस का मुद्दा हो सकता है। लेकिन कनाडा की मेडिकल एसोसिएशन जर्नल की चिंता यह है कि ये सारी पाबंदियां कैंसर को रोकने के लिए कतई नाकाफी हैं। डॉक्टर साफ कहते हैं कि ऐसी कोई सुरक्षित सीमा नहीं है, जिससे कम अल्कोहल नुकसानरहित हो। हाल ही में कई ऐसी रपटों से पता चला है कि रोजाना एक पेग अल्कोहल भी मुंह, गले, ईसोफेगस, लिवर, कोलोन, रेक्टम, स्तन के कैंसर को जगाने के लिए काफी है। पत्रिका में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर के मुताबिक यूरोप में पुरुषों के 10 फीसदी और महिलाओं के 3 फीसदी कैंसरों का कारण मात्र अल्कोहल का सेवन है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि रेड वाइन की चुस्कियों से दिल के मर्ज दूर रहते हैं, पर यह भी एक भ्रम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी लगातार कहता है कि जितना कम हो उतना ही बेहतर है।&lt;a href="http://www.who.int/substance_abuse/publications/globalstatusreportalcohol2004_healtheffects.pdf"&gt; विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट&lt;/a&gt; बताती है कि दिल की बीमारियों सहित नौ बीमारियां हैं जिनका एकमात्र कारण शराबखोरी हो सकती है। इनके अलावा सैकड़ों तकलीफें हैं, जिनको बढ़ाने में शराब मदद करती है। इस अध्ययन में कैंसर पर गहराई से आंकड़े जुटाए गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी देश में बीमार होना व्यक्ति की सिर्फ अपनी नहीं बल्कि पूरे देश की चिंता है, क्योंकि सब मिलाकर देश की कुल स्वास्थ्य व्यवस्था और इतनी बड़ी आबादी के लिए उपलब्ध सीमित संसाधनों पर बोझ पड़ता है। खर्च व्यक्ति का अकेले का नहीं, पर पूरे देश के साझा संसाधनों का होता है। इसमें एक व्यक्ति के डॉक्टरी पढ़ने के सरकार के खर्च से लेकर दवा या उपकरणों पर सब्सिडी या सीमित संख्या में उपलब्ध अस्पताल के बेड को पा लेने तक बहुत से खर्च और संसाधन शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कनाडा में पुरुषों के लिए हफ्ते में 14 ड्रिंक और महिलाओं के लिए 9 ड्रिंक की सीमा को सेहत के लिहाज से कम रिस्क वाला बताया गया है।  ध्यान रहे कि इसे “लो रिस्क” कहा गया है, “नो रिस्क” नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप शराब पीने के लिए बिना कारण कितना रिस्क लेने को तैयार हैं? औऱ उसकी जिम्मेदारी...?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-8803160881930710741?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/8803160881930710741/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=8803160881930710741' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8803160881930710741'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8803160881930710741'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='शराब के नतीजों की जिम्मेदारी लेने की कोई उम्र नहीं हो सकती'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-6006012718338374379</id><published>2011-05-19T03:00:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.154+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉफी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर रिसर्च'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एंटी ऑक्सीडेंट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>कॉफी पिएं कि न पिएं- कैंसर का इससे क्या वास्ता?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-XF0RuQ3Rv6U/TdQ3Jx68hqI/AAAAAAAAAS0/Hpfhjx_vA_4/s1600/Cup%2Bcoffee.png"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 256px; height: 256px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-XF0RuQ3Rv6U/TdQ3Jx68hqI/AAAAAAAAAS0/Hpfhjx_vA_4/s400/Cup%2Bcoffee.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5608168077142034082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक ताजा अध्ययन के बारे में &lt;a href="http://www.dailymail.co.uk/health/article-1385763/Five-cups-coffee-day-protect-breast-cancer.html?ito=feeds-newsxml"&gt;छपी खबर में ऐलान किया गया कि हर दिन पांच कप कॉफी पीना&lt;/a&gt; एक तरह के स्तन कैंसर को रोकने में मददगार होता है। कॉफी को नुकसानदेह पेय माना जाता है, इसलिए इस तरह की खबरों से लोग चौंके और साथ ही कॉफी के शौकीन प्रसन्न भी हुए होंगे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;स्टॉकहोम के एक रिसर्च संस्थान में हुए इस अध्ययन पर बायोमेड के वेबसाइट&lt;a href="http://breast-cancer-research.com/content/13/3/R49/abstract"&gt; ब्रेस्ट कैंसर रिसर्च&lt;/a&gt; ने अपनी रिपोर्ट में निष्कर्श दिया कि हर दिन ज्यादा मात्रा में कॉफी पीने से पोस्ट-मेनोपॉजल (सरल शब्दों में- बड़ी या 50 साल से ज्यादा उम्र की) महिलाओं में एस्ट्रोजन रिसेप्टर नेगेटिव टाइप के स्तन कैंसर, (जो कि काफी आम है) में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। और कई अखबारों ने इसे खबर बनाकर महत्वपूर्ण ढंग से छाप भी दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह अध्ययन दरअसल ऐसा कोई निष्कर्ष सामने नहीं लाता, जिसका दावा इस खबर में किया गया है। बल्कि इस खबर में अध्ययन की कई महत्वपूर्ण बातों को सामने नहीं लाया गया। अध्ययन में शामिल स्वीडिश लोगों में 2800 स्तन कैंसर के मरीज थे जबकि 3100 नहीं थे। इन लोगों को कई साल पहले की अपनी कॉफी पीने की आदत और जीवन के दूसरे पक्षों के बारे में याद करने को कहा गया। यह बहुत ही व्यक्तिपरक तरीका है, किसी अध्ययन का। इसमें कई साल पुरानी बातें सबको ठीक से याद हों और सबने ठीक से बताई हों, कोई जरूरी नहीं है। अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने रोज 5 कप या उससे ज्यादा कॉपी पीने की आदत के बारे में बताया, उनमें स्तन कैंसर होने की संभावना कॉफी न पीने वालों के मुकाबले 20 फीसदी कम पाई गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन कॉफी पीने और न पीने वालों में दूसरे अंतर भी रहे होंगे, जैसे कसरत या शारीरिक गतिविधियां करना या न करना, शराब पीने की मात्रा या न पीना, खाने में गरिष्ठ भोजन और फल-सब्जियों का अनुपात, उनकी उम्र आदि, इत्यादि। इन कारकों को शामिल करने के बाद अध्ययन टीम ने पाया कि इनकी पृष्ठभूमि में कॉफी से कैंसर के बचाव का तथ्य कमजोर पड़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैंसर ऐसी बीमारी है, जिसके कारण कई हो सकते हैं और उस पर कई रसायनों का कई तरह से प्रभाव पड़ता है। ऐसे में, हो सकता है, सैकड़ों में से किसी एक या दो प्रकार के स्तन कैंसरों पर कॉफी में मौजूद सैकड़ों-हजारों में से किसी एक या दो पौध-रसायनों (कॉफी भी आखिर पौधे से ही मिलती है) का सकारात्मक प्रभाव पड़ता हो। लेकिन इसे किसी प्रकार के कैंसर से बचाव के रूप में नहीं देखा जा सकता। और ऐसा मान भी लिया जाए तो इससे ऐसा कोई अनुमान लगाना कठिन होगा कि किस व्यक्ति को उस खास तरह का स्तन कैंसर होने की संभावना ज्यादा है, जिसमें कॉफी ज्यादा पीने से उसे स्तन कैंसर रोकने में मदद मिलेगी। और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अध्ययन में कॉफी को कैंसर रोकने वाला नहीं बताया है बल्कि सिर्फ कॉफी पीने और एक खास स्तन कैंसर होने में संबंध बताया गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबारों की ऐसी रिसर्च संबंधी खबरों को याद करें तो चॉकलेट के बारे में भी आए दिन ऐसी विरोधाभासी खबरें आती रहती हैं। चॉकलेट स्ट्रेस बस्टर है, मूड ऐलिवेटर है, लेकिन चस्का लगा देता है। या फिर नुकसानदेह है, मोटापा, थॉयरॉइड जैसी भयानक बीमारियां पैदा करता है आदि, इत्यादि। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोगों को लेकर ऐसे छोटे-छोटे अध्ययनों से कैंसर जैसी जटिल, विविधता भरी और अस्पष्ट-सी बीमारी के बारे में कोई साफ निष्कर्ष निकाल पाना कठिन है। और जब ऐसे अध्ययनों के टुकड़ों में, अधूरे-से परिणाम आते हैं तो मरीज उत्साहित होते हैं, झूठे ही भरोसा करते हैं, आशाएं बांधते हैं ऐसे अध्ययनों पर और उन आंकड़ों से अपनी हालत का आकलन करने, अपनी सेहत का अंदाजा लगाने में जुट जाते हैं। यह वैसा ही है, जैसे कोई मरीजों के तालाब में कई सारी बंसियां डालकर बैठे और इंतजार में रहे कि आंकड़ों की कौनसी मछली फंसती है, पकड़ में आती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल किसी भी रिसर्च के निष्कर्ष देने के बाद कुछ इंतजार करना और समान अध्ययनों से मिले दूसरे आंकड़ों से अपने परिणामों का मिलान करना जरूरी होता है ताकि पता लगे कि वह परिणाम सिर्फ संयोग नहीं था, एकबारगी हुई परिघटना नहीं थी। साथ ही, अध्ययन की गलतियों, कमियों को भी जांचा जा सकता है। ध्यान रखना चाहिए कि निष्कर्ष दोहराए जाना ही विज्ञान में सत्यता की कसौटी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस की &lt;a href="http://arstechnica.com/science/news/2010/03/were-so-good-at-medical-studies-that-most-of-them-are-wrong.ars"&gt;एक पैनल के सदस्य, यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के सुरेश मुलगांवकर और उनके साथियों&lt;/a&gt; का मानना है कि हमारी आंकड़े पैदा करने की क्षमता बढ़ती जा रही है, लेकिन उसी रफ्तार से उनके विश्लेषण और तुलना के जरिए सही निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन है, क्योंकि हर फैसले से गलतियों की संभावना भी बढ़ती है। और यह मेडीकल साइंस की नहीं बल्कि सांख्यिकी की कमी के कारण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टॉकहोम के इस कॉफी बनाम कैंसर के अध्ययन को जर्मनी में 3464 कैंसर की मरीजों और 6657 स्वस्थ महिलाओं के साथ दोहराया गया। और नतीजा उलट आया- कॉफी ज्यादा पीने से कैंसर रोकने का निष्कर्ष सही नहीं था। इस संपुष्टीकारक अध्ययन में एस्ट्रोजन-रिसेप्टर नेगेटिव प्रकार के स्तन कैंसर के बारे में भी कोई महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने नहीं आया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताज्जुब की बात तो यह है कि इस पर भी रिसर्चर्स मानने को तैयार नहीं थे कि उनके पहले अध्ययन में कोई कमी थी या पूरी तरह तथ्यों से उसके नतीजों की संपुष्टि करना बाकी है। उनका कहना था कि हो सकता है, जर्मनी में कॉफी की किस्म, उसे ब्रू करने के तरीके या फिर कैफीन की मात्रा में अंतर की वजह से नतीजों में फर्क आया हो, लेकिन फिर भी उनके नतीजे सही हैं कि कॉफी पीना स्तन कैंसर को रोकने में मददगार है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2009 में चीन में ऐसे ही एक अध्ययन से पता चला था कि हर दिन दो कप कॉफी स्तन कैंसर की संभावना में 2 फीसदी की कमी लाता है, एक और ध्ययन ने यह आंकड़ा 6 फीसदी तक पहुंचाया। फिर भी यह कसरत करने और शराब-फैटी चीजों से बचने जैसे पहचाने हुए कारकों के मुकाबले बहुत छोटा है। सबसे बड़ी बात है कि अमरीका, स्वीडन आदि में ऐसे कई अध्ययन हो चुके हैं जिनमें हजारों महिलाओं को शामिल किया गया और देखा गया कि कॉफी पीने और कैंसर रोकने में क्या कोई संबंध है। सभी अध्ययनों के बाद कोई महत्वपूर्ण, ठोस नतीजा नहीं पाया जा सका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम नतीजा अब तक तो यही है कि कॉफी पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए। किसी को इसका स्वाद पसंद है, कोई इससे अपनी थकान मिटाना चाहता है, कोई आदतन पीता है। लेकिन चाहे जिस कारण से पिएं, इसे अपने कैंसर के रिस्क को कम करने के हिसाब-किताब से बाहर ही रखें तो बेहतर।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-6006012718338374379?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/6006012718338374379/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=6006012718338374379' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6006012718338374379'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6006012718338374379'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='कॉफी पिएं कि न पिएं- कैंसर का इससे क्या वास्ता?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-XF0RuQ3Rv6U/TdQ3Jx68hqI/AAAAAAAAAS0/Hpfhjx_vA_4/s72-c/Cup%2Bcoffee.png' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-7275009105731367010</id><published>2011-04-25T13:30:00.002+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.157+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर फैक्ट्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>क्या कहते हैं आंकड़े कैंसर के बारे में</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-p3QWGI6JIsM/TbLV2qnfuLI/AAAAAAAAASk/lE2VAY-MaZ8/s1600/cigarette_composition.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-p3QWGI6JIsM/TbLV2qnfuLI/AAAAAAAAASk/lE2VAY-MaZ8/s400/cigarette_composition.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5598772421904545970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दुनिया में&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;# हर साल एक करोड़ नए कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# हर साल 60 लाख से ज्यादा कैंसर मरीज जान से हाथ धो बैठते हैं। ये कुल होने वाली मौतों का 12 फीसदी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# 2020 तक हर साल नए कैंसर मरीजों की संख्या में डेढ़ करोड़ और सालाना मौतों की संख्या एक करोड़ तक हो जाने का अंदेशा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# नैशनल कैंसर कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक वर्ष 2000 में विकसित देशों में कैंसर रोगियों की संख्या 54 लाख और विकासशील देशों में 47 लाख थी। 2020 तक ये आंकड़ा उलट कर 60 लाख और 93 लाख हो जाने की संभावना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;#1950 के मुकाबले आज पेट के कैंसर के मामले आधे रह गए हैं जबकि फेफड़ों के कैंसर के मामले बेतरह बढ़े हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# 1980 के बाद विकसित देशों में धूम्रपान से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूकता की वजह से पुरुषों में फेफड़ों के कैंसर में कमी आई है जबकि विकासशील देशों में और महिलाओं में यह अब भी बढ़ ही रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश में आज की तारीख में कोई 20-25 लाख कैंसर के मरीज हैं। हर साल सात लाख से ज्यादा नए मरीज इस लिस्ट में जुड़ रहे हैं और इनमें से तीन लाख हर साल दम तोड़ देते हैं। &lt;br /&gt;देश में हर लाख में 70-90 लोगों को कैंसर होने की आशंका है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;भारत में पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर सबसे आम हैं। इसके बाद पेट और मुंह के कैंसर आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले सबसे ज्यादा हैं। शहरों में हर 8-10 महिलाओं में से एक को और गांवों में हर 35-40 में एक को स्तन कैंसर होने की संभावना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद बच्चेदानी के मुंह के (सर्वाइकल) कैंसर का नंबर आता है। कुछेक साल पहले तक महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के मामले सबसे ज्यादा थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-7275009105731367010?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/7275009105731367010/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=7275009105731367010' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7275009105731367010'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7275009105731367010'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html' title='क्या कहते हैं आंकड़े कैंसर के बारे में'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-p3QWGI6JIsM/TbLV2qnfuLI/AAAAAAAAASk/lE2VAY-MaZ8/s72-c/cigarette_composition.gif' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-7096886126475707789</id><published>2011-04-24T18:45:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.158+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मोटापा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Living with cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लाइफ स्टाइल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='life style and cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>बेहतर सेहत कैंसर से लड़ने की ज्यादा ताकत देती है</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सेहत पहले से ही अच्छी हो तो कैंसर से होने वाली 65 फीसदी मौतों को रोका जा सकता है&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्तन कैंसर का इलाज कराने वाली महिलाओं के लिए उनकी कैंसर होने के पहले की सेहत भी बहुत मायने रखती है। अमेरिका के After Breast Cancer Pooling Project में शामिल शुरुआती स्तन कैंसर की 9,400 महिलाओं पर कैसर का पता लगने के दिन से अगले सात साल तक लगातार नजर रखी गई। पाया गया कि इनमें से करीब आधी महिलाओं का बॉडी-मास इंडेक्स (बीएमआई) यानी लंबाई और वजन का अनुपात गड़बड़ था। सरल शब्दों में कहें तो वे मोटी थीं, उनका वजन लंबाई और उम्र के अनुपात में ज्यादा था। और इस वजह से उनकी कुल सेहत भी खराब थी। जिन महिलाओं की सेहत इलाज के शुरू में खराब आंकी गई उनमें से 27 फीसदी को दोबारा कैंसर हुआ- उसी जगह या फिर नई जगह पर नया कैंसर। जबकि आम तौर पर शुरुआती स्टेज का कैंसर ज्यादा खतरनाक नहीं माना जाता।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-H6d4WP9FtCM/TbLTbtms0MI/AAAAAAAAASc/G5BlMPHSAmI/s1600/fat.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-H6d4WP9FtCM/TbLTbtms0MI/AAAAAAAAASc/G5BlMPHSAmI/s320/fat.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5598769759826792642" /&gt;&lt;/a&gt; इन महिलाओं की सेहत के आंकड़ों का विश्लेषण करके यह भी पाया गया कि इन कम स्वस्थ महिलाओं की कैंसर या किसी और बीमारी से मरने की संभावना सामान्य वजन वाली महिलाओं की तुलना में 65 फीसदी ज्यादा रही। इनके बारे में पाया गया कि वे कम सक्रिय थीं, इन्हें नींद की समस्या रही, और उच्च रक्तचाप या डाइबिटीज होने की संभावना 50 फीसदी ज्यादा थी और आर्थराइटिस होने की संभावना भी दोगुनी रही। American Association for Cancer Research (AACR), के ओरलैंडो में हुए सम्मेलन में इस अध्ययन को प्रस्तुत किया गया। डॉक्टरों का कहना था कि सिर्फ कैंसर के इलाज के बजाए महिलाओं के कुल स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर उनके सामान्य स्वास्थ्य में पांच फीसदी का भी सुधार होता है तो उनके जीवन की गुणवत्ता और जीवित रहने के अवसरों में खासा सुधार होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न सिर्फ कैंसर के मौके के लिए बल्कि हमेशा हम अपनी सेहत पर ध्यान देते रहें और खान-पान, कसरत आदि पर ध्यान देते रहें तो किसी भी बीमारी से बेहतर लड़ सकेंगे, बल्कि कई बीमारियों को आने के पहले ही जरूर रोक सकेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-7096886126475707789?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/7096886126475707789/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=7096886126475707789' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7096886126475707789'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7096886126475707789'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/04/blog-post_24.html' title='बेहतर सेहत कैंसर से लड़ने की ज्यादा ताकत देती है'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-H6d4WP9FtCM/TbLTbtms0MI/AAAAAAAAASc/G5BlMPHSAmI/s72-c/fat.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-5222732830845537377</id><published>2011-04-23T18:08:00.002+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.159+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शराब और कैंसर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='life style and cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='living healthy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>हर हाल में खराब है शराब</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-08JYTUZaNk4/TbLJ6DtWNLI/AAAAAAAAASU/UC4v-pRnkEo/s1600/drinks%2Bmeasurement.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 296px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-08JYTUZaNk4/TbLJ6DtWNLI/AAAAAAAAASU/UC4v-pRnkEo/s400/drinks%2Bmeasurement.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5598759286040048818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हाल के एक रिसर्च से पता चला है कि ‘सीमित मात्रा में’ शराब पीना भी कैंसर को बढ़ावा देता है। और अगर कोई कम ही सही, पर लंबे समय तक नियमित शराब पीता रहा तो उसे कैंसर होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। और यह खतरा उस समय भी रहता है, जबकि उसने अब यह आदत छोड़ दी हो। ब्रिटेन में 10 में से एक पुरुष और 33 में से एक महिला को शराब के कारण कैंसर होने का खतरा होता है। और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। वहां हर साल 13,000 लोगों को शराब पीने के कारण कैंसर हो रहा है, जिसमें स्तन, मुंह, खाने की नली का ऊपरी हिस्सा, स्वर यंत्र, जिगर और मलाशय के कैंसर शामिल हैं। महिलाएं एक यूनिट या 125 मिली लीटर वाइन, आधा पिंट बियर या सिंगल व्हिस्की के बराबर और पुरुष इससे दोगुनी शराब यदि नियमित पीते हैं तो उन्हें अल्कोहल से जुड़े कैंसर का खतरा बताया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1992 से चल रहा ईपीआईसी (एपिक)कार्यक्रम पूरे यूरोप में खाने-पीने और कैंसर के संबंधों का अध्ययन करता है। इस अध्ययन में यूरोप में पिछले 10 साल से शराब पीने की आदतों और कैंसर के संबंध पर रिसर्च चल रहा है। इसमें 35 से 70 साल के 3.6 लाख लोग शामिल हुए। रिसर्च से पता चला है कि ज्यादातर लोग कैंसर और शराब के इस मारक संबंध से अनजान हैं। अनेकों का तो मानना है कि शराब पीने से उनकी सेहत बेहतर होती है। जबकि वास्तविकता यह सामने आई है कि एक पेग रोज पीने वाले भी अपने लिए कैंसर को निमंत्रण दे रहे हैं। यह भी भ्रम है कि ठंड में और ठंडे इलाकों में शराब पीना शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है। जबकि यह अध्ययन ऐसे सभी भ्रमों के जाले साफ कर रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-5222732830845537377?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/5222732830845537377/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=5222732830845537377' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5222732830845537377'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5222732830845537377'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='हर हाल में खराब है शराब'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-08JYTUZaNk4/TbLJ6DtWNLI/AAAAAAAAASU/UC4v-pRnkEo/s72-c/drinks%2Bmeasurement.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-5223082566707486221</id><published>2010-04-08T09:55:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.161+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>मरीज न सही, डॉक्टर तो जानें इस मर्ज को!</title><content type='html'>महानगरों, खासकर दिल्ली में स्तन कैंसर जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, डॉक्टर भी हैरान हैं। कारण कई हैं, जिनमें से एक लाइफ-स्टाइल भी है। सेहतमंद रहने के लिए अच्छा खाने और कसरत करने की नसीहतें तो कई बार दे चुकी हूं। फिलहाल खास तौर, पर दिल्ली की महिलाओं में कैंसर और स्तन से जुड़ी दूसरी समस्याओँ के मूल कारणों की पड़ताल करने की कोशिश कर रही हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहली बात है, स्तन की बीमारियों के बारे में जानकारी का पूर्णतः अभाव। स्तनों के बारे में भारतीय महिलाओं में जानकारी का कतई अभाव है। वे इसे बेहद निजी, शर्मिंदा करने वाले अंग के रूप में देखती हैं या फिर पुरुषों को रिझाने और उसी इस्तेमाल के अंग के रूप में सहेजती हैं। कभी हाथ-पैर-सिर में दर्द हो, परेशानी हो तो वह फौरन सबसे चर्चा करती है, पर स्तन में कुछ गंभीर हुआ-सा लगे तो भी किसी से चर्चा तक नहीं करती। मानो वह उसके जीवित शरीर का जीवित हिस्सा हो ही नहीं। स्तनों में गांठ होना, निप्पल से कोई सफेद या रंगीन (पीला, लाल, हरा कोई भी) पानी का निकलना, उसका आकार बेवजह बदलना, दूध पिलाने के समय समस्याएं, स्तनों में सूजन और उनका पक जाना जैसी दसियों समस्याएं महिलाएं आए दिन झेलती हैं, पर बिना किसी से कहे, चुपचाप। यह गलत है। स्कूलों में छोटी उम्र से ही लड़कियों को यह जानकारी मिलनी चाहिए, जो नहीं मिलती। मीडिया में भी कैंसर पर बात करना तो फैशनेबल है, लेकिन स्तन की दूसरी समस्याओं पर बिरले ही कुछ पढ़ने-देखने को मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी समस्या डॉक्टरों से संबंधित है। कोई महिला मरीज सबसे पहले अपने नजदीक के, परिचित डॉक्टर के पास ही पहुंचती है। और उसकी बीमारी का भविष्य उस डॉक्टर की जानकारी और कुशलता पर निर्भर करता है। कई सर्वेक्षणों से बार-बार साबित हो चुका है कि आम फिजीशियन स्तन कैंसर और स्तन की दूसरी बीमारियों के बारे में बहुत कम जानते हैं। आश्चर्य हो सकता है, लेकिन वे भी आम जनता के बराबर ही भ्रम में जीते हैं। वे भी स्तन की गांठ, स्राव, दर्द, बदलाव आदि लक्षणों को नजरअंदाज कर दते हैं या फिर इन्हें संक्रमण जैसी कोई स्थानीय समस्या मानकर एंटीबायोटिक आदि का एक कोर्स तस्कीद कर देते हैं। जबकि इमेजिंग यानी अल्ट्रासाउंड और मेमोग्राफी, बायोप्सी या एफएनएसी जैसी नैदानिक जांचों की तत्काल जरूरत उन्हें महसूस होनी चाहिए। इस तरह बीमारी की पहचान में देर हो जाती है और बीमारी को खतरनाक हद तक बढ़ने का मौका मिल जाता है। दूसरी तरफ कई बार अतिउत्साह में छोटी लड़कियों की भी मेमोग्राफी कर दी जाती है जबकि मेडिकल नियमों के अनुसार 35 साल से कम उम्र की महिला की मेमोग्राफी अपरिहार्य स्थितियों में ही करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरी बात है, स्तन कैंसर और स्तन की दूसरी समस्याओं का गलत तरीके से इलाज। यह तथ्य भी डॉक्टरों के बीच सर्वेक्षणों से सामने आया है कि अकुशल और अधूरी जानकारी वाले डॉक्टर स्तन कैंसर, निप्पल से स्राव या स्तन के फोड़े और सूजन का इलाज मनमाने ढंग से कर देते हैं। दूध पिलाने के समय अक्सर महिलाओं को स्तन में सूजन और गांठ यानी मास्टिटिस से जूझना पड़ता है। थोड़े-बहुत घरेलू इलाज के बाद मरीज दर्द से परेशान, डॉक्टर के पास पहुंचता है और डॉक्टर बच्चे का दूध छुड़ा कर स्तन में चीरा लगा देते हैं ताकि जमा हुआ दूध, मवाद निकल जाए। यह तो हुआ डॉक्टर के लिए सरल, मशीनी तरीका, जिसे कोई अंतर्राष्ट्रीय मानक मंजूर नहीं करता। इसके लिए बिना चीरा लगाए सुई से मवाद निकालने और बच्चे को दूध पिलाते रहने का कायदा दुनिया के डॉक्टरों ने मंजूर किया है। लेकिन हमारे यहां कम ही डॉक्टर/सर्जन इसे जानते या मानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार बिना मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड, बायोप्सी आदि के टेढ़ा-मेढ़ा चीरा लगाकर स्तन कैंसर तक का इलाज कर दिया जाता है। बाद का इलाज यानी कीमोथेरेपी, रेडियो थेरेपी आदि किए बिना मरीज को घर भेज दिया जाता है। इसका नतीजा होता है, कुछ महीनों या साल भर बाद बीमारी का फिर उभरना और ज्यादा तेजी से, मारक अंदाज में उभरना। इस समय तक बीमारी भीतर ही भीतर कई अंगों तक फैल चुकी होती है। विशेषज्ञ के लिए ऐसे मरीज का इलाज करना टेढ़ी खीर ही होता है। ऐसे में हजारों रुपए खर्च करने के बावजूद मरीज का इलाज कितना कारगर होगा, इसमें शक ही होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौथी बात, अगर कोई मरीज शुरुआत में ही विशेषज्ञ के पास जाना चाहे तो उसे कहां मिलता है कोई स्तन विशेषज्ञ? उसे पता ही नहीं चल पाता कि कौन सा डॉक्टर स्तन की बीमारियों को ज्यादा समझता है। कारण यह है कि ऐसे विशेषज्ञों की बेहद कमी है। और यह स्थिति गांव-कस्बे में ही नहीं दिल्ली जैसे महानगर में भी है। और अंत में भीड़-भाड़ वाले बड़े सरकारी अस्पताल या फिर बेहिसाब महंगे 5 सितारा अस्पताल में ही उसे गति दिखती है, जिससे वह हमेशा बचने की कोशिश करता रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कोई मरीज सौभाग्य से विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंच भी गया तो अच्छे डॉक्टर का काम होना चाहिए कि वह मरीज को बीमारी और इलाज के बारे में बताए, उसकी प्रक्रिया समझाए, नतीजे बताए और उसे उपलब्ध विकल्पों के बारे में भी जरूर ही बताए। पर ऐसा कब हो पाता है? डॉक्टर लिख देता है और मरीज बिना जाने-समझे बल्कि पढ़े बिना भी (क्योंकि जटिल हस्तलेख में, जटिल भाषा में पर्चा पढ़ना हरेक के बस का नहीं) बस, रोबोट की तरह उन निर्देशों का पालन करता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी महंगी दवा का सस्ता विकल्प बाजार में उपलब्ध हो तो भी उसके पास ऐसा करने की चॉइस नहीं होती क्योंकि हमारे देश में दवाओं के जेनेरिक नाम यानी रसायन का नाम लिखने के बजाए ब्रांड का नाम लिखने का चलन है, जो मरीज के खिलाफ जाता है। यह वैसा ही हुआ जैसे किसी को जींस खरीदनी हो तो उसके पास डेनिम, कॉटन या कॉर्डरॉय जैसे नहीं बल्कि लीवाइज, रैंगलर या डीज़ल जैसे विकल्प सामने रख दिए जाएं। ऐसे में जानकारी के अभाव में वह गरीब मरीज हर हाल में महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर होगा क्योंकि बराबर असर वाली सस्ती दवाओं के बारे में उसे कौन बताए? उसे अपनी जिंदगी, अपने इलाज, अपने शरीर के बारे में इलाज, विकल्पों को जानने का हक कोई डॉक्टर, अस्पताल नहीं देता। क्या यह भी मानवाधिकार हनन का मामला नहीं होना चाहिए?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-5223082566707486221?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/5223082566707486221/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=5223082566707486221' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5223082566707486221'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5223082566707486221'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='मरीज न सही, डॉक्टर तो जानें इस मर्ज को!'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4678404997681257975</id><published>2009-12-19T20:28:00.002+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.162+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर रिसर्च'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रसायन और कैंसर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर खबर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धूम्रपान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>मिल गई कैंसरों के जीववैज्ञानिक इतिहास की चाभी</title><content type='html'>फेफड़ों और त्वचा के कैंसरों के जीववैज्ञानिक इतिहास का पता लगा लिया गया है। इंग्लैंड के &lt;a href="http://www.sanger.ac.uk/genetics/CGP/"&gt;सेंगर इंस्टीट्यूट में कैंसर जीनोम परियोजना&lt;/a&gt; में लगे वैज्ञानिकदल ने  इन दोनों प्रकार के कैंसरों के मरीजों की बीमार कोशिकाओं के जीन में पाए जाने वाले अंतरों को ढूंढ लिया है जो कैंसर के कारण पैदा होते हैं।  सेंगर इंस्ट्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पहली बार त्वचा और फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की कोशिकाओं के हर म्यूटेशन को पहचाना है जो स्वस्थ कोशिका को कैंसर की स्थिति की ओर धकेलते हैं। यह खोज कैंसर के सटीक इलाज के रास्ते में मील का पत्थर है। अब कैसर कोशिकाओं के साथ-साथ शरीर की तेजी से बढ़ती स्वस्थ कोशिकाओं को भी खत्म कर देने वाली कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की जगह सिर्फ कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को खत्म करने के तरीके ढूंढने में मदद मिलेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों ने 45 साल के मेलानोमा (त्वचा का कैंसर) से पीड़ित और 55 साल के स्मॉल सेल लंग कैंसर से पीड़ित पुरुषों की बीमार कोशिकाओं का उन्हीं  की स्वस्थ कोशिकाओं के साथ मिलान किया और दोनों में अंतर ढूंढते गए। इस तरह दोनों प्रकार की कैंसर कोशाओं के जीन में म्यूटेशन (अचानक आए असामान्य बदलाव) को दर्ज किया। यह शोध त्वचा और फेफड़ों के कैंसर पर ही किया गया क्योंकि इन दोनों के होने में पर्यावरण के हाथ का पता लग चुका है। ज्यादातर मेलानोमा बचपन में ज्यादा अल्ट्रावॉयलट किरणों को झेलने से और स्मॉल-सेल लंग कैंसर बीड़ी-सिगरेट के धुएं से होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाया गया कि लंग कैंसर की कोशिकाओं में 23 हजार तरह के म्यूटेशन होते हैं जो सिर्फ लंग कैंसर पीड़ित कोशाओं में ही होते हैं और स्वस्थ कोशाओं में कभी नहीं पाए जाते। त्वचा के कैंसर, मेलानोमा की बीमार कोशिका में 32 हजार प्रकार के म्यूटेशन पाए गए। लंग कैंसर के सभी म्यूटेशन यानी कोशिकाओँ के जीन में बदलाव सिगरेट में पाए जाने वाले 60 तरह के रसायनों के कारण होते हैं जो डीएनए के साथ जुड़ कर उसे अपना सामान्य कामकाज करने से रोकते हैं और उसकी संरचना को बिगाड़ देते हैं। लंग कैंसर पर शोधदल का नेतृत्व करने वाले डॉ. पीटर कैंपबेल के मुताबिक - “ हर 15 सिगरेटों का धुआं स्वस्थ कोशिका के जीनोम में एक म्यूटेशन लाता हैं। और यह असर पहली सिगरेट से ही शुरू हो जाता है। यह तथ्य भयानक है क्योंकि कई लोग हैं जो हर दिन एक पैकेट सिगरेट का धुंआ पी जाते हैं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खास बात यह है कि हमारे देश में मुंह, गले और फेफड़ों के कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यहां मुंह का कैंसर कुल मामलों में से 45  फीसदी से ज्यादा है। इनमें से 90 फीसदी से ज्यादा मामलों में कारण तंबाकू और उससे बने उत्पाद हैं। जबकि योरोप के देशों में जागरूकता के कारण यह आंकड़ा लगातार घट रहा है और 4-5 फीसदी के आस-पास तक पहुंच गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर साल 13 लाख से ज्यादा लोग फेफड़ों के कैंसर से मर जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव कोशिकाओं में क्रोमोसोम के 23 जोड़े होते हैं जिनमें जेनेटिक मटीरियल या जनन द्रव्य अक्षरों (A,G,C और T प्रोटीनों ) के तीन अरब जोड़ों के रूप में होता है। ये सभी अक्षर जिगसॉ-पजल के जोड़ों की तरह होते हैं जो किसी खास अक्षर से किसी खास तरफ से ही जुड़ते हैं। इन अक्षरों के जोड़ों में से किसी एक जोड़े में बदलाव आता है तो इसे म्यूटेशन कहा जाता हैं। एक अक्षर का जोड़ा दूसरे अक्षर से जुड़ जाए, या किसी का जोड़ा ही न मिले या किसी के दो जोड़े हो जाएं, किसी परफेक्ट जोड़ी का डुप्लिकेट ही बन जाए या फिर किसी क्रोमोसोम श्रृंखला का कोई हिस्सा टूट जाए या फिर गलत तरीके से जुड़े हो तो यह म्यूटेशन हुआ।&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;10 साल तक चलने वाली इस कैंसर जीनोम परियोजना में 50 तरह के कैंसरों के जीनोम और कोशिकाओं के म्यूटेशन का नक्शा बनाने की योजना है। आम कैंसरों के इस स्तर तक खुलासे के बाद इनका इलाज आसान हो जाएगा। हालांकि इलाज के पहले हर मरीज की अलग-अलग जेनेटिक मैपिंग करनी पड़ेगी जिसका फिलहाल खर्च कोई एक लाख डॉलर है, और डेढ़-दो साल बाद इसके करीब 20 हजार डॉलर हो जाने की उम्मीद है। और 10 साल बाद जबकि इस तरह का टारगेटेड इलाज बाजार में आ जाएगा, इस तरह की जेनेटिक मैपिंग भी सस्ती हो जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर कितनी? अगर मान लें कि एक हजार रुपए तक भी सस्ती हो जाए तो भी....क्या किसी भी कीमत पर जिंदगी इतनी सस्ती है कि उस पर कुछेक पैकेट सिगरेट-बिड़ी के खर्च किए जाएं और यह तमाम हो जाए!??  नहीं न!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिगरेट-बिड़ी-पान मसाला-तंबाकू पर पैसे, समय, ऊर्जा और आखिरकार पूरी जिंदगी खर्च कर देना कहां की अक्लमंदी है? इन सबसे तो आसान होता है, सिगरेट के साथ-साथ कैंसर की जांच और इलाज के पैसे बचाना और इस तरह अपनी जान को जोखिम में डालने से बचाना। क्या सोच रहे हैं??&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4678404997681257975?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4678404997681257975/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4678404997681257975' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4678404997681257975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4678404997681257975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='मिल गई कैंसरों के जीववैज्ञानिक इतिहास की चाभी'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-3020701009869602081</id><published>2009-11-12T23:50:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.164+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तंबाकू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='living healthy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धूम्रपान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>सिगरेट पीना हॉट है या कूल?</title><content type='html'>वैसे तो धुआं पीना कई जगहों पर मना हो गया है। फिर भी पीने वाले को तो सिगरेट-बिड़ी पीनी ही होती है। भई, जिसको पीना है, वो कहीं भी जाकर अपनी तलब पूरी करेगा। भले ही कड़ी सर्दी में बाहर मैदान में खड़े होना पड़े या फिर कड़ी तपती गर्मी में मैदान में या सड़क पर पेड़ की एक पत्ता छांव भी न मिले। भले ही अपने मित्रों का झुंड छोड़कर अजनबियों के बीच खड़ा होना पड़े या फिर नो-स्मोकिंग जोन के अंदर पकड़े जाने पर इज्जत जाती रहे। और ये सब एक दिन की नहीं, रोज-ब-रोज की बात है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जमाना था जब सिगरेट पीना स्टाइल माना जाता था, शान की निशानी मानी जाती थी। फिल्मों के हीरो स्टाइल से धुआं छोड़ते हुए ‘अदाएं’ दिखाते थे और दर्शक फिदा हुए जाते थे। पर आज समय बदल गया है। अब फिल्मों में सिगरेट पीना टशन नहीं बल्कि टेंशन की निशानी बन गया है। या तो विलेन पिएगा या फिर परेशान-हाल हीरो। कोई स्वस्थ-प्रसन्न चरित्र फिल्मों में धुआं करता कम ही दिखता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी सोचिए कोई लती बुजुर्ग धुंए की तलब में अपने दफ्तर से निकल कर दूर चला जाता है, काम-काज, दफ्तर के भीतर के अनुकूलत वातावरण को छोड़कर। छुपकर जिंदगी को धुंए में उड़ाने के लिए। और वहां से लौटता है, एक बदबू का भभका लेकर जिसे हर कोई पास से गुजर कर महसूस कर सकता है, नाक भौं सिकोड़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोलंबस के जमाने से भी पहले से अमरीकी रेड इंडयन नशे के लिए तंबाकू की पत्तियां जलाकर धुंआ पीना जानते थे। लेकिन उसी अमरीका में मार्लबोरो सिगरेट कंपनी के अभिमानी मालिक की जान उसी की कंपनी की बनाई सिगरेट के धुंए ने ले ली। &lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2008/05/blog-post_18.html"&gt;हमारे  देश में पुरुषों के कैंसर के मामलों में 45 फीसदी मुंह, श्वास नली या फेफड़ों का कैंसर होता है। इनमें 95 फीसदी बीमारी का कारण तंबाकू और धूम्रपान है।&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सिगरेट से लोगों का तिरस्कार ही मिलता है, और ज्यादा समय होने पर लती होते देर नहीं लगती और लोग उसे निरीह, बीमार समझने लगते हैं। यानी सिगरेट पीने वाला न तो ‘हॉट’ लगता है, और न यह कोई ‘कूल’ अदा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बारे में आपकी राय क्या है, जरूर बताएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;नवंबर फेफड़ों के कैंसर की जागरूकता का महीना है।&lt;/span&gt; &lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-3020701009869602081?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/3020701009869602081/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=3020701009869602081' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3020701009869602081'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3020701009869602081'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html' title='सिगरेट पीना हॉट है या कूल?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-3046673456115615885</id><published>2009-11-07T15:30:00.001+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.165+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर खबर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चर्चा में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सर्वाइकल कैंसर'/><title type='text'>सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन कितनी कारगर होगी?</title><content type='html'>दिल्ली में कई सरकार और गैर-सरकारी अस्पतालों में कैंसर विभाग या महिला  रोग और प्रसूती विभाग की दीवारों पर सर्वाइकल कैंसर को रोकने की वैक्सीन के पोस्टर लगे मिल जाते हैं जो कि एक कंपनी के अपने उत्पाद का विज्ञापन है। इसमें एक 22-25 साल की महिला इस वैक्सीन को लगवाने की वकालत कर रही है जिससे सर्वाइकल कैंसर को रोका जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी एक परिचता ने भी इस बारे में मुझसे चर्चा की। उसे लंबे समय से गर्भाशय के मुंह में संक्रमण की समस्या रही। गर्भाशय और अंडाशय (ओवरी) से जुड़ी कुछ दूसरी तकलीफें भी रहीं। लंबे समय से लगातार इलाज करवा रही मेरी सखी को किसी क्लीनिक में यही- वैक्सीन वाला विज्ञापन देखने को मिला। इसके बाद से वह बेचैन हो रही है इस वैक्सीन का कोर्स करवाने के लिए। उसे लग रहा है, जैसे बादल वाले किसी दिन बाहर निकलने के छतरी लिए बिना नहीं निकलती, उसी तरह उस वैक्सीन की सुरक्षा से वह अपने को संभावित सर्वाइकल कैंसर से आसानी से बचा सकती है। उसे डर है कि यह कसर पूरी किए बिना उसे खुदा न खास्ता सर्वाइकल कैंसर हो गया तो वह खुद को माफ नहीं कर पाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बारे में कुछ जानने की इच्छा से मैंने थोड़ी-बहुत खोज की तो पता चला कि इंग्लैंड के नैशनल हेल्थ स्कीम के तहत सर्वाइकल कैंसर के लिए वैक्सिनेशन प्लान चल रहा है। वहां राष्ट्रीय वैक्सिनेशन कार्यक्रम के तहत 12 से 18 साल की लड़कियों को &lt;a href="http://www.telegraph.co.uk/health/healthnews/6167708/High-street-pharmacy-offers-cervical-cancer-vaccine-for-405.html"&gt;यह दवा स्कूलों में मुफ्त दी जा रही&lt;/a&gt; है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां बड़ी उम्र की महिलाएं भी इसकी मांग कर रही हैं लेकिन सरकारी फार्मेसी में उनके लिए यह दवा नहीं रखी गई है। और इसका ठोस कारण है। हालांकि बाजार इस बेकार मांग की पूर्ति में भी अपना मुनाफा काटने के लिए तैयार है। दुकानों में प्राइवेट कंपनियों की वैक्सीन 18 से 54 साल की महिलाओं के लिए उपलब्ध है। इस तीन इंजेक्शन वाले इस पूरे कोर्स की कीमत है- 405 पौंड।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिलाओं को होने वाले सर्विक्स (बच्चेदानी के मुंह) के कैंसर का सबसे बड़ा कारण (80 फीसदी से ज्यादा) ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) है जिसके खिलाफ इस वैक्सीन का इस्तेमाल होने लगा है। वैज्ञानिकों ने कम उम्र की लड़कयों के लिए यह वैक्सीन लंबे दौर में कारगर बताई है। उनकी सिफारिश है कि 12 साल तक की हर लड़की को वैक्सीन दी जाए। जो छूट जाएं उन्हें भी हर हाल में 18 वर्ष तक की उम्र तक वैक्सीन जरूर दे दी जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://74.125.153.132/search?q=cache:EiB35qfX1WIJ:www.mayoclinic.com/health/cervical-cancer-vaccine/WO00120+cervical+cancer+vaccine+guidelines&amp;cd=2&amp;hl=en&amp;ct=clnk&amp;gl=in"&gt;वैज्ञानकों का मानना है &lt;/a&gt; कि इस उम्र के बाद एच पी वी वैक्सीन देने की खर्चीली योजना का ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस, सेक्शुअली फैलने वाला वायरस है और इस उम्र तक लड़कियां सेक्शुअली एक्टिव हो जाती हैं। इसलिए इसके बाद वैक्सीन लगाने का ज्यादा फायदा नहीं, क्योंकि तब तक वायरस का संक्रमण सर्विक्स में पहुंच जाने की काफी संभावना होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई देशों में इस वैक्सीन के इस्तेमाल के लिए दिशानिर्देश हैं। अमरीका की मेयो क्लीनिक के मुताबिक 11 से 12 वर्ष की उम्र में छह माह के भीतर इस वैक्सीन के तीनों डोज़ दे दिए जाने चाहिए। पहले डोज़ के दो महीने बाद दूसरा और उसके चार महीने बाद तीसरा। अगर कोई महिला उस वक्त वैक्सीन न ले पाए या तीन डोज़ का यह कोर्स बीच में छूट जाए तो 13 से 26 साल की महिलाओं को कैच-अप डोज दिया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंग्लैंड में एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 20 से 29 वर्ष की 10 में से एक महिला में एचपीवी संक्रमण है। इन महिलाओं को वैक्सीन का फायदा नहीं होगा क्योंकि संक्रमण हो जाने के बाद वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचने में मदद नहीं करती। इस तरह उनमें इस बीमारी से बचने की झूठी सुरक्षा भावना जागेगी और वे खुद को वैक्सीन से सुरक्षित मान कर सर्वाइकल कैंसर की जांच के लिए होने वाली नियमित&lt;a href="http://74.125.153.132/search?q=cache:qLzlGArxYGUJ:www.cancer.gov/cancertopics/factsheet/Detection/Pap-test+what+is+pap+smear+test&amp;cd=7&amp;hl=en&amp;ct=clnk&amp;gl=in"&gt; पैप-स्मीयर जांच&lt;/a&gt; भी नहीं करवाएंगी। नतीजा वैक्सीन के पहले के समय से ज्यादा भयावह होगा। हालांकि सफल वैक्सिनेशन के बाद भी विशेषज्ञ रूटीन जांच के महत्व को कम नहीं आंकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैक्सीन बनने के पहले भी इंग्लैंड में नैशनल हेल्थ स्कीम के तहत सर्वाइकल स्क्रीनिंग कार्यक्रम 1988 से चल रहा है जिसमें क्लीनिकल जांच के अलावा मुख्यतह पैप स्मीयर जांच की जाती है जिससे अब तक वहां एक लाख से ज्यादा महिलाएं मरने से बच सकी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://74.125.153.132/search?q=cache:R6fMCG8vokMJ:www.inctr.org/publications/2003_v03_n03_w02.shtml+cervical+cancer+india+statistics&amp;cd=3&amp;hl=en&amp;ct=clnk&amp;gl=in"&gt;आंकड़े कहते हैं&lt;/a&gt; कि दुनिया की पांच लाख सर्वाइकल कैंसर की मरीजों में से एक लाख सिर्फ भारत में हैं यानी दुनिया की 1/5 सर्वाइकल कैंसर का बोझ भारतीय महिलाएं उठा रही हैं। दक्षिण भारत में यह महिलाओं में सबसे ज्यादा होने वाला कैंसर है। सर्वाइकल कैंसर सीधे तौर पर निर्धनता और अज्ञानता से जुड़ा हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसे रोका जा सकता है, सेक्शुआल हाइजीन और कंडोम जैसे बैरियर गर्भनिरोधक जैसे आसान तरीकों से। लेकिन इसके साथ ही लोगों के सामान्य स्वास्थ्य, रोग-निरोधक शक्ति खान-पान, और जीवन स्तर को भी सुधारने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश में लड़कियां जल्दी सेक्शुअली एक्टिव हो जाती हैं। इसका कारण कम उम्र में लड़कियों की शादी हो जाना है। इससे उनमें सर्वाइकल कैंसर होने की संभावना भी ज्यादा होती है। ऐसी स्थिति में हमारे देश में भी अगर कोई एचपीवी के खिलाफ वैक्सीनेशन करवाना चाहे तो किशोरावस्था में ही करवाना होगा। ध्यान देने की बात है कि यह वैक्सीन कैंसर को सिर्फ रोक सकती है, संक्रमण हो जाने के बाद इसका इलाज नहीं कर सकती। बड़ी उम्र की महिलाओं के वैक्सीनेशन का कोई फायदा नहीं रह जाता। और इस महंगे वैक्सीनेशन के बाद महिलाएँ झूठे ही सुरक्षित महसूस करके इस तरफ से लापरवाह हो जाएं और पैप स्मीयर जैसी सरल, सुरक्षित जांच भी न करवाएं, यह ज्यादा खतरनाक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बहुराष्ट्रीय कंपनी एमएसडी ने अक्टूबर 2008 में सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ भारत में पहली वैक्सीन बाजार में उतारी। इसके साथ ही कई नैतिकता और व्यावहारिक प्रश्नों से जुड़े विवाद भी उठ खड़े हुए। इस वैक्सीन के पुख्ता परीक्षण, साइड इफेक्ट, दूरगामी प्रभावों, नौ-दस साल की कच्ची उम्र में सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ वैक्सीन देने, समाज में इसके बारे में जानकारी की कमी, इसकी कीमत आदि के अलावा इसके टीवी विज्ञापनों में सूचना देने के बजाए लोगों में डर पैदा करने की कोशिश पर काफी बवाल मचा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर भारत में एक और नामी कंपनी ग्लैक्सोस्मिथक्लीन ने सर्वाइकल कैंसर के लिए वैक्सीन उतारी है जिसे वे 10 से 40 साल की उम्र तक की महिलाओं को दे सकने लायक बताते हैं। इन कंपनियों ने अपनी वैक्सीन के समर्थन में आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (एम्स) और ऑब्स्टेट्रिक एंड गाइनेकोलॉजिकल सोसाइटीज़ जैसे स्वीकृत संस्थानों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों तक से कहलवाया है। हालांकि इनके कथनों से साफ पता चलता है कि सभी उपलब्ध आंकड़े दूसरे, विकसित देशों को हैं और भारत जैसे विकासशील देश में इनका कोई ट्रायल नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में सर्वाइकल कैंसर के लिए वैक्सीन को मान्यता देने, इसकी जरूरत और उपयोगिता पर वैज्ञानिक-सामाजिक जगत में चर्चा जारी है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे यहां सर्वाइकल कैंसर और साफ-सफाई से जुड़ी दूसरी बीमारियों से बचने के लिए कम उम्र में स्कूलों, आंगनबाड़ी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए लड़कियों, और लड़कों को भी, शरीर की साफ-सफाई, संक्रमणों और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उचित पोषण के बारे में बताने की बहुत ज्यादा जरूरत है। चिकित्सा व्यवस्था में महिलाओं की पैप स्मीयर जैसी सरल और सस्ती जांच के जरिए नियमित स्क्रनिंग को सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है ताकि हर साल कोई सवा लाख महिलाएं सर्वाइकल कैंसर और उसके इलाज की पीड़ा को झेलने से बच सकें और 75 हजार महिलाओँ की मौत को रोका जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी विषय पर मेरा एक लेख 'कितनी उपयोगी होगी सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन'- आज के नवभारत टाइम्स में छपा है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन पर लेख है- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5204055.cms"&gt;महिलाओं में फैल रहा है सर्वाइकल कैंसर&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-3046673456115615885?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/3046673456115615885/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=3046673456115615885' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3046673456115615885'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3046673456115615885'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/11/blog-post_07.html' title='सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन कितनी कारगर होगी?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4186389753488692221</id><published>2009-11-05T21:00:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.166+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कीमोथेरेपी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीना इसी का नाम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नया इलाज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>अब कौन डरता है कैंसर से!</title><content type='html'>&lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2009/11/blog-post.html"&gt;दस साल में कितना कुछ बदल गया!&lt;/a&gt; &lt;span style="font-style:italic;"&gt;का आगे का भाग-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब के समय के ज्यादातर कैंसर मरीजों के लिए शारीरिक अनुभव निश्चय ही 10 साल पहले के अनुभव के मुकाबले ज्यादा सहनीय हो गए हैं। अब कैंसर का पता लगना मौत का फरमान नहीं लगता। अपने आस-पास कैंसर के मरीजों और इलाज करा रहे या करा चुके विजेताओं को देखते, उनसे चर्चा करते, समाज अब इस बीमारी के प्रति अपेक्षाकृत सहज है। इस जागरूकता के बाद अब लोग जल्दी डॉक्टर और इलाज तक पहुंचने लगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई तकनीकों के कारण कैंसर की पहचान जल्द और आसान हो गई है। और बायोप्सी के बाद डॉक्टर बीमारी के प्रकार, आकार, फैलाव और ‘गुणों’ के बारे में ज्यादा जान पाते हैं जो निश्चित रूप से इलाज में मददगार साबित होते हैं। और &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SvLtkJrpA2I/AAAAAAAAANA/J4LR3vMPTkk/s1600-h/colorPET.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 289px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SvLtkJrpA2I/AAAAAAAAANA/J4LR3vMPTkk/s320/colorPET.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400640108500681570" /&gt;&lt;/a&gt;जिन मरीजों के कैंसर की पहचान उतने ‘समय’ पर नहीं हो पाती, उनके लिए भी कई तकनीकें आ गईं हैं जो उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी, सहज और कम तकलीफदेह बना देती हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इमेंजिंग तकनीकें यानी जांच की मशीनें: मेमोग्राम और अल्ट्रासोनोग्राफी अब ज्यादा आम और लोगों की जेबों की पहुंच के भीतर हो गई हैं। इनके अलावा एमआरआई, सीटी स्कैन मशीनें कई जगहों पर लग गई हैं। इस बीच भारत में एक नई मशीन आई है- पेट स्कैन जो सीटी स्कैन और एमआरआई से भी ज्यादा बारीकी से बीमारी को देख कर जांच करके पाती है। इससे कुछ ज्यादा छोटे ट्यमरों को भी देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीमोथेरेपी: इस क्षेत्र में कई नई दवाएं बाजार में आई हैं जो ज्यादा टारगेटेड हैं यानी किसी खास प्रकार के कैंसर के लिए ज्यादा प्रभावी हो सकती हैं। इसके अलावा अब दवाओं के साइड इफेक्ट कम हैं और अगर हैं भी तो उन्हें कम करने के लिए बेहतर दवाएं उपलब्ध हैं। कीमोथेरेपी के बाद बाल झड़ने की समस्या (अगर इसे समस्या मानें तो) अब भी वैसी ही है, लेकन उल्टी की परेशानी से निबटने के लिए डॉक्टर बेहतर दवाएं दे पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीमोथेरेपी का एक आम साइड इफेक्ट है- खून में सफेद और लाल रक्त कणों और प्लेटलेट्स की कमी। लाल रक्त कणों की कमी तो पहले की  ही तरह खून चढ़ा कर पूरी की जाती है लेकिन अब खून के अवयवों को अलग करने की तकनीक ज्यादा विकसित है। इसके कारण एक रक्तदाता से मिले रक्त को अब सिर्फ एक की बजाए चार मरीजों के लिए या चार तरह की कमियों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाल कण हीमोग्लोबिन की कमी वाले मरीज को, प्लेटलेट्स की कमी होने पर प्लेटलेट्स, रक्त प्लाज्मा उनको जिनका खून जल्दी गाढ़ा हो जाता है और एल्ब्यूमिन और इम्यून सीरम ग्लोब्यूलिन कोशिकीय और एंटीबॉडी प्रकृति की वजह से दिया जा सकता है। और रक्त के ये अवयव ज्यादा समय तक संरक्षित किए जा सकते हैं और इन्हें अलग-अलग कर लेने के बाद रक्त के ब्लडग्रुप आदि मैच न करने की दिक्कतें अब न्यूनतम हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि रोग-प्रतिरोधक सफेद रक्त कणों, जो कि कीमोथेरेपी के दौरान खास तौर पर जरूरी होते हैं, को खून के बाकी अवयवों की तरह एक से निकाल कर दूसरे को नहीं दिया जा सकता। फिर भी अब लैबोरेटरी में बने एंटीबॉडी इंजेक्शन के रूप में बाजार में उपलब्ध हैं जो शरीर में स्वयं सफेद रक्त कण और एंटीबॉडी बनने की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। 10 साल पहले ये दवाएं भारतीय बाजारों में दुर्लभ थीं। आज इनके कारण कीमो के दौरान रोगी की जान साधारण संक्रमण से नहीं जा सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SvLsr7rPT6I/AAAAAAAAAMw/-ullXAyFl0A/s1600-h/port-726417.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 279px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SvLsr7rPT6I/AAAAAAAAAMw/-ullXAyFl0A/s400/port-726417.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400639142668226466" /&gt;&lt;/a&gt;कीमो के साइड-इफेक्ट झेल पाना अब ज्यादा नहीं, पर थोड़ा आसान हो गया है। आखिर झेलना तो मरीज को पड़ता ही है।कीमोथेरेपी देने के तरीकों में भी बदलाव आया है। अब अस्पताल में भर्ती होकर ड्रिप के जरए कई दिनों तक कीमो लेने की लाचारी नहीं रही। उसक जगह कुछेक घंटों में ओपीडी में ही कीमो ली जा सकती है।इसके अलावा कई मरीजों को जरूरत पड़ने पर एक स्थाई नली यानी कीमोपोर्ट गर्दन या बांह में लगा दी जाती है जिससे जब चाहे दवा भी दी जा सकती है और खून आदि निकाला भी जा सकता है। यह उन मरीजों के लिए फायदेमंद है, जिनके हाथ या पैर में शिराएं ढूंढना डॉक्टर और नर्स के लिए एक चुनौती और मरीज के लिए दर्दनाक प्रक्रिया बनी रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SvLvRU9SEyI/AAAAAAAAANI/qvpu-TbLkKg/s1600-h/sac001.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SvLvRU9SEyI/AAAAAAAAANI/qvpu-TbLkKg/s200/sac001.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5400641984133206818" /&gt;&lt;/a&gt;रेडिएशन: अब कैंसर के मरीजों को रेडिएशन देने के लिए कोबॉल्ट की जगह लीनियर एक्सेलेरेटर मशीनें ज्यादा संख्या में दिखाई पड़ती हैं जिनसे रेडिएशन यानी सिकाई सिर्फ जरूरत की जगह पर ही होती है, उसके परे उसकी नुकसानदेह किरणें कम फैलती हैं। साथ ही अब सिकाई का शरीर के बाकी हिस्सों पर असर कम-से-कम है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा ब्रैकीथेरेपी में रेडियोएक्टिव सिकाई की बजाए रेडयोएक्टिव पदार्थ के छोटे-छोटे टुकड़ों यानी ‘सीड्स’ को ट्यूमर की जगह पर रख दिया जाता है जिसमें से धीरे-धीरे लगातार विकिरण निकलकर कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट कर देती है और आस-पास के ऊतकों को नुकसान नहीं पहुंचता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्जरी: ज्यादातर कैंसरों का आधारभूत इलाज सर्जरी ही है। इस लिहाज से सर्जरी की तकनीकों में सुधार होना अपने आप में कैंसर के इलाज में सुधार होना भी है। सर्जरी अब ज्यादा सटीक, सीमित, सुरक्षित, कम तकलीफदेह, कम समय लेने वाली, जल्द ठीक होने वाली और इन सबके बावजूद ज्यादा फायदेमंद हो गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन बदलावों के साथ-साथ अब उम्मीद कर सकते हैं कि कुछेक साल में मानव जीनोम यानी अलग-अलग  लोगों के जीनों की संरचनाओं को जान कर डॉक्टर उसी के मुताबिक हर मरीज के लिए सिर्फ उसी के लिए बना ‘डिजाइनर’ इलाज भी कर पाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4186389753488692221?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4186389753488692221/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4186389753488692221' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4186389753488692221'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4186389753488692221'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/11/blog-post_05.html' title='अब कौन डरता है कैंसर से!'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SvLtkJrpA2I/AAAAAAAAANA/J4LR3vMPTkk/s72-c/colorPET.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-2996391614235494349</id><published>2009-11-02T19:50:00.001+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.168+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीना इसी का नाम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुभव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>दस साल में कितना कुछ बदल गया!</title><content type='html'>पहली बार मई 1998 में पता चला कि मुझे कैसर है। तब इलाज का वह 10 महीने लंबा समय खुद से परिचय कराते-&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/Su7pDYRDfVI/AAAAAAAAAMg/olioyxeP-nE/s1600-h/OxvfzLZ8ypm3_-D2pI-fW6p3d1i_0dq8N3nclwZzXw8KsLDOo4AId0nEhct3le9b.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 96px; height: 96px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/Su7pDYRDfVI/AAAAAAAAAMg/olioyxeP-nE/s400/OxvfzLZ8ypm3_-D2pI-fW6p3d1i_0dq8N3nclwZzXw8KsLDOo4AId0nEhct3le9b.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399509247526665554" /&gt;&lt;/a&gt;कराते ही तेजी से उड़ गया। ये कठिन 10 महीने भी कितनी जल्दी बीत गए थे। उतने लंबे नहीं लगे। जैसे आइंस्टाइन का सापेक्षतावाद कहता है कि अगर किसी आदमी को सुंदर महिला के सामने बैठा दो तो उसे दो घंटे भी दो मिनट की तरह लगेंगे। और अगर उसे गर्म तवे पर बैठाया जाए तो उसके दो मिनट भी दो घंटे की तरह गुजरेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उस गर्म तवे पर बैठ कर, गर्मी का एहसास करते हुए भी मुझे वह वक्त उतना लंबा नहीं लगता। कारण शायद यह रहा हो कि उस समय हर अगले पल के अनुभव से अनजान थी, नहीं जानती थी कि आगे क्या होने वाला है, क्या होगा, क्या अपेक्षा करूं। इसके साथ ही उत्सुकता, कि अब क्या होगा, कैसे होगा, क्या करूं कि मेरा हर वार एकदम सटीक बैठे क्योंकि पता नहीं, उस कैंसर रूपी दुश्मन पर दूसरा वार करने का मौका भी मिले कि नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ में यह भरोसा भी रहता था कि बस, यह एक पल कठिन है, गुजर जाए तो बस। फिर तो तकलीफ खत्म। और इसी उम्मीद और भरोसे के साथ वह पूरा समय कट गया क्योंकि नीचे गर्म तवा होने के बावजूद आस-पास फुलवारी थी, सुंदर लोग, तितलियां, भंवरे, फूल-पत्ते, सुगंध थे जो लगातार मन को लुभाते रहे, उस जलन-गर्मी के तकलीफदेह एहसास से दूर ले जाते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर दूसरी बार मार्च-अप्रैल 2005 में मुझे पता लगा कि मैं फिर से युद्ध के मैदान में हूं, उसी पुराने दुश्मन के साथ दो-दो हाथ करने के लिए। इस बार मैं जानकारी के हथियार से लैस थी। डॉक्टर ने भी चुटकी ली कि अब तो मैं ‘वैटरन’ हो गई हूं, डरने, चिंता करने की कोई बात नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यहीं सब मार खा गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार जब मुझे पता था कि क्या-क्या बुरा हो सकता है, और उससे बचने के लिए मैं क्या-क्या कर सकती हूं और क्या-क्या मुझे करना पड़ेगा  तो मुझे शुरुआत में ही लगा कि थक गई। उफ! फिर से वही मशक्कत लंबे समय तक करनी पड़ेगी! और इस बार हर कष्ट और उसको झेलने की संभावना का ख्याल तक मुझे कष्ट देने लगा, हर कष्ट मुझे ज्यादा कष्टकारी लगा। क्योंकि मैं जानती थी, इसलिए होने के पहले भी अपने दिल-दिमाग में अनुभव कर लेती थी, कि यह होना है। और इस बार क्योंकि कोई नयापन नहीं था, कोई उत्सुकता नहीं थी, इसलिए आठ महीने चला इलाज भी बहुत लंबा और उबाऊ लगा।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/Su7rNbrlvqI/AAAAAAAAAMo/cwUq4wjYRDk/s1600-h/ap+388A.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 101px; height: 75px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/Su7rNbrlvqI/AAAAAAAAAMo/cwUq4wjYRDk/s400/ap+388A.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399511619265216162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, यह मेरा भावनात्मक अनुभव था। लेकिन अब के समय के ज्यादातर कैंसर मरीजों के लिए शारीरिक अनुभव निश्चय ही 10 साल पहले के अनुभव के मुकाबले ज्यादा सहनीय हो गए हैं।  अब कैंसर का पता लगना मौत का फरमान नहीं लगता। अपने आस-पास कैंसर के मरीजों और इलाज करा रहे या करा चुके विजेताओं को देखते, उनसे चर्चा करते, समाज अब इस बीमारी के प्रति अपेक्षाकृत सहज है। इस जागरूकता के बाद अब लोग जल्दी डॉक्टर और इलाज तक पहुंचने लगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई तकनीकों के कारण कैंसर की पहचान जल्द और आसान हो गई है। और बायोप्सी के बाद डॉक्टर बीमारी के प्रकार, आकार, फैलाव और ‘गुणों’ के बारे में ज्यादा जान पाते हैं जो निश्चित रूप से इलाज में मददगार साबित होते हैं। और जिन मरीजों के कैंसर की पहचान उतने ‘समय’ पर नहीं हो पाती, उनके लिए भी कई तकनीकें आ गईं हैं जो उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी, सहज और कम तकलीफदेह बना देती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;....जारी, अगली पोस्ट में&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-2996391614235494349?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/2996391614235494349/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=2996391614235494349' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/2996391614235494349'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/2996391614235494349'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='दस साल में कितना कुछ बदल गया!'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/Su7pDYRDfVI/AAAAAAAAAMg/olioyxeP-nE/s72-c/OxvfzLZ8ypm3_-D2pI-fW6p3d1i_0dq8N3nclwZzXw8KsLDOo4AId0nEhct3le9b.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4387830487957066309</id><published>2009-10-28T08:15:00.004+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.169+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता माह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर फैक्ट्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता अभियान'/><title type='text'>दस मिनट खर्च करके जान बचाएं</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;आज, बुधवार 28 अक्टबर, 2009 को दैनिक भास्कर के 'समय' पेज पर मेरा यह लेख छपा है। उसे नीचे दे रही हूं।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश में एक लाख में से 30 से 33 महिलाओं को स्तन कैंसर हो रहा है और अनुमान है कि शहरों में हर 8-10 महिलाओं में से एक को और गांवों में हर 35-40 में एक को यानी औसतन हर 22 वीं महिला को अपने जीवनकाल में कभी न कभी स्तन कैंसर होने की संभावना होती है। इस समय स्तन कैंसर के कोई एक लाख नए मामले हर साल दर्ज हो रहे हैं और इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) का अंदाज़ा है कि सन 2015 तक यह आंकड़ा ढाई लाख का होगा। इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि गांवों में ऐसे कई मामले रिपोर्ट भी नहीं होते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले स्तन कैंसर विकसित देशों की, खाते-पीते परिवारों की महिलाओं की बीमारी मानी जाती थी, लेकिन अब हर वर्ग की महिलाओं में देखी जा रही है। बदले समय में शहरी भारतीय महिलाओं में भी स्तन का कैंसर सबसे आम हो गया है।इन संख्याओँ के बीच सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा यह है कि स्तन कैंसर के 50 फीसदी मरीजों को इलाज करवाने का मौका ही नहीं मिल पाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंकड़ों को जाने दें तो भी हमारे यहां स्तन कैंसर का परिदृष्य भयावह है। इसके बारे में जागरूकता की और इसके निदान और इलाज की सिरे से कमी के कारण ज्यादातर मामलों में एक तो मरीज इलाज के लिए सही समय पर सही जगह नहीं पहुंच पाता। दूसरे इसके महंगे और बड़े शहरों तक ही सीमित इलाज के साधनों तक पहुंचना भी हर मरीज के लिए संभव नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी ज्यादातर मरीजों के बारे में सच यह है कि न इलाज इन तक पहुंच पाता है, न ये इलाज तक पहुंच पाते हैं। और जब तक मरीज कैंसर का इलाज दे सकने वाले अस्पताल तक पहुंचने में कामयाब होता है, उसका कैंसर बेकाबू हो गया रहता है। और अगर नहीं, तो पैसे की कमी के कारण वह इलाज बीच में ही बंद कर देता है। कई बार तो समय पर सही अस्पताल पहुंच कर पूरा खर्च करने के बाद भी कैंसर ठीक नहीं हो पाता। कारण- हमारे देश में कैंसर क विशेषज्ञता और इलाज की सुविधाओँ की बेतरह कमी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या करें कि हालात बेहतर हों। तो, हम समस्या की शुरुआत में ही बहुत कुछ कर सकते हैं। और यही सबसे जरूरी भी है कैंसर को काबू में करने के लिए। कैंसर के सफल इलाज का एकमात्र सूत्र है ।- जल्द पहचान। जितनी शुरुआती अवस्था में कैंसर की पहचान होगी, इलाज उतना ही सरल, सस्ता, छोटा और सफल होगा। इसकी पहचान के बारे में अगर व्यक्ति जागरूक हो, अपनी जांच नियमित समय पर खुद करे तो मशीनी जांचों से पहले ही उसे बीमारी के होने का अंदाजा हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैंसर की खासियत है कि यह दबे पांव आता है, बिना आहट के, बिना बड़े लक्षणों के। फिर भी कुछ तो सामान्य लगने वाले बदलाव कैंसर के मरीज में होते हैं, जो कैंसर की ओर संकेत करते हैं और अगर वह मरीज सतर्क, जागरूक हो तो वहीं पर मर्ज को दबोच सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपन्न देशों में क्लीनिकल जांच, स्तन स्वयं परीक्षा के अलावा 40 साल में और फिर उसके बाद हर दूसरे साल और 50 की उम्र के बाद हर साल मेमोग्राफी यानी मशीन से स्तन की जांच की जाती है जिससे छोटी-सी गांठ या बदलाव भी पकड़ में आ सके। लेकिन भारत में बहुत ही कम लोग हैं जो नियमित रूप से इस खर्च को वहन कर सकते हैं, वह भी कैंसर की महज संभावना को जानने के लिए। ध्यान देने की बात यह है कि मेमोग्राफी स्तन कैंसर को रोकने का तरका नहीं है, न ही इसका इलाज है। यह सिर्फ कैंसर को जल्द पहचानने का मशीनी तरीका है, जो कभी गलत रिपोर्ट भी दे सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेमोग्राफी मशीन की सेंसिटिविटी औसतन 80 फीसदी होती है। यानी मशीन सौ में से बीस मामलों में कैंसर को नहीं पकड़ पाती, फॉल्स नेगेटिव रिपोर्ट देती है। अमरीका में नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि मेमोग्राम हर पांच में से एक कैंसर के मामले को पकड़ने में नाकाम रहता है।  डॉक्टरों का एक स्कूल यहां तक मानता है कि मेमोग्राफी का खास फायदा नहीं है, क्योंकि जितनी बड़ी गांठ को उस मशीन से देखा जा सकता है, उस स्टेज पर तो महिलाएं अपनी जांच करके भी गांठ और बदलाव आदि का पता लगा सकती हैं। इसके अलावा उस मशीन से जो रेडिएशन निकलता है वही कई बार कैंसर की शुरुआत का कारण बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लिहाज से हमारे देश में और भी जरूरी हो जाता है कि सभी महिलाएं अपने स्तन की स्वयं परीक्षा करना सीख लें और महीने में सिर्फ दस मिनट खर्च करके यह जांच करें। कम सुविधाओं के बीच अपनी सेहत का इस तरह ख्याल रख कर महिलाएं अपनी जिंदगी बचा सकती हैं। पुरुषों के लिए भी जरूरी है कि वे इस बीमारी के बारे में जानें ताकि समाज में फैले सैकड़ों भ्रम दूर हो सकें। लोग इसे दुर्भाग्य, अपशकुन, किन्हीं कुकर्मों का फल या मारक बीमारी न समझ कर किसी भी दूसरी बीमारी की तरह देखें और इसके इलाज के लिए प्रस्तुत हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमरीका में 1993 से अक्टूबर को स्तन कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाना शुरू किया और बाकी दुनिया ने भी इसे अपना लिया। दुनिया में गुलाबी रिबन स्तन कैंसर जागरूकता का प्रतीक मान लिया है। इसे भले ही कोई दिखावा या विदेशी रस्म कहे, लेकिन यह मानना ही पड़ेगा कि हमारे देश में गुलाबी रिबन की जरूरत सभी को है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4387830487957066309?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4387830487957066309/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4387830487957066309' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4387830487957066309'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4387830487957066309'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/10/blog-post_28.html' title='दस मिनट खर्च करके जान बचाएं'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-8597391614732468892</id><published>2009-10-25T18:11:00.002+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.170+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रसायन और कैंसर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर खबर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>केरल के कुट्टनाड इलाके में कैंसर की पैदावार?</title><content type='html'>केरल से एक चौंकाने वाला आंकड़ा मिला है। यहां अलप्पुड़ा मेडीकल कॉलेज अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग में इस साल जनवरी से मई के बीच 499 मरीजों ने इलाज करवाया जिनमें से ज्यादातर कुट्टनाड इलाके के थे। इसके मुकाबले पिछले साल यहां 355 मरीज आए थे जबकि उससे पहले साल 300 मरीजों ने इलाज करवाया। यह संख्या सिर्फ उन मरीजों की है जो उस अस्पताल तक पहुंचे। कई और रहे होंगे जिन्होंने निजी अस्पतालों में इलाज करवाया, या फिर करवाया ही नहीं। कोई 21 लाख की आबादी वाले इलाके में कैंसर के मरीजों की संख्या इस रफ्तार से बढ़ना खतरे की घंटी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केरल के अलप्पुड़ा जिले के कुट्टनाड इलाके को धान का कटोरा भी कहा जाता है। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://chefsojusfood.com/wp-content/uploads/2009/07/kuttanad-fields.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 246px;" src="http://chefsojusfood.com/wp-content/uploads/2009/07/kuttanad-fields.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;यहां जमीन नीची है, जिससे जल-भराव के कारण चावल के अलावा कोई और खेती नहीं हो सकती। यहां के 90 फीसदी किसान ज्यादा उपज वाली फसल बोते हैं जिसके लिए ज्यादा रसायनों की जरूरत पड़ती है। उस पर पानी-भरा इलाका होने के कारण यहां भूरे टिड्डे और फफूंदी का प्रकोप रहता है, जिसे काबू करने के लिए कीटनाशक और फफूंदीनाशक जरूरी हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चावल की फसल में कीटनाशक रसायनों के इस्तेमाल पर &lt;a href="http://www.sandeeonline.com/uploads/documents/abstract/796_ABS_policy_brief_19.pdf"&gt;एक अध्ययन&lt;/a&gt; एक एनजीओ ‘सैंडी’ ने प्रायोजित किया। केरल कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्र की डॉ. पी इंदिरा देवी के इस रिसर्च की रिपोर्ट साउथ एशियन नेटवर्क फॉर डेवलपमेंट एंड एनवायर्नमेंटल इकॉनॉमिक्स (SANDEE) की पत्रिका में मार्च 2007 में छपी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कहा गया कि कुट्टनाट में चावल की फसलों को भूरे टिड्डे, चावल कीट और पत्तों पर लगने वाली बीमारी से बचाने के लिए रसायनों का जरूरत से कई गुना ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां कुल 19 तरह के रसायन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इस इलाके में हर साल 15 हजार टन रासायनिक उर्वरकों, 500 टन कीटनाशकों और 50 टन फफूंदनाशकों का इसेतेमाल किया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इन रसायनों का छिड़काव सुरक्षित मशीनों से नहीं किया जाता। छिड़काव करने वाले अपने को रसायन से बचाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा कोई कपड़ा नाक-मुंह पर बाध लेते हैं या अपने शर्ट की आस्तीन से ही काम चलाते हैं। जबकि ये रसायन बेहद खतरनाक और जानलेवा तक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्ट के मुताबिक केरल के कुट्टनाड इलाके में ओंठ, पेट, त्वचा और सिर के कैंसर, लिंफोमा, ल्यूकेमया और मायलोमा जैसे कैंसर के अनेक मामले सामने आए। एक अन्य सर्वेक्षण में पाया गया कि यहां मछलियों की संख्या में भी कमी आई है। स्थानीय मीडिया में खबरें भी आईं कि बड़ी संख्या में मछलियां अल्सर के कारण मर रही है। इन सभी घटनाओं को इस रिपोर्ट में रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से जोड़ा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले भी 1980 और 90 के दशकों में केरल का कासरगोड़ जिला काजू की फसल पर कीटनाशकों के बेहिसाब इस्तेमाल के लिए खूब चर्चा में रहा है। एंडोसल्फान नाम के इस कीटनाशक के असुरक्षित छिड़काव की वजह से यहां अनेक मौंतें हुईं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल में मीडिया में आई इन खबरों के बाद कुट्टनाड विकासन समति ब्लॉक और ग्राम पंचायत के साथ मिलकर ने इस इलाके में घर-घर जाकर स्क्रीनिंग करके कैंसर के लक्षणों वाले लोगों को जांच केंद्रों में भेजने और उनका इलाज करवाने की मुहिम शुरू की है। इस कार्यक्रम के निदेशक का भी मानना है कि इलाके के पानी में रसायन लगातार जमा होते जा रहे हैं जिनका असर लोगों की सेहत पर दिख रहा है। इसे रोकने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चावल की फसल में जरूरत से ज्यादा रसायनों के इस्तेमाल और इससे कैंसर की घटनाएं बढ़ने के बारे में हाल ही में राज्य की विधानसभा में भी सवाल उठ चुका है। सरकार ने इस बारे में सभी उपाय करने का वादा भी किया। स्थानीय डॉक्टरों की भी मांग है कि इस मुद्दे की पूरी जांच की जाए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और रोकथाम के उपाय समय रहते किए जा सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि किन्हीं रसायनों से कैंसर होने में 5-10 साल का समय लगता है लेकिन यह भी समझ में आ रहा है कि कैंसर होने की मौजूदा घटनाएं कुछेक साल पहले के रसायनों के असुरक्षित इस्तेमाल का नतीजा हैं और आगे की पीढ़ी को यह विकट स्थिति न देखनी पड़े इसके लिए जरूरी है कि अभी से सतर्क होकर ऐसे वैकल्पिक उपाय अपनाए जाएं जो हानिकारक न हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बड़े पैमाने पर हो रही खेती के लिए जैविक खाद को बहुत व्यावहारिक नहीं बताया जा रहा है। लेकिन एक विकल्प है- एक फसल के बाद खेतों में एक मौसम मछलीपालन किया जाए जो घास-पात और खरपतवार को खाएंगी भी और साथ ही पानी में अपने मल के रूप में जैविक खाद भी उस जमीन में छोड़ेंगी। इससे जमीन फिर उपजाऊ हो जाएगी, खरपतवार खत्म होंगे और किसान को नुकसान भी नहीं उठाना पड़ेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सरकारी सर्वेक्षण में देश के खाने की चीजों के 25 नमूनों में निर्धारित अधिकतम मात्रा की सीमा से अधिक खतरनाक रसायन पाए गए। शायद पूरे देश में खेती के लिए रसायनों की जगह वैकल्पक उपायों की जरूरत है ताकि भावी पीढ़ियों के लिए खान-पान और रोजगार के रूप में खेती सुरक्षित बनी रहे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-8597391614732468892?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/8597391614732468892/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=8597391614732468892' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8597391614732468892'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8597391614732468892'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html' title='केरल के कुट्टनाड इलाके में कैंसर की पैदावार?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-60882675913187753</id><published>2009-10-22T21:47:00.004+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.172+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिंक रिबन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता माह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>गुलाबी रंगत मौसम में भी है, माहौल में भी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_X3eBmUTX9LI/Rx3xRCPw4nI/AAAAAAAAAFw/FVm3v2D_-P4/s400/penguin.png"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 367px; height: 289px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_X3eBmUTX9LI/Rx3xRCPw4nI/AAAAAAAAAFw/FVm3v2D_-P4/s400/penguin.png" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-60882675913187753?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/60882675913187753/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=60882675913187753' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/60882675913187753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/60882675913187753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='गुलाबी रंगत मौसम में भी है, माहौल में भी'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_X3eBmUTX9LI/Rx3xRCPw4nI/AAAAAAAAAFw/FVm3v2D_-P4/s72-c/penguin.png' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-2806423941440198167</id><published>2009-09-13T16:34:00.003+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.173+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेल फोन और कैंसर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिलचस्प किस्से'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>'सेल फोन से ब्रेन ट्यूमर होता है?- गलत'</title><content type='html'>हम सभी को एक-न-एक बार वह फॉरवर्डेड मेल मिली होगी जिसमें कहा जाता है कि ज्यादा सेलफोन इस्तेमाल करने वालों को सिर का ट्यूमर होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए सेलफोन को सिर के पास न यानी कान पर रखें बल्कि ब्लू-टूथ उपकरणों का इस्तेमाल करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेलफोन से ट्यूमर होने की बात सबसे पहले चर्चा में आई जब डेविड रेनार्ड ने 1993 में एक टीवी शो में अपनी पत्नी को ब्रेन ट्यूमर होने का कारण यह माना कि वह सिर से सेलफोन लगाकर काफी देर तक बातें करती थी। इसके समर्थन में कई न्यूरोसर्जन्स भी कह चुके हैं हालांकि वे भी इसका कोई पुख्ता कारण नहीं दे पाए कि यह कैसे होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका जवाब मेडीकल साइंस के नहीं, भौतिकी के विशेषज्ञों से आया है। कोलैबोरेशन ऑफ इंटरनैशनल ईएमएफ एक्टिविस्ट्स नाम के इस ग्रुप ने सेलफोन से ब्रेन ट्यूमर होने की संभावना पर एक रपोर्ट जारी की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल कैंसर शरीर में होता है जब कोशिकीय डीएनए में गडबड़ होती है और उसमें म्यूटेशन आ जाता है, यानी उसकी संरचना में बदलाव आ जाता है। रसायनों, रेडएशन या वायरस से होने वाले ट्यूमर सभी में कोशिका में यह बदलाव आता है। सभी प्रकार के रेडएशन में फोटोन होते हैं और रेडिएशन की वेवलेंथ से उस फोटोन की ताकत तय होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भौतिकशास्त्री एक आधारभूत तथ्य देते हैं कि साधारण बल्ब की रौशनी की फ्रीक्वेंसी 5x1014 हर्ट्ज़ होती है जिसमें हमारी कोशिका के डीएनए को तोड़ने या छेड़ने की ताकत नहीं होती, वरना आज हम सब या तो कैंसरों का पुलिंदा बने घूम रहे होते या अंधेरे में जी रहे होते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके मुकाबले सेलफोन की फ्रीक्वेंसी 1 x 109 हर्ट्ज़ होती है और घरेलू इस्तेमाल के माइक्रोवेव ओवन की 2.45 x 1012 हर्ट्ज़। यानी बल्ब के मुकाबले माइक्रोवेव में ऊर्जा एक हजारवां और सेलफोन में दस लाखवां हिस्सा होती है। यानी सेलफोन की ऊर्जा से जीवित शरीर के भीतर किसी कोशिका के डीएनए को तोड़ना वैसा ही है जैसे कागज़ की कैंची से लोहे का तार काटना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जर्नल ऑफ नैशनल कैंसर इंस्टीट्यूट ने 2001 के अंक में डेनमार्क के 5 लाख सेलफोन इस्तेमाल करने वालों के आंकड़ों का अध्ययन कर रिपोर्ट छापी है जिसमें उन्हें ब्रेन ट्यूमर होने के कोई लक्षण नहीं मिले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैरीलैंड विश्वविद्यालय के भौतिकशास्त्री रॉबर्ट एल पार्क का इसी पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन ऐसे किसी तथ्य की पुष्टि नहीं करता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जहां तक फॉर्वर्डेड मेल्स में यूटू्यूब की सेलफोन से मक्के का पॉपकॉर्न बनने जैसी फिल्मों का सवाल है, तो थोड़ी सी कंप्यूटर कारीगरी से सेलफोन के ऊपर रखे मक्के दानों को नीचे टेबल पर गिरते ही पॉपकॉर्न में बदल देना कोई बड़ी बात नहीं। और यह वीडियो दरअसल एक ब्लू टूथ बनाने वाली कंपन का विज्ञापन है। नीचे बटन पर क्लिक करके देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/KsoVEeJg3TY&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/KsoVEeJg3TY&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-2806423941440198167?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/2806423941440198167/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=2806423941440198167' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/2806423941440198167'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/2806423941440198167'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='&apos;सेल फोन से ब्रेन ट्यूमर होता है?- गलत&apos;'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-7674715601176287725</id><published>2009-08-17T19:51:00.003+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.175+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर खबर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चर्चा में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर फैक्ट्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर क्यों होता है'/><title type='text'>‘ऊंची नाक’  के कारण कैंसर से ज्यादा मारे जाते हैं पुरुष?!</title><content type='html'>कुछ दिनों पहले खबर आई है कि पुरुषों को अपनी अकड़ की कीमत कैंसर से मौत के रुप में भी देनी पड़ रही है। इंग्लैंड में हाल ही में हुए एक अध्ययन के हैरान करने वाले नतीजे निकले हैं। पता लगा है कि स्त्री-पुरुष दोनों को होने वाले कैंसरों से मरने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं के मुकाबले 60 फीसदी ज्यादा होती है। और दिलचस्प बात ये है कि यह अवलोकन बिना किसी अपवाद के इस कैटेगरी के हर तरह के कैंसर पर लागू होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों को इसका कोई बायोलॉजिकल कारण नहीं समझ में आया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानकों ने पाया कि पुरुषों के कैंसर से मरने की संभावना महिलाओं से 40 फीसदी तक ज्यादा है। लीड्स मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालय की इस रपोर्ट के लेखकों में से एक प्रो. ऐलन व्हाइट का मानना है कि पुरुषों की जीवनचर्या यानी लाइफ स्टाइल (सिगरेट, मद्यपान, पान मसाला आदि) ही इसका कारण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टरों का मानना है कि पुरुष जानते हुए भी इस बात को नजरअंदाज करते हैं कि उनके शरीर के बीच के भाग का मोटापा यानी तोंद मोटापे से जुड़े कैंसर और उससे  मौत तक होने की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है। एक विचार यह भी है कि पुरुष डाक्टर के पास जाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि शायद इसीलिए समय पर निदान और इलाज न होना भी इसका एक कारण हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2006 और 2007 में कैंसर के मामलों और इसकी वजह से जान गंवा चुके लोगों के बारे में इकट्ठे किए गए आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों में किसी भी प्रकार का कैंसर होने की संभावना महिलाओं के मुकाबले 16 फीसदी ज्यादा है लेकिन उन्हें दोनों में होने वाले कैंसरों के होने की संभावना 60 फीसदी ज्यादा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जैसा कि अक्सर होता है, इन नतीजों पर भी विवाद शुरू हो गया है। इंग्लैंड के जाने-माने कैंसर विशेषज्ञ कैरोल सिकोरा का मानना है कि पुरुषों में कैंसर से ज्यादा मौतों का कारण वहां की राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना (एन एच एस) का पुरुषों के खिलाफ भेद-भाव है। वे कहते हैं कि वहां एन एच एस बरसों से महिलाओं के हित में काम कर रही है जबकि पुरुषों की सेहत की लगातार अनदेखी होती रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लब्बो-लुबाब ये कि इंग्लैंड में पढ़े-लिखे पुरुषों को भी कैंसर के बारे में पढ़ाने-सिखाने की जरूरत महसूस की जा रही है। महज लाइफस्टाइल में सुधार करके ही करीब 50 फीसदी कैंसरों का होना रोका जा सकता है। मगर चिंता की बात ये है कि इन सलाहों पर कोई कान नहीं दे रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबक सीखना हो तो- कैंसर को छुपाना, उसके बारे में बात न करना शुतुरमुर्ग का रेत में चोंच छुपाना है। इससे सामने आया खतरा टल नहीं जाता। बल्कि ज्यादा आक्रामक, ताकतवर होकर हमला करता है। कैंसर पर अंग्रेजी में 30 करोड़ से ज्यादा वेबसाइट हैं। कोई यहां पहुंचे तो सही!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-7674715601176287725?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/7674715601176287725/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=7674715601176287725' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7674715601176287725'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7674715601176287725'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='‘ऊंची नाक’  के कारण कैंसर से ज्यादा मारे जाते हैं पुरुष?!'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4034961816536301584</id><published>2009-05-31T10:31:00.001+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.177+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तंबाकू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हंसी का कोना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लाइफ स्टाइल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>इसके बावजूद तंबाकू का सेवन करने वाले, धूम्रपान करने वाले खोपड़ी से खाली हैं....</title><content type='html'>आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SiILszIo4NI/AAAAAAAAAMY/5m81IILfP_4/s1600-h/mini-goneplayers-full.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SiILszIo4NI/AAAAAAAAAMY/5m81IILfP_4/s320/mini-goneplayers-full.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5341844972283420882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SiILcGszRcI/AAAAAAAAAMQ/sz0aTs4Ky-c/s1600-h/tha+hindu.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 342px; height: 382px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SiILcGszRcI/AAAAAAAAAMQ/sz0aTs4Ky-c/s400/tha+hindu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5341844685477594562" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;# “पता है, स्मोकिंग दरअसल आप नहीं करते। सिगरेट ही स्मोकिंग करती है। आप तो सिर्फ सिगरेट का छोड़ा हुआ धुंआ पीते हैं।“ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;# “अब यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि सिगरेट दुनिया में आंकड़ों के होने का एक प्रमुख कारण है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SiILQql5g4I/AAAAAAAAAMI/oRktALlE410/s1600-h/grin249l.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 368px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SiILQql5g4I/AAAAAAAAAMI/oRktALlE410/s400/grin249l.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5341844488953889666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंबाकू पर ज्यादा जानकारी के लिए 18 मई 2008 की पोस्ट देखें- &lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2008/05/blog-post_18.html"&gt;कैंसर की दुनिया का आतंकवादी पत्ता: तंबाकू&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4034961816536301584?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4034961816536301584/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4034961816536301584' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4034961816536301584'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4034961816536301584'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/05/blog-post_31.html' title='इसके बावजूद तंबाकू का सेवन करने वाले, धूम्रपान करने वाले खोपड़ी से खाली हैं....'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SiILszIo4NI/AAAAAAAAAMY/5m81IILfP_4/s72-c/mini-goneplayers-full.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-7239913870993882593</id><published>2009-05-28T19:25:00.001+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.178+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर और कविता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><title type='text'>चाहती हूं जीना एक दिन</title><content type='html'>जिंदगी उतनी लंबी होती है, जितनी आदमी जी लेता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उतनी नहीं जितनी आदमी जिंदा रह लेता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई एक में कई जिंदगियां जी लेता है तो कोई एक दिन भी नहीं जी पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जीना चाहती हूं। एक दिन में कई दिन- चाहती हूं जीना ऐसा एक दिन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक शाम- जब मैं जा सकूं साथी के साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सान्ता मोनिका पर नए साल के स्वागत के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई दिन- बिना दर्द, जलन, तकलीफ के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन- जब मेरे हाथ में हो दिलचस्प किताब,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पास बजता हो मीठा संगीत और साथ हो अच्छा खाना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन- जब मैं नताशा के साथ फुर्सत से बैठकर गपशप कर सकूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठे-बैठे उसकी बिटिया को अपनी गोद में सुला सकूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस दिन- जब मैं किसी बच्चे के साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जा सकूं एक छोटी सी पहाड़ी पर पर्वतारोहण के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक महीना- जब मुझे अस्पताल या पैथोलॉजी लैब का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भी चक्कर न लगाना पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मौसम- जिसके हर दिन मैं पकाऊं कुछ नया, पहनूं कुछ नया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो बनाए मुझे सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक साल- जिसमें लगा सकूं हर पखवाड़े एक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैंसर जांच और जागरूकता कैंप दिल्ली भर में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांच साल- बिना कैंसर की पुनरावृत्ति के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जीवन- जब मैं परिवार और झुरमुटों-झरनों-जुगनुओं के बीच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहूं दूर पहाड़ी पर कहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ये सारे दिन एक बार जीना चाहती हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इजाजत है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(PS: रचना ने इस तरफ द्यान खींचा कि बिना संदर्भ के इस कविता कई पाठकों को ठीक से समझ में नहीं आएगी। और संदर्भ इसे ज्यादा प्रभावी बना देगा। अस्तु-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संदर्भ: पिछले ग्यारह साल से हर दिन मेरे लिए कुछ आशंकाएं लिए आता है। मई 1998 में पहली कार मुझे कैंसर होने का पता चला। पूरा इलाज कोई 11 महीने चला। इसके बाद लगातार फॉलो-अप, चेक-अप, ढेरों तरह की जांचें, तय समयों पर और कई बार बिना तय समयों पर भी, जब भी कैंसर के लौट आने की जरा भी आशंका हुई। उसके बाद सारे एहतियात के बाद भी मार्च 2005 में कैंसर का दोबारा उभरना। इन सबके बीच इन छोटी-छोटी मोहलतों की हसरत बनी हुई है, जिनमें से कुछेक पूरी हुईं भी, लेकिन उस इत्मीनान के साथ नहीं, जो मैं दिल से चाहती हूं। इसलिए जिंदगी से इजाजत मांगने का मन है कि क्या कभी हो पाएगा। और मुझे उम्मीद है कि होगा।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-7239913870993882593?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/7239913870993882593/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=7239913870993882593' title='53 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7239913870993882593'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7239913870993882593'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='चाहती हूं जीना एक दिन'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>53</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4338554357779184702</id><published>2009-04-29T09:00:00.000+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.179+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर की पहचान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>कैसे खुद पहचानें कैंसर को : कैंसर के सफल इलाज का एकमात्र सूत्र है- जल्द पहचान</title><content type='html'>कई बार डॉक्टर से पहले हमें ही पता लग जाता है कि हमारे शरीर में कुछ बदलाव है, कुछ गड़बड़ है। शरीर का मुआयना इस बदलाव को सचेत ढंग से पहचानने का एक जरिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; स्वयं परीक्षा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्वचा, स्तन, मुंह और टेस्टिकुलर कैंसर का पता अपनी जांच कर के लगाया जा सकता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;त्वचा की जांच-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खूब रौशनी वाली जगह में आइने के सामने अपने पूरे शरीर की त्वचा का मुआयना कीजिए। नाखूनों के नीचे, खोपड़ी, हथेली, पैरों के तलवे जैसी छुपी जगहों का भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या देखें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-कोई नया तिल, मस्सा या रंगीन चकत्ता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-कोई पुराना तिल या मस्सा जो आकार-प्रकार में बड़ा या कड़ा हो गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-मस्से या तिल का रंग बदलना, उससे खून निकलना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-किसी जगह कोई असामान्य गिल्टी या उभार &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- त्वचा पर कोई कटन या घाव जो ठीक नहीं हो रहा, बल्कि बढ़ रहा हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मुंह की जांच&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंह के कैंसर के लक्षण कैंसर होने के काफी पहले ही (प्रीकैंसरस स्टेज पर) दिखने लगते हैं। उन्हें पहचान कर जल्द इलाज कराया जाए और तंबाकू सेवन छोड़ने जैसे उपाय किए जाएं तो इससे बचा भी जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंह की जांच हर दिन करनी चाहिए, खास तौर पर उन्हें जो तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन करते हों, नकली दांत या दांतों को ठीक करने वाले स्थाई तार आदि लगाते हों, गाल चबाने की आदत हो या दांत टेढ़े-मेढ़े हों। दरअसल कोई भी बाहरी चीज जब मुंह की नाजुक त्वचा को लगातार चोट पहुंचाती है तो एक सीमा के बाद शरीर उसे झेलने से मना कर देता है। नतीजा होता है उस जगह चमड़ी का मोटा होना, छिल जाना, लाल या सफेद हो जाना आदि। यही बाद में कैंसर बनकर फैल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मुंह का मुआयना-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज सुबह ब्रश करके मुंह अच्छी तरह धो लेने के बाद अच्छी रौशनी वाली जगह में आइने के सामने करें, जहां पर मुंह खोलने पर उसके भीतरी भाग आसानी से दिखते हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मुंह के हिस्सों को क्रम से देखते चलें-&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;1. मुंह बंद रखकर अंगुलियों के सिरों से पकड़ कर दोनों होठों को बारी-हारी से उठाएं और देखें।&lt;br /&gt;2. दोनों ओठों को हटा कर दांतों को साथ रख कर मसूढ़ों को सावधानी से देखें।&lt;br /&gt;3. मुंह को पूरा खोल कर जीभ के ऊपरी हिस्से, तालू यानी मुंह की छत पर, गले के पास और जीभ के नीचे मुआयना करें&lt;br /&gt;4.  गालों के भीतरी हिस्सों को भी अच्छी रौशनी में ठीक से देखें। &lt;br /&gt;- कहीं कोई घाव, चकत्ता, या गांठ तो नहीं? चकत्ता सफेद या लाल भी हो सकता है।&lt;br /&gt;- मसूढ़ों से खून तो नहीं निकलता? कोई मसूढ़ा किसी जगह ज्यादा मोटा तो नहीं हो गया है?&lt;br /&gt;- कोई दांत अचानक तो ढ़ीला होकर गिर नहीं गया?&lt;br /&gt;- क्या जीभ उतनी ही बाहर निकाल पाते हैं जितनी पहले, या इसमें कोई अड़चन महसूस होती है?&lt;br /&gt;- मुंह के भीतर कहीं भी कोई गांठ या असामान्य बात नजर आती है?&lt;br /&gt;- आवाज में बदलाव, लगातार खांसी, निगलने में तकलीफ, गले में खराश पर भी ध्यान दें।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;स्वयं स्तन परीक्षा&lt;/span&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;20 साल की उम्र से हर महिला को हर महीने पीरियड के बाद (बुजुर्ग महिलाओं को तारीख तय करके) स्वयं स्तन परीक्षा करनी चाहिए। स्तन और निप्पल को आइने में देखिए। नीचे ब्रालाइन से ऊपर कॉलर बोन यानी गले के निचले सिरे तक और बगलों में भी अपनी तीन अंगुलियां मिला कर थोड़ा दबा कर महसूस करके देखिए। अंगुलियों का चलना नियमित गति और दिशाओं में हो। (यह जांच शावर में या लेट कर भी कर सकते हैं।) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं ये बदलाव तो नहीं हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;1. स्तन या निप्पल के आकार में कोई असामान्य बदलाव।&lt;br /&gt;2. कहीं कोई गांठ, चाहे वह मूंग की दाल के बराबर ही क्यों न हो। इसमें अक्सर दर्द नहीं रहता है।&lt;br /&gt;3. इस पूरे इलाके में कहीं भी त्वचा में सूजन, लाली, खिंचाव या गड्ढे पड़ना या त्वचा में संतरे के छिलके के समान छोटे-छोटे छेद या दाने से बनना।&lt;br /&gt;4. एक स्तन पर खून की नलियां ज्यादा स्पष्ट दिखना।&lt;br /&gt;5. निप्पल भीतर को खिंचना या उसमें से दूध के अलावा कोई भी स्त्राव- सफेद, गुलाबी, लाल, भूरा, पनीला या किसी और रंग का, हो।&lt;br /&gt;6. स्तन में कही भी लगातार दर्द हो।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.cancer.org/docroot/PED/content/PED_2_3X_Do_I_Have_Testicular_Cancer.asp?sitearea=PED"&gt;अंडकोष (टेस्टिस)के कैंसर &lt;/a&gt;की स्वयं परीक्षा&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंडकोष के कैंसर के सबसे आम लक्षण हैं, कोई गांठ या सूजन। लेकिन ये आम लक्षण वहां किसी संक्रमण के कारण भी हो सकते हैं। इसलिए कहना मुश्किल होता है कि कैंसर है या कुछ और तकलीफ। लेकिन अगर अपनी जांच में कभी अंडकोष में कोई गांठ महसूस हो, जिसमें दर्द न होता हो, उसमें सूजन हो, आकार बढ़ जाए तो फौरन डॉक्टर से सलाह करनी चाहिए। गांठ असुविधाजनक लग सकती है लेकिन तेज दर्द आम तौर पर कैंसर की शुरुआती गांठ में आमतौर पर नहीं होता। इसके अलावा पेट के निचले हिस्से में भारीपन और खिंचाव भी हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेस्टिस का कैंसर नवजात पुरुष से लेकर बूढ़े तक सभी को हो सकता है। लेकिन आम तौर पर 20 से 54 साल की उम्र के बीच यह सबसे ज्यादा होता है। टेस्टिस के कैंसर के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। शायद इसलिए भी कि यह कैंसर होने की संभावना बहुत कम, 300 में एक, को होती है। इस कैंसर से होने वाली मृत्यु-दर भी बहुत कम, पांच हजार में एक, है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मशीनों से जांच&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फाइबर ऑप्टिक या धातु की महीन लचीली प्रकाशित नली को किसी खास अंग के भीतर डालकर उसके अंदरूनी हिस्सों को मॉनीटर पर देखा जाता है। इसे&lt;a href="http://www.cancer.org/docroot/PED/content/PED_2_3X_Endoscopy.asp?sitearea=PED"&gt; एंडोस्कोपी&lt;/a&gt; कहा जाता है। इस नई तकनीक ने कैंसर की जांच को आसान बना दिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जांचे जाने वाले अंग के आकार-प्रकार के आधार पर यह मशीन कई तरह की होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाक और गले के सबसे ऊपरी हिस्से के लिए&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; नेजोस्कोपी&lt;/span&gt;, स्वरयंत्र यानी लैरिंग्स के लिए डायरेक्ट &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लैरिंगोस्कोपी&lt;/span&gt;, सांस की नली के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ब्रोंकोस्कोपी&lt;/span&gt;, छाती के बीच में दिल, धमनियों आदि की जंच के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मीडियास्टिनोस्कोप&lt;/span&gt;, खाने की नली के ऊपरी हिस्से की जांच के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इसोफेगोस्कोपी&lt;/span&gt;, आमाशय के निचले सिरे को देखने के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गेस्ट्रोडियोडिनोस्कोपी&lt;/span&gt; आदि। पेंक्रियास और पूरे बाइल सिस्टम को देखने के लिए &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एआरसीपी स्कोप&lt;/span&gt; का इस्तेमाल किया जाता है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रोक्टोस्कोप&lt;/span&gt; रेक्टम के लिए, &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सिग्मोयडोस्कोप&lt;/span&gt; बड़ी आंत के आखिरी सिरे की जांच के लिए और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कोलोनोस्कोप&lt;/span&gt; कोलोन की जांच के लिए की जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एंजियोग्राफी&lt;/span&gt; में किसी डाई को खून में डालकर फिर धमनी तंत्र को एक्सरे प्लेट पर देखा जाता है। नई तकनीक&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; डिजिटल सबस्ट्रेक्शन एंजियोग्राफी&lt;/span&gt; में कंप्यूटर धमनियों की पृष्ठभूमि को गायब कर देता और चित्र ज्यादा साफ दिखाई देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.cancer.org/docroot/PED/content/PED_2_3X_Imaging_Radiology_Tests.asp?sitearea=PED"&gt;सीटी स्कैन&lt;/a&gt; &lt;/span&gt;यानी कंप्यूटर असिस्टेड टोमोग्राफी एक विशेष एक्सरे तकनीक है जिसमें संबंधित अंग की पतली पतली तहों के कई एक्सरे लिए जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एमआरआई&lt;/span&gt; यानी मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग कैंसर की पहचान और उसके आकार और फैलाव की जांच के लिए विशेष ताकतवर चुंबक के जरिए शरीर के चित्र लिए जाते हैं और उन्हें मिलाकर पूरी तस्वीर बनाई जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रेडियो न्यूक्लाइड स्कैन:&lt;/span&gt; इसमें खून में रेडियो सक्रिय आइसोटोप डाले जाते हैं। जिन जगहों पर ट्यूमर होता है वहां इन आउसोटोप्स का जमाव ज्यादा होता है जो कि स्कैन में साफ दिखाई पड़ते हैं। हडिडयों, लीवर, किडनी, फेफड़ों आदि की जांच के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.cancer.org/docroot/PED/content/PED_2_3X_Mammography_and_Other_Breast_Imaging_Procedures.asp?sitearea=PED"&gt;मेमोग्राफी&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;: यह स्तन का एक्सरे होता है जो खास इसी जांच के लिए बनी मशीन से की जाती है। बीमारी की जानकारी न होने पर भी स्क्रिनिंग के लिए इस जांच का इस्तेमाल एक खास उम्र के बाद किया जाता है। 35 साल की उम्र में महिलाओं को एक बार और फिर 40 की उम्र के बाद हर दो साल पर एक बार और 50 की उम्र के बाद हर साल मेमोग्राफी करवाने की सलाह दी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://www.cancer.org/docroot/PED/content/PED_2_3X_Testing_Biopsy_and_Cytology_Specimens_for_Cancer.asp?sitearea=PED"&gt;प्रयोगशाला में परीक्षण&lt;/a&gt;:&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बायोप्सी-&lt;/span&gt; ठोस गांठों की जांच के लिए प्रभावित उत्तक यानी टिश्यू का एक टुकड़ा या कुछ कोशिकाएं लेकर सूक्षमदर्शी से देखा जाता है कि वहां कैंसर है या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पेपस्मियर-&lt;/span&gt; बच्चेदानी के कैंसर की पहचान और संभावना जांचने के लिए की जाने वाली ये एक सस्ती, सरल और पक्की जांच है। इसमें गर्भाशय में एक चपटी स्पैचुला डालकर वहां की कोशिकाएं खुरचकर निकाली जाती हैं और उनकी माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। विवाह के तीन वर्ष बाद से हर दो साल में यह जांच हर महिला को करवानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एफएनएसी&lt;/span&gt;(फाइन निडिल एस्पिरेशन साइटोलॉजी)-बारीक सूई से गांठ की भितरी तहों को कुरेदकर वहां हुई कोशिकाओं को उसी सूई से खींचकर निकाला जाता है और माइक्रोस्कोप से उसकी जांच की जाती है। बेहद छोटी या अस्पष्ट गांठों के लिए अल्ट्रासाउंड या सीटी स्कैन गाइडेड एनएनएसी की जाती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4338554357779184702?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4338554357779184702/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4338554357779184702' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4338554357779184702'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4338554357779184702'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/blog-post_29.html' title='कैसे खुद पहचानें कैंसर को : कैंसर के सफल इलाज का एकमात्र सूत्र है- जल्द पहचान'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-1332641521325300434</id><published>2009-04-20T15:59:00.003+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.181+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लाइफ स्टाइल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='life style and cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='living healthy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-4)</title><content type='html'>&lt;strong&gt;खान-पान और कैंसर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुमान है कि विभिन्न कैंसरों से होने वाली 30 फीसदी मौतों को जीवन भर सेहतमंद खान-पान और सामान्य कसरत के जरिए रोका जा सकता है। लेकिन कैंसर हो जाने के बाद सिर्फ बोहतर खान-पान के जरिए इसे ठीक नहीं किया जा सकता। इंटरनैशनल यूनियन अगेन्स्ट कैंसर (यूआईसीसी) ने अध्ययनों में पाया कि एक ही जगह पर रहने वाले अलग खान-पान की आदतों वाले समुदायों में कैंसर होने की संभावनाएं अलग-अलग होती हैं। ज्यादा चर्बी खाने वाले समुदायों में स्तन, प्रोस्टेट, कोलोन और मलाशय (रेक्टम) के कैंसर ज्यादा होते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजन के खाद्य तत्वों के अलावा बाहरी तत्व, जैसे- प्रिजर्वेटिव और कीटनाशक रसायन, उसे पकाने का तरीका यानी जलाकर ((ग्रिल), तेज आंच पर देर तक पकाना आदि, और उसमें पैदा हुए फफूंद या जीवाणु यानी बासीपन आदि भी कैंसर को बढ़ावा देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाद्य सुरक्षा और खाने की सुरक्षा, दोनों का ही कैंसर की संभावना से गहरा संबंध है। विकसित देशों में अतिपोषण की समस्या है तो विकासशील देशों में कुपोषण की। जब जरूरी पोषक तत्वों की कमी से शरीर किसी बीमारी से लड़ने में पूरी तरह सक्षम नहीं होता तो शरीर कैंसर का आसान शिकार बन जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मांसाहार बनाम शाकाहार-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;सेहतमंद खानपान की बात हो तो ये मुद्दा आना ही है कि मांसाहार बेहतर है कि शाकाहार। मेरा अपना विवेक शाकाहार के पक्ष में तर्क देता है। नीचे कुछ तथ्य हैं जो मैंने शाकाहार के समर्थन में ढूंढ निकाले हैं। मांसाहार के पक्ष में आपकी राय हो तो जरूर बताएं, चर्चा ज्यादा समृद्ध होगी। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*जर्मनी में 11 साल तक चले एक अध्ययन में पाया गया कि शाकाहारी भोजन खाने वाले 800 लोगों को आम लोगों के मुकाबले कैंसर कम हुआ। कैंसर होने की दर सबसे कम उन लोगों में थी जिन्होंने 20 साल से मांसाहार नहीं खाया था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;*ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैंसर में 2007 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 35 हजार महिलाओं पर अपने 7 साल लंबे अध्ययन में पाया गया कि जिन बूढ़ी महिलाओं ने औसतन 50 ग्राम मांस हर दिन खाया, उन्हें, मांस न खाने वालों के मुकाबले स्तन कैंसर का खतरा 56 फीसदी ज्यादा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* 34 हजार अमरीकियों पर हुए एक अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि मांसाहार छोड़ने वालों को प्रोस्टेट, अंडाषय और मलाशय (कोलोन) का कैंसर का खतरा नाटकीय ढ़ंग से कम हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* 2006 में हार्वर्ड के अध्ययन में शामिल 1,35,000 लोगों में से अक्सर ग्रिल्ड चिकन खाने वालों को मूत्राशय का कैंसर होने का खतरा 52 फीसदी तक बढ़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शाकाहार किस तरह कैंसर के लिए उपयुक्त स्थियों को दूर रखता है-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* मांस में सैचुरेटेड फैट अधिक होता है जो शरीर में कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है। (चर्बी निकाले हुए चिकेन से भी, मिलने वाली ऊर्जा की कम से कम आधी मात्रा चर्बी से ही आती है।) चिकेन और कोलेस्ट्रॉल शरीर में ईस्ट्रोजन हार्मोन को बढ़ाता है जो कि स्तन कैंसर से सीधा संबंधित है। जबकि शाकाहार में मौजूद रेशे शरीर में ईस्ट्रोजन के स्तर को नियंत्रित रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* मांस को हजम करने में ज्यादा एंजाइम और ज्यादा समय लगते हैं। ज्यादा देर तक अनपचा खाना पेट में अम्ल और दूसरे जहरीले रसायन बनाता है जिससे कैंसर को बढ़ावा मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* मांस-मुर्गे का उत्पादन बढ़ाने के लिए आजकल हार्मोन, डायॉक्सिन, एंटीबायोटिक, कीटनाशकों, भारी धातुओं का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है जो कैंसर को बढ़ावा देते हैं। थोड़ी सी जगह में ढेरों मुर्गों को पालने से वे एक-दूसरे से कई तरह की बीमारियां लेते रहते हैं। ऐसे हालात में उन्हें जिलाए रखने के लिए खूब एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं जिनमें आर्सेनिक जैसी कैंसरकारी भारी धातुएं भी होती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* मांस-मुर्गे में मौजूद परजीवी और सूक्ष्म जीव कुछ तो पकाने पर मर जाते हैं और कुछ हमारे शरीर में बढ़ते हैं और कैंसर और दूसरी बीमारियां पैदा करते हैं, हमारी प्रतिरोधक क्षमता को थका देते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* शाकाहार में मौजूद रेशे बैक्टीरिया से मिलकर ब्यूटिरेट जैसे रसायन बनाते हैं जो कैंसर कोशा को मरने के लिए प्रेरित करते हैं। दूसरे, रेशों में पानी सोख कर मल का वजन बढ़ाने की क्षमता होती है जिससे जल्दी-जल्दी शौच जाने की जरूरत पड़ती है और मल और उसके रसायन ज्यादा समय तक खाने की नली के संपर्क में नहीं रह पाते। खूब फल और सब्जियां खाने से मुंह, ईसोफेगस, पेट और फेफड़ों के कैंसर की संभावना आधी हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* फलों और सब्जियों में एंटी-ऑक्सीडेंट की प्रचुर मात्रा होते हैं जो शरीर में कैंसरकारी रसायनों को पकड़ कर उन्हें 'आत्महत्या' के लिए प्रेरित करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;* शाकाहार में मौजूद विविध विटामिन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और इस तरह कैंसर कोषाएं फल-फूल कर बीमारी नहीं पैदा कर पातीं। शाकाहार जरूरी लवणों का भी भंडार है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-1332641521325300434?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/1332641521325300434/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=1332641521325300434' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1332641521325300434'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1332641521325300434'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/4.html' title='कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-4)'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-1355304695464517287</id><published>2009-04-18T10:36:00.003+05:30</published><updated>2011-10-19T00:47:24.182+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लाइफ स्टाइल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एंटी ऑक्सीडेंट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुराधा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंद्रधनुष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='R Anuradha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ्री-रैडिकल्स'/><title type='text'>कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-3)</title><content type='html'>&lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/2.html"&gt;कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-2)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/1.html"&gt;कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-1)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फ्री-रैडिकल्स और ऐंटी-ऑक्सीडेंट &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ऑक्सीडेशन&lt;/span&gt; एक रासायनिक प्रक्रिया है जिससे लोहे में जंग लगती है और हमारे शरीर में भी। हमारे शरीर में मौजूद &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फ्री-रैडिकल्स&lt;/span&gt; ऐसे अणु हैं जिनमें एक इलेक्ट्रॉन कम होता है जिसकी पूर्ति के लिए वे दूसरे अणुओं की ओर जल्द आकर्षित होते हैं और उनके इलेक्ट्रॉन चुरा लेते हैं। अब जिस अणु का इलेक्ट्रॉन चोरी हुआ है वह किसी और का चुराने को उद्धत रहता है इस तरह यह चेन रिऐक्शन चलता रहता है जिससे कोशिका के भीतर कई तरह के अणु, यहां तक कि डीएनए भी प्रभावित होते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डीएनए का एक अणु भी अपनी जगह से हिला तो उसके जेनेटिक कोड में बदलाव आ जाता है और कोशिका का काम-काज प्रभावित होता है। तंबाकू, धुंए, रेडिएशन जैसी कई चीजों में फ्री-रैडिकल्स होते हैं जो कोशिका के जेनेटिक कोड  में बदलाव लाकर कैंसर भी पैदा कर सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्री-रैडिकल्स के लिए इलेक्ट्रॉन देने में शरीर में मौजूद ऑक्सीजन अव्वल होती है। इसलिए फ्री-रैडिकल्स को इलेक्ट्रॉन की पूर्ति होना ऑक्सिडेशन कहलाता है। जो अणु फ्री-रैडिकल्स के ऑक्सिडेशन को रोकते हैं उन्हें &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ऐंटी-ऑक्सीडेंट&lt;/span&gt; कहा जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐंटी-ऑक्सीडेंट, जैसे विटामिन ई और सी, फ्री रैडिकल्स के साथ रिऐक्शन करके उन्हें काबू में रखते हैं और इस तरह ऑक्सीडेशन की चेन रिऐक्शन को, यानी कैंसर पैदा होने की स्थितियों को रोकते हैं। पेड़-पौधों में ऐंटी-ऑक्सीडेंट काफी होते हैं। ये हमारे शरीर में भी पैदा होते हैं लेकिन काफी कम मात्रा में। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फाइटोकेमिकल्स&lt;/span&gt; यानी पौधों से मिलने वाले रसायन जो कैंसर को रोकते हैं, उसकी ग्रोथ को रोकते हैं या उसे ठीक करने में मदद करते हैं। अब तक कोई ऐसा फाइटोकेमिकल नहीं खोजा जा सका है जिससे कैंसर का इलाज हो जाए। हालांकि कैंसर को रोकने में कई फाइटोकेमिकल्स कामयाब पाए गए है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ऐंथोसायनिन&lt;/span&gt; ऐसे रसायन हैं जो सब्जियों, साइट्रस फलों, बेरीज़ आदि को लाल, नीला और जामुनी रंग देते हैं। इनसे बढ़ी उम्र से जुड़ी तकलीफें, दिल की बीमारियां, मोटापे और कैंसर रोकने में मदद करते हैं। ये ऐंटी-ऑक्सीडेंट का काम करके डीएनए को नुकसान से बचाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;करक्यूमिन&lt;/span&gt; हल्दी को पीला रंग देने वाला रसायन है। यह ऐटी-ऑक्सीडेंट के साथ ही कीटीणु-नाशक, विष-नाशक भी है। यह स्वस्थ कोशाओं को छेड़े बिना ट्यूमर की बीमार कोशिकाओं के विकास को धीमा कर देता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ईजीसीजी या एपीगैलोकैचिन-3-गैलेट&lt;/span&gt; हरी चाय में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो त्वचा, कोलोन, स्तन, पेट, लिवर और पेफड़ों के कैंसर को रोकने में मदद करता है। पानी के बाद सबसे ज्यादा पिया जाने वाला पेय- चाय की पत्ती को जब फर्मेंट या प्रोसेस नहीं किया जाता तो उसके ज्यादातर गुण रह जाते हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लाइकोपीन &lt;/span&gt;टमाटरों को लाल रंग देने वाला रसायन है। यह तरबूज़, अंगूर, अमरूद र पपीते में भी थोड़ी-बहुत मात्रा में मिलता है। इसका सेवन करने से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा कम हो जाता है। साबित हो चुका है कि ताजे टमाटरों से मिलने वाला लाइकोपीन ज्यादा असरदार होता है, बजाए लाइकोपीन की गोलियों के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ईस्ट्रोजन हार्मोंन&lt;/span&gt; जो मानव शरीर में अपने आप बनता है। इसके समान हार्मोन पौधों में भी होता है- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फाइटोईस्ट्रोजन&lt;/span&gt;। सोया उत्पादों में यह बड़ी मात्रा में होता है। ईस्ट्रोजन हार्मोंन स्तन, बच्चेदानी की झिल्ली और प्रोस्टेट कैंसर का कारण है। जबकि फाइटोईस्ट्रोजन की मौजूदगी ईस्ट्रोजन के बुरे प्रभाव को कम कर देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पिक्नोजेलोन &lt;/span&gt;फ्रांस में पाए जाने वाले चीड़ के पेड़ की छाल से मिलने वाला रसायन है। यह अंगूर और कोकोआ में भी पाया जाता है। इसके ऐंटी-ऑक्सीडेंट प्रभाव की पड़ताल जारी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-1355304695464517287?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/1355304695464517287/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=1355304695464517287' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1355304695464517287'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/1355304695464517287'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/3.html' title='कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-3)'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4029489643109200693</id><published>2009-04-16T07:29:00.001+05:30</published><updated>2009-04-16T07:31:24.554+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर क्यों होता है'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-2)</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;इंटरनेट पर कैंसर के बारे में ढेरों जानकारी बिखरी पड़ी है। इनका सार आपके सामने रखने की कोशिश में यह सीरीज दे रही हूं। यह मेरे नवभारत टाइम्स में 6 अप्रैल को जस्ट-जिंदगी पेज पर छपे लेख पर आधारित है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कैंसर को बढ़ावा देते हैं ये सब &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. तंबाकू का सेवन &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश में पुरुषों में 48 फीसदी और महिलाओं में 20 फीसदी कैंसर की इकलौती वजह तंबाकू है। अगर आप बीड़ी-सिगरेट नहीं पीते, लेकिन मजबूरी में उसके धुएं में सांस लेनी पड़ती है तो भी आपको खतरा है। गुटखा (पान मसाला) चाहे तंबाकू वाला हो या बिना तंबाकू वाला, दोनों नुकसान करता है। हां, तंबाकू वाला गुटखा ज्यादा नुकसानदायक है। तंबाकू या पान मसाला चबाने वालों को मुंह का कैंसर ज्यादा होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. एक-दो पेग से ज्यादा शराब &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज दो से ज्यादा पेग लेना मुंह, खाने की नली, गले, लिवर और ब्रेस्ट कैंसर को खुला न्योता है। ड्रिंक में अल्कोहल की ज्यादा मात्रा और साथ में तंबाकू का सेवन कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ा देता है। सबसे कम अल्कोहल बियर में, उससे ज्यादा वाइन में और उससे भी ज्यादा अल्कोहल विस्की व रम में होती है। बेस्ट है कि शराब न लें। अगर छोड़ना मुश्किल है तो एक-दो पेग से ज्यादा न लें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. ज्यादा चर्बी (फैट) वाला भोजन&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तला हुआ खाना या ऊपर से घी-मक्खन लेने से बचना चाहिए। ज्यादा चर्बी खाने वाले लोगों में ब्रेस्ट, प्रॉस्टेट, कोलोन और मलाशय (रेक्टम) के कैंसर ज्यादा होते हैं। अनुमान है कि कैंसर से होनेवाली 30 फीसदी मौतों को सही खानपान के जरिए रोका जा सकता है। प्रेजर्वेटिव वाले प्रॉसेस्ड फूड और तेज आंच पर देर तक पकी चीजें कम खाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. नॉन-वेज डिशेज&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मीट हजम करने में ज्यादा एंजाइम और ज्यादा वक्त लगता है। ज्यादा देर तक बिना पचे भोजन से पेट में एसिड व दूसरे जहरीले रसायन बनते हैं जिनसे कैंसर बढ़ता है। जर्मनी में 11 साल तक चली स्टडी में पाया गया कि वेजिटेरियन लोगों को आम लोगों के मुकाबले कैंसर कम हुआ। सब्जियों में मौजूद विविध विटामिन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और कैंसर सेल्स को बनने से रोकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. बार-बार एक्स-रे कराना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक्स-रे, सीटी स्कैन आदि की किरणें हमारे शरीर में पहुंचकर सेल्स की रासायनिक गतिविधियां बढ़ा देती हैं जिससे स्किन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अगर आप अलग-अलग डॉक्टरों से इलाज कराते हैं और हर डॉक्टर अलग एक्सरे कराने के लिए कहे, तो डॉक्टर को जरूर बताएं कि आप पहले कितनी बार एक्सरे करा चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6. हार्मोन थेरपी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हार्मोन थेरपी बहुत जरूरी होने पर ही लें। महिलाओं को मीनोपॉज़ के दौरान होनेवाली तकलीफों से बचने के लिए उन्हें इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिन हार्मोन थेरपी दी जाती है। हाल की स्टडीज से पता चला है कि मीनोपॉजल हार्मोन थेरपी से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। हार्मोन थेरपी लेने के पहले इसके खतरों पर जरूर गौर कर लेना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7. लगातार धूप में रहना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज से निकलने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणों से स्किन कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है। धूप में निकलना हो तो पूरी बाजू के कपड़े, कैप, अल्ट्रावॉयलेट किरणें रोकने वाला चश्मा और कम-से-कम 15 एसपीएफ वाले सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना चाहिए। वैसे, हम भारतीयों की स्किन में मेलानिन पिग्मेंट ज्यादा होता है, जो अल्ट्रावॉयलेट किरणों को रोकता है। इससे स्किन को कैंसर का खतरा कम होता है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8. पेनकिलर दवाएं ज्यादा लेना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेनकिलर और दूसरी दवाएं खुद ही बेवजह खाते रहने की आदत छोड़ें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं खाना शरीर के लिए घातक हो सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4029489643109200693?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4029489643109200693/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4029489643109200693' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4029489643109200693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4029489643109200693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/2.html' title='कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (भाग-2)'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-675393631349585903</id><published>2009-04-14T13:19:00.003+05:30</published><updated>2009-04-16T07:32:17.895+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (1)</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;इंटरनेट पर कैंसर के बारे में ढेरों जानकारी बिखरी पड़ी है। इनका सार आपके सामने रखने की कोशिश में यह सीरीज शुरू कर रही हूं। यह मेरे नव भारत टाइम्स में 6 अप्रैल को जस्ट-जिंदगी पेज पर छपे लेख पर आधारित है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कैसे होता है कैंसर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे शरीर की सबसे छोटी यूनिट (इकाई) सेल (कोशिका) है। शरीर में 100 से 1000 खरब सेल्स होते हैं। हर पल ढेरों नए सेल बनते रहते हैं और पुराने व खराब सेल खत्म होते जाते हैं। शरीर के किसी भी नॉर्मल टिश्यू में जितने नए सेल्स पैदा होते हैं, उतने ही पुराने सेल्स खत्म हो जाते हैं। इस तरह टिश्यू में संतुलन बना रहता है। कैंसर के मरीजों में यह संतुलन बिगड़ जाता है और उनमें सेल्स की बेलगाम बढ़ोतरी होती रहती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गलत लाइफस्टाइल और तंबाकू-शराब जैसी चीजें किसी सेल के जेनेटिक कोड में बदलाव लाकर कैंसर पैदा कर देती हैं। आमतौर पर जब किसी सेल में किसी वजह से खराबी आ जाती है तो खराब सेल अपने जैसे खराब सेल्स पैदा नहीं करता। वह खुद को मार देता है। कैंसर सेल खराब होने के बावजूद खुद को नहीं मारता, बल्कि अपने जैसे सेल बेतरतीब तरीके से पैदा करता जाता है जो सही सेल्स के कामकाज में रुकावट डालने लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कैंसर सेल एक जगह टिककर नहीं रहते। अपने मूल अंग से निकलकर शरीर में किसी दूसरी जगह जमकर वहां भी अपने तरह के बीमार सेल्स का ढेर बना डालते हैं। इससे उस अंग के कामकाज में भी रुकावट आने लगती है। इन अधूरे बीमार सेल्स का समूह ही कैंसर है। ट्यूमर बनने में महीनों, बरसों, बल्कि कई बार तो दशकों लग जाते हैं। कम-से-कम एक अरब सेल्स के जमा होने पर ही ट्यूमर पहचानने लायक हालत में आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बिनाइन ट्यूमर और कैंसर में फर्क&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्यूमर को गांठ या गिल्टी भी कहते हैं। यह कैंसर-रहित (नॉन मेलिग्नेंट या बिाइन) भी हो सकती है और कैंसर वाली (मेलिग्नेंट) भी। यानी हर ट्यूमर कैंसर ही हो, जरूरी नहीं। कई बार पुराना कैंसर-रहित ट्यूमर भी बाद में जाकर कैंसर बन सकता है। इसलिए यदि शरीर में कहीं गांठ या गिल्टी हो, तो समय-समय पर उसकी जांच करवाना सेफ रहता है। इसके लिए बायोप्सी कराई जाती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-675393631349585903?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/675393631349585903/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=675393631349585903' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/675393631349585903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/675393631349585903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/1.html' title='कैंसर पर जानकारी टुकड़ों में (1)'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-739747469623612302</id><published>2009-04-05T16:56:00.002+05:30</published><updated>2009-04-05T17:13:52.267+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर की पहचान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर फैक्ट्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर क्यों होता है'/><title type='text'>आसां है कैंसर के डंक से बचे रहना</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कैंसर का नाम सुनते ही कुछ बरसों पहले तक मन में एक डर-सा पैदा हो जाता था। वजह, इस बीमारी का लाइलाज होना। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब न सिर्फ कैंसर का इलाज मुमकिन है, बल्कि ठीक होने के बाद सामान्य जिंदगी भी जी जा सकती है। शर्त यह है कि शुरुआती स्टेज पर बीमारी की पहचान हो जाए और फिर उसका मुकम्मल इलाज कराया जाए। वैसे, अगर कुछ चीजों से बचें और लाइफस्टाइल को सुधार लें तो कैंसर के शिकंजे में आने की आशंका भी काफी कम हो जाती है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैंसर से बचाव और जांच के विभिन्न पहलुओं पर मेरी ये रिपोर्ट :&lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4359570.cms"&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आसां है कैंसर के डंक से बचे रहना&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथियो &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये मेरा ताजा लेख है जो आज के नवभारत टाइम्स के जस्ट जिंदगी पेज (पेज 9) पर छपा है। आप भी पढ़ें और अपनी राय दें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-739747469623612302?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/739747469623612302/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=739747469623612302' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/739747469623612302'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/739747469623612302'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='आसां है कैंसर के डंक से बचे रहना'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4858070514746569437</id><published>2009-03-24T22:59:00.002+05:30</published><updated>2009-03-24T23:07:49.268+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर और कविता'/><title type='text'>हमारा घर</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;a href="http://raziamirza.blogspot.com"&gt;रजिया मिर्जा&lt;/a&gt; इस ब्लॉग की नई पाठक और कॉन्ट्रीब्यूटर हैं। उन्होंने यह कविता भेजी तो मैं एक मिनट भी रुक नहीं पाई उसे ब्लॉग पर लगाने से। उनकी स्थिति को हम सब समझते हैं और उम्मीद और दुआ करते हैं कि मां जल्द ही इलाज पूरा करके, उसकी तकलीफों से उबर कर फिर स्वस्थ हो जाएंगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा घर, हमारा घर, हम सब का घर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी, मंझली, छोटी और मुन्ने का घर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ हम पले, जहाँ हमने अपनी पहली सांस ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसमें हमारा वजूद बना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस से हमारे ताने-बाने जुडे हुए थे,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो हमारा घर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर आज….हमारे उसी घर को,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घेर रख़ा है दीमक ने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीमक ने अपना जाल खूब फैला रख़ा है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे उसी घर पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते हैं “निकाल दो इस दीमक को”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर कैसे? कैसे निकाल सकते हैं हम इसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस से जो हमारी “मा” जुडी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका इस घर से पचत्तर साल का नाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर वो कमजोर भी तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस बेचारी को तो पता भी नहीं कि..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीमक ने घेर रख़ा है उसके घर को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर हाँ…!इलाज जारी है, दीमक के फैलते हुए जाल को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोकने का…।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“ कीमोथेरेपी और रेडिएशन ” के ज़रीए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताकि बच जाए हमारी “माँ”&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4858070514746569437?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4858070514746569437/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4858070514746569437' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4858070514746569437'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4858070514746569437'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/03/blog-post_24.html' title='हमारा घर'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-6573882572583973801</id><published>2009-03-08T22:59:00.005+05:30</published><updated>2009-03-08T23:14:00.421+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर की पहचान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>संक्षेप में जो आप जानना चाहते हैं स्तन कैंसर के बारे में</title><content type='html'>बदले समय में भारतीय महिलाओं में भी स्तन का कैंसर सबसे आम हो गया है। हर 22 वीं महिला को कभी न कभी स्तन कैंसर &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SbQDItRPTjI/AAAAAAAAAL4/bTnHO9ADqCw/s1600-h/images+cancer.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 86px; height: 150px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SbQDItRPTjI/AAAAAAAAAL4/bTnHO9ADqCw/s400/images+cancer.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5310873308702395954" /&gt;&lt;/a&gt;होने की संभावना होती है। शहरी महिलाओँ में यह संख्या और भी ज्यादा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;खुद पहचानें &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;स्तन कैंसर के सफल इलाज का एकमात्र सूत्र है- जल्द पहचान। आइने के सामने और शावर में या लेट कर स्तनों की हर महीने पीरियड के बाद खुद जांच करके देखें- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;- &lt;/span&gt;स्तन या निप्पल के आकार में कोई असामान्य बदलाव।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;-&lt;/span&gt; कोई गांठ, चाहे वह मूंग की दाल के बराबर ही क्यों न हो। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;-&lt;/span&gt; स्तन में सूजन, लाली, खिंचाव या गड्ढे पड़ना, संतरे के छिलके के समान छोटे-छोटे छेद या दाने-से बनना।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;- &lt;/span&gt;एक स्तन पर खून की नलियां ज्यादा स्पष्ट दिखने लगना।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;-&lt;/span&gt; निप्पल भीतर को खिंचना, उसमें से दूध के अलावा कोई भी स्त्राव- सफेद, गुलाबी, लाल, भूरा, पनीला या किसी और रंग का, होना ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;-&lt;/span&gt; स्तन में कही भी लगातार दर्द होना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जांच &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;      • 40 की उम्र में एक बार और फिर हर दो साल में मेमोग्राफी करवानी चाहिए ताकि शुरुआती स्टेज में ही स्तन कैंसर का पता लग सके।&lt;br /&gt;      • ब्रेस्ट स्क्रीनिंग के लिए एमआरआई, अल्ट्रासोनोग्राफी भी की जाती है।&lt;br /&gt;      • एफएनएसी- किसी ठोस गांठ की जांच सुई से वहां की कोशिकाएं निकालकर की जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बचाव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;     &lt;span style="font-weight:bold;"&gt; - &lt;/span&gt;कसरत: हर हफ्ते सवा तीन घंटे दौड़ लगाने या 13 घंटे पैदल चलने वाली महिलाओं को स्तन कैंसर की संभावना 23  फीसदी कम होती है। &lt;br /&gt;      &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;-&lt;/span&gt; मातृत्व: बच्चे पैदा करना, वह भी सही उम्र में, और उसे स्तनपान कराना स्तन कैंसर को टालने का कारगर तरीका है।&lt;br /&gt;      &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;- &lt;/span&gt;व्यसन: गुटका, तंबाकू और धूम्रपान ही नहीं, अल्कोहल भी स्तन कैंसर के रिस्क को बढ़ाता है। हर ड्रिंक का अर्थ है, कैंसर के खतरे में इजाफा। &lt;br /&gt;      &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;-&lt;/span&gt; धूपस्नान: विटामिन डी की कमी का सीधा संबंध स्तन कैंसर से है। शरीर को हर दिन 1000 मिलिग्राम कैल्शियम और 350 यूनिट विटामिन डी मिलना चाहिए। 5-10 मिनट का धूपस्नान शरीर में विटामिन डी बनाने में मदद करेगा। &lt;br /&gt;     &lt;span style="font-weight:bold;"&gt; -&lt;/span&gt; कैलोरी में कटौती: रेड मीट और प्रोसेस्ड भोजन कम, होल ग्रेन, फल-सब्जियां ज्यादा खाना कैंसर से बचाव का रास्ता है। चर्बी से मिलने वाली कैलोरी कुल कैलोरी की 20 फीसदी तक रहे तो स्तन कैंसर की संभावना में 24 फीसदी की कटौती हो सकती है। &lt;br /&gt;      &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;- &lt;/span&gt;छरहरी काया: शरीर पर छाई चर्बी ईस्ट्रोजन हॉर्मोन बनाती है जो स्तन कैंसर का कारण है। दुबला लेकिन सुपोषित होना आदर्श स्थिति है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भ्रम न पालें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;      • कैंसर छूत की, संक्रमण से होने वाली बीमारी नहीं है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप की तरह शरीर में खुद ही पैदा होती है।&lt;br /&gt;      • चोट या धक्का लगने से स्तन कैंसर नहीं होता। बल्कि कई बार चोट लगने पर इसकी तरफ ध्यान जाता है।&lt;br /&gt;      • 20 साल की युवती से लेकर मृत्यु की चौखट पर खड़ी बूढ़ी महिला तक किसी को भी स्तन कैंसर हो सकता है।&lt;br /&gt;      • स्तन कैंसर पुरुषों को भी होता है। 200 में से एक स्तन कैंसर का मरीज पुरुष हो सकता है।&lt;br /&gt;      • खान-पान और जीवनचर्या में सकारात्मक बदलाव करके कैंसर की संभावना को कम किया जा सकता है। लेकिन कैंसर हो जाने के बाद इसका प्रामाणिक इलाज ऐलोपैथी ही है।&lt;br /&gt;      • 93 फीसदी मामलों में स्तन कैंसर वंशानुगत बीमारी नहीं है। &lt;br /&gt;      • स्तन की 90 फीसदी गांठें कैंसररहित होती हैं, सिर्फ 10 फीसदी गांठों में कैंसर की संभावना होती है। फिर भी हर गांठ की फौरन जांच करानी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-6573882572583973801?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/6573882572583973801/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=6573882572583973801' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6573882572583973801'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6573882572583973801'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='संक्षेप में जो आप जानना चाहते हैं स्तन कैंसर के बारे में'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SbQDItRPTjI/AAAAAAAAAL4/bTnHO9ADqCw/s72-c/images+cancer.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-7982319567199316005</id><published>2009-02-26T14:31:00.005+05:30</published><updated>2009-02-26T15:43:47.074+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हंसी का कोना'/><title type='text'>एक पहेली- बूझो तो जाने!</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(इलाज पक्का था, मरीज ने पूरा करवाया भी, फिर भी बच न पाई?! बहुत नाइंसाफी है ये।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक महिला डॉक्टर के पास अपनी जांच करवाने गई। तभी पता लगा कि उसे कैंसर हुआ है। डॉक्टर ने कहा कि कोई चिंता की बात नहीं है। उसने अपने मरीज को स्तन कैंसर का ताजातरीन इलाज तस्कीद कर दिया। इस इलाज के बारे में साबित हो चुका था कि यह स्तन कैंसर का सौ फीसदी प्रभावी, शर्तिया इलाज है। आम जनता और दुनिया भर के डॉक्टर भी इससे सहमत थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर ने उस महिला को बताया कि यह बिना साइड-इफेक्ट वाला, सुरक्षित, सस्ता और प्रभावी इलाज है। और उसकी सारी बातें सच भी थीं। उस महिला का अगले दिन से ही इलाज शुरू हो गया, उसी नयी दवा से। लेकिन पूरे इलाज के बावजूद कुछ समय बाद उस महिला की कैंसर से मौत हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह इलाज सौ-फीसदी प्रभावी और जांचा-परखा था। फिर उस मरीज की मौत क्यों हो गई?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SaZcdBYIzoI/AAAAAAAAALo/fOqmaXlA6js/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 127px; height: 85px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SaZcdBYIzoI/AAAAAAAAALo/fOqmaXlA6js/s200/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5307030864558345858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जवाब: वह इलाज स्तन कैंसर के लिए सौ फीसदी प्रभावी था, पर दूसरे प्रकार के कैंसरों के लिए नहीं। पहेली में कहीं नहीं कहा गया है कि उस महिला को स्तन कैंसर था। दरअसल उसे किसी और जगह का कैंसर था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-7982319567199316005?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/7982319567199316005/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=7982319567199316005' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7982319567199316005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7982319567199316005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html' title='एक पहेली- बूझो तो जाने!'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SaZcdBYIzoI/AAAAAAAAALo/fOqmaXlA6js/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-3410995669780851019</id><published>2009-02-22T23:00:00.003+05:30</published><updated>2009-02-22T23:19:55.194+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Living with cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीना इसी का नाम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर को हराते लोग'/><title type='text'>जेड गुडी की शादी की चर्चा हम क्यों करें?</title><content type='html'>आज के दिन हर जगह जेड गुडी की चर्चा है। आज का दिन उसके लिए खास है- उसने आज शादी कर ली है। उसकी शादी के पहले इंग्लैंड और वेल्स के रोमन कैथोलिक चर्च ने जेड को शुभकामनाएं दीं और उनके लिए प्रार्थना की। &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://newsimg.bbc.co.uk/media/images/45500000/jpg/_45500072_jadekiss.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 226px; height: 300px;" src="http://newsimg.bbc.co.uk/media/images/45500000/jpg/_45500072_jadekiss.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;शादी के पहले खास मीडिया के लिए जेड और उसके होने वाले पति ने यह जीवंत पोज दिया&lt;/span&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पर दुनिया के लिए 27 वर्षीय जेड गुडी की शादी इतनी खास क्यों है? इसका जवाब पाने के लिए उसकी पूरी कहानी जाननी पड़ेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेड के जिक्र/ परिचय का सिरा जोड़ने के लिए याद दिला दूं कि हिंदुस्तानी मीडिया में जेड की चर्चा पहली बार जनवरी 2007 में हुई जब इंगलैंड के रियलिटी टीवी शो &lt;span style="font-style:italic;"&gt;सेलेब्रिटी बिग ब्रदर&lt;/span&gt; में शिल्पा शेट्टी पर रेसिस्ट टिप्पणियां करने का इल्जाम उस पर लगा। इसके बाद वे शो से बाहर हो गईं और आखिरकार शिल्पा जीत गईं। हालांकि इसके लिए बाद में जेड ने कई बार माफी मांगी और सफाई दी कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दिलचस्प बात यह है कि फिर अगस्त 2008 में भारत में&lt;span style="font-style:italic;"&gt; बिग ब्रदर&lt;/span&gt; की ही तर्ज पर शिल्पा के कार्यक्रम&lt;span style="font-style:italic;"&gt; बिग बॉस&lt;/span&gt; में जेड शामिल हुईं। बिग बॉस के घर में अपने दूसरे ही दिन जेड को फोन पर पता चला कि उन्हें बच्चेदानी के मुंह का कैंसर है जो काफी विकसित अवस्था में है जिसका फौरन इलाज जरूरी है। जाहिर है, जेड कार्यक्रम छोड़ कर चली गईं और तब से लगातार कैंसर से लड़ रही हैं। ताजा समाचार यह है कि डॉक्टरों का कहना है कि “उसके पास इस दुनिया में ज्यादा समय नहीं है”। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी किसी के इस दुनिया में रहने या न रहने के समय को कैसे तय कर सकता है, जब तक कि व्यक्ति के दिल-दिमाग ने काम करना बंद न कर दिया हो? खास तौर पर कैंसर के मरीजों के बारे में ऐसी ‘भविष्यवाणियां’ मैंने भी कई बार सुनी हैं। और, यकीन मानिए, डॉक्टरों की ऐसी भविष्यवाणियों को भी अनेक मरीजों ने मेरे सामने ही झूठा साबित कर दिया है। सबका जिक्र जरूरी नहीं है, लेकिन दो-चार या आठ-दस महीनों को चार-पांच साल में बदलते मैंने कई बार देखा है। इसलिए जब सुन रही हूं कि जेड के पास कुछेक हफ्तों या महीनों का ही समय है तो चुपचाप यकीन नहीं करना चाहती। और अगर यह सच हो भी जाए तो बड़ी बात यह होगी कि जेड ने अपने 27 साल के जीवन को कितना जिया। महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि अपने छोटे से समय में उसने क्या किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने बहुत कुछ किया, खूब किया। पांच जून 1981 को जन्मी एक टूटे परिवार की लड़की जेड सेरिसा लॉराइन गुडी को पहली बार दुनिया ने जाना जब वह 2002 में ब्रिटेन के चैनल 4 के रियलिटी शो &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बिग ब्रदर&lt;/span&gt; के परिवार में शामिल हुईं। इस ‘परिवार’ से निकाले जाने के बाद उसने अपने टीवी कार्यक्रम बनाना शुरू किया। साथ ही अपने सौंदर्य प्रसाधन भी बाजार में उतारे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://newsimg.bbc.co.uk/media/images/45500000/jpg/_45500073_jadebridesmaids.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 466px; height: 220px;" src="http://newsimg.bbc.co.uk/media/images/45500000/jpg/_45500073_jadebridesmaids.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;जेड गुडी शादी के एक दिन पहले ब्राइड्स मेड्स के साथ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोलह साल की उम्र में पहली बार उसे पता लगा कि उसके शरीर में कई ऐसी कोशिकाएं हैं जो कैंसर बना सकती हैं। इन बीमार कोशिकाओं का इलाज कर दिया गया। फिर सन 2004 उसे अंडाशय (ओवरी) का कैंसर और फिर 2006 में मलाशय का कैंसर बताया गया। दोनो बार इलाज के बाद उसे डॉक्टरों ने ‘ठीक हो गई’ माना। मगर ऐसा था नहीं। अगस्त 2008 के शुरू में फिर कैंसर की आशंका में उसने कुछ जांचें करवाईं जिनकी रिपोर्ट उन्हें हिंदुस्तान में बिग बॉस के घर पर मिली। इस दौरान दो मई 2006 को जेड ने अपनी पहली आत्मकथा- 'जेड: माई ऑटोबायोग्राफी' छपवाई और उसी साल जून में अपना इत्र- 'श्..जेड गुडी' जारी किया जो खासा लोकप्रिय हुआ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवंबर 2006 तक उसने&lt;span style="font-style:italic;"&gt; नाउ&lt;/span&gt; पत्रिका के लिए साप्ताहिक कॉलम भी लिखा। फिर अगस्त 2008 में तीसरी बार कैंसर होने का पता लगने के बाद अक्टूबर 2008 में एक और आत्मकथा लिखी- 'जेड: कैच अ फॉलिंग स्टार' जिसमें 2007 में &lt;span style="font-style:italic;"&gt;बिग ब्रदर&lt;/span&gt; कार्यक्रम के दौरान के अनुभवों को समेटा है। उस पर एक टीवी डॉक्युमेंटरी ‘लिविंग विथ जेड गुडी’ का प्रसारण सितंबर में हुआ तो दिसंबर में एक और फिल्म ‘जेड’स कैंसर बैटल’ दिखाई गई। अक्टूबर में उसने अपना दूसरा ब्यूटी सैलोन खोला। फिर क्रिसमस के दौरान थिएटर रॉयल में स्नो व्हाइट नाटक में बिगड़ैल रानी का किरदार निभाया। इस हालत में भी अपनी जीजीविषा को जिलाए रखने और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना सब कर पाने के लिए उसकी खूब तारीफ हुई। पर जनवरी में उसे इस शो से हटना पड़ा, शरीर साथ नहीं दे पाया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुक्रवार, 6 फरवरी को उनके मलाशय से गेंद के बराबर ट्यूमर ऑपरेशन के जरिए निकाला गया। आज उसने अपनी बीमारी की हालत में, मौत के करीब खड़े होकर भी शादी की है जिसे फिल्माने का ठेका भी उन्होंने महंगे में बेचा। इस ईवेंट के एक्सक्लूसिव कवरेज के लिए एक पत्रिका के साथ भी उनका सौदा हुआ, एक मोटी रकम के बदले। और कीमोथेरेपी से गंजी हुई अपनी खोपड़ी को दिखाने के लिए शादी में घूंघट न पहनने का फैसला भी चौंकाने वाला, पर बिकाऊ रहा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अपनी जिंदगी के आखिरी चंद दिन कैमरे में कैद करवाने वाली यह बीमार सेलेब्रिटी अब अपनी मौत को भी भुनाना चाहती है? लोग यही कह रहे हैं और वह खुद भी कहती है कि वह मरने के पहले ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा कर लेना चाहती है, अपने पांच और चार साल के दो बच्चों के लिए। इस बारे में कुछ लोगों का कहना है कि यह जेड का शोषण है। किसी की मौत को टीवी पर लाइव देखना- दिखाना क्रूर और अमानवीय है। पर जेड का कहना है कि उनकी जिंदगी कैमरे के सामने बीती है, इसलिए मौत भी कैमरे के सामने ही हो। उधर डॉक्टर मान रहे हैं कि टीवी पर यह सब देख रहे हजारों दर्शक इसी बहाने कैंसर के बारे में जानेंगे और जागरूक बनेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-3410995669780851019?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/3410995669780851019/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=3410995669780851019' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3410995669780851019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3410995669780851019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='जेड गुडी की शादी की चर्चा हम क्यों करें?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-5970259137014972906</id><published>2009-01-28T08:56:00.004+05:30</published><updated>2009-01-28T09:06:19.850+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Living with cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><title type='text'>जिंदगी है यूं-यूं... रानी की कहानी (भाग-2)</title><content type='html'>&lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2009/01/blog-post.html"&gt;ऐसा क्यों हुआ? (रानी की कहानी भाग-1)&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हम सब दुखी हैं। कारण है रानी की तबीयत, जो दिन पर दिन बदतर होती जा रही है और डॉक्टरों ने जवाब तो नहीं दिया है, पर यह साफ है कि वो लाजवाब हैं। उसकी रीढ़ इतनी भुरभुरी हो चुकी है कि किसी भी समय, चलते-फिरते, हिलते-डुलते चूर-चूर होकर रीढ़ के भीतर की नर्व में चुभ जाएगी और तब उसके शरीर का कोई हिस्सा संवेदनहीन, लकवाग्रस्त हो जाएगा। अब वह बहुत ही धीरे-धीरे चलती-फिरती है। कमरे से बाथरूम तक जाना उसकी सबसे बड़ी वॉक है। अस्पताल तक लेजाने में डर लगा रहता है कि कोई झटका न लग जाए। पीठ को हमेशा सीधा रखना जरूरी है। खाने-पीने की जरूरत तो है पर भूख मर गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब उसकी देखभाल तो कर रहे हैं, लेकिन कोई उससे ज्यादा नहीं कर पा रहा है, डॉक्टर भी नहीं। इस स्टेज पर कैंसर ही विजेता होता है, हम उसके हाथ की कठपुतली। जब तक चलाएगा, चलेंगे, फिर...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब इस बीमारी यानी स्तन कैंसर के साथ रानी पहली बार रिपोर्ट आदि लेकर अस्पताल गई थी तो मैं भी उसके साथ थी, एक अनुभवी कैंसर रोगी (वैसे, दोबारा इलाज के बाद अभी तक ठीक हूं) के तौर पर। रिपोर्टों के आदार पर उसे चौथे स्टेज का कैंसर बताया गया जो स्तन के अलावा दूसरे हिस्सों, जैसे रीढ़ और कूल्हे की हड्डियों में भी पैल गया था। उस समय मुझे महसूस हुआ था कि डॉक्टर रिपोर्ट देखने के बाद उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं, जो एक सामान्य मरीज को मिलनी चाहिए। उसके बाद पहले कीमोथेरेपी का सुझाव दिया गया। कीमो के बाद कोई इलाज किए बिना उसे सिर्फ जांचें कराते रहने को कहा गया। मुझे ताज्जुब हो रहा था कि उसका ऑपरेशन तक डॉक्टरों की योजना में नहीं था। बाद में मेरे उकसाने पर कोई छह महीने बाद रानी ने आगे इलाज के सवाल उठाए तो डॉक्टरों ने थोड़े आपसी विमर्श के बाद सर्जरी और रेडियोथेरेपी की तारीखें दीं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय डॉक्टरों के रवैये के बारे में जो महसूस किया था, वह सही था, यह हाल ही में एक लेख पढ़ कर समझ में आया। इंग्लैंड में बढ़ी अवस्था के कैंसर मरीजों के बीच हुए एक सर्वे में करीब आधे मरीजों ने बताया कि नामी विशेषज्ञों तक उनकी पहुंच नहीं थी या सहज नहीं थी। जबकि शुरुआती स्टेजों के मरीजों में से 98 फीसदी को यह सुविधा मिली। गंभीर मरीजों का कहना था कि उन्हें “अकेला छोड़ दिया गया”। उस हालत में इलाज कराने (या न कराने), इलाज के चुनाव, और जीवन के अंत को स्वीकारने जैसे फैसलों में विशेषज्ञ सलाहकारों का पूरा सहयोग नहीं मिला। जबकि सभी को जब जरूरत हो फौरन, और जब तक जरूरत हो, मॉरल सपोर्ट और देखभाल, सार-संभाल मिलनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश की बात करें तो ज्यादातर लोगों के पहुंच के भीतर सरकार अस्पताल ही हैं। इनमें अव्वल तो मेडीकल नर्सिंग ड्यूटी में मॉरल सपोर्ट की ड्यूटी शामिल ही नहीं होती। (कागजों पर हो तो पता नहीं।)। और अगर कोई नर्स या डॉक्टर मरीज को थोड़ा समय देना भी चाहे तो उसे ओपीडी के चार घंटों में करीब सौ मरीज देखने होते हैं। यानी लगातार काम करे तो हर घंटे 25 मरीज यानी हर मरीज के हिस्से कोई दो मिनट। इन दो मिनटों में वह मरीज की जांच करे, उसकी सुने, अपनी कहे, उसके साथ आए अटेंडेंट को समझे या पर्चा लिखे और उसको समझाए! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में जाहिर है, जिंदगी बचाने जैसे सबसे गंभीर मसले पर ही ध्यान दिया जा सकता है। बाकी मसले प्राथमिकता सूची में नीचे आ जाते हैं, जिन तक मामला अक्सर पहुंच ही नहीं पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन, अगर इन पर ध्यान देना नहीं हो पाता इसका मतलब यह कतई नहीं कि ये मसले हैं ही नहीं। कैंसर से हारते लोगों के लिए शारीरिक तौर पर सबसे जरूरी होता है- दर्द का निवारण और अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति। और मानसिक रूप से सबसे जरूरी होता है उन्हें अपने होने की सार्थकता का एहसास दिलाते रहना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमरीका के एक सर्वेक्षण में पता चला कि ज्यादातर मरीज आखिरी समय में अपने घर-परिवार के बीच रहना चाहते हैं। लेकिन उनकी यह इच्छा कई बार मजबूरी बन जाती है जब परिवार उन्हें बोझ और बेकार समझने लग जाता है। रिश्तेदार सोचते हैं कि अब इनकी सेवा करके कितने दिन जिलाए रखा जाए। ऐसे माहौल में मरीज अस्पताल में ही भर्ती रहना ज्यादा पसंद करते हैं, जहां उन्हें भरोसा होता है कि डॉक्टर और नर्सें कम से कम उन्हें जरूरत के समय फौरन मदद तो करेंगे। किसी भी वक्त मर जाने का विचार उनकी चिंता का और तनाव को खत्म नहीं होने देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीसवीं सदी के मुकाबले अब कैंसर के मरीजों के जिंदा रहने और बेहतर, ज्यादा सामान्य जीवन जीने की संभावना कई गुना बढ़ गई है। चिकित्सा-जगत ने इतनी तरक्की कर ली है कि बढ़े हुए कैंसर के साथ भी कई लोग कई महीनों और वर्षों तक जीवित रहते हैं। ऐसे में उनके लिए पैलिएटिव केयर यानी उनका जीवन सुखमय बनाने और सेहत को जहां तक हो सके संभाले रखने का महत्व बढ़ गया है। ऐसे में पैरामेडिकल क्षेत्र के लोगों को इस विषय पर और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-5970259137014972906?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/5970259137014972906/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=5970259137014972906' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5970259137014972906'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/5970259137014972906'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/01/2.html' title='जिंदगी है यूं-यूं... रानी की कहानी (भाग-2)'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4723763111619065410</id><published>2009-01-24T16:49:00.000+05:30</published><updated>2009-01-24T16:52:20.600+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Living with cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><title type='text'>ऐसा क्यों हुआ?</title><content type='html'>मेरी एक मित्र, नहीं, बल्कि दफ्तर में सहकर्मी- नाम से क्या फर्क पड़ता है, सुविधा के लिए रानी कह लेते हैं- के करीबी सहयोगी ने कोई ढाई साल पहले मुझे एक दिन बताया कि रानी को मेरी सलाह की जरूरत है, मुझे उससे बात करनी चाहिए। मैं उससे मिली तो पता चला कि उसे भी स्तन कैंसर की आशंका में अस्पताल में कई टेस्ट करवाए गए हैं और रिपोर्ट ले-जाकर डॉक्टर को दिखाने में वह घबरा रही है। साथ ही वह उन रिपोर्ट्स की तफसील जानना चाहती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने रिपोर्ट्स पढ़ कर सुनाई, और जितना समझ में आया, उनका अर्थ भी बताया। संक्षेप में- उसे स्तन का कैंसर है जो कई अंगों में छुट-पुट फैल चुका है। मुझसे काफी देर तक वह बात करती रही। उसने अपनी इस और इससे पहले भी किसी आमो-खास तकलीफ की चर्चा किसी से नहीं की थी। वह है ह हिम्मती। यह उसका आत्मविश्वास था, जिसकी सभी तारीफ करते हैं। उस समय भी वह आत्मविश्वास से भरी थी और अपनी सेहत को लेकर उसे विश्वास था कि कुछ समय की बात है, वह फिर से स्वस्थ हो जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मविशवास अच्छा है, लेकिन अज्ञानी का आत्मविश्वास खतरा सामने देखकर आंखें बंद कर लेने जितना ही खतरनाक है, दुस्साहसिक है। मैं उसके साथ अस्पताल गई। डॉक्टर ने चौथी अवस्था का कैंसर बताया। इलाज के लिए कीमोथेरेपी का सुझाव दिया और कहा कि उसके नतीजे देखने के बाद आगे के इलाज की योजना बनाई जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे सामान्य, छह साइकिल कीमोथेरेपी दी गई। उसके बाद डॉक्टरों का कहना था कि कैंसर अब भी काफी फैला हुआ है, इसलिए सर्जरी की सफलता पर संदेह है। फिर भी उसकी सर्जरी और रेडियोथेरेपी भी हुई, जो थोड़े विकसित स्तन कैंसर के पूरे इलाज का सामान्य हिस्सा है। फिर उसे पहले एक महीने और फिर हर तीन महीने में फॉलो-अप के लिए आने को कहा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा उस दफ्तर से तबादला हो गया। बीच-बीच में जब भी फोन पर रानी से या अपने किसी और पुराने सहयोगी से बातचीत होती तो यही समाचार मिलता कि वह ठीक है। मैं हमेशा संतोष महसूस करती कि इतने बुरे हालात के बाद भी इलाज से उसकी तबीयत काफी संभल गई है। मैं यह मान कर चल रही थी कि वह नियम से फॉलो-अप में जा रही है। न मानने का कारण ही नहीं था। इतना पढ़ा-लिखा व्यक्ति अपनी सेहत के प्रति इतनी गंभीर लापरवाही बरतेगा!&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मगर मामला कुछ और था। इलाज ‘खत्म होने’ का अर्थ उसे यही समझ में आया कि वह ठीक हो गई है। इसलिए जब कोई आठ महीने बाद उसकी कमर और रीढ़ के निचले हिस्से में बर्दाश्त से बाहर दर्द होने लगा तब वह अस्पताल पहुंची। वहां, स्वाभाविक था, डॉक्टरों ने उसे डांट पिलाई और ढेर सारी जांचें फिर करवाने को कहीं। और तब पता चला कि कैंसर उसे भीतर तक खा चुका है, रीढ़ और कूल्हे की हड्डियों को सबसे ज्यादा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय उसकी हालत जानकर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है। उसका आत्मविश्वास भी कैंसर को काबू करने में नाकाम रहा। अब हम सब दौड़-भाग कर रहे हैं। सरकारी अस्पताल की अनंत भीड़ में उसकी जांचें, इलाज- यानी पहले रीढ़ और कूल्हे की हड्डियों के लिए पैलिएटिव रेडियोथेरेपी और फिर हल्की कीमोथेरेपी और दूसरी दवाइयां आदि जल्द-से-जल्द करवाने के लिए संबंधित लोगों और विभागों में याचना से लेकर उसके बैंक खाते, तनख्वाह, ग्रैच्युटी आदि में किसी को नामांकित करवाने तक। मैं शायद जिक्र करना भूल गई, उसने शादी नहीं की है और अपने खातों में किसी को नामांकित तक नहीं किया है, जो उसके जाने के बाद (भगवान न करे) उसके पैसे पा सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे गुस्सा आ रहा है उसके आत्मविश्वास पर। बल्कि मुझे तो लग रहा है कि वह उसकी मूर्खता थी। क्या कोई इंसान अपनी सेहत की तरफ से इतना लापरवाह हो सकता है? शुरू में जब उसे अपने स्तन में गांठ का पता चला तो वह उसे लेकर निश्चिंत बैठी रही, जब तक वह न भरने वाला घाव बदबूदार और दर्दनाक न हो गया। इतना कि उसके काफी करीब जाने पर दूसरों को भी गंध महसूस होने लगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना, उसमें सहनशीलता है, पर ऐसी सहनशीलता! दूर से ही सलाम।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उसके बाद? सारा महंगा और लंबा और तकलीफदेह इलाज करवाने के बाद वह फिर वही अज्ञानी-आत्मविश्वासी रानी बन गई।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;नतीजा? आठ महीने की निश्चिंत जिंदगी बिताकर फिर उस दलदल में कूद पड़ी है रानी, जिसे वह अपने और अपने चाहनेवालों के लिए समतल सड़क न सही, पर चलने लायक तो बनाए रख सकती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच है, जिस स्टेज में वह पहली बार अस्पताल गई थी, उसके बाद यह स्थिति तो आनी ही थी, पर इतनी जल्दी और इतनी दर्दनाक! किसी ने नहीं सोचा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4723763111619065410?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4723763111619065410/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4723763111619065410' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4723763111619065410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4723763111619065410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='ऐसा क्यों हुआ?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-7358079847476813552</id><published>2008-11-27T14:40:00.001+05:30</published><updated>2008-12-04T12:27:20.750+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शोक/आक्रोश'/><title type='text'>शोक/आक्रोश</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SS5hsMBLS2I/AAAAAAAAAKo/IrABOApvrcM/s1600-h/shok.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 100px; height: 100px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SS5hsMBLS2I/AAAAAAAAAKo/IrABOApvrcM/s400/shok.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5273259625465727842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; य़ह आक्रोश, विरोध और दुख का चित्र है। कल/आज की मुंबई की और पिछली तमाम ऐसी घटनाओं के खिलाफ। इस चित्र को अपने ब्लॉग पोस्ट मे भी डालें और साथ दें । इस एक दिन हम सब हिन्दी ब्लॉग पर अपना सम्मिलित आक्रोश व्यक्त करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-7358079847476813552?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/7358079847476813552/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=7358079847476813552' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7358079847476813552'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/7358079847476813552'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/11/blog-post_27.html' title='शोक/आक्रोश'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_TlexI9QjNfY/SS5hsMBLS2I/AAAAAAAAAKo/IrABOApvrcM/s72-c/shok.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-8034976030127944179</id><published>2008-11-07T22:23:00.010+05:30</published><updated>2009-05-31T10:37:03.553+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तंबाकू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर जागरूकता अभियान'/><title type='text'>इन्हें ज़रा सांस तो लेने दो!</title><content type='html'>आज हमारे देश में राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर ये दोहराना सही होगा कि देश में पुरुषों के कैंसर के मामलों में 45 फीसदी मुंह, श्वास नली या फेफड़ों का कैंसर होता है और इनमें 95 फीसदी का कारण तंबाकू और धूम्रपान है। सरकार ने इस साल मई में &lt;a href="http://mohfw.nic.in/smoke%20free%20rules.pdf"&gt;धूम्रपान पर रोक लगाने के लिए कड़े नियम&lt;/a&gt; लागू कर दिए हैं, जिनका पालन, जाहिर है, आम तौर पर नहीं ही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कुछ तो सांस लीजिए, सिगरेट पीना बंद कीजिए।&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यू-ट्यूब पर फेफड़ों को बचाने की धूम्रपान-विरोधी मुहिम का रियलिस्टिक वीडियो।-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/_c4VjRbUTMU&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/_c4VjRbUTMU&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-8034976030127944179?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/8034976030127944179/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=8034976030127944179' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8034976030127944179'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8034976030127944179'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='इन्हें ज़रा सांस तो लेने दो!'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-6753154283635742386</id><published>2008-10-31T17:18:00.004+05:30</published><updated>2008-10-31T17:27:29.089+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लाइफ स्टाइल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='life style and cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर क्यों होता है'/><title type='text'>जो पहले ज़ख्म था, नासूर बन गया</title><content type='html'>इन पृष्ठों पर कैंसर के रिस्क फैक्टर्स यानी कैंसर की संभावना बढ़ाने वाले कारकों के बारे में चर्चा हुई है। लेकिन कैंसर का एक और रिस्क फैक्टर है जिसके बारे में हम लोकोक्तियों/कहावतों में तो कई बार कहते हैं लेकिन उसे भाषा की सुंदरता बढ़ाने वाले अलंकार से ज्यादा नहीं समझते। दिल के किसी पुरानी चोट/दर्द के ठीक होने की सूरत नहीं नज़र आती तो हम अक्सर कहते हैं कि जो पहले ज़ख्म था, अब नासूर बन गया है। नासूर यानी कैंसर। लंबे समय का दिल का जख्म या दुख जब ठीक नहीं होता तो सिर्फ दिल में नहीं शरीर में भी नासूर बना सकता है।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://farm1.static.flickr.com/7/10059281_cf42184119.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 500px; height: 333px;" src="http://farm1.static.flickr.com/7/10059281_cf42184119.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इज़राइल में रिसर्चरों की एक टीम ने 255 स्तन कैंसर की मरीज़ों और 367 स्वस्थ महिलाओं के जीवन में बीमारी शुरू होने के पहले खुशी, आशावादिता, तनाव, अवसाद जैसी स्थितियों के आंकड़े जुटाए। डाक्टरों ने पाया कि जिन महिलाओं के जीवन में एक या एक से ज्यादा बड़े दुख की घटनाएं हुईं उन्हें कैंसर की संभावना ज्यादा थी। जबकि आम तौर पर सामान्य, खुशमिजाज़, आशावादी रहने वाली महिलाओं को स्तन कैंसर कम हुआ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका कहना है कि केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सेंट्रल नर्वस सिस्टम), हार्मोन और रोग प्रतिरक्षा तंत्र आपस में संबंधित हैं और व्यक्ति का व्यवहार और बाहरी कारक इनकी कार्यक्षमता पर असर डालते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो, हम बाकी सकारात्मक कोशिशों के साथ साथ- खुश रहने और कैंसर दूर भगाने के इस मंत्र को भी याद रखें ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-6753154283635742386?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/6753154283635742386/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=6753154283635742386' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6753154283635742386'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6753154283635742386'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post_31.html' title='जो पहले ज़ख्म था, नासूर बन गया'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://farm1.static.flickr.com/7/10059281_cf42184119_t.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-8306331005399546600</id><published>2008-10-29T15:32:00.005+05:30</published><updated>2008-11-02T09:55:11.417+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिंक रिबन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता अभियान'/><title type='text'>गुलाबी रिबन में पुरुष अजीब नहीं लगते</title><content type='html'>गुलाबी रिबन के बारे में पिछली पोस्ट &lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post_25.html"&gt;क्या आपने आज कुछ गुलाबी पहना है?&lt;/a&gt; पर एक टिप्पणी थी – ‘गुलाबी रंग में पुरुष - शायद कुछ अजीब लगे।‘ उसके जवाब में अपने ई-मेल बॉक्स पर मिली यह दिलचस्प और सार्थक कहानी आपके साथ बांट रही हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;एक अधेड़ उम्र का सुदर्शन पुरुष कैफे में पहुंचा और शांति से कोने की एक टेबल पर बैठ गया। कुछ देर में उसका ध्यान बगल वाली टेबल पर बैठे कुछ नौजवानों की तरफ गया जो उसे ही देख कर हंस रहे थे। फिर अचानक उसे कुछ ख्याल आया और वह समझ गया कि वे क्यों हंस रहे हैं। उसे याद आया कि उसने कोट के कॉलर वह गुलाबी रिबन टांका था, जिसे देख कर वे नौजवान उसका मज़ाक उड़ा रहे थे।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.about-columbusoh.com/wp-content/uploads/pink_ribbon.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 300px;" src="http://www.about-columbusoh.com/wp-content/uploads/pink_ribbon.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी देर तो वह उनकी ठिठोली को नज़रअंदाज़ करता रहा। फिर रिबन पर अंगुली रखी और उनमें से सबसे उच्श्रृंखल लगने वाले लड़के की तरफ देख कर पूछा- “क्या इस पर हंस रहे हो?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह लड़का बोला,- “माफ करें, लेकिन नीले कोट पर यह गुलाबी रिबन बिल्कुल नहीं जंच रहा है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस अधेड़ ने उसे इशारे से बुलाया और पास बैठने का न्यौता दिया। नौजवान असहज होकर उसके पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। उस अधेड़ ने धीमी आवाज़ में कहा- “मैं स्तन कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए, अपनी मां के सम्मान में इसे पहनता हूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“मुझे अफसोस है। क्या स्तन कैंसर ने उनकी जान ले ली थी?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“नहीं, वह मरी नहीं हैं। लेकिन शैशवकाल में उनके स्तनों से मेरा पोषण हुआ, और लड़कपन में जब भी मैं डर या अकेलापन महसूस करता था तो अपना सिर उन पर रख कर आश्वस्त हो जाता था। मैं उनका शुक्रगुज़ार हूं।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“अच्छा!।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“मैं यह रिबन अपनी पत्नी के सम्मान में भी पहनता हूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“उम्मीद है, अब वे भी ठीक हो गई होंगी?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हां, उन स्तनों ने 23 साल पहले मेरी प्यारी सी बेटी को पोषित किया, दिलासा दिया। वे हमारे स्नेहिल संबंधों में खुशी का स्रोत रहे हैं। मैं उनका भी आभारी हूं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“और आप इसे अपनी बेटी के सम्मान में भी पहनते होंगे?” नौजवान ने उकता कर कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“नहीं। उसके सम्मान में इसे पहनने के लिए बहुत देर हो चुकी है। मेरी बेटी एक माह पहले स्तन कैंसर से मर गई। उसका ख्याल था कि इस कम उम्र में उसे स्तन कैंसर नहीं हो सकता। इसलिए जब एक दिन अचानक उसने गांठ महसूस की तो भी वह चैतन्य नहीं हुई, उसे नज़रअंदाज़ करती रही। उसे लगा कि चूंकि उसे दर्द नहीं होता है, उसलिए चिंता की कोई बात नहीं है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कहानी से विचलित नौजवान बरबस बोल उठा- “ओह, मुझे बहुत दुख हुआ जानकर।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधेड़ बोला- “अब मैं अपनी बेटी की याद में गर्व से यह रिबन लगाता हूं। यह मुझे, दूसरों को इस बारे में सतर्क और जागरूक करने में मदद करता है। अब घर जाकर अपनी पत्नी, मां, बेटी, रिश्तेदारों और मित्रों को इस बारे में बताना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यह लो ”- कहते हुए उस अधेड़ ने अपनी कोट की जेब से एक गुलाबी रिबन निकाल कर उसे थमा दिया।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-8306331005399546600?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/8306331005399546600/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=8306331005399546600' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8306331005399546600'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/8306331005399546600'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/23.html' title='गुलाबी रिबन में पुरुष अजीब नहीं लगते'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-815134947407526141</id><published>2008-10-25T21:46:00.006+05:30</published><updated>2008-10-25T22:50:13.927+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिंक रिबन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्तन कैंसर जागरूकता अभियान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>क्या आपने आज कुछ गुलाबी पहना है?</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://rdr.zazzle.com/img/imt-prd/pd-168365051512777552/tl-pink_ribbon_mug.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 325px; height: 325px;" src="http://rdr.zazzle.com/img/imt-prd/pd-168365051512777552/tl-pink_ribbon_mug.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;क्या आपने आज कुछ गुलाबी पहना है? गुलाबी कपड़े, जूते, मोज़े, कड़े, रुमाल, रिबन... कुछ भी। अगर नहीं तो मेरी गुज़ारिश है कि जरूर पहनें। यह स्तन कैंसर का प्रतीक रंग है। आज का दिन गुलाबी पहनने के लिए खास इसलिए है कि, कहते हैं न, जब जागे, तभी सवेरा। जागरूकता के लिए तो कोई भी दिन अच्छा है। आप सोच रहे हैं, कि एक दिन एक खास रंग पहनने से क्या हो जाएगा! तो जनाब, इस लेख को पूरा पढ़ जाइए, आपको जवाब मिल जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्टूबर का महीना स्तन कैंसर जागरूकता को समर्पित है। अक्टूबर को नैशनल ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाने की शुरुआत अमरीका में हुई। अब इसे कई देशों ने अपना लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/3/32/PinkWhiteHouseOctober.jpg/200px-PinkWhiteHouseOctober.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 100px;" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/3/32/PinkWhiteHouseOctober.jpg/200px-PinkWhiteHouseOctober.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;गुलाबी रंगत में व्हाइट हाउस, अक्टूबर 2008&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;पिंक रिबन&lt;/span&gt; का इतिहास&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्तन कैंसर की मरीज सूज़न जी. कोमेन को मौत के करीब पहुंची हालत में देखकर बहन नैंसी जी. ब्रिकनर ने उससे वादा किया कि वह इस बीमारी के बारे में जागरुकता फैलाने की हर कोशिश करेगी। इसी वादे को निभाने के लिए 1982 में ‘&lt;a href="(http://cms.komen.org/komen/index.htm)"&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;सूज़न जी. कोमेन फॉर क्योर&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;’ नाम की संस्था बनी। इसके जरिए नैंसी ने स्तन कैंसर के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। आज यह स्तन कैंसर के मरीजों, विजेताओं और कार्यकर्ताओं का संभवतः दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/1/1a/Tokyotowerpink.jpg/180px-Tokyotowerpink.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 180px; height: 251px;" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/1/1a/Tokyotowerpink.jpg/180px-Tokyotowerpink.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;अक्टूबर 2007- स्तन कैंसर जागरूकता माह, गुलाबी रोशनी में नहाया टोकियो टावर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1991 में इस संस्था ने न्यूयॉर्क में आयोजित कैंसर जागरूकता दौड़ में सहभागियों को प्रतीक के रूप में गुलाबी रिबन बांटे। तब से गुलाबी रिबन दुनिया भर में स्तन कैंसर का प्रतीक चिन्ह बन गया है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गुलाबी रंगत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सामाजिक संस्थाओं को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में गुलाबी रिबन कामयाब रहा है। इसके नाम पर ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;पिंक रिबन इंटरैशनल&lt;/span&gt;’ जैसी संस्थाएं और ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;वियर इट पिंक&lt;/span&gt;’ और ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;इन द पिंक&lt;/span&gt;’ जैसी स्तन कैंसर से जुड़ी परियोजनाएँ खासा बड़ा काम समाज के लिए कर रही हैं। गुलाबी रिबन के अलावा इस रंग के दूसरे उत्पाद भी इस कैंसर जागरूकता माह में खूब बेचे और खरीदे जाते हैं और इससे तथा दान में मिले धन का इस्तेमाल स्तन कैंसर जागरूकता, इलाज और अनुसंधान के लिए किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्तन कैंसर पर सार्वजनिक आयोजनों के अलावा एक दिन तय किया जाता है जब संस्था से जुड़े सभी लोग और यहां तक कि उसे प्रायोजित करने वाली कंपनियों के कर्मचारी भी गुलाबी पहनते हैं। इसे ‘&lt;span style="font-style:italic;"&gt;पिंक डे&lt;/span&gt;’ कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पिंक फॉर अक्टोबर' &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/9/9c/Goingpink.gif "&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 106px; height: 106px;" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/9/9c/Goingpink.gif " border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;             &lt;span style="font-style:italic;"&gt;पिंक फॉर अक्टोबर का लोगो&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और अभियान है जिसके तहत स्तन कैंसर जागरूकता अभियान का समर्थन करने वाले सभी वेबसाइट इस महीने अपने पृष्ठों पर गुलाबी रंग बिखेर देते हैं। (&lt;a href="http://pinkforoctober.org/2006/08/im-going-pink-button/"&gt;आप भी बिखेर सकते हैं&lt;/a&gt;) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्टूबर 2006 में मैथ्यू ओलीफैंट का मज़ाक-मज़ाक में बनाया गुलाबी रंग से भरा मज़ाहिया वेबसाइट कैसे स्तन कैंसर जागरूकता अभियान के लिए प्रेरणा बन गया, &lt;a href="(http://en.wikipedia.org/wiki/Pink_for_October)"&gt;यह कहानी &lt;/a&gt;भी दिलचस्प है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैंसर की दवाएं बनाने वाली कंपनियों ने भी आदतन इस चिन्ह को व्यावसायिक फायदे के लिए खूब इस्तेमाल किया है। दरअसल शुरू में गुलाबी रिबन को बड़े पैमाने पर प्रायोजित करने वाली संस्था खुद एक रसायन कंपनी थी, जिसके उत्पाद स्तन कैंसर को बढ़ावा देते हैं। इसी तरह की परिघटनाओं के लिए ‘पिंकवाशिंग’ शब्द निकला है। यानी अपने बुरे कर्मों (ज़हरीले रसायनों का उत्पादन) की कालिख को (कैंसर के उपचार, जागरूकता आदि अभियानों के लिए खुले आम धन दे कर) धोने की कोशिश। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन आलोचनाओं से परे सोचने की बात यह है कि स्तन और दूसरे कैंसरों के बारे में जानने की जरूरत लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के&lt;a href="(http://209.85.175.104/search?q=cache:XWsjDHo8q8EJ:mohfw.nic.in/pg192to203.pdf+breast+cancer+indian+cancer+registry+prevalence&amp;hl=en&amp;ct=clnk&amp;cd=9&amp;gl=in)"&gt; ताज़ा आंकड़े&lt;/a&gt; बताते हैं कि&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; देश में आज की तारीख में कोई 20-25 लाख कैंसर के मरीज हैं। हर साल सात लाख से ज्यादा नए मरीज इस लिस्ट में जुड़ रहे हैं और इनमें से तीन लाख हर साल दम तोड़ देते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;स्तन कैंसर की बात करें तो हर साल शहरों में हर 8-10 महिलाओं में से एक को और गांवों में हर 35-40 में एक को स्तन कैंसर होने की संभावना है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या अब तक आप समझ पाए कि मैंने आज के दिन आपसे गुलाबी पहनने की गुज़ारिश क्यों की? जवाब बहुत सरल है। जब आप गुलाबी पहनेंगे तो इस बारे में सोचेंगे भी, क्योंकि आपका गुलाबी पहनना स्वतःस्फूर्त नहीं है, बल्कि ऐसा करने को आपसे कहा गया है। और उसी सोच के दौरान यह भी जानने को उत्सुक होंगे कि आखिर गुलाबी रंग और स्तन कैंसर का क्या रिश्ता है। और इस प्रक्रिया में आप कैंसर के बारे में कुछ नया जानें या नहीं, पर यह आपकी विचार-प्रक्रिया में शामिल जरूर हुआ। है न! बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता अभियान में शामिल होने के लिए शुक्रिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-815134947407526141?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/815134947407526141/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=815134947407526141' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/815134947407526141'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/815134947407526141'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post_25.html' title='क्या आपने आज कुछ गुलाबी पहना है?'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-6699026438679310345</id><published>2008-10-22T09:21:00.005+05:30</published><updated>2008-10-23T10:41:02.837+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कीमोथेरेपी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिलचस्प किस्से'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><title type='text'>तानाशाह हिटलर के शुक्रगुज़ार हैं कैंसर के मरीज़</title><content type='html'>जर्मनी के नाज़ी तानाशाह हिटलर की कैंसर के मरीजों को एक बड़ी देन है। हालांकि वे चले थे बुराई करने, अनेकों के साथ बुरा तो हुआ पर कुछेक का भला भी हो गया। नहीं, ज्यादा पहेलियां बुझाने का मेरा कोई इरादा नहीं है, बस एक कहानी सुनानी है। तो,&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://gwakpyunghwa.files.wordpress.com/2008/01/hitler.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px;" src="http://gwakpyunghwa.files.wordpress.com/2008/01/hitler.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt; हिटलर ने यहूदियों को मारने के लिए कई तरीके ईजाद किए। सैकड़ों को एक साथ मारने का उसका एक तरीका था- गैस चेंबर। झुंड-के-झुंड यहूदियों को बड़े-से हॉल में बंद कर देना और उसमें जहरीली गैस छोड़ना, जिसे सूंघ कर सबका काम तमाम हो जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछेक बार ऐसा हुआ कि गैस-चेंबरों की जहरीली गैस सूंघने के बाद भी कुछ लोग जिंदा रह पाए और जान बचाकर निकल भागे। उन भागने वालों में कुछ कैंसर के मरीज भी थे। देखा गया कि गैस चेंबर से बचे कैंसर के मरीजों की हालत में अचानक चमत्कारी सुधार होने लगा। बाद में पता लगा कि उन जहरीली गैंसों से उनके शरीर की कैंसर कोशिकाएं नष्ट हो गईं। और इस तरह खोज हुई कैंसर को मारने वाले जहरीले रसायनों की। इन मारक रसायनों का इस्तेमाल कैंसर के मरीजों की जान बचाने के लिए होने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.australiafreepress.org/images/auschwitzgaschamber.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px;" src="http://www.australiafreepress.org/images/auschwitzgaschamber.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;Auschwitz gas chamber&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://i.dailymail.co.uk/i/pix/2008/07/24/article-0-03334B890000044D-654_468x594.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px;" src="http://i.dailymail.co.uk/i/pix/2008/07/24/article-0-03334B890000044D-654_468x594.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;Aftermath&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                 &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://isurvived.org/Pictures_iSurvived-4/paint-insideGasChamber.GIF"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px;" src="http://isurvived.org/Pictures_iSurvived-4/paint-insideGasChamber.GIF" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;Inside a gas chamber&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये रसायन यानी कीमोथेरेपी की दवाएं जहरीली तो अब भी उतनी ही हैं, लेकिन अब यह भी पता लग गया है कि सबसे अच्छे परिणाम पाने के लिए वे कितनी मात्रा में और कैसे दी जाएं और उनके बुरे असर कम करने के लिए क्या-क्या किया या न किया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह की अब तक सैकड़ों दवाएं खोजी जा चुकी हैं। इनमें से कुछ दवाएं दूसरी एक या दो दवाओं के साथ दिए जाने पर कैंसर के खिलाफ ज्यादा कारगर साबित होती हैं। कीमोथेरेपी की इस पद्यति को कॉम्बिनेशन कीमोथेरेपी कहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दवाओं का चुनाव कैंसर के प्रकार अवस्था और शरीर के अंग के आधार पर (और हां, हिंदुस्तान में खास तौर पर सरकारी अस्पतालों में पहुंचे गरीब मरीजों के लिए उनकी माली हालत के आधार पर!) किया जाता है। इन्हें मरीज के रक्त-संचार तंत्र में डाला जाता है जहां से यह रक्त नलियों के जरिए पूरे शरीर में फैल जाती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-6699026438679310345?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/6699026438679310345/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=6699026438679310345' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6699026438679310345'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6699026438679310345'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post_22.html' title='तानाशाह हिटलर के शुक्रगुज़ार हैं कैंसर के मरीज़'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4730831269836056588</id><published>2008-10-19T12:45:00.005+05:30</published><updated>2008-10-19T13:03:55.521+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='life style and cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='living healthy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>थुल-थुल मोटापे से तौबा!</title><content type='html'>जिराफ कभी मोटा नहीं होता।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.blogaholics.ca/Zeiss1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px;" src="http://www.blogaholics.ca/Zeiss1.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;इसीलिए अव्वल तो उसे कैंसर होता नहीं। और खुदा-न-खास्ता कभी हो भी गया तो उसके बचने के चांसेस काफी मोटे होंगे क्योंकि वह खुद मोटा नहीं होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोटे और थुल-थुल शरीर वाले कैंसर मरीजों की ठीक होने की संभावना कम होती है। यह ताजा नतीजा हाल के एक रिसर्च के बाद सामने आया है। लान्सेट ऑन्कोलॉजी पत्रिका में छपे लेख के मुताबिक वैज्ञानिकों ने पाया कि मोटे लेकिन कमज़ोर मांस-पेशियों वाले लोगों में इलाज के लिए दी जाने वाली कीमोथेरेपी का वितरण पूरे शरीर में आसानी से नहीं हो पाता।  इस कारण दवाओं का पूरा फायदा शरीर को नहीं मिल पाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोटे लोगों में भी उपापचय की दर, पेशियों और मांस का अनुपात शरीर के गठन के मुताबिक अलग-अलग होता है। इसलिए उनको दी गई समान कीमोथेरेपी का पूरे शरीर में वितरण और असर होने का समय अलग-अलग हो सकता है। इसलिए इलाज के दौरान शरीर की सक्रियता, खान-पान और मोटापे का असर इलाज के कुल फायदे पर भी पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कनाडा में हुए एक क्लीनिकल ट्रायल में कैंसर के कमजोर मांस-पेशियों वाले मोटे मरीजों (सार्कोपीनिक ओबीज़) पर दवाओं के असर और उनकी ठीक होने की संभावना का अध्ययन किया गया। इसमें 250 मोटे मरीजों को शामिल किया गया , जिनमें से 38 फीसदी सार्कोपीनिक ओबीज़ माने गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अध्ययन के कुछ नतीजे थे-&lt;br /&gt;• सार्कोपीनिक ओबेसिटी वाले मरीज़ों की मृत्यु दर दूसरे ओबीज़ मरीजों के मुकाबले चार गुना ज्यादा थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• सार्कोपीनिक ओबीज़ मरीजों की सक्रियता यानी अपना रोज़ का काम करने और अपनी देखभाल कर पाने की क्षमता दूसरे मोटे मरीजों के मुकाबले बहुत कम थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• शरीर में कीमोथेरेपी के असमान वितरण के कारण सार्कोपीनिक ओबीज़ में कीमो के साइड इफेक्ट पर भी नकारात्मक असर पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों ने निश्कर्ष निकाला कि शरीर की रचना और गठन, खास तौरपर सार्कोपीनिक ओबेसिटी का मरीज़ की उत्तरजीविता, सामान्य जीवन, कीमोथेरेपी के जहरीले बुरे असर आदि  से गहरा संबंध है। यह भी पाया गया कि ऐसे मरीजों में समान शारीरिक वजन और ऊंचाई के बावजूद उपयुक्त दवा की मात्रा में तीन-गुने तक का अंतर आ सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ट्रायल पर ज्यादा अध्ययन के बाद हो सकता है भविष्य में सार्कोपीनिक ओबेसिटी से पीड़ित कैंसर मरीजों के लिए दवा की मात्रा तय करते समय इन कारकों को भी गिनती में लिया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिला कर सबक यही है कि हर कीमत पर मोटापे से बचा जाए, चाहे हम सार्कोपीनिक ओबीज़ हों या नहीं, चाहे हम कैंसर के मरीज़ हों या नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4730831269836056588?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4730831269836056588/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4730831269836056588' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4730831269836056588'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4730831269836056588'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post_19.html' title='थुल-थुल मोटापे से तौबा!'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-3723359856730028534</id><published>2008-10-16T20:21:00.001+05:30</published><updated>2008-10-16T20:25:55.197+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर की पहचान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैंसर के बारे में'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='About Cancer'/><title type='text'>खून की सरल जांच कैंसर होने का पता देगी</title><content type='html'>खून की जांच कराई और पता लगा लिया कि शरीर के किसी हिस्से में कैंसर की शुरुआत तो नहीं हो रही! आज की तारीख में सभी तरह के कैंसरों के लिए तो नहीं पर कुछेक के लिए यह जांच सुविधा उपलब्ध है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जल्दी ही बाकी तरह के कैंसर में भी ऐसी ही सरल जांच से काम बन जाएगा। कैंसर जैसी जटिल बीमारी के बारे में यह सोच पाना कठिन है कि सबसे सरल तरीका सबसे प्रभावी भी हो सकता है। कैंसर की पहचान के लिए ढेरों बड़ी-बड़ी महंगी मशीनें और दुरूह जांच हैं जो कुछेक गिने-चुने शहरों और अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं। ऐसे में अमेरिकन सोसाइटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी के शिकागो में हुए हालिया सम्मेलन में रिसर्चरों ने राय जाहिर की है कि कैंसर का पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका हैं, खून की कुछेक बूंदें लेकर जांच करना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खून से कैंसर का हाल जानने की तकनीक नई नहीं है। जिस तरह किसी महिला के खून में मौजूद प्रोटीनों की जांच करके उसके 10 दिन का गर्भ होने का पता भी लगाया जा सकता है, उसी तरह कैंसर की बेहद शुरुआती अवस्था में खून की जांच से ट्यूमर द्वारा छोड़ी गई कोशिकाओं पर मौजूद कुछ खास प्रोटीन की जांच करके उसकी मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है। ज्यादातर ट्यूमर पास-पास जुड़ी हुई कई परतों वाली ऐपीथीलियल कोशिकाओं से बने होते हैं। कैंसर कोशिकाओं की खास बात यह है कि वे एक जगह टिकती नहीं है और ट्यूमर से छिटक-छिटक कर तेजी से खून के जरिए दूसरी जगहों पर फैलने की कोशिश करती हैं। एक और दिलचस्प बात यह है कि कैंसर कोशिकाएं अविकसित, अधूरी, कमजोर और तेजी से विभाजित होने और उसी तेजी से मरते जाने वाली कोशिकाएं हैं। ऐसे में किसी जगह ट्यूमर बनने के पहले ही उससे निकल कर खून में आई ये अलग तरह की ऐपीथीलियल कोशिकाएं तुरंत पहचानी जा सकती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खून की जांच से कैंसर होने का पता देने वाली उसमें घूम रही अविकसित ऐपीथीलियल कोशिकाओं की मौजूदगी का पता लगा लेना काफी नहीं है। वैसे ही जैसे किसी जगह दुश्मन के सैनिकों की मौजूदगी का पता लगाना काफी नहीं। अगर उन्हें पकड़ कर पूछताछ भी की जा सके, उनके इरादों, योजनाओँ का भी खुलासा हो पाए तो बात बने। इसलिए नए तरह के परीक्षणों से वैज्ञानिक अब उन कोशिकाओं पर मौजूद प्रोटीन के प्रकार की पहचान करके यह भी पता लगा पा रहे है कि वह जिस ट्यूमर से निकल रहा है उसकी प्रकृति क्या है। क्या वह तेजी से बढ़ने वाला है, किसी और अंग में फैलने की स्टेज पर है, या धीरे-धीरे बढ़ रहा अपनी ही जगह पर बना हुआ है। इससे डॉक्टरों को हर मरीज की जरूरत के मुताबिक सही समय पर सही इलाज करने में मदद मिलेगी। ऐसी तरकीब इसलिए और भी जरूरी है कि कैंसर के सामान्य इलाज के जहरीले साइड इफेक्ट बहुत ज्यादा और मारक हैं। ऐसे में इलाज जितना सटीक होगा उतना ही कारगर, सस्ता, सुगम और कम साइड इफेक्ट पैदा करने वाला होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जानना रोचक है कि अब ट्यूमर से निकली कोशिकाओं के डीएनए, आरएनए और प्रोटीन में मौजूद बदलावों की जांच करके ट्यूमर के भीतर की खबर लेना आसान हो गया है। इन जांचों की सबसे बड़ी खासियत है इनका आसान और सहज होना। आजकल सबसे आम जांच चलन में है फाइन नीडिल एस्पिरेशन साइटोलॉजी तकनीक या एफ एन ए सी। सरल शब्दों में कहें तो ट्यूमर की जगह से कुछ कोशिकाएँ सुई के जरिए खींच कर निकालना और फिर माइक्रोस्कोप के नीचे उनकी पड़ताल करके उनके आकार-प्रकार, रचना, संख्या आदि का पता लगाना। लेकिन यह जांच तभी की जा सकती है जबकि पहले ही कैंसर का अंदेशा हो, ट्यूमर की जगह का पता हो, वह कम-से-कम इतना बड़ा हो कि उसमें से कोशिकाएं सुई के जरिए निकाली जा सकें और सुई उस तक पहुंच सके। इस प्रक्रिया में एक खतरा कैंसर कोशिकाओं के जल्द फैलने का भी है। ट्यूमर के भीतर तक पहुंची सुई के सहारे कैंसर कोशिकाएं अब तक अनछुई परतों तक पहुंच कर आदतन वहां भी पैर जमाना शुरू कर सकती हैं। लेकिन रक्त निकालकर जांच करने में इस बात का कोई खतरा नहीं होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खून की जांच पर आधारित इन निदान तकनीकों से कैंसर की पहचान में कोई बड़ा बदलाव आ गया हो, ऐसा समझना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन डॉक्टरों को इनसे बहुत उम्मीदें हैं। कैंसर के बारे में बुनियादी बात यही है कि इसकी पहचान जितनी जल्दी होती है, इसका इलाज उतना ही सरल, कम खर्चीला और सफल होता है और इसके दोबारा होने की संभावना उतनी ही कम होती है। इसलिए इन तकनीकों के ज्यादा सटीक और भरोसेमंद बनाने की कोशिशें जारी हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-3723359856730028534?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/3723359856730028534/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=3723359856730028534' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3723359856730028534'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/3723359856730028534'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post_16.html' title='खून की सरल जांच कैंसर होने का पता देगी'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-4604580347412992732</id><published>2008-10-04T14:30:00.004+05:30</published><updated>2009-05-31T10:37:38.063+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तंबाकू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीना इसी का नाम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='life style and cancer'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='living healthy'/><title type='text'>धूम्रपान पर कड़ी पाबंदी</title><content type='html'>दो अक्टूबर से सभी सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर पाबंदी लग गई है। इसे न मानने पर सज़ा का भी प्रावधान है। यह सभी की सेहत के लिए अच्छा है। खास बात यह है कि कई सर्वेक्षणों में लोगों ने समान रूप से इस पाबंदी का समर्थन किया है। &lt;br /&gt;इस मसले पर &lt;a href="http://pret-vinashak.blogspot.com/"&gt;घोस्ट बस्टर ने अपने ब्लॉग&lt;/a&gt; पर एक शानदार पोस्ट डाली है। उसके सुंदर चित्र, प्रवाहमय भाषा, खूबसूरत अभिव्यक्ति और रिच कंटेंट पढ़ कर मैं आपको भी उससे परिचित करवाने के लालच से बच नहीं पाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे लिखते हैं- "आम जनता की और से सरकार के इस कदम का जबरदस्त स्वागत हुआ है. मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार ९२% लोगों ने धूम्रपान निषेध के लिए कड़े क़दमों का स्वागत किया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर भी इस बात को लेकर एक बड़ी बहस छिडी हुई है. बैन के पक्षधर और विरोधी तमाम तरह के तर्क दे देकर मैसेज बॉक्स और फोरम्स के पन्नों पर पन्ने रंगे जा रहे हैं. अपन तो बस इस बैन को जल्द से जल्द और सख्ती से लागू किए जाते देखना चाहते हैं. एक कम्युनिटी के रूप में स्मोकर्स के लिए अपने मन में जरा भी इज्जत नहीं. क्योंकि,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. ये जानते हैं कि धूम्रपान इनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है. मगर इन्हें परवाह नहीं.&lt;br /&gt;२. इन्हें पता है कि ये इनके घर के अन्य सदस्यों, जो स्मोक नहीं भी करते, के लिए भी बुरा है, मगर ये आदत से मजबूर हैं.&lt;br /&gt;३. स्मोकिंग से होने वाली विषैली गैसों का उत्पादन पूरे विश्व के पर्यावरण के लिए नुक्सान ही पहुँचाने वाला है, होता रहे इनकी बला से.&lt;br /&gt;४. सार्वजनिक स्थानों पर किसी स्मोकर को धुंआ उडाते देखने का दृश्य अभद्रता का खुला प्रदर्शन लगता है...."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए &lt;a href="http://pret-vinashak.blogspot.com/2008/09/blog-post_27.html"&gt;यहां&lt;/a&gt; क्लिक करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-4604580347412992732?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/4604580347412992732/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=4604580347412992732' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4604580347412992732'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/4604580347412992732'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post_04.html' title='धूम्रपान पर कड़ी पाबंदी'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-6747079350961838046</id><published>2008-10-03T09:44:00.003+05:30</published><updated>2008-10-03T10:33:49.203+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपने ब्लॉग की चर्चा'/><title type='text'>चहुंओर रंग बिखेरता इंद्रधनुष</title><content type='html'>पिछले दिनों &lt;a href="http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0808/29/1080829044_1.htm"&gt;वेबदुनिया में अपने इस ब्लॊग पर एक लेख &lt;/a&gt;आया तो मैं बहुत उत्साहित हो गई। उसी उत्साह के नतीजे में नेट पर और जगहों पर तलाश की तो पता चला हम कई और जगहों पर भी समीक्षित हैं। तो उनमें से कुछ के बारे में लिंक सहित नीचे दे रही हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://thatshindi.oneindia.in"&gt;THATS HINDI&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;रविवार, मई 11, 2008 &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://thatshindi.oneindia.in/news/2008/05/11/2008051109087000.html"&gt;कैंसर को समर्पित ब्लॉग 'इंद्रधनुष'  &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रविवार, मई 11, 2008 &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। हिंदी ब्लॉग की दुनिया में साहित्य, सिनेमा, राजनीति, संगीत आदि पर तो कई ब्लॉग मौजूद हैं और सक्रिय रूप से काम भी कर रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को समेटे ब्लॉग की संख्या काफी कम है। हाल ही में हिंदी ब्लॉग जगत में कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने के उदेश्य से 'इंद्रधनुष' नामक ब्लॉग का प्रवेश हुआ है।&lt;br /&gt;नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। हिंदी ब्लॉग की दुनिया में साहित्य, सिनेमा, राजनीति, संगीत आदि पर तो कई ब्लॉग मौजूद हैं और सक्रिय रूप से काम भी कर रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को समेटे ब्लॉग की संख्या काफी कम है। हाल ही में हिंदी ब्लॉग जगत में कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने के उदेश्य से 'इंद्रधनुष' नामक ब्लॉग का प्रवेश हुआ है।&lt;br /&gt;यह ब्लॉग कई मायनों में अन्य ब्लॉगों से अलग है। कैंसर से जुड़ी जानकारियों से लेकर इससे जुड़ी गलत अवधारणाओं के बारे में भी यहां जानकारियां दी जा रही हैं। जहां ब्लॉग का नाम 'इंद्रधनुष' रखा गया है, वहीं इसका परिचय इस प्रकार दिया गया है- "यह ब्लॉग उन सबका है जिनकी जिंदगियों या दिलों के किसी न किसी कोने को कैंसर ने छुआ है।"...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.hindimedia.in"&gt;हिंदी मीडिया.इन&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.hindimedia.in/content/view/2850/168/"&gt;कैंसर ने जीने की राह दिखाई&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लॉग समीक्षा |   रंजना भाटिया |  Monday, 21 July 2008 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हिन्दी ब्लॉग समीक्षा की श्रृंखला में प्रस्तुत है इंद्रधनुष ,  इस ब्लॉग की लेखिका है आर अनुराधा, जिन्होंने कैंसर जैसी बीमारी पर जीत हासिल की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जितना हवा में प्रदूषण फ़ैल रहा है, उतनी ही तेजी से बीमारी फ़ैल रही है| कैंसर  का इलाज यदि वक्त रहते हो जाए तो यह  अच्छा है | बहुत अच्छी बात जो इस ब्लॉग को पढने में आती है वह है इसकी  सकरात्मक   सोच | जब कोई व्यक्ति जिंदगी से हार रहा हो उस वक्त यदि इस तरह की सोच उस व्यक्ति के दिल में कुछ पढ़ कर सुन कर पैदा हो जाए तो सब लिखना सार्थक हो जाता है | इस ब्लॉग में लिखे कुछ वाक्य तो जिंदगी के प्रति नजरिया ही बदल देते हैं और दिल में जीने का उत्साह भर देते हैं | नई दवाओं और इलाज के तरीकों ने सारे माहौल और लोगों के सोचने का ढंग ही बदल दिया है। अस्पतालों में ऐसे कई कैंसर के मरीज आपको मिल जाएंगे जो पिछले 24-25 साल से तमाम आशंकाओं को नकारते हुए अपना सफर ज़िंदादिली के साथ तय कर रहे हैं। काफी संभव है कि जब मृत्यु आए तो उसकी वजह कैंसर न हो। ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.rejectmaal.blogspot.com"&gt;रिजेक्ट माल&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;जो कहीं नहीं छ्पा वो यहाँ छपेगा ... सूचना और रचना के लोकतंत्र में आप सबका स्वागत है। अपना रिजेक्ट माल या ऐसा माल जो आपको लगता है कि रिजेक्ट हो जाएगा, उसे rejectmaal@gmail.com पर भेजें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Tuesday, July 8, 2008&lt;br /&gt;&lt;a href="http://rejectmaal.blogspot.com/2008/07/blog-post_08.html"&gt;मुमकिन है कैंसर के साथ जीना ! &lt;/a&gt;कैंसर का खौफ अब पहले से कम हो रहा है। कैंसर के बावजूद अब कई लोग उसी तरह लंबी जिंदगी जी रहे हैं जैसे कि हार्ट की बीमारी या डायबिटीज के मरीज जीते हैं। बीमारी का इलाज न हो तो भी उसका मैनेजमेंट कई बार मुमकिन हो पाता है। कैंसर का मतलब जीवन का अंत नहीं है, इस बात को रेखांकित करता &lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3207950.cms"&gt;एक लेख &lt;/a&gt;आज नवभारत टाइम्स के संपादकीय पन्ने पर मुख्य लेख के रूप में छपा है। ये लेख आर अनुराधा ने लिखा है, जिनकी राजकमल-राधाकृष्ण से छपी किताब &lt;em&gt;इंद्रधनुष के पीछे -पीछे, एक कैंसर विजेता की डायरी&lt;/em&gt; बेस्टसेलर रही है। अनुराधा के ब्लॉग का नाम है इंद्रधनुष। ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://taakjhak.com"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ताक-झांक&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने भी &lt;a href="http://taakjhak.com/go.php?show=newsdetails&amp;id=199"&gt;मेरा एक लेख &lt;/a&gt;&lt;a href="http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2008/08/blog-post_4599.html"&gt;'नारी'&lt;/a&gt; ब्लॊग से लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.josh18.com"&gt;जोश18&lt;/a&gt;सितम्बर 2008 &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://josh18.com/showstory.php?id=202171"&gt;"&gt;जीवन शैली  »  वाह जिंदगी! &lt;br /&gt; एक ब्लॉग, कैंसर के नाम! &lt;br /&gt;12 मई 2008&lt;br /&gt;इंडो-एशियन न्यूज सर्विस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई दिल्ली। हिंदी ब्लॉग की दुनिया में साहित्य, सिनेमा, राजनीति, संगीत आदि पर तो कई ब्लॉग मौजूद हैं और सक्रिय रूप से काम भी कर रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को समेटे ब्लॉग की संख्या काफी कम है। हाल ही में हिंदी ब्लॉग जगत में कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने के उदेश्य से ‘इंद्रधनुष’ नामक ब्लॉग का प्रवेश हुआ है।....&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://anubhaw.blogspot.com"&gt;अनुभव &lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://anubhaw.blogspot.com/2008/05/blog-post_12.html?showComment=1210616280000"&gt;May 12, 2008&lt;br /&gt;कैंसर को समर्पित ब्लॉग 'इंद्रधनुष'&lt;br /&gt;POSTED BY गिरीन्द्र नाथ झा AT MONDAY, MAY 12, 2008  &lt;br /&gt;LABELS: ब्लॉग की बातें &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7993881583428957935-6747079350961838046?l=ranuradha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ranuradha.blogspot.com/feeds/6747079350961838046/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7993881583428957935&amp;postID=6747079350961838046' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6747079350961838046'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7993881583428957935/posts/default/6747079350961838046'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ranuradha.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='चहुंओर रंग बिखेरता इंद्रधनुष'/><author><name>आर. अनुराधा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16394670775058734814</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='17' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-81_0aNoGLuM/ThiRhoVNZ4I/AAAAAAAAAT4/9D44jgaWwyg/s220/SP.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7993881583428957935.post-5430980511045519112</id><published>2008-09-28T16:47:00.003+05:30</published><updated>2008-09-28T17:20:50.983+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एक कैंसर विजेता की डायरी'/><title type='text'>बेटियों के दिन पर उनके लिए खास: कैंसर विजेता की डायरी के पन्ने</title><content type='html'>आज बेटियों के अपने दिन अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘&lt;a href="http://ranuradha.blogspot.com/2008/05/blog-post.html"&gt;इंद्रधनुष के पीछे-पीछे: एक कैंसर विजेता की डायरी&lt;/a&gt;’ के कुछ संबंधित हिस्से उनके और सबके साथ बांट रही हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://www.leahbrowning.net/images/Girl_in_Dappled_Sunlight.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px;" src="http://www.leahbrowning.net/images/Girl_in_Dappled_Sunlight.jpg" border="0" alt="" /&gt;&lt;/a&gt;मैंने अपने को हमेशा एक वंचित बेटी समझा है जिसे पदार्थ के रूप में तो समृद्धि हमेशा मिली लेकिन भावनात्मक संतुष्टि की तलाश में परिवार के बाहर सहृदय लोगों का मुंह देखना पड़ा। इसमें मां की गलती नहीं है कि वे मुझे उम्र के उस बदलावों भरे तूफानी दौर में दिलासा नहीं दे पाईं, जिसकी मुझे सख्त जरूरत थी। दरअसल मां ने भी जो सीखा था, वही व्यवहार मेरे साथ किया। लेकिन आज की मांएं यह बेहतर समझती हैं कि अपनी बेटी को उस कठिन समय में संभालना, जानकारी देना, मजबूती देना और भरोसा दिलाना हर मां के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ये रहे पुस्तक के पृष्ठ 56-57-58 से कुछ हिस्से:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“मन के कोने में एक बात छुपी हुई है जिसे संकोच के परदे हटा कर बाहर लाने की पूरी कोशिश करती हूं- इस बात को कहने का यह, शायद जीवन का एकमात्र, मौका मैं खोना नहीं चाहती। मैं नहीं जानती, ऐसा कुछ मेरे जमाने में हर किशोर होती लड़की को सहना पड़ा होगा या नहीं। लेकिन मेरे दिलो-दिमाग में वे बातें गहरी खुदी हुई हैं। अच्छा लगता है आज की किशोरियों की मांओं यानी अपनी पीढ़ी की परिचित औरतों को अपनी बेटियों के सामान्य विकास की परवाह करता देख कर। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उस समय चौदह साल की थी और अपने आप से ही जूझ रही थी- शरीर और मन के बदलावों से। लगता था सारी दुनिया की नज़रें मुझ पर हैं। हर जगह, हर समय बंदिश है, कुछ अपने संकोच की, कुछ मां की हिदायतों की। मन करता था, किसी ऐसी जगह जा कर रहा जाए जहां मन-मुताबिक हाथों-पैरों और दिलो-दिमाग को पूरी तरह ढीला छोड़कर कुछ देर जिया जा सके। छातियों के बढ़ने के दर्द को सहा पर कभी किसी से कह नहीं पाई। मां ने कभी इन सब विषयों पर बात नहीं की। मुझसे बड़ी एक बहन भी थी, लेकिन कभी खयाल नहीं आया कि उससे ही कुछ पूछा जाए। उस स्तर पर उससे कभी बातचीत ही नहीं होती थी। मां ने कभी बात तो नहीं की लेकिन कभी शाम को कॉलोनी की ही सहेलियों के घर से लौटने में देरी हो तो ताने जरूर दिए- लाज-शर्म नहीं है। और जबाव मेरी आवेश भरी आंखों में होता था- हां, तो मैं क्या करूं। इसमें मेरी क्या गलती है। और एक बार नहीं, अनेक बार मैंने मनाया कि मैं लड़की रहूं भी तो इन छातियों के साथ नहीं। उन्हें छुपाने की कोशिश में कसी हुई शमीज पहनने से लेकर स्कर्ट या मिडी में टक-इन की हुई शर्ट को ढीला रखते हुए उसके नीचे पहनी शमीज़ को खींच-खींच कर रखने जैसे न जाने कितने उपाय किए लेकिन उनका आकार नहीं घटा, बल्कि बढ़ता ही गया।...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...लेकिन स्तन क्या इतन
